-- मनोज भक्त और आदित्य कृष्णा
खान और खनिज (विकास और नियमन) संशोधन कानून, 2026 (2026 का संशोधन) सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलटने की कोशिश कर रहा है जो उसने 2024 में ‘मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथाॅरिटी बनाम स्टील अथाॅरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड’ (एमएडीए) मामले में दिया था. एमएडीए मामले में 9 जजों की बेंच ने राज्यों के इस अधिकार पर मुहर लगाई थी कि वे खनिज अधिकारों और खनिज वाली जमीनों, दोनों पर अलग से टैक्स लगा सकते हैं. यह फैसला 25 जुलाई 2024 को आया था. अब 2026 का नया संशोधन राज्यों के इन दोनों अधिकारों पर पाबंदी लगाना चाहता है.
यह कानूनी लड़ाई तीन दशकों से भी ज्यादा पुरानी है. ‘इंडिया सीमेंट बनाम तमिलनाडु सरकार’ (1989) मामले में 7 जजों की बेंच ने खनिज पर राॅयल्टी को एक तरह का टैक्स मान लिया था और कहा था कि राज्य सरकारें इस पर सेस नहीं लगा सकतीं. लेकिन ‘पश्चिम बंगाल राज्य बनाम केसोराम इंडस्ट्रीज’ (2004) में पांच जजों की पीठ ने उलटी राय रखी और इंडिया सीमेंट की संबंधित टिप्पणी को टाइपिंग की गलती करार दिया. आखिरकार यह विवाद एमएडीए मामले में 9 जजों की बड़ी बेंच के पास पहुंचा. कोर्ट ने 8:1 के बड़े बहुमत से साफ कर दिया कि राॅयल्टी कोई टैक्स नहीं है, बल्कि खनिज निकालने और उसका इस्तेमाल करने के बदले दी जाने वाली कीमत है. आसान शब्दों में, राॅयल्टी खनन का पट्टा लेने वाली कंपनी और खनिज के मालिक के बीच एक करार या कारोबारी लेन-देन है. जबकि टैक्स सरकार अपनी संप्रभु ताकत से जनता या कंपनियों से वसूलती है. इसलिए एमएमडीआर कानून के तहत राॅयल्टी चुकाने से राज्य सूची की एंट्री 50 के तहत राज्यों की टैक्स लगाने की ताकत खत्म नहीं होती. अदालत ने यह भी कहा कि उस वक्त के एमएमडीआर कानून में राज्यों की इस ताकत पर कोई रोक नहीं थी. साथ ही एमएडीए ने माना कि एंट्री 50 खुद संसद को यह छूट देती है कि वह खनिज विकास से जुड़े कानून के जरिए राज्यों की खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की ताकत पर बंदिशें लगा सकती है. यानी एंट्री 50 के तहत टैक्स पर रोक लगाने वाला कानून संसद बना सकती थी.
दूसरी तरफ, खनिज वाली जमीन का मसला बिल्कुल अलग था. अदालत ने साफ कहा कि सिर्फ इसलिए कि जमीन में खनिज है, वह जमीन से कुछ और नहीं बन जाती. वह राज्य सूची की एंट्री 49 के तहत ‘जमीन’ ही रहती है और उस पर राज्य टैक्स लगा सकते हैं. उस जमीन पर लगा टैक्स सिर्फ इसलिए खनिज पर टैक्स नहीं बन जाता क्योंकि टैक्स का हिसाब निकालने के लिए खनिज की मात्रा, कीमत या राॅयल्टी को पैमाना बनाया गया है. टैक्स का विषय और टैक्स नापने का पैमाना, दोनों अलग चीजें हैं. यह बात इसलिए बेहद जरूरी थी क्योंकि एंट्री 50 के उलट एंट्री 49 में संसद की लगाई पाबंदियों की शर्त साफ तौर पर नहीं जोड़ी गई है.
झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के लिए यह संविधान के पन्नों की कोई अमूर्त बहस नहीं है. इन राज्यों से भारी मात्रा में खनिज निकाला जाता है, जबकि खनन वाले इलाके विस्थापन, पर्यावरण की तबाही, सार्वजनिक ढांचे पर दबाव और बुनियादी सेवाओं की बदहाली का बोझ ढो रहे हैं. एमएडीए ने खुद ‘संसाधनों के अभिशाप’ का जिक्र किया और बताया कि खनिज वाले राज्यों के पास टैक्स और राजस्व का अधिकार होना ही तय करता है कि वे स्वास्थ्य, शिक्षा, कल्याण और इंफ्रास्ट्रक्चर पर कितना खर्च कर पाएंगे. इसका सबसे ज्यादा नुकसान झारखंड, ओडिशा, असम और तेलंगाना के उन आदिवासी तबकों को उठाना पड़ता है जो पहले से ही हाशिए पर हैं और जिनके जल, जंगल, जमीन को खनन के चलते कभी न सुधरने वाला नुकसान पहुंचता है.
अब दुर्लभ मृदा खनिजों (रेयर अर्थ मिनरल्स) के बढ़ते महत्व ने दांव और बढ़ा दिया है, जिनका नई तकनीकों में भारी इस्तेमाल हो रहा है. दुनिया भर में ऐसे खनिजों के उत्पादन में चीन का करीब 70% और अमेरिका का 13-14» हिस्सा है, जबकि भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 0.74% है. अब बड़े काॅर्पाेरेट घराने रेयर अर्थ से भरपूर माने जाने वाले ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों की तरफ ललचाई नजरों से देख रहे हैं. इसका समय भी गौर करने लायक है. चल रही जंगों और अमेरिका-इजरायल की ईरान पर जंग से गहराए ऊर्जा संकट ने कोयले और लोहे की मांग काफी बढ़ा दी है. इसने निजी पूंजीपतियों के लिए बिना रोक-टोक और बिना किसी कड़े नियम-कायदों के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा जमाने का खुला मौका बना दिया है.
यह अंतर्विरोध झारखंड और देश के अन्य हिस्सों में भाकपा(माले) के नजरिये के केंद्र में रहा है. पार्टी हमेशा से यह सवाल उठाती रही है कि बेशुमार खनिज संपदा के बावजूद यहां गरीबी, बेरोजगारी, विस्थापन और पलायन क्यों है? पार्टी का साफ कहना है कि खनन का फायदा सबसे पहले राज्य की जनता तक पहुंचना चाहिए, स्थानीय रोजगार, पुनर्वास, पर्यावरण की हिफाजत और इलाकाई विकास के रास्ते, न कि यह दौलत बड़े काॅर्पाेरेट घरानों की तिजोरियों में भर दी जाए.
एमएडीए के बाद झारखंड विधानसभा ने ‘झारखंड मिनरल-बेयरिंग लैंड सेस बिल’ पास किया, जिसमें निकाले गए खनिज के वजन (टन) के हिसाब से अलग-अलग सेस तय किया गया था. भाकपा(माले) के विधायक विनोद कुमार सिंह ने इस तरीके का विरोध किया था और मांग की थी कि यह टैक्स वजन के बदले खनिज के बाजार भाव से जोड़ा जाना चाहिए. उनकी दलील बिल्कुल सीधी थी: टन सिर्फ वजन बताता है, उससे यह पता नहीं चलता कि उस वक्त खनिज से कितनी दौलत कमाई जा रही है. इसके अलावा, एक ही खनिज की अलग-अलग किस्मों के दाम अलग-अलग होते हैं. इसलिए बाजार भाव से जुड़ा सेस खनिज के आर्थिक मूल्य के साथ घटता-बढ़ता रहेगा और राज्यों को बार-बार प्रति टन की दर बदलने के लिए सिर खपाना नहीं पड़ेगा.
अब 2026 का संशोधन उस दायरे को ही सीमित कर देता है जिसमें राज्य ऐसे फैसले ले सकते थे. नई जोड़ी गई धारा 9 डी राज्यों को ‘खनिज अधिकारों’ या ‘खनिज-युक्त जमीनों’ पर कोई भी कर, सेस या दूसरी लेवी लगाने से रोकती है, चाहे उसकी गणना मात्रा, कीमत, राॅयल्टी या किसी और आधार पर हो. छूट सिर्फ तब है जब वह केंद्र सरकार की तय शर्तों और पाबंदियों के दायरे में हो. संशोधन एमएमडीआर कानून के तहत केंद्र के नियंत्रण की घोषणा को भी खनिज-युक्त जमीनों तक बढ़ा देता है. इसे पिछली तारीख से लागू किया गया है, यानी जो लेवी अब तक चुकाई या वसूली नहीं गई थी, उसे पूरी तरह माफ कर दिया गया है. इसका नतीजा यह है कि कंपनियों पर बकाया पुराना सारा पैसा डूब गया. ओडिशा का लगभग 1 से 1.2 लाख करोड़ रुपये और झारखंड का 1.36 लाख करोड़ रुपये का पुराना बकाया सीधे-सीधे खारिज हो गया.
यह संशोधन खनन कंपनियों के लिए नियमों को ढीला करने का रास्ता भी खोलता है. अगर कोई कंपनी पट्टे (लीज) में तय किए गए खनिज के अलावा कोई दूसरा खनिज निकालना शुरू करती है, तो उसे अब नए पट्टे की जरूरत नहीं पड़ेगी. इसे खनन में ‘विविधता लाने’ के नाम पर सही ठहराया जा रहा है. लेकिन चिंता यह है कि इससे पूरी लीज अवधि के दौरान जमीन पर कंपनी का कब्जा बरकरार रहेगा, भले ही अचानक खनन का तरीका बदलने से पर्यावरण और पानी की उपलब्धता को ऐसा भारी नुकसान पहुंचे जिसकी भरपाई कभी न हो सके. इस पर वैज्ञानिक शोध भी बहुत कम है. यह भी साफ नहीं है कि ‘डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन’ (डीएमएफ) इस नए विनाश को रोकने में कितना कारगर हो पाएगा.
खनिज अधिकारों के मामले में तो केंद्र एंट्री 50 का सहारा ले सकता है. लेकिन सबसे पेचीदा सवाल खनिज वाली जमीन का है. एमएडीए फैसले में साफ कहा गया था कि ऐसी जमीनें राज्य सूची की एंट्री 49 के तहत आती हैं, और टैक्स तय करने के लिए खनिज के वजन या कीमत का इस्तेमाल करने से वह खनिज अधिकार का टैक्स नहीं बन जाता. धारा 9-डी अब इन टैक्सों पर भी केंद्र की शर्तें थोपने की कोशिश कर रही है. झारखंड, केरल, तेलंगाना और कर्नाटक ने इस संशोधन को अदालत में चुनौती देने का फैसला किया है, और खनिज वाली जमीन का यह मुद्दा कोर्ट में सबसे ज्यादा जांच-परख का केंद्र बनने की संभावना है.
केंद्र सरकार का तर्क है कि राज्यों के अलग-अलग टैक्स लगाने से लागत बढ़ती है, असमंजस पैदा होता है और खनन क्षेत्र में नया निवेश नहीं आता. केंद्र यह भी कह रहा है कि खनन से आने वाले राजस्व का लगभग 90% हिस्सा राज्यों को ही जाता है. लेकिन लड़ाई सिर्फ इस बात की नहीं है कि राज्य के खजाने में कितना प्रतिशत पैसा पहुंच रहा है. संसद और केंद्र सरकार के बनाए ढांचे के तहत मिलने वाली राॅयल्टी, नीलामी का प्रीमियम या डीएमएफ का पैसा और संविधान द्वारा राज्यों को सीधे दी गई टैक्स लगाने की ताकत, दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है. एमएडीए ने राज्यों को अपनी वित्तीय नीतियां खुद तय करने की आजादी दी थी. धारा 9-डी अब उसी आजादी को केंद्र की शर्तों के पिंजरे में बंद करना चाहती है.
जिस तरह से इस कानून को पास किया गया, उस पर भी कड़ा विरोध हुआ है. भाकपा(माले) ने इस बात की कड़ी निंदा की है कि इसे संसद में बिना किसी बहस या चर्चा के, ‘पारदर्शिता’ और ‘कारोबार में आसानी’ के नाम पर आनन-फानन में पास करा दिया गया, जिससे निजी कंपनियों को तय दर पर अयस्क लूटने की छूट मिल गई. पार्टी ने इसे संघीय ढांचे की अनदेखी, राज्यों के प्रति औपनिवेशिक रवैया और मौजूदा व भविष्य के खनिज संसाधनों को काॅर्पाेरेट हाथों में सौंप देना करार दिया है. राज्यों की कमाई पर इसका बहुत बुरा असर पड़ेगा. पुराने बकाए के डूबने के अलावा, अकेले ओडिशा को हर साल 12,000 से 20,000 करोड़ रुपये और झारखंड को करीब 14,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होने का अनुमान है. छत्तीसगढ़, असम, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश को भी ऐसे ही नुकसान की आशंका है. राजस्व में इतनी बड़ी गिरावट से जनकल्याणकारी योजनाएं, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं बुरी तरह प्रभावित होंगी – और ठीक यही बात एमएडीए फैसले ने भी कही थी कि खनिज पैदा करने वाले राज्यों की वित्तीय ताकत का सीधा ताल्लुक इन सुविधाओं को चलाने से है.
झारखंड में भाकपा(माले) ने इस संशोधन का विरोध इसे खनिज उत्पादक राज्यों के संघीय अधिकारों पर हमला और काॅर्पाेरेट-केंद्र गठजोड़ द्वारा संसाधनों के केंद्रीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा मानते हुए किया है. पार्टी ने इस विरोध को जल, जंगल, जमीन की पुरानी लड़ाई और झारखंड से लूटी जाने वाली बेहिसाब दौलत बनाम वहां की जनता की बदहाली के तीखे अंतर्विरोध से जोड़ा है.
पार्टी ने इस सवाल को बड़कागांव और गोंदलपुरा में अडानी के कोयला प्रोजेक्ट के खिलाफ किसानों के आंदोलन से भी जोड़ा है, जहां गांव और जंगलों की जमीन खनन के लिए छीनने और विस्थापन का कड़ा विरोध हो रहा है. पार्टी का मानना है कि खनिज संसाधनों पर नियंत्रण का सवाल असल में काॅर्पाेरेट भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष, स्थानीय रोजगार, सम्मानजनक पुनर्वास और पर्यावरण सुरक्षा की मांगों से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है.
भाकपा(माले) इस लड़ाई को जमीन के अधिकार के ऐतिहासिक संघर्ष के रूप में देखती है. भारत में जमीन का मालिकाना हक कभी पूरी तरह केंद्र सरकार के हाथ में नहीं रहा. अंग्रेजों के दौर से लेकर आजादी के बाद तक, जनता के लंबे संघर्षों ने ही जमीन पर सामंती-जमींदारी एकाधिकार को तोड़ा था. पार्टी के अनुसार जमीन पर राज्यों के अधिकार को इसी संघर्ष के नजरिए से देखा जाना चाहिए. पार्टी का कहना है कि पिछले तेरह सालों में भूमि कानूनों में किए गए बदलावों ने जंगलों और साझी जमीनों पर सामुदायिक अधिकारों को कमजोर किया है. झारखंड में ‘लैंड बैंक’ नीति और भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में बदलाव करके सामुदायिक जमीनों को सरकारी खाते में डाला जा रहा है, पेसा कानून को कमजोर किया जा रहा है, और खनन व उद्योगों के लिए जमीन लेते वक्त सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव के आकलनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. पार्टी का तर्क है कि 2026 का संशोधन जमीन को काॅर्पाेरेट के हवाले करने की इस प्रक्रिया को और तेज करेगा, और यह स्थानीय समुदायों के बुनियादी अधिकारों की बलि चढ़ाकर होगा.
इसलिए खनिज राजस्व पर राज्य के अधिकार का सवाल प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के बड़े सवाल से जुड़ा है. खनिज किन शर्तों पर निकाले जाएंगे, यह कौन तय करता है, यह इस बात से अलग नहीं है कि खनन की तबाही कौन चुकाता है, रोजगार किसे मिलता है, प्रभावित समुदायों का पुनर्वास कैसे होता है और उससे पैदा हुई दौलत कहां खर्च होती है.
यह विरोध अब सड़कों पर भी उतर आया है. 9 सितंबर 2026 को भाकपा(माले) ने झारखंड की कोयला राजधानी धनबाद में एक विशाल रैली निकाली और 2026 के इस संशोधन को तुरंत रद्द करने की मांग की. पोलित ब्यूरो सदस्य आनंद महतो ने ऐलान किया कि अगर केंद्र सरकार ने यह संशोधन वापस नहीं लिया, तो झारखंड से खनिजों की ढुलाई रोक दी जाएगी. झारखंड मुक्ति मोर्चा, बीजू जनता दल और कांग्रेस ने भी इसका विरोध किया है. पार्टी ने सार्वजनिक संसाधनों की काॅर्पाेरेट लूट के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन के साथ-साथ राज्य-स्तरीय संघर्षों का आह्वान किया है, ताकि स्थानीय समुदायों को एकजुट कर राज्यों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की जा सके और जमीन पर जनता का हक बहाल हो सके.
एमएडीए के फैसले ने खनिज-उत्पादक राज्यों को वह संवैधानिक गुंजाइश दी थी कि वे अपने संसाधनों से जुड़े सवालों के जवाब खुद तय कर सकें. 2026 का संशोधन खनिज अधिकारों और खनिज-संपन्न भूमि, दोनों को केंद्र द्वारा तय शर्तों वाले एक राजकोषीय ढांचे में लाकर उसी गुंजाइश को बेहद सीमित कर देना चाहता है. झारखंड जैसे राज्यों के लिए यह सिर्फ इतना नहीं है कि खनन की कमाई का कुछ हिस्सा उन्हें मिलता रहेगा या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या राज्य के पास यह संवैधानिक अधिकार बचेगा कि उसकी जमीन से निकलने वाली दौलत उसके अपने खजाने और उस तबाही को झेलने वाली आम जनता की जिंदगी को बेहतर बनाने के काम आए.