वर्ष 35 / अंक - 15 / कॉमरेड चंदू : पोस्टर से सिवान तक

कॉमरेड चंदू : पोस्टर से सिवान तक

कॉमरेड चंदू : पोस्टर से सिवान तक

-- सबा आफरीन 

31 मार्च, कॉमरेड चंद्रशेखर उर्फ ‘चंदू’ की शहादत का दिन मेरे लिए एक तारीख भर नहीं, बल्कि एक जिंदा सवाल था. उसी सवाल ने मुझे उनके जन्मस्थान सीवान तक खींच लिया.

आइसा और छात्रा राजनीति से जुड़ने वाले हर नौजवान की तरह मेरा भी चंदू से पहला परिचय किसी किताब से नहीं, बल्कि रंग-बिरंगे पोस्टरों से हुआ. फिर यूनिवर्सिटी की दीवारों पर उनका नाम दिखा, फिर ‘चंदू तेरे सपनों को मंजिल तक पहुंचाएंगे’ के नारों में उनकी आवाज सुनाई दी, तब कहीं जाकर किसी किताब के कवर पर उनका चेहरा देखा. यानी, चंदू मेरे लिए पहले एक एहसास बने, फिर एक शख्सियत.

सीवान जाने का सफर, दरअसल, एक दिन पहले ही शुरू हो गया था, जब मैं उनके भाषणों के वीडियोज देख रही थी. उन वीडियो में चंदू एक साधारण छात्र की तरह नजर आते हैं, सादा कपड़े, दुबली काया, मासूम चेहरा. लेकिन जैसे ही वो बोलना शुरू करते हैं, श्रोताओं का जोश दुगुना हो जाता है. उनकी बातों में भाव भी है, आर्टिकुलेशन भी और एक ऐसी साफगोई भी, जिसे आने वाली पीढ़ियां बार-बार दोहराया करेंगी.

आज अगर किसी छात्र को भगत सिंह, डॉ. भीमराव अंबेडकर, सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख की विरासत को छात्र राजनीति में समझाना हो, तो चंदू की ये लाइन काफी है ‘हमारी आने वाली पीढ़ियां हमसे जवाब मांगेगीं, जब हाशिये की आवाजें अपने हक के लिए उठ रही थीं, तब तुम कहां थे?’

दूसरे शब्दों में कहें, तो आज देश भर के कैंपसों में ‘राजनीति’ के नाम पर जो भौकाली-दबदबे, पैसे और मनी-मसल पावर का मॉडल खड़ा किया जा रहा है, चंदू की विरासत उसके बरक्स एक लोकतांत्रिक, छात्र-केन्द्रित और संघर्षशील मॉडल की गूंज है जो आज भी कई कैंपसों में ढफली की थाप पर सुनाई देती है.

हमारा सफर सुबह 8 बजे पटना से शुरू हुआ. साथ में थे, कॉमरेड धीरेंद्र झा, कॉमरेड कुमार परवेज, जेएनएसयू की प्रेसिडेंट कॉमरेड अदिति और कॉमरेड प्रेम. रास्ते भर बातचीत का सिलसिला चलता रहा. कामरेड धीरेंद्र से कैंपस में छात्र राजनीति को और व्यापक व संगठित बनाने पर चर्चा हुई. कामरेड अदिति से जनेवि में कैंपस डेमोक्रेसी पर हो रहे हमलों और मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक हालात को चंदू की नजर से समझने की कोशिश की. कॉमरेड परवेज ने कॉमरेड नईमुद्दीन अंसारी समेत उन साथियों की कहानी सुनाई, जिन्होंने चंदू के साथ सीवान में गोलियां झेली थीं और बताया कि ‘सीवान, सीवान कैसे बना?.’

सीवान पहुंचते ही हमारी मुलाकात कॉमरेड नईमुद्दीन अंसारी से हुई. उनके हाथों पर आज भी गोलियों के निशान मौजूद हैं, और कंधे पर तीन तारा वाला लाल झंडा उसी बेबाकी से लहरा रहा है.

चंदू के लिए बने स्मृति स्थल को लाल झंडों और फूलों से सजाया गया था, और बगल में उनकी एक पेंटिंग रखी हुई थी.

श्रद्धांजलि देते वक्त बार-बार वही दुबला-पतला, सादा-सा छात्र मेरी आंखों के सामने आ रहा था, जो जेएनयू में खड़े होकर बोल रहा है और इतिहास को एक नई दिशा दे रहा है.

‘कॉमरेड चंदू को लाल सलाम’, ‘नक्सलबाड़ी लाल सलाम’, ‘सभी शहीद अमर रहें’ – इन नारों ने हमारे भीतर की लौ और तेज कर दिया.

इसके बाद सीवान के साथियों के साथ अमेरिका-इजराइल गठजोड़ द्वारा ईरान पर किए गए हमले के खिलाफ एक शांति मार्च निकाला गया. का. चंदू अक्सर अपने भाषणों में दो नाम लेते थे – भगत सिंह और चेग्वेरा. वो कहा करते थे, ‘हां, मैं महत्वाकांक्षी हूं, मेरी महत्वाकांक्षा है भगत सिंह की तरह जीना और चेग्वेरा की तरह मरना!’ ये दोनों ही नाम साम्राज्यवाद के खिलाफ सबसे बुलंद आवाजों में शामिल हैं. आज जब दुनिया भर में अमेरिका-इजराइल की साम्राज्यवादी धुरी ईरान, फिलिस्तीन और वेनेजुएला पर दमन चला रही है, और देश की संघ-भाजपा सरकार जनता की बुनियादी समस्याओं से मुंह मोड़कर बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप के साथ खड़ी नजर आती है. ऐसे दौर में सीवान की सड़कों पर ‘युद्ध नहीं, शांति चाहिए’ का नारा एक अलग ही उम्मीद जगा रहा था. जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा, तो एक तरफ सत्ता की चुप्पी और समझौते दर्ज होंगे, और दूसरी तरफ सीवान के वो छात्रा-नौजवान, जो सड़कों पर उतरकर इंसाफ और शांति की आवाज बुलंद कर रहे हैं.

सीवान की इस यात्रा ने मेरे भीतर एक नई ऊर्जा पैदा की है. इसने मुझे उन सच्चाइयों से रूबरू कराया, जहां लोग हर दिन अपनी जान हथेली पर लेकर इस लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं. आज जब हम साम्प्रदायिक-फासीवादी ताकतों के खिलाफ, संविधान बचाने के लिए, दलित-पिछड़ों-महिलाओं को हाशिए से केंद्र में लाने के लिए, और सब तक सस्ती शिक्षा पहुंचाने के लिए लड़ रहे हैं तो ये वही लड़ाई है, जिसका आह्वान का. चंदू ने बहुत पहले कर दिया था.

ऐसे में, चंदू की विरासत हर छात्र-युवा के लिए अंधेरे में एक लकड़ी की तरह है जो रास्ता भी दिखाती है और सहारा भी देती है. वो आपको निराश नहीं होने देती लेकिन सफर तो आपको खुद तय करना है.

आप सवाल पूछिए, चंदू जरूर जवाब देंगे, साथियो!


11 April, 2026