वर्ष 35 / अंक - 13 / भगत सिंह की साम्राज्यवाद-विरोधी विरासत को बुलंद कर...

भगत सिंह की साम्राज्यवाद-विरोधी विरासत को बुलंद करें और अमेरिका-इजरायल गठजोड़ के सामने मोदी सरकार के समर्पण का विरोध करें

भगत सिंह की साम्राज्यवाद-विरोधी विरासत को बुलंद करें और अमेरिका-इजरायल गठजोड़ के सामने मोदी सरकार के समर्पण का विरोध करें

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत को अब पचानवे साल बीत चुके हैं. उनकी शहादत ने ही भारत को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से पूर्ण स्वतंत्रता के संघर्ष के लिए प्रेरित किया था. तब से रावी नदी में बहुत पानी बह चुका है. लाहौर, वह शहर जहां भगत सिंह ने अपनी प्यारी मातृभूमि को अलविदा कहा था, 1947 से पाकिस्तान का हिस्सा है. लेकिन भगत सिंह का संदेश आज भी, चाहे वह आज का भारत हो या पाकिस्तान, और भी ज्यादा जोरदार ढंग से गूंज रहा है. ‘इंकलाब जिंदाबाद’, ‘क्रांति अमर रहे’ और ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे हमारी मौजूदा स्थिति में और भी ज्यादा प्रासंगिक व तात्कालिक हो गए हैं.

भगत सिंह अपने समय के एक अग्रणी क्रांतिकारी थे. जब वे बारह साल के किशोर थे, उन्होंने जलियांवाला बाग में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का सबसे क्रूर चेहरा देखा था. जिस साल उनका जन्म हुआ था, उसी साल उनके चाचा अजीत सिंह ने पंजाब में ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ के जोशीले नारे के साथ किसानों के एक बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया था. जैसे कि 2019-20 में मोदी सरकार के कॉरपोरेट-परस्त कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन सफल रहा था, वैसे ही ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ आंदोलन, जो 1857 के महान स्वतंत्रता संग्राम की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर शुरू हुआ था, ब्रिटिश शासकों को तीन औपनिवेशिक कृषि कानून रद्द करने पर मजबूर करने में सफल रहा. और करतार सिंह सराभा में, गदर पार्टी के उस युवा क्रांतिकारी में, जिसे प्रथम विश्व युद्ध के दौरान औपनिवेशिक शासन के खिलाफ विद्रोह संगठित करने की एक नाकाम कोशिश के बाद 19 साल की उम्र में लाहौर जेल में फांसी दे दी गई थी, भगत सिंह को अपना आदर्श मिला.

आजादी के आंदोलन की प्रेरणा पूरे भारत से आई – खेतों और कारखानों से, गांवों और शहरों से – और इसने हर तरह के जुल्म, शोषण और गुलामी के खिलाफ गरिमा और आजादी की हर कोशिश से ताकत हासिल की. भगत सिंह और उनके साथी भी कामरेड लेनिन के नेतृत्व में हुई कामयाब रूसी क्रांति से मिली जबरदस्त प्रेरणा और उम्मीद से संचालित हो रहे थे. उनकी देशभक्ति सिर्फ भारत को ब्रिटिश औपनिवेशिक राज की चंगुल से आजाद कराने तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि इसका मकसद भारत में समाजवाद की स्थापना करना और भारत के करोड़ों मेहनतकश लोगों के लिए असली सत्ता और आजादी हासिल करना था. वे जानते थे कि साम्राज्यवाद के दबदबे वाली दुनिया में भारत सचमुच आजाद नहीं हो सकता, इसलिए उनकी राजनीति में समाजवादी सोच और साम्राज्यवाद-विरोध की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी.

1920 के दशक में भारत के युवाओं के लिए भगत सिंह का जो संदेश था, वह आज के दौर में हमारे लिए खास अहमियत रखता है. आज भारत में राजनीतिक सत्ता पर पूरी तरह से उन ‘भूरे अंग्रेजों’ का कब्जा हो गया है जिनके बारे में भगत सिंह ने हमें आगाह किया था – यानी, मुनाफाखोर कॉरपोरेट और उनके राजनीतिक साझेदार, जो देश के संसाधनों पर कब्जा करने और लोगों के हितों को हमला और युद्ध की अमेरिकी-इजरायली साम्राज्यवादी धुरी के हाथों गिरवी रखने में मशगूल हैं. इसने देश को गहरी अनिश्चितता और संकट की स्थिति में धकेल दिया है. लगभग एक करोड़ प्रवासी भारतीय मजदूर युद्ध से जूझ रहे पश्चिम एशिया के अलग-अलग हिस्सों में फंसे हुए हैं, जबकि पूरा देश ईंधन की किल्लत, व्यापार में रुकावट और आसमान छूती कीमतों के विनाशकारी असर से जूझ रहा है. अमेरिका के साथ हुआ व्यापार समझौता भारत की खेती-बाड़ी को करारा झटका देने का खतरा पैदा कर रहा है – यह भारत के संकटग्रस्त छोटे और सीमांत किसानों को अमेरिका के भारी सब्सिडी पाने वाले और मशीनों से लैस ताकतवर फार्म लॉबी के साथ पूरी तरह से असमान मुकाबले में घसीट ले रहा है.

अब समय आ गया है कि भगत सिंह की साम्राज्यवाद-विरोधी देशभक्ति की भावना को फिर से जगाया जाए और भारत के फासीवादी शासकों द्वारा भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने के नाम पर देश के राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता को बंधक बनाने की कोशिशों का प्रतिरोध किया जाए. भारत की विदेश नीति को अमेरिका-इजरायल गठजोड़ के हितों के अधीन करके, भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने लिए और अधिक अलगाव ही मोल लिया है. दक्षिण एशिया में अपने पड़ोसी मुल्कों से पहले ही अलग-थलग पड़ चुका भारत अब इस्लामी दुनिया में अपने एक पारंपरिक दोस्त ईरान से भी अलग-थलग पड़ गया है.

मोदी सरकार के दिवालियापन और विश्वासघात के बावजूद यह मौजूदा दौर अमेरिकी साम्राज्यवाद की प्रभुत्ववादी शक्ति के अंत की शुरुआत का संकेत दे रहा है. अगर ट्रंप ने यह सोचा था कि ईरान में सत्ता परिवर्तन उतना ही तेज अभियान साबित होगा जितना कि वेनेजुएला या इराक में हुआ था, तो ईरान ने उन्हें पूरी तरह से गलत साबित कर दिया है. यह धारणा भी गलत साबित हुई है कि ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ने से अमेरिका-इजरायल धुरी के इर्द-गिर्द पश्चिमी गठबंधन की एकता और मजबूत होगी, जैसा कि इराक युद्ध के दौरान हुआ था. ‘नाटो’ सहयोगियों ने न केवल ईरान युद्ध में घसीटे जाने से इनकार किया है, बल्कि उन्होंने इराक में अपने सैन्य अड्डे खाली करना भी शुरू कर दिया है. जब साम्राज्यवादी खेमे में दरारें पड़ने लगी हैं और अमेरिका-इजरायल गठजोड़ के खिलाफ दुनिया भर में गुस्सा बढ़ने लगा है, और जब फासीवादी सरकार की नीतियां भारत को गंभीर आर्थिक संकट और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय अलगाव में धकेल रही हैं, तो भगत सिंह के वारिसों के लिए इन सबका मुंहतोड़ जवाब देने का वक्त आ गया है. 

28 March, 2026