वर्ष 35 / अंक - 15 / जनता का मताधिकार चुराने की साजिश को ध्वस्त करें !

जनता का मताधिकार चुराने की साजिश को ध्वस्त करें !

जनता का मताधिकार चुराने की साजिश को ध्वस्त करें !

दो चरणों में होनेवाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए नामांकन प्रक्रिया अब अपने अंतिम चरण में है, ऐसे में इन चुनावों के लिए मतदाता सूची को ‘फ्रीज’ (स्थगित) घोषित कर दिया गया है. और इसके साथ ही, जिस चुनावी लोकतंत्र को हम 1952 में हुए पहले चुनावों से अब तक जानते आए हैं, उसे भी एक तरह से ‘डीप फ्रीज’ में डाल दिया गया है.

कई राज्य अबतक उस दर्दनाक अनुभव से गुजर चुके हैं, जिसे भारत का चुनाव आयोग मतदाता सूची का ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआइआर) कहता है. मतदाता सूची को पूरी तरह से त्रुटिहीन बनाने के नाम पर, जिसमें मृत मतदाताओं, एक से अधिक जगह पर दर्ज नामों वाले मतदाताओं, या उन मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं जो अपने मूल पंजीकरण स्थान से हमेशा के लिए कहीं और चले गए हैं. बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं. जब तक यह एसआइआर प्रक्रिया पूरे भारत में पूरी होगी, तब तक दुनिया चुनावी इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी चुनावी छंटनी देख चुकी होगी.

हालांकि सभी राज्यों में मतदाताओं के नाम हटाने का पैमाना बहुत बड़ा है, लेकिन पश्चिम बंगाल में जो हो रहा है वह सचमुच चौंकाने वाला है – यहां लाखों मतदाताओं के वोट देने के अधिकार को, उनकी अपनी बिना किसी गलती के, निलंबित कर दिया गया है. पश्चिम बंगाल में नाम हटाने की शुरूआती संख्या लगभग उतनी ही थी जितनी हमने बिहार में देखी थी – एसआइआर प्रक्रिया से पहले के 7.6 करोड़ मतदाताओं में से 58 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए थे. लेकिन इसके बाद जो शुरू हुआ, वह बड़े पैमाने पर उत्पीड़न और चुन-चुनकर लोगों को बाहर करने की एक अभूतपूर्व गाथा बन गई.

पश्चिम बंगाल में, निर्वाचन आयोग ने छानने-बीनने के कुछ अतिरिक्त तरीके लगाए, ताकि उन मामलों का पता लगाया जा सके जिन्हें उसने ‘तार्किक विसंगति’ वाले मामले कहा. बिना परखे हुए सॉफ्टवेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) टूल्स का इस्तेमाल करते हुए चुनाव आयोग ने दावा किया कि उसने ऐसे लगभग 1.50 करोड़ मामलों का पता लगाया है, और बाद में इस संख्या को कम करके लगभग 1.00 करोड़ तक सीमित कर दिया. इन सभी मतदाताओं से कहा गया कि वे सुनवाई के लिए उपस्थित हों और अतिरिक्त दस्तावेज जमा करें. इसके बाद, और 5 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए, तथा 60 लाख मामलों को न्यायिक निर्णय के लिए भेज दिया गया. इस तरह, मतदाता सूची को अंतिम रूप देने का काम चुपचाप एक न्यायिक प्रक्रिया में बदल गया.

इन साठ लाख मतदाताओं के फैसले से लोगों के नाम बाहर किए जाने की दर बहुत ज्यादा बढ़ गई है : लगभग 45 प्रतिशत. इस बड़े पैमाने के अलावा, न्यायिक फैसले और नतीजतन नाम हटाने की प्रक्रिया के मुतल्लिक और भी ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि इसमें मुसलमानों के नाम काफी अनुपातहीन तरीके से हटा दिए गए हैं. मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे मुस्लिम-बहुल जिलों के कुछ चुनाव क्षेत्रों में 2-5 प्रतिशत की शुरूआती नाम हटाने की दर दस से बीस गुना बढ़कर 40-50 प्रतिशत हो गई.

यह पैटर्न उन जिलों में भी साफ देखा गया है जहां मुस्लिमों की आबादी औसत स्तर पर है. उदाहरण के लिए, नंदीग्राम चुनाव क्षेत्र पर विचार करें जहां 2021 में ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल विधान सभा में विपक्ष के निवर्तमान नेता शुभेंदु अधिकारी से करारी हार मिली थी. नंदीग्राम में लगभग 25 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है. दिसंबर के आखिर में प्रकाशित पहली एसआइआर लिस्ट में 10,604 नाम हटाए गए थे, जिनमें से 33.3 प्रतिशत मुसलमान थे – यानी हर तीन में से एक. लेकिन अब अनुपूरक लिस्ट में 2,826 और वोटरों के नाम हटाए जाने की बात है जिसमें मुसलमानों की संख्या 2,700 है, यानी आश्चर्यजनक 95.5 प्रतिशत ! ‘ऑल्टन्यूज’ ने कोलकाता की दो सीटों - ममता बनर्जी की मौजूदा सीट भवानीपुर और बालीगंज - में अपने गहन अध्ययन के दौरान ऐसे ही पैटर्न पाए हैं.

जब सुप्रीम कोर्ट के सामने फैसले का मुद्दा आया, तो जजों ने एक और शिकायत फोरम और सुधार के विकल्प - ट्रिब्यूनल - के गठन पर जोर दिया. हमें बताया गया कि न्यायिक फैसले के जरिये हटाए गए वोटरों की अपील पर विचार करने के लिए उन्नीस ट्रिब्यूनल बनाए जाएंगे. सुनने में तो यह ठीक लगता है, किंतु ट्रिब्यूनल तो सिर्फ कागजों पर रह जाते हैं. लेकिन जब ट्रिब्यूनल अभी तक असल में शुरू ही नहीं हुए हैं, तो 27 लाख बाहर किए गए मतदाताओं को चुनाव से पहले न्याय कैसे मिल सकता है जो बिल्कुल जिंदा हैं और जिनके नाम सूची में दर्ज हैं ? कोर्ट अब यह तसल्ली दे रहा है कि अगर अपीलें मान ली जाती हैं, तो बाहर किए गए वोटर भविष्य के चुनावों में हमेशा वोट दे सकते हैं ! देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है. अगर चुनाव आयोग और न्यायपालिका की संयुक्त कार्रवाई की प्रक्रियागत जटिलताओं के चलते किसी नागरिक का मताधिकार स्थगित कर दिया जाता है, तो इसे योग्य वोटर के मताधिकार-हरण के अलावा और क्या कहा जाएगा ? और जब लाखों मतदाताओं को बाहर कर दिया जाए, तो पूरा चुनाव ही अनुचित और दूषित हो जाता है. निर्णय और सत्यापन को टाला जा सकता है, लेकिन सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को न तो टाला जा सकता है और न ही उसे शिथिल किया जा सकता है.

जब एसआइआर शुरू किया गया था, तो इसका मूलमंत्र था ‘कोई भी योग्य मतदाता छूटना नहीं चाहिए’. अब, जब 2024 के लोकसभा चुनावों में मतदान करने वाले 27 लाख मतदाताओं को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है, तो पात्रता के सिद्धांत को ही पूरी तरह से उलट दिया गया है. पश्चिम बंगाल में अब वोट नागरिकों का मौलिक अधिकार नहीं रह गया है, बल्कि यह विशेषाधिकार और किस्मत की बात बन गया है. लाखों मतदाताओं के मतदान के अधिकार को छीनकर कराया गया चुनाव स्पष्ट रूप से एक मखौल है – ऐसा अभूतपूर्व मखौल, जो चुनावी सूची को अंतिम रूप देने के सबसे बुनियादी स्तर पर ही किया गया है.

हम इस मखौल के खिलाफ कैसे लड़ें ? कई लोगों का तर्क है कि ऐसे हास्यास्पद चुनाव में हिस्सा लेना इस असंवैधानिक प्रक्रिया को वैधता प्रदान करने जैसा है. लेकिन क्या एक प्रतीकात्मक बहिष्कार कोई प्रभावी राजनीतिक प्रत्युत्तर हो सकता है ? या, क्या इससे सत्ता हथियाने वालों के लिए मैदान खुला नहीं रह जाएगा ? नोटबंदी और चुनावी बॉन्ड (जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने बाद में असंवैधानिक घोषित कर दिया था) से लेकर सीएए और एसआइआर तक, मोदी सरकार के ज्यादातर कदम अतार्किक और खुले तौर पर भेदभावपूर्ण रहे हैं. जब नागरिकों को इन उपायों द्वारा गढ़ी और विकृत की गई प्रक्रियाओं में शामिल होने के लिए मजबूर किया जाता है, तो वे न तो इन गलतियों को वैधता प्रदान करते हैं, और न ही वे इन अन्यायपूर्ण कृत्यों के खिलाफ अपना संघर्ष छोड़ते हैं. किसी भी अन्य राज्य की तुलना में, पश्चिम बंगाल में एसआइआर की प्रक्रिया एक बड़ा मुद्दा बन गई है. यह अब जगजाहिर तथ्य है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता हथियाने के लिए भाजपा ने चुनावी प्रणाली के बुनियादी सिद्धांतों पर इतना जबरदस्त हमला बोला है, और इसीलिए चुनावी अभियान को सीधे तौर पर एसआइआर के इसी हमले के खिलाफ निर्देशित किया जाना चाहिए. जो लोग सत्ता हथियाने के लिए मतदाताओं को सूची से बाहर निकालना चाहते हैं, उन्हें अवश्य ही करारा जवाब देना होगा.

11 April, 2026