पुरुषोत्तम शर्मा
10 दिनों बाद शुरू होगा धराली में दबी लाशें निकालने का काम
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले की हर्षिल घाटी स्थित धराली में तबाही को हुए अब 6 दिन बीत गए हैं पर अभी भी धराली में आए 20 से 50 फीट ऊंचे मलवे के नीचे दबे लोगों के शवों और वाहनों को निकालने का काम शुरू ही नहीं हो पाया है. स्मार्ट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की स्मार्ट सरकार और उसका आपदा विभाग रेस्क्यू किए जिन लोगों की संख्या गिना रहा है, उनमें धराली हादसे से वहां बचे कुछ ही लोग हैं. इनमें बड़ी संख्या पूरी हर्षिल घाटी व जिले भर से रेस्क्यू किए गए लोगों की है. रिपोर्ट के अनुसार धराली में हादसे वाले दिन हर्षिल से गंगोत्री तक स्थानीय आबादी के अलावा करीब 500 से ज्यादा पर्यटक भी मौजूद थे. मौसम ठीक होने के बाद शुरूआती दो दिन में सेना और एनडीआरएफ ने वहां फंसे हुए जिन 307 पर्यटकों को हेलीकॉप्टर के जरिए निकाला इनमें 131 गुजरात, 123 महाराष्ट्र, 21 मध्य प्रदेश, 12 उत्तर प्रदेश, 6 राजस्थान, 28 केरल, 5 कर्नाटक व 3 तेलंगाना के हैं. मिल रही रिपोर्टों के अनुसार रेस्क्यू कार्य में लगे मात्रा 3 हेलीकाफ्टर जगह-जगह फंसे पर्यटकों, महिलाओं, बच्चों व बूढों को ही रेस्क्यू कर रहे थे. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हेलीपैड पर लोगों की भीड़ लगातार बढ़ रही है, पर पर्यटकों के लिए असीमित हेली सेवा दिलाने वाली राज्य सरकार ने रेस्क्यू के लिए हेलीकाप्टरों की पर्याप्त व्यवस्था अभी भी नहीं की है. रेस्क्यू के लिए प्रशासन द्वारा हेली सेवा लेने से मना किये जाने के बाद गंगोत्री क्षेत्र में फंसे पहाड़ के नागरिकों को अपनी जान जोखिम में डाल कर खुद ही पैदल आगे बढ़ना पड़ रहा है.
2013 की केदारनाथ आपदा की तरह धराली आपदा के मृतकों का सही आंकड़ा कभी भी सामने नहीं आ पाएगा. अभी मिल रही प्राथमिक जानकारी के अनुसार महाराष्ट्र के 31 पर्यटकों का कोई पता नहीं चल रहा है. मजदूरी के लिए बिहार के बेतिया से आकर धराली में ठहरे 45 मजदूरों की तलाश में उनके परिजन धराली की ओर पैदल जा रहे हैं क्योंकि हादसे के बाद उनका किसी से भी सम्पर्क नहीं हो पा रहा है. एनडीटीवी के रविश रंजन की रिपोर्ट के अनुसार नेपाल से अपनों की तलाश में धराली आए लोगों के अनुसार उनके एक गांव के 25 लोग घटना के दिन धराली में ही काम कर रहे थे. अब उनका कोई पता नहीं चल रहा है. संभल और सहारनपुर के लोग धराली में कार्यरत अपने 3-3 लोगों की तलाश के लिए पैदल धराली की ओर बढ़ रहे हैं. उनके अलावा कई और पर्यटक, नेपाल और बिहार के अन्य क्षेत्रों के मजदूर, वाहन चालक आदि बाहरी लोग भी हादसे के वक्त वहां मौजूद हो सकते हैं. एक होटल मालिक दुर्गेश पवार ने एनडीटीवी को बताया कि धराली में 60-70 होटल, कई दुकानें और 50-60 घर थे. इनमें भी अनुमानतः 2 व्यक्ति प्रति होटल या घर में रहे होंगे तो उनकी संख्या भी 250 से कम नहीं होगी. धराली से कुछ दूर मुखबा में जहां से प्रधानमंत्री मोदी ने पहाड़ में “घाम तापो पर्यटन” (धूप सेंको पर्यटन) की घोषणा की थी, स्थित सेना के केम्प से भी 11 जवानों के बहने की सूचना है, जबकि राज्य सरकार अभी भी मात्र 5 मृतक और 50-60 लापता लोगों का ही आंकड़ा जारी कर रही है.
मीडिया से मिल रही रिपोर्टों के अनुसार धराली में अभी सिर्फ तीन जेसीबी मशीनें ही राहत कार्य में लगी हैं, जो धराली में लाशें खोजने के बजाए रास्ता बनाने के प्राथमिक कार्य में लगी हैं. प्रशासन के अनुसार थर्मल सेंसिंग उपकरण, हाइटेक और बड़ी मशीनों को वहां पहुंचने में कम से कम चार दिन और लग सकते हैं. ये अभी 60 किलोमीटर दूर भटवाड़ी में खड़े हैं. भटवाड़ी से हर्षिल के बीच तीन जगह भू-धसाव और एक जगह पुल टूटा है. ऐसे ही हर्षिल से धराली के बीच चार जगह पर लगभग 150 मीटर सड़क खत्म हो चुकी है. जब तक भटवाड़ी से धराली तक नए सिरे से सड़क और टूटा पुल नहीं बन जाता, तब तक मलवे के नीचे दबी लाशों को निकालने का काम शुरू ही नहीं हो पाएगा. यानी घटना के 10 दिन बाद ही लाशों को खोजने का काम शुरू हो पाएगा. जिन थर्मल सेंसिंग उपकरणों के जरिये मलवे में दबी लाशों का पता लगाया जाएगा, उनकी क्षमता भी जमीन के नीचे 20 से 30 फीट तक ही वस्तुओं की पहचान करने की है. ऐसे में 30 से 50 फीट नीचे मलवे में दबे और मलवे के साथ उफनती भागीरथी में बह गए अनगिनत शवों का भविष्य में भी कभी कोई पता नहीं चल पाएगा. भूगर्भ विज्ञानी प्रोफेसर एसपी सती बताते हैं कि 1835 में खीर गंगा में सबसे भीषण बाढ़ आई थी, तब नदी ने आज के सारे धराली कस्बे के क्षेत्र को पाट दिया था. प्रोफेसर सती कहते हैं कि जो कोई भी हिमालयी क्षेत्र का जानकार मुखबा से धराली की फोटो लेता था, उसे नजर आ जाता था कि यह सब एक दिन बह जाएगा. यह तो अवश्यंभावी था. यह आज नहीं जाता तो कल जाता, लेकिन इसे जाना ही था.
अति संवेदनशील पारिस्थितिकीय तंत्र से छेड़छाड़ का नतीजा
भारी मलवे में विलीन हो चुका धराली आज की ही तरह पूर्व में खीर गंगा से आए परत दर परत जमे मलवे पर ही बसा है. यह क्षेत्र मानव बस्ती और होटल रिजॉर्ट के लिए कहीं से भी सुरक्षित नहीं है. पहाड़ के हमारे पूर्वजों ने कहीं भी ऐसी जगह बस्तियां नहीं बसाई थी. मूल धराली गांव भी इस जगह के बजाय ऊंचाई वाली अपनी जमीन पर था. धराली और ऐसी ही संवेदनशील आबादियों के लिए गंभीर खतरे की चेतावनियां हमारे भू-वैज्ञानिक और हिमालय की संवेदनशीलता को जानने वाले लोग हमारी सरकारों और उनके योजनाकारों को देते रहे हैं. पर हमारी सरकारों ने उन चेतावनियों को अनदेखा कर विकास के नाम पर हिमालय और हिमालय वासियों पर ऐसी योजनाओं को थोपा, जो केदारनाथ से लेकर अब धराली तक अपनी तबाही के जख्म छोड़ चुका है. पहाड़ के लोगों ने हजारों वर्षों से न सिर्फ वनों को लगाया और उनकी रक्षा की बल्कि यहां के इको सिस्टम को समझते हुए अपने रहन-सहन और आजीविका के साधनों का विकास किया. पहाड़ के पुराने बसे गांवों की बनावट को अगर देखें तो हर गांव में ऊपर जंगल, जंगल के नीचे आबादी, आबादी के नीचे खेती, खेती के नीचे नदी. यानी किसी भी गांव की आबादी नदी से सटी नहीं है. क्यूंकि अपने हजारों वर्षों के अनुभव से उन्होंने नदी तट को आबादी के लिए सुरक्षित नहीं माना था. पहाड़ के गांवों में कहावत है कि नदी बारह वर्ष में अपनी पुरानी जगह पर आ जाती है. नदी को लेकर पहाड़ के ग्रामीणों के इस परम्परागत ज्ञान को वर्तमान आपदाओं ने पूरी तरह सही साबित कर दिखाया है.
हिमालय से सटा उत्तराखंड का गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ का पूरा क्षेत्र गंगा का जल संभरण क्षेत्र होने के कारण प्राकृतिक और पारिस्थितिक रूप से अति संवेदनशील क्षेत्र है. यह पूरा क्षेत्र उत्तराखड के निवासी पूर्वजों द्वारा संरक्षित जैव विविधता के मामले में अद्वितीय है. इस क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और पारिस्थितिकीय तंत्र की संवेदनशीलता के कारण ही यहां कई राष्ट्रीय पार्क और ईको सेंसेटिव जोन स्थापित किए गए गए हैं. इनमें भागीरथी के जल संभरण क्षेत्र में ‘भागीरथी इको-सेंसेटिव जोन’ गंगोत्री से उत्तरकाशी शहर के बीच 4,157 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लागू है. साथ ही ‘गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान’ (619.70 वर्ग किलोमीटर का) इको-सेंसिटिव जोन घोषित है. यूनेस्को की विश्व धरोहर लिस्ट में शामिल ‘नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान’ (630.33 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में) अलकनंदा का जल संभरण क्षेत्र है. इसी तरह ‘केदारनाथ वन्यजीव अभ्यारण’ भी 975.20 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला है. ईको सेंसेटिव जोन की घोषणा का उद्देश्य क्षेत्र की जैव विविधता और संवेदनशील पारिस्थितिकीय तंत्र की सुरक्षा के लिए उन क्षेत्रों में वहां के निवासियों द्वारा की जा रही कृषि को छोड़कर बाकी सभी प्रकार की मानवीय गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाना होता है. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम,1986 की धारा 3 के अंतर्गत पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा इको सेंसेटिव जोन को अधिसूचित किया जाता है. अखिल भारतीय किसान महासभा की ओर से हमने सरकार से मांग की थी कि ईको सेंसेटिव जोन की परिधि में आने वाले परम्परागत निवासियों को उनके आवास निर्माण और परम्परागत आजीविका के क्षेत्र में प्रतिबंधों से छूट मिलनी चाहिए.
गंगोत्री के हर्षिल और धराली में आज आई आपदा वर्ष 2012 में घोषित ‘भागीरथी इको-सेंसेटिव जोन’ में ही आती है. परन्तु भाजपा की केंद्र और उत्तराखंड सरकारों ने कारपोरेट मुनाफे के लिए उत्तराखंड के इस अति संवेदनशील क्षेत्र पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं. इसके लिए पर्यटन प्रदेश और भारी भरकम चार धाम परियोजना का हमला इस क्षेत्र पर बोल दिया गया है. चारधाम यात्रा को सुगम बनाने और चीन सीमा तक पहुंच बनाने के नाम पर यहो सड़कों का चौड़ीकरण, लम्बी सुरंगों का निर्माण और पर्यटकों की सुविधा के लिए बड़े होटल और रिजॉर्ट के निर्माण की छूट केंद्र की मोदी सरकार ने दे दी. प्रधान मंत्री मोदी ने बड़े जोर-शोर से चार धाम के लिए जिस बारह माह चलने वाली “आल वेदर रोड” की घोषणा की थी, वह पहाड़ों की तबाही के रूप में सामने आ चुकी है. आज धराली हादसे के 10 दिन बाद तक वहां दबी लाशों की खोज का इंतजार हमें प्रधान मंत्री मोदी की आल वेदर रोड के कारण ही करना पड़ रहा है, क्योंकि सड़कों के चौड़ीकरण ने इन कच्चे पहाड़ों को अगले बीस वर्षों के लिए अस्थिर कर दिया है. जब तक कि सड़क चौड़ीकरण में कटे पहाड़ों के ऊपर से भारी मलवा गिरने बाद पहाड़ों की ढाल स्थिर नहीं हो जाती है, तब तक ऊपर से पहाड़ खिसकते रहेंगे और नीचे भारी मलवे से भरी नदियां सड़क काटती रहेंगी. प्रकृति द्वारा उसपर मानव हमले का बदला लिए जाने के इस अभियान को अब कोई भी ताकत नहीं रोक सकती है.
प्राकृतिक आपदाओं में लापता और नेपाली मजदूरों को मुआवजा नहीं
प्राकृतिक आपदाओं या अन्य घटनाओं में मृतक लोगों की जब तक लाश नहीं मिल जाती तब तक सरकार उन्हें मृत घोषित नहीं करती है तथा उनके परिजनों को मुआवजा भी नहीं देती है. इसीलिए सरकार द्वारा हर घटना के बाद मौतों को छुपाने का खेल शुरू हो जाता है. इसमें सबसे दुःखद बात है कि नेपाल के मजदूर जो लाखों की संख्या में भारत और खासकर उत्तराखंड में जोखिम भरा काम करते हैं, दुर्घटना का शिकार होने पर राज्य और केंद्र सरकार उन्हें कोई मुआवजा नहीं देती है. धराली आपदा में भी कम से कम 25 नेपाली मजदूरों के दब कर मरने की खबर है. पौड़ी जिले के चौथान पट्टी स्थित बांकुड़ा गांव में भी बादल फटने से उफनते गधेरे में 5 नेपाली मजदूर बह गए हैं. भाकपा(माले) नेता और जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के नेता अतुल सती ने बताया कि विष्णुगाड़ परियोजना की तबाही में मरे नेपाल निवासी मजदूरों की पूरी लिस्ट होने के बाद भी राज्य या केंद्र सरकार और परियोजना संचालन करने वाली कम्पनी ने उनके परिजनों को कोई मुआवजा नहीं दिया. भारत की जीडीपी में योगदान करने वाले नेपाल के मेहनती मजदूरों के प्रति भारत सरकार का यह रुख निंदनीय और मानवता विरोधी है. इस मुद्दे पर दोनों देशों को मजदूरों के हित में ठोस कदम उठाने की जरूरत है.
इधर धराली हादसे की जमीनी स्थिति की रिपोर्टिंग करने जा रहे बारहमासा के पत्रकार राहुल कोटियाल, वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी, इण्डिया टुडे की पत्रकार अनामिका सहित कई जनपक्षीय पत्रकारों को धराली पहुंचने वाले पुल से सुरक्षा कर्मियों ने नहीं जाने दिया. उनसे कहा गया कि यहां से सिर्फ स्थानीय लोगों को ही आगे जाने देने के आदेश ऊपर से आए हैं. इस कारण उन्हें अपनी पूरी टीमों के साथ लगभग तीन घंटे की अतिरिक्त उतार व फिर चढ़ाई का कठिन और जोखिम भरा पहाड़ी सफर कर आगे बढ़ना पड़ा.