वर्ष 34 / अंक-34 / विकसित भारत शिक्षा अधिक्षण बिल : उच्च शिक्षा की बर...

विकसित भारत शिक्षा अधिक्षण बिल : उच्च शिक्षा की बर्बादी

विकसित भारत शिक्षा अधिक्षण बिल : उच्च शिक्षा की बर्बादी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विकसित भारत शिक्षा अधिक्षण बिल को मंजूरी दे दी है. यह बिल पहले हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (HECI) बिल के नाम से जाना जाता था. इस बिल के माध्यम से उच्च शिक्षा के लिए एकल नियामक संस्था की स्थापना होगी, जो यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC), ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) और नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) की जगह लेगी. मेडिकल और लॉ कॉलेज इस नियामक के दायरे से बाहर रहेंगे. HECI की अवधारणा पहली बार 2018 में ड्राफ्ट बिल के रूप में सामने आई थी, जिसमें UGC ऐक्ट को निरस्त कर नई कमीशन बनाने का प्रस्ताव था. लेकिन छात्रों एवं शिक्षकों के व्यापक विरोध के कारण इसे आगे नहीं बढ़ाया गया. नई शिक्षा नीति 2020 के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में 2021 से प्रयास तेज हुए. अब कैबिनेट की मंजूरी एवं संसद से पारित होने के बाद देश भर में इसे लागू करने की तैयारी है. हालांकि विपक्ष के विरोध एवं मांग के बाद इसे जेपीसी को भेज दिया गया है. जेपीसी को इस विधेयक को भेजा जाना महज एक औपचारिकता ही है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में मौजूद संघीय ढांचे को खारिज करते रहा है और इसी विचार के तहत शिक्षा संविधान के समवर्ती सूची में होने के बावजूद एकल एवं केंद्रीयकृत व्यवस्था लाया जा रहा है. शिक्षा जैसे विषय में राज्यों और विश्वविद्यालयों की भूमिका को सीमित करना संघीय व्यवस्था की आत्मा पर चोट है.

विधेयक के तहत एक नई शीर्ष संस्था ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान’ की स्थापना का प्रस्ताव है. इसके अंतर्गत तीन अलग-अलग परिषदें काम करेंगी. विकसित भारत शिक्षा विनियमन परिषद, नियामक परिषद, प्रत्यायन परिषद, मानक निर्धारण परिषद. अभी तक यूजीसी उच्च शिक्षण संस्थानों के नियामक तय करता था तथा फंडिग करता था लेकिन अब टठै. सिर्फ उच्च शिक्षण संस्थानों का नियामक तय करेगा एवं विधेयक में अनुदान वितरण की जिम्मेदारी सीधे शिक्षा मंत्रालय को दी गई है, जबकि इसके लिए किसी स्वतंत्र परिषद का प्रावधान नहीं है. इससे फंडिंग प्रक्रिया नौकरशाही, मनमानी और राजनीतिक प्रभाव के अधीन हो जाएगी. यह देश भर के विश्वविद्यालयों को प्रभावित करेगा. आज जब विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों को ले कर भाजपा-आरएसएस के लोगो की नियुक्तियां की जा रही हैं. जब सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले एवं विरोध करने वाले संस्थानों को देशद्रोहियों का अड्डा कह के बदनाम किया जा रहा है एवं उन्हें बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है तब किसी स्वतंत्र संस्था के बजाए मंत्रालयों को वित्तीय अनुदान का अधिकार दे देना, गंभीर सवाल खड़ा करता है.

इस विधेयक से विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता खतरे में पड़ जाएगी. बिल में स्वायत्तता की बात की गई है, लेकिन केंद्र सरकार को कई शक्तियां भी दी गई हैं. केंद्र सरकार नीतिगत निर्देश दे सकेगी, प्रमुख पदों पर नियुक्ति करेगी, विदेशी विश्वविद्यालयों को मंजूरी देगी और जरूरत पड़ने पर आयोग या परिषदों को तय समय के लिए भंग भी कर सकेगी. निश्चित ही इन शक्तियों का इस्तेमाल केंद्र सरकार विश्वविद्यालयों का भगवाकरण के लिए करेगी.

शिक्षा के समवर्ती सूची का विषय होने के बावजूद, बिल में राज्य उच्च शिक्षा परिषदों की अनुपस्थिति और राज्य प्रतिनिधित्व की कमी संघीय ढांचे को कमजोर करती है. भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एक ही ढांचे और मानक को सभी राज्यों पर लागू करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि प्रत्येक राज्य की सामाजिक, आर्थिक, भाषाई और सांस्कृतिक परिस्थितियां भिन्न होती हैं. प्रस्तावित आयोग में 12 में से 10 सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा किए जाने का प्रावधान है, जबकि शिक्षकों का प्रतिनिधित्व केवल दो सदस्यों तक सीमित है. इसके अलावा, आयोग में दलित, आदिवासी और अत्यंत पिछड़े समुदायों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों, दिव्यांगों और ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए कोई सुनिश्चित प्रतिनिधित्व नहीं है. इसे उच्च शिक्षा के लोकतांत्रिक और समावेशी स्वरूप के विपरीत है.

पहली बार यह तय किया गया है कि सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा. यदि कोई संस्था नियम तोड़ती है या मानकों का उल्लंघन करती है, तो उस पर कड़ा जुर्माना और अन्य कार्रवाई हो सकती है. पहली बार उल्लंघन करने पर 10 लाख तक का जुर्माना, दोबारा उल्लंघन पर 30 से 75 लाख तक का जुर्माना का प्रावधान है.

बिल में कड़े मानकों और निरीक्षणों का अनुपालन सरकारी और संसाधनहीन संस्थानों के लिए कठिन हो सकता है, जबकि निजी संस्थान धन और संसाधनों के बल पर इन शर्तों को आसानी से पूरा कर सकते हैं. इससे सरकारी शिक्षा संस्थानों की स्थिति कमजोर और निजी संस्थानों की स्थिति मजबूत हो सकती है, जो शिक्षा को एक सार्वजनिक सेवा के बजाय एक व्यवसाय में बदल देगा. यह पुरी तरह से शिक्षा को निजी हाथों में तैयारी है. नई शिक्षा नीति के लागू होने के बाद देश भर के विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक अराजकता का माहौल बना हुआ है. उस बीच अब ऐसी केंद्रीयकृत नियामक संस्थान का आना उच्च शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने के सरकार के प्रयास के कड़ी के रूप में ही देखना चाहिए.


20 December, 2025