जनता की उम्मीदों और ज्यादातर एग्जिट पोल के अनुमानों के बिल्कुल विपरीत, बिहार चुनाव का नतीजा महाराष्ट्र की तरह हैरतअंगेज साबित हुआ. पहली नजर में यह 2010 की तस्वीर दोहराता लगता है, जब नीतीश कुमार की एनडीए ने 243 में से 206 सीटें जीत ली थीं और मुख्य विपक्षी पार्टी राजद सिर्फ 22 सीटों पर सिमट गई थी. लेकिन वह दौर अलग था – जब नीतीश कुमार अपने राजनीतिक उत्कर्ष पर थे और दिल्ली में मोदी युग की शुरुआत नहीं हुई थी. ऐसे में, पंद्रह साल बाद, पूरा विपक्ष सिर्फ 35 सीटों पर सिमट जाए, यह बिल्कुल अस्वाभाविक है – खासकर तब जब पिछली बार सरकार मुश्किल से बची थी और 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा अपना स्वतंत्र बहुमत भी खो चुकी थी.
इस नतीजे को समझने के लिए हमें दो बड़ी, अभूतपूर्व सरकारी दखलंदाजियों की पृष्ठभूमि देखनी होगी, जिन्हें लगातार कमजोर, निकम्मी और अलोकप्रिय होती सरकार के गिरते चुनावी प्रदर्शन को रोकने के लिए अंजाम दिया गया. पहली दखलंदाजी थी सर्जिकल तरीके से चलाया गया मतदाता सूची का ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (एसआइआर), जिसमें लगभग 69 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए और 25 लाख से ज्यादा नए नाम जोड़े गए. इसके अलावा, एसआइआर पूरा होने और चुनाव घोषित हो जाने के बाद भी 3 लाख से अधिक नाम रहस्यमय तरीके से जोड़ दिए गए. इस पूरी प्रक्रिया ने पूरे राज्य के चुनावी संतुलन को पलट कर रख दिया. एसआइआर के जरिये व्यापक पैमाने पर मतदाता सूची से नाम काटे जाने और जोड़े जाने से हुए बदलाव ज्यादातर इलाकों में 2020 में विपक्ष के जीत-हार के अंतर से भी ज्यादा थे. फिर एसआइआर के बाद जो अतिरिक्त नाम मतदाता सूची में जोड़े गए, उससे दर्जनभर से ज्यादा करीबी सीटों में संतुलन पूरी तरह बदल गया.
एसआइआर ने न केवल मताधिकार खोने का डर बढ़ाया, बल्कि नागरिकता और उससे जुड़े अधिकार-लाभ छिन जाने की आशंका से भी व्यापक चिंता और भय का माहौल पैदा कर दिया. बिहार ने अपने चुनावी इतिहास में सबसे ज्यादा मतदान दर्ज किया, जिसमें बाहर रहने वाले मतदाताओं को संगठित तरीके से लाने के इंतजाम भी शामिल थे, खासतौर पर एनडीए समर्थक मतदाताओं को लाने के लिए चलाई गई खास ट्रेनें. प्रशासन ने भी अपनी खुली पक्षधरता दिखाते हुए बड़े पैमाने पर सरकार-समर्थक संगठित फर्जी मतदान को खुली छूट दी. यह अतिरिक्त वोट, चाहे फर्जी हों या वास्तविक, दोनों ने मिलकर एनडीए के वोट शेयर को बढ़ाया, और ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ जैसी विसंगतिपूर्ण व्यवस्था ने वोट शेयर में मामूली बढ़त को सीटों में भारी बहुमत में बदल दिया.
नतीजा यह हुआ कि सत्ताधारी गठबंधन ने अविश्वसनीय 202 सीटें जीत लीं, जो ज्यादातर एग्जिट पोल के अनुमानों को भी पीछे छोड़ गईं.
दूसरी सरकारी दखलंदाजी चुनावों से ठीक पहले और यहां तक कि मतदान के दौरान भी अभूतपूर्ण मात्रा में सीधे नकद हस्तांतरण के रूप में सामने आई. एक संवेदनहीन, निकम्मी और तेजी से अलोकप्रिय होती सरकार के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश को शांत करने के लिए तीन खास कदम उठाए गए : वृद्धावस्था और दिव्यांग पेंशन को 400 रूपये से बढ़ाकर 1,100 रूपये प्रति माह करना; हर महीने 125 यूनिट तक मुफ्त बिजली देना; और सबसे अहम – ग्रामीण आजीविका मिशन ‘जीविका’ द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी लगभग 1.5 करोड़ महिलाओं को एकमुश्त 10,000 रूपये का नकद हस्तांतरण.
नई योजना, जिसे ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ नाम दिया गया, असल में बड़ा ही उपहासपूर्ण है, क्योंकि इसका सही नाम तो ‘महिला कर्जदार योजना’ या ‘महिला ऋण-ग्रस्तता योजना’ होना चाहिए. इसे बिहार में चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से ठीक कुछ दिन पहले शुरू किया गया, और पैसे का वितरण चुनाव के दौरान भी चलता रहा. एक इंटरव्यू में अमित शाह ने 10,000 रुपये की इस राशि को आने वाले दिनों में और बड़ा कर्ज देने के लिए ‘बीज पूंजी’ बताया – यानी ये शुरुआत भर है. बिहार की महिलाओं में माइक्रोफाइनेंस की जबरन वसूली को लेकर फैले गुस्से और नाराजगी को देखते हुए परेशान नीतीश कुमार को सफाई देनी पड़ी कि यह 10,000 रुपये कर्ज नहीं है और इसे लौटाना नहीं पड़ेगा. यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह पैसा सीधे वोट में बदले और चुनावी फसल ठीक से काटी जाए, चुनाव आयोग की पोस्ट-पोल प्रेस नोट के मुताबिक 1,80,000 जीविका ‘वालंटियर’ को चुनाव ड्यूटी में लगाया गया.
चुनाव के दौरान आया एक तीसरा बड़ा संकेत, जिसे मीडिया ने लगभग नजरअंदाज कर दिया था – पीरपैंती-अदानी पावर डील का ऐलान. इस डील के तहत अदानी को 1,050 एकड़ जमीन महज 1 रुपये की वार्षिक लीज पर दी गई, और साथ ही बिजली को 6 रु. प्रति यूनिट से ज्यादा कीमत पर खरीदने की गारंटी भी दी गई. मोदी कैबिनेट के पूर्व ऊर्जा मंत्री और आरा से दो बार के भाजपा सांसद आरके सिंह ने इस सौदे को 62,000 करोड़ रुपये का घोटाला बताया और सीबीआई जांच की मांग की, और नतीजतन उन्हें अपनी ही पार्टी से बाहर कर दिया गया. चुनावी बॉन्ड को असंवैधानिक करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कॉर्पारेट दानदाताओं और राजनीतिक दलों के बीच ‘कुछ देकर कुछ लेने’ की इस व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए थे.
तो फिर पीरपैंती पावर डील के बदले बिहार चुनावों में अदानी समूह की क्या भूमिका रही? इसका कुछ सुराग शायद हमें प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी की कॉरपोरेट-फंडेड राजनीतिक यात्राओं और इन चुनावों में भाजपा-एनडीए द्वारा पैसे की बेहिसाब ताकत के इस्तेमाल से मिलता है. आने वाले दिनों में बिहार को सिर्फ नए सिरे से सामंती दमन और तेज होती सांप्रदायिक नफरत-हिंसा ही नहीं, बल्कि और तीखी कॉरपोरेट लूट का भी सामना करना पड़ेगा. बिहार में विकास की बहस, जो अब तक रोजगार, आमदनी, सुविधाओं और मेहनतकशों के अधिकारों से कटी रही है, अदानी के बढ़ते दखल के साथ और ज्यादा इंफ्रास्ट्रक्चर-केंद्रित और जन-विमुख होती जाएगी.
कई मायनों में 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का नतीजा वही पैटर्न और वही पैमाना दोहराता है जो नवंबर 2024 के महाराष्ट्र चुनाव में दिखा था. महाराष्ट्र में एमवीए 288 में से केवल 50 सीटों पर सिमट गया था और बिहार में इंडिया गठबंधन 243 में से महज 35 सीटों पर. मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया अब पूरे देश में एक संगठित और योजनाबद्ध ‘इलेक्टोरल पर्ज’ – यानी मतदाताओं की सुनियोजित सफाई – में बदल दी गई है. और चुनावी इंजीनियरिंग का नकद-हस्तांतरण मॉडल अब एक नए और खतरनाक स्तर तक ले जाया जा चुका है. बिहार ने जन सुराज पार्टी के रूप में कॉरपोरेट-पोषित एक अति-प्रचारित प्रयास भी देखा, जिसका मकसद सत्ता-विरोधी जन-आक्रोश को एकजुट होने से रोकना था. यह प्रयास अंततः ध्वस्त हो गया, लेकिन पूरे चुनाव-पूर्व दौर में मीडिया पर इसका ही दबदबा रहा.
मुसलमानों के चुनावी प्रतिनिधित्व में भारी गिरावट और डिप्टी सीएम के लिए किसी मुस्लिम नाम का ऐलान न होना, मुस्लिम समाज में गहरी नाराजगी का बड़ा कारण बना. इसी माहौल में एआईएमआईएम एक बार फिर बिहार में मुस्लिम राजनीति का प्रमुख केंद्र बनकर उभरी और उसने 2020 में जीती अपनी सभी पांच सीटें इस बार भी जीत लीं. लेकिन एनडीए की भारी जीत का परिणाम यह हुआ कि विधानसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व अपने ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया – पिछली विधानसभा के 19 की तुलना में अब सिर्फ 11 मुस्लिम विधायक हैं. 2010 में जब एनडीए के पास 206 सीटें थीं, तब जदयू में सात और भाजपा में भी एक मुस्लिम विधायक था. लेकिन इस बार एनडीए में जदयू का केवल एक मुस्लिम विधायक है, जबकि बाकी दस मुस्लिम विधायक एआईएमआईएम, राजद और कांग्रेस से आते हैं. एक और महत्वपूर्ण उलटफेर यह रहा कि एनडीए खेमे में सवर्ण/जनरल कैटेगरी के 69 विधायक अब ओबीसी के 66 विधायकों से ज्यादा हो गए हैं. यह भी ध्यान रखने की बात है कि भाजपा ने 101 उम्मीदवारों की सूची में 16 फीसदी मुस्लिम आबादी में से एक भी नाम शामिल नहीं किया, जबकि 10.7 फीसदी सवर्ण हिंदू आबादी को 49 टिकट मिले.
भाकपा(माले) ने इस चुनाव में बीस सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन पार्टी सिर्फ दो सीटें ही जीत पाई – जबकि पांच साल पहले उसने बारह सीटें जीती थीं – हालांकि पार्टी का वोट शेयर केवल मामूली रूप से घटा है. पार्टी चार सीटें तीन हजार से भी कम के बेहद छोटे अंतर से हार गई, जिनमें से एक सीट तो सिर्फ 95 वोटों से. पार्टी निश्चित रूप से नतीजों की गहराई से समीक्षा करेगी, जरूरी सबक निकालेगी और आगे के लिए सुधारात्मक कदम उठाएगी. इंडिया गठबंधन को भी व्यापक समीक्षा करनी होगी – प्रशासनिक हेराफेरी, चुनावी धांधली और चुनावी तंत्र के दुरुपयोग के पूरे दायरे को उजागर करना और चुनौती देना होगा, जिसकी शुरुआत भारतीय चुनाव आयोग की बेहद मनमानी और पक्षपातपूर्ण भूमिका से होती है. और उतना ही जरूरी है कि इंडिया गठबंधन अपनी अंदरूनी कमजोरियों और चूकों से भी सबक ले और उन्हें दूर करे.
नीतीश कुमार सरकार का पांचवां कार्यकाल पहले से कहीं ज्यादा भाजपा के दबदबे में चलेगा, और संघ परिवार ने यह बिलकुल नहीं छुपाया है कि वह बिहार को बुलडोजर राज की प्रयोगशाला बनाना चाहता है. असामान्य रूप से भारी बहुमत वाली सरकारें अक्सर तेजी से बिखर जाती हैं, और जनता की बदलाव की चाहत के विपरीत इतने असामान्य बहुमत के साथ सत्ता में लौटी एनडीए सरकार भी शायद इसका अपवाद नहीं होगी. लेकिन बिहार पर कब्जा बनाए रखने के बाद अब संघ-भाजपा की नजर चार राज्यों – असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल – पर है, जहां मई 2026 तक चुनाव होंगे, और उसके बाद उत्तर प्रदेश पर, जहां फरवरी 2027 तक चुनाव तय है.
संवैधानिक लोकतंत्र की बुनियाद को बचाने के लिए यह जरूरी है कि भारत उस खतरनाक रफ्तार को तुरंत रोके, जहां सत्ता एक ही पार्टी के हाथों में लगातार सिमट रही है और धन-संपदा कुछ गिने-चुने हाथों में और भी तेजी से केंद्रित हो रही है, जो बिहार चुनावों के बाद बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है. एक तरफ मजबूत होती फासीवादी मुहिम और दूसरी तरफ लोकतांत्रिक पुनर्जागरण की ताकतों के बीच की लड़ाई की रेखायें आज पहले से कहीं ज्यादा साफ और तीखी हैं. देश की तमाम प्रगतिशील ताकतों को चाहिए कि वे बिहार के नतीजों से अपनी एकता, अपने संकल्प और अपनी ताकत को किसी भी कीमत पर कमजोर न होने दें.
यह वक्त एकजुट होने और आगे बढ़ने का है.