वर्ष 35 / अंक - 06 / बिहार में जोर पकड़ रही है नीट छात्रा को न्याय दिलान...

बिहार में जोर पकड़ रही है नीट छात्रा को न्याय दिलाने की मांग

बिहार में जोर पकड़ रही है नीट छात्रा को न्याय दिलाने की मांग

बिहार की राजधानी पटना में बहुचर्चित नीट छात्रा बलात्कार-हत्याकांड ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि महिलाओं के खिलाफ सत्ता और सिस्टम का बेहद संवेदनहीन, अमानवीय और अपराधी चरित्र भाजपा-जदयू शासन की चारित्रिक विशिष्टता बन गई है – शंभू गर्ल्स हॉस्टल में जहानाबाद की नीट छात्रा के साथ बलात्कार के बाद हत्या और औरंगाबाद की एक अन्य नीट छात्रा की पटना में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने पूरे राज्य को झकझोर दिया है – ये कोई घटना मात्र नहीं, बल्कि उस राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था का परिणाम है जिसमें अपराधियों को संरक्षण और पीड़ितों को अन्याय मिलता है.

पुलिस-प्रशासन का झूठ : साजिश की पहली परत

शंभू गर्ल्स हॉस्टल कांड में पुलिस-प्रशासन ने जिस तरह झूठ पर झूठ गढ़ा, बयान बदले और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया, वह अपने आप में इस बात का चीखता हुआ सबूत है कि मामला साधारण नहीं है. पहले ही दिन पुलिस ने बलात्कार से साफ इंकार करके अपने रूख का परिचय दे दिया था, जबकि परिजन लागातार बलात्कार और अस्पताल के अंदर हत्या का आरोप लगाते रहे. जब किसी जघन्य अपराध में सच को छुपाने की इतनी बेताबी हो, तो सवाल उठता है. आखिर डर किस बात का है? क्या डर अपराधियों के पकड़े जाने का है, या फिर उन चेहरों के बेनकाब होने का, जो सत्ता के शीर्ष तक बैठे हैं? जनआंदोलनों के दबाव में गठित एसआईटी भी तथ्यों को उजागर करने के बजाय गुमराह करने का जरिया बनती दिखी. लेकिन जब बाद में एफएसएल रिपोर्ट ने बलात्कार की पुष्टि कर दी तो सरकार की बोलती बंद हो गई. तब सरकार ने परिजनों को ही चुप कराने की कोशिश की.

मुजफ्फरपुर से पटना तक : वही पुराना पैटर्न

क्या हम मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड को भूल चुके हैं? क्या उस भयावह सच्चाई से हमने कुछ भी नहीं सीखा? तब भी सिस्टम ने पहले इंकार किया, फिर लीपापोती की और अंत तक पीड़िताओं को ही चुप कराने की कोशिश की. आज भी वही पैटर्न दोहराया जा रहा है – मिथ्या प्रचार, सबूतों को मिटाने की कोशिश, परिजनों पर दबाव, लालच देने और दबाव डालने के जरिए मामले को दबा देने की राजनीति. क्या यही महिला सशक्तीकरण है? और इन मार दी गई लड़कियों का चरित्र हनन कोई और नहीं बल्कि बिहार का डीजीपी कर रहा है, वह भी उसके परिजनों के सामने. निर्लज्जता का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है? सोचिए उस मां पर क्या गुजरी होगी जो डीजीपी के पास न्याय की उम्मीद में गई थी, लेकिन उसे बताया गया कि उसकी बेटी बदलचन थी, वह पढ़ती नहीं थी, वह डायरी लिखती थी. तर्क भी कितने घटिया किस्म के. उस मां ने डीजीपी को चेताया – मेरी बेटी जो भी हो, बलात्कार व हत्या का अधिकार किसने दिया? यही सवाल आज पूरे बिहार का है. और इसलिए डीजीपी ने परिवार पर दबाव बनाया कि वह इस बात को मान ले कि हत्या नहीं, सुसाइड है. यह है बिहार का पुलिस महकमा! लेकिन, कुछ लोग बिकने वाले नहीं होते. अपनी बेटी और बिहार की सभी बेटियों के लिए न्याय की मांग पर वह मां चट्टान की तरह खड़ी हो गई है. सीबीआई जांच की सिफारिश भी सरकार ने सहीं जांच के लिए नहीं, बल्कि परिजनों को मैनेज कर पाने में अक्षम साबित होने के कारण विवश होकर किया. जबकि परिजन शुरू से ही न्यायिक जांच की मांग करते रहे हैं.

नीतीश सरकार महिला सशक्तीकरण को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताती नहीं थकती. हर मंच से कहा जाता है कि अब महिलाएं सुरक्षित हैं. रात-बिरात निकल सकती हैं. लेकिन सवाल सीधा है – अगर महिलाएं सुरक्षित हैं तो बलात्कार और हत्या का ग्राफ लागातार बढ़ क्यों रहा है? अगर माहौल बदला है तो फिर हर दिन महिलाओं के खिलाफ हिंसा की खबरें क्यों आ रही हैं? क्या आज का बिहार सचमुच बेटियों के लिए सुरक्षित हैं.  क्या यह सिर्फ आंकड़ों और भाषणों में गढ़ा गया एक झूठा सपना है?

एक दिन में दो मौत : संयोग नहीं, खतरनाक संकेत

राजधानी पटना में एक ही दिन दो नीट छात्राओं की हत्या, वह भी गर्ल्स हॉस्टलों के भीतर, क्या इसे सामान्य अपराध कहा जा सकता है? बिल्कुल नहीं, यह एक खतरनाक और डरावना संकेत है. यह बताता है कि अपराधी पूरी तरह निडर हैं. क्योंकि उन्हें मालूम है कि सिस्टम उनके साथ खड़ा है या कम से कम उनके खिलाफ नहीं जाएगा. जब अपराध हॉस्टलों जैसे ‘सुरक्षित माने जाने वाले’ स्थानों में होने लगे तो यह पूरे राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल है.

सत्ता के गलियारों तक जाते तार

दबी आवाज में जिन नामों की चर्चा हो रही है, वे किसी गली-मोहल्ले के अपराधी नहीं बताए जा रहे. ये वे लोग हैं जो सत्ता के गलियारों में उठते-बैठते हैं, जिनकी पहुंच और रसूख है. विडंबना यह है कि यही लोग मंचों से नैतिकता, संस्कार और महिला सम्मान का पाठ पढ़ाते हैं, और वे ही उन गिरोहों के संरक्षक बताए जा रहे हैं जो सपने लेकर पटना आने वाली बेटियों को एक ऐसे दलदल में धकेल देते हैं, जहां से उनकी वापसी नहीं हो पाती. नीट की तैयारी, डॉक्टर बनने का सपना, मां-बाप की उम्मीदें – सब कुछ उस दलदल में घुट कर मर जाता है.

पटना आने वाली ये लड़कियां अपना भविष्य बनाने पटना आती हैं और यहां सुरक्षित ठिकाना की खोज में परेशान  रहती हैं. नीतीश सरकार की तमाम बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बावजूद सरकारी छात्रावास लगभग खत्म हो चुके हैं. मजबूरन उनको उन निजी गर्ल्स हॉस्टलों में रहना पड़ता हैं, जो न तो सुरक्षित हैं और न ही निगरानी में. यही निजी हॉस्टल धीरे-धीरे उनकी कब्रगाह में बदलते जा रहे हैं. सवाल यह नहीं है कि एक हत्या हुई या दो, सवाल यह है कि यह सिलसिला क्यों बनता जा रहा है? इसी तर्ज पर बिहार के अन्य जिलों में महिलाओं के साथ जघन्य अपराधों की बाढ़ आई हुई है, खगड़िया में 14 साल की बच्ची को नशीला पदार्थ खिलाकर  छह लोगों ने उसके साथ रेप किया. छपरा में एक छात्रा अंजली पर हमला हुआ, तो मधेपुरा, पूर्णिया, बक्सर और गोपालगंज में महिलाओं पर अत्याचार. ऐसी खबरें रोजाना आ रही हैं. हर जिले से बलात्कार, हत्या और हिंसा की घटनाएं दोगुनी गति से बढ़ रही हैं, लेकिन सरकार की नींद नहीं टूट रही. भाजपा-आरएसएस की राजनीति महिलाओं के खिलाफ साजिश रच रही है. अपराधियों को सरकारी छत्रछाया मिल रही है.

आक्रोश और उबाल पर खड़ा बिहार

बिहार विधानसभा चुनाव को साजिशपूर्ण तरीके से हड़पने के बाद भाजपा-जदयू सरकार ने सोचा था कि उसे राज्य में कुछ भी करने का लाइसेंस मिल गया है. गरीबों के घरों को बुलडोजर से ढाह दो. बलात्कार, हत्या, मॉब लिंचिंग और यौन हिंसा का राज बना दो. पिछले महज दो महीनों में महिला हिंसा की घटनाओं में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है. पूरे राज्य को असुरक्षा व भय में धकेल दिया गया है. लोगों ने बिलकुल सही समझा है – चुनाव के पहले दस हजार, चुनाव के बाद हिंसा-हत्या-बलात्कार! और इसीलिए आज पूरे बिहार में जनता सड़कों पर उतर रही है. चारों तरफ से न्याय की आवाज उठ रही है और वह एक व्यापक आंदोलन में बलदता जा रहा है.

आइसा, ऐपवा और भाकपा(माले) की पहलकदमियां

11 जनवरी की रात पटना के कारगिल चौक पर प्रदर्शन कर रहे नीट छात्रा के परिजनों पर बर्बर लाठीचार्ज हुआ. पटना से लेकर जहानाबाद तक आग फैल गई. चूंकि सामाजिक रूप से पीड़िता भाजपा-जदयू के समर्थक आधार की है, इसलिए मामला बड़ा बनता गया. बिहारी समाज ने ठीक ही इसकी शिनाख्त महिलाओं के खिलाफ संगठित हिंसा के रूप में की और इसके खिलाफ सड़कों पर उतर आया. राजनीतिक संगठन के बतौर उतरने वाला पहला संगठन आइसा रहा, जिसने 13 जनवरी को पटना विश्वविद्यालय में प्रदर्शन किया. 14 जनवरी को घोषी से भाकपा(माले) के पूर्व विधायक रामबली सिंह यादव पीड़िता के जहानाबाद स्थित गांव पतियावां पहुंच गए और न्याय की लड़ाई आगे बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया. फिर तो वहां नेताओं को तांता लगा, लेकिन बस सांत्वना व्यक्त करने भर तक ही वह सीमित रहा. 18 जनवरी को ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी के नेतृत्व में एक टीम पतियावां पहुंची और परिजनों से मुलाकात की. उसके बाद जहानबाद में प्रदर्शन हुआ.

का. दीपंकर पतियावां पहुंचे, सुप्रीम जांच की मांग की

भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने छात्रा के पिता श्री नवीन कुमार, उनकी पत्नी और परिजनों से मुलाकात कर शोक-संवेदना व्यक्त की. बिहार सरकार द्वारा इस मामले को सीबीआई जांच के लिए संदर्भित किए जाने के बाद उनके घर पहंचने वाली यह पहली टीम थी. उनके साथ कॉ. शशि यादव, कॉ. धीरेंद्र झा, जहानाबाद जिला सचिव कॉ. रामाधार सिंह, घोसी के पूर्व विधायक कॉ. रामबली यादव, पार्टी के मीडिया प्रभारी कॉ. कुमार परवेज तथा जहानाबाद के कई अन्य नेता भी थे.

परिजनों और स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि सीबीआई जांच की घोषणा तब की गई, जब परिवार ने बिहार सरकार के दबाव में आकर अपनी बेटी की मौत को आत्महत्या मानने से इनकार कर दिया. लेकिन परिवार को आशंका है कि यह सीबीआई जांच न्याय दिलाने के बजाय मामले को लटकाने और टालने की एक रणनीति भी हो सकती है. परिवार को शुरू से ही सरकार की ओर से कोई संवेदनशीलता या सहानुभूति नहीं मिली. यहां तक कि डीजीपी ने भी उनसे बेहद असंवेदनशील और डराने वाले अंदाज में बात की. पुलिस-प्रशासन पीड़िता पर ही दोष मढ़ने, परिवार के साथ दुर्व्यवहार करने और माता-पिता को उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास किसी “समझौते” के लिए ले जाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाता रहा. सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो प्रशासन शुरुआत से ही परिवार पर बेटी की मौत को आत्महत्या मानने का दबाव डालता रहा, वही प्रशासन अब अचानक इस गंभीर और चौंकाने वाले मामले में सीबीआई जांच का आदेश क्यों दे रहा है? परिवार को आशंका है कि यह न्याय में देरी और अंततः न्याय से वंचित करने की कोशिश हो सकती है.

भाकपा(माले) महासचिव ने कहा कि जरूरी है कि हम इस परिवार के साथ और बिहार के हर न्यायप्रिय नागरिक के साथ खड़े हों, और यह मांग करें कि इस मामले की जांच सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में हो, ताकि बिना देरी के सच सामने आए और पीड़िता को वास्तविक न्याय मिल सके.

विधानमंडल में गूंजी न्याय की आवाज

बिहार विधानमंडल के पहले ही दिन भाकपा(माले) विधायकों ने न्याय की आवाज बुलंद की. पोस्टर के साथ बाहर प्रदर्शन किया और अगले दिन कार्यस्थगन दिया. एमएलसी शशि यादव ने राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान इस प्रश्न को उठाया. उनके हस्तक्षेप से पूरा सत्ता पक्ष घबराया सा दिखा और इस सवाल से भागते दिखे.

पटना में जनसुनवाई

30 जनवरी को पटना में आइसा ने ‘बेटी बचाओ न्याय मार्च’ का आयोजन किया. इसमें बड़ी संख्या में मगध महिला कॉलेज की छात्राओं ने हिस्सा लिया. अखबारों ने उसे सुर्खियां दी. 3 फरवरी को पटना में आयोजित जनसुनवाई में सरकार के खिलाफ आरोप पत्र पेश किया गया और कहा गया कि बिहार सरकार बेटियों को सुरक्षा देने में पूरी तरह विफल रही है. केवल सीबीआई जांच की घोषणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के प्रत्यक्ष निर्देशन में निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की आवश्यकता है. नीट छात्रा कांड सहित कई मामलों में सरकारी तंत्र अपराधियों को संरक्षण दे रहा है.

जनसुनवाई में ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी ने कहा कि ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का नारा देने वाली सरकार आज बेटियों के हत्यारों और बलात्कारियों को संरक्षण देने वाली सरकार बन चुकी है. यह कोई छिपा हुआ सच नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत है. उन्होंने कहा कि शंभू और परफेक्ट गर्ल्स हॉस्टल कांड में साक्ष्य मिटाने, गवाहों को डराने और प्रभावशाली अपराधियों को बचाने के लिए प्रशासन ने खुलकर काम किया है. विधान परिषद सदस्य शशि यादव ने कहा कि एक ओर सरकार महिला सशक्तिकरण के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर राज्य में छात्राओं और महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. उन्होंने कहा कि न्याय यात्रा मगध क्षेत्र से होते हुए पूरे बिहार में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की आवाज बुलंद करेगी. बिहार राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष मंजू प्रकाश ने कहा कि औरतें आजादी और सम्मान का अधिकार लेकर पैदा होती हैं, लेकिन जब वे अपने अधिकारों की मांग करती हैं तो उन्हें हर स्तर पर निशाना बनाया जाता है. अब इस हालात को और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. आजादी हमारा हक है.

जनसुनवाई में महिला कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, साहित्यकारों और छात्र-युवा संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे. मुख्य रूप से प्रीति कुमारी,  वंदना प्रभा, सबा आफरीन, कमलेश शर्मा, अफ्शा जबीं सहित अन्य वक्ताओं ने अपनी बातें रखीं. कार्यक्रम का संचालन कुमार दिव्यम ने किया. जन संस्कृति मंच के कलाकारों ने अपने क्रांतिकारी गीतों के माध्यम से सामाजिक बदलाव का आह्वान किया.

जनसुनवाई की जूरी में महिला कार्यकर्ता रूपम मिश्र, सामाजिक कार्यकर्ता अशरफी सदा, सिस्टर डोरिथी और मंजू प्रकाश शामिल थे.

पतियावां से ‘बेटी बचाओ-न्याय यात्रा’ की शुरुआत 

4 फरवरी 2026 को ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी के नेतृत्व में ‘बेटी बचाओ-न्याय यात्रा’ की शुरुआत जहानाबाद जिले के पतियावां गांव से हुई. यह वही गांव है जहां नीट छात्रा की हत्या-बलात्कार की घटना ने पूरे राज्य को झकझोर दिया था. यात्रा की शुरुआत शोक, आक्रोश और न्याय के संकल्प के साथ हुई. नीट छात्रा के माता-पिता और गांव के लोगों ने नम आंखों से यात्रा को विदा किया और उम्मीद जताई कि यह संघर्ष उनकी बेटी को न्याय दिलाने में निर्णायक होगा. इस अवसर पर जहानाबाद जिला सचिव रामाधार सिंह, अरवल के पूर्व विधायक महानंद सिंह, घोसी के पूर्व विधायक रामबली सिंह यादव, मीडिया प्रभारी कुमार परवेज, श्रीनिवास शर्मा, हसनैन अंसारी सहित अनेक जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय लोग उपस्थित थे. न्याय यात्रा में मीना तिवारी के अलावा संगीता सिंह, रीता वर्णवाल, लीला वर्मा, अंजूषा कुमारी, वंदना प्रभा, प्रीति कुमारी, अनु, दीपंकर आदि ऐपवा और आइसा नेता शामिल हैं. पतियावां में लगभग पूरा गांव यात्रियों का साथ देने को उमड़ पड़ा. गांव की लड़कियों ने भी कुछ दूरी तक यात्रा के साथ मार्च किया.

यह न्याय यात्रा जहानाबाद के काको, घोषी, बंधुगंज, एकंगरसराय, हिलसा, बिहारशरीफ होते हुए 5 फरवरी 2026 को नालंदा जिले के थरथरी थाना अंतर्गत दीरी गांव पहुंची, जहां एक आंगनबाड़ी सेविका और उनके परिवार पर बर्बर पुलिसिया अत्याचार का मामला सामने आया. पीड़िता ने बताया कि 30 जनवरी की रात लगभग 11 बजे बिना किसी नोटिस, वारंट या कानूनी आदेश के पुलिस ने घर में घुसकर महिलाओं और बच्चों सहित पूरे परिवार के साथ अमानवीय मारपीट की. महिला पुलिस की अनुपस्थिति सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का खुला उल्लंघन है. पीड़िता के पति रामवचन प्रसाद को गंभीर रूप से घायल कर पुराने मामले का बहाना बनाकर जेल भेज दिया गया. यह गिरफ्तारी नहीं बल्कि राज्य प्रायोजित प्रतिशोध है. न्याय यात्रा की टीम ने इसे भाजपा-जदयू सरकार के शासन में बढ़ते पुलिसिया आतंक और दमन का उदाहरण बताया.

इसके बाद यात्रा नूरसराय, बिहार शरीफ, सिलाव और राजगीर में सभाएं और प्रेस वार्ताएं करते हुए आगे बढ़ी. नवादा में भगत सिंह चौक पर शहीद भगत सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ ‘बेटी बचाओ-न्याय यात्रा’ की सभा आयोजित की गई. ऐपवा और आइसा ने दोहराया कि जबतक बेटियों को न्याय नहीं मिलेगा, तबतक यह संघर्ष सड़क से सदन तक जारी रहेगा. यह यात्रा 9 फरवरी को पटना पहुंचेगी और 10 फरवरी को पटना में एक विशाल विधानसभा मार्च के साथ इसका समापन होगा.



07 February, 2026