-- अरिंदम सेन
“लोकतंत्र में सब कुछ इस बात पर टिका है कि जनता को वोट देने का अधिकार मिले. लेकिन ये अधिकार तभी मायने रखता है जब चुनाव कराने की मशीनरी पूरी तरह निष्पक्ष और ईमानदार तरीके से काम करे. इसलिए यह सबसे ज्यादा जरूरी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त एक स्वतंत्र अधिकारी हो और उसे सुप्रीम कोर्ट के जज के समान आधार और तरीके के अलावा बर्खास्त न किया जा सके....चुनावों की शुचिता और आजादी के लिए यह बहुत जरूरी है कि चुनाव आयुक्तों को सरकार के किसी भी दखल से मुक्त रखा जाए.”
– बी.आर. अंबेडकर
“अगर हम ऊंचे ओहदों पर बैठे लोग अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से नहीं निभाएंगे तो जिम्मेदार सरकार की बुनियाद ही नहीं रहेगी और आगे का मंजर बहुत डरावना होगा.”
– हृदयनाथ कुंजरू
[ संविधान सभा की बहस, 15-16 जून 1949 ]
आज यह चेतावनी कितनी सच लगती है. अंबेडकर ने जिस ‘हिंदू राज’ को सबसे बड़ा खतरा बताया था, वही अब स्पष्ट रूप से दिख रहा है. क्या यही वह समय नहीं है जब हिंदू बहुसंख्यकवादी शासन के दौरान चुनाव आयोग – राज्यपालों, उप-राज्यपालों और सुप्रीम कोर्ट के आज्ञाकारी जजों तक – सत्ताधारी पार्टी के बेशर्म और ढीठ एजेंट बन गए हैं?
क्या देशव्यापी एसआईआर (मतदाता सूची संशोधन) की मौजूदा मुहिम अब तक के सबसे खतरनाक तानाशाही हमलों में सबसे विनाशकारी नहीं है? यह गरीबों, बहुजनों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को मनमाने और चुनिंदा तरीके से वोट के अधिकार से वंचित कर संसदीय लोकतंत्र की जड़ों पर हमला कर रही है, और भविष्य में उन्हें राज्यविहीन और अधिकारविहीन बनाने का रास्ता तैयार कर रही है.
इन सड़ते-गलते घावों की वास्तविकता पर चर्चा करने से पहले, आइए एक नजर डालते हैं कि संविधान सभा ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता के अहम मुद्दे से कैसे निपटा था.
नजीरः पद्मभूषण सुकुमार सेन
जहां संविधान ने भारत को लोकतंत्र का सपना और रूह दी, वहीं सेन ने उस सपने को जमीन पर उतारने के लिए जरूरी ढांचा और काम की संस्कृति खड़ी की. अंबेडकर की सोच को अपना रास्ता मानकर उन्होंने और उनकी टीम ने पूरी लगन से चुनावी तंत्र खड़ा किया. उन्हें सब कुछ बिलकुल शुरू से बनाना पड़ा – एक ऐसे पिछड़े देश में जहां संचार व्यवस्था बहुत कमजोर थी, समाज में गहरी दरारें थीं और तरह-तरह की मुश्किलें. सेन की हौसला बढ़ाने वाली अगुवाई में पूरी टीम ने जी-जान से काम किया और वही कर दिखाया जिसे न्यूयॉर्क टाइम्स ने “चमत्कार” कहा था.
काम बेहद चुनौतीपूर्ण थाः 17.6 करोड़ मतदाताओं की सूची तैयार करना, जिनमें से ज्यादातर ने पहले कभी वोट नहीं डाला था; 85% निरक्षर मतदाताओं के लिए उपयुक्त मतदान तरीके निकालना – जैसे हर उम्मीदवार के लिए अलग चित्र वाले निशान ताकि निरक्षर लोग आसानी से पहचान सकें, और अलग बैलेट बॉक्स, घर-घर जाकर नाम दर्ज करना वगैरह; 2,24,000 मतदान केन्द्रों में गुप्त और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करना, जिनमें से कई बेहद दुर्गम इलाकों में थे. सेन ने इसे वास्तव में “दुनिया में अपनी विशालता और जटिलताओं के लिए अनोखा और बेहद पेचीदा बड़ा तजुर्बा” कहा.
इससे भी बढ़कर, सेन ने पूरे काम को आधुनिक प्रगतिशील नजरिए से किया. मसलन, उन्होंने उस पुरानी रिवायत को ठुकराया जिसमें औरतों को वोटर लिस्ट में सिर्फ “फलां की पत्नी” या “फलां की बेटी” लिखकर दर्ज किया जाता था, और जिद की कि औरतों के अपने नाम दर्ज हों, मर्दों की बराबरी पर. उस दौर में यह कदम एक साहसी समाज-सुधार की तरह था.
जनता के इस महान उत्सव की सफल समाप्ति पर सभी तरफ से भरपूर तारीफें आ रही थीं. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संशय से बदलकर भरपूर प्रशंसा करने लगा, यहां तक कि सूडान ने 1953 में अपने पहले चुनाव कराने के लिए सेन को आमंत्रित किया. फिर भी, चुनाव आयुक्त ने कहा कि वे और उनकी टीम केवल अपना कर्तव्य कर रहे थे और सारा श्रेय भारत की आम जनता को दियाः
“वयस्क मताधिकार के विरोध में पहले जो मुख्य दलील दी जाती थी... वो थी मतदाताओं की निरक्षरता, जो चुनाव को एक मजाक बना देती जब तक कि कोई ऐसी चुनाव प्रणाली न बनाई जाए जिसमें एक निरक्षर मतदाता भी समझदारी से और गुप्त रूप से अपना वोट डाल सके.”
उन्होंने कहाः
“तजुर्बा साबित करता है कि चाहे ‘अविकसित’ देश का आम आदमी कितना भी पिछड़ा और अज्ञानी हो, उसके पास अपने तरीके से इतनी अक्ल होती है कि वह जान जाता है कि उसके लिए क्या अच्छा है.”
“पुरुष और महिलाएं, शहर के समझदार हों या गांव के साधारण लोग, अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, आदिवासी, पहाड़ी और मैदानी – इस महान मुल्क के सब नागरिक कंधे से कंधा मिलाकर लाखों मतदान केन्द्रों तक जाएंगे ताकि अगले पांच साल के लिए देश की तकदीर तय करने वाली अपनी सरकार चुन सकें.”
दूसरे आम चुनाव पर चुनाव आयोग ने 325 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट जारी की, जो आगे के चुनावों की मिसाल बनी. आयोग की बारीकी का अंदाजा सिर्फ इस फैसले से लगाया जा सकता है कि उन्होंने रेल इंजन का चुनाव-चिह्न हटा दिया क्योंकि दूर-दराज के गांवों में बहुत से लोग उसे पहचान नहीं पाते थे. सेन ने संतोष जताया कि अराजकता की तमाम आशंकाओं के बावजूद मतदाताओं ने गजब का जोश और अनुशासन दिखाया, और खास तौर पर गरीब और हाशिए पर खड़े लोगों की बड़ी भागीदारी को उन्होंने सार्वभौमिक मताधिकार की सच्ची जीत कहा.
सड़ांध शुरू, सुप्रीम कोर्ट की दखल
सुकुमार सेन की व्यक्तिगत ईमानदारी और लगन के साथ-साथ आजादी की लड़ाई से निकले नये गणराज्य का लोकतांत्रिक माहौल भी पहले चुनाव आयोग की बड़ी कामयाबी का मूल स्रोत था. यह माहौल, जिसका प्रतिनिधित्व नेहरू, अंबेडकर, आजाद और कई अन्य व्यक्तित्वों ने किया, ज्यादा लंबा नहीं टिक सका. चारों तरफ सड़ांध फैलने लगी और चुनाव आयोग भी अपनी चमक खोने लगा – हालांकि अन्य संस्थाओं की तुलना में धीमी रफ्तार से – और 2014 के बाद यह गिरावट और तेज हो गई.
चुनाव आयोग सत्ता पार्टी का मोहरा क्यों बन गया, इसकी मुख्य वजह यह थी कि संसद – यानी बारी-बारी से सत्ता संभालने वाली पार्टियां – संविधान सभा की सुझाई कानून बनाने की बात टालती रहीं. उन्हें इस मामले में बिना किसी कानूनी बाध्यता के रहना आसान लगा. नतीजा यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा.
2 मार्च 2023 को अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ के मामले में एक ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने कहा कि जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बनाती, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तीन व्यक्तियों की समिति द्वारा सुझाए गए नामों के पैनल से होनी चाहिएः प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या यदि कोई औपचारिक विपक्षी नेता मान्यता प्राप्त नहीं है तो सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता), और भारत के मुख्य न्यायाधीश.
इस आदेश का देशभर में स्वागत हुआ. लोगों को उम्मीद थी कि नई व्यवस्था मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में उचित लोकतांत्रिक परामर्श और पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी.
सुप्रीम कोर्ट की विवेकपूर्ण हिदायत को मोदी ने ठुकराया
लेकिन लोकतांत्रिक सलाह-मशविरा फासीवादी सरकार को कभी मंजूर नहीं था. उसने चुनाव आयोग जैसी अहम संस्था पर पूरा नियंत्रण पाने के लिए जल्दबाजी में चीफ इलेक्शन कमिश्नर और अन्य इलेक्शन कमिश्नरों (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) कानून, 2023 पास कर दिया. इस कानून ने समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटा कर उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को बैठा दिया, जिससे समिति में सरकार को हमेशा दो-तिहाई बहुमत सुनिश्चित हो गया.
इस तरह न्यायपालिका की भूमिका पीछे धकेल दी गई और चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर पूरी ताकत कार्यपालिका यानी सरकार के हाथ में आ गई. कोई कानून तो उल्लंघन नहीं हुआ, लेकिन संवैधानिक नैतिकता – जिसे हमारे संविधान के मुख्य शिल्पकार ने इस आधारभूत दस्तावेज का सबसे बुनियादी मूल्य माना था – को भारी धक्का लगा.
सम्मान के शिखर से अपमान की गहराई तक
भारत के नागरिक पहले मुख्य चुनाव आयुक्त को उनकी बेदाग साख और जन-समर्थक छवि, सबको साथ लेने वाली सोच के लिए हमेशा याद करेंगे. मगर मौजूदा 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इतिहास में उस व्यक्ति के रूप में जाने जाएंगे जिसने सबको साथ लेने वाली पारंपरिक सोच को पलट दिया. उन्होंने नागरिकता का वह सिद्धांत बदल डाला जिसमें हर वयस्क भारतीय को नागरिक माना जाता था जब तक कि वह विदेशी साबित न हो जाए. अब उल्टा कर दिया – हर शख्स पहले विदेशी माने जाएंगे, जब तक वे पुख्ता सबूत से अपनी नागरिकता साबित न करें. इस बोझ को आम लोगों पर डालकर चुनाव आयोग ने जानबूझ कर करोड़ों गरीबों को वोट के अधिकार से वंचित करने का रास्ता खोल दिया.
पहले मुख्य चुनाव आयुक्त के ठीक उलट, मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त पर भरोसे का गहरा संकट है और जनता में वह सत्ता पार्टी का एजेंट माना जा रहा है. उन्होंने पहले दिन से ही अपने निर्लज्ज व्यवहार के लिए बहुत बदनामी कमाई है. ‘वोट चोरी’ आरोप पर राहुल गांधी के खिलाफ उनका गुस्से से भरा बयान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया तथा पूर्व चुनाव आयुक्तों को भी चुभ गया और तीखी प्रतिक्रियाएं आईं. पूर्व सीईसी कुरैशी ने कहा कि विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल गांधी करोड़ों लोगों की राय रख रहे थे, इसलिए उनकी टिप्पणी पर आयोग को गुस्सा नहीं आना चाहिए था. “अगर मैं होता तो जांच का आदेश देता और बात को गंभीरता से लेता. विपक्ष के नेता को इस लहजे में और इस गुस्से के साथ ललकारना चुनाव आयोग के लिए कोई सम्मान की बात नहीं है.”
सुकुमार सेन हमेशा जनता के प्रति जवाबदेह रहे, उनके पास छिपाने को कुछ नहीं था. इसके बरअक्स ज्ञानेश कुमार प्रेस कॉन्फ्रेंस में जरूरी सवालों से बचने के लिए मशहूर हैं. चुनाव आयोग ने अदालत में यह कहने में भी कोई झिझक नहीं दिखाई कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए थे, उसकी वजह जानने का कोई अधिकार नहीं है. ईवीएम धांधली के आरोपों के बावजूद, उनके दौर में महाराष्ट्र और कर्नाटक से शुरू हुई मतदाता सूची की हाई-टेक गुप्त हेराफेरी अब देश के दूसरे हिस्सों में भी फैलने की खबरें हैं. पहली बार किसी मुख्य चुनाव आयुक्त पर यह दाग लगा कि वह ‘वोट चोरों’ को बचा रहा है, क्योंकि उसने कर्नाटक की सीआईडी को बार-बार मांगने पर भी वोट चोरी के दोषियों की जानकारी देने से इनकार कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट का अधिकार, चुनाव आयोग की चुनौती
सितंबर के मध्य में मामला और पेचीदा हो गया. दिल्ली के भाजपा नेता व आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय ने एक जनहित याचिका दायर की, जिसमें हर चुनाव से पहले देशभर में अनिवार्य “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” (SIR) कराने की मांग की गई. जवाबी हलफनामे में चुनाव आयोग ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 324 उसे चुनावों और मतदाता सूचियों पर “निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण” का अधिकार देता है. आयोग का दावा था कि जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के साथ मिलकर यह ढांचा तय करता है कि मतदाता सूची कब और कैसे संशोधित होगी – और इसका फैसला केवल वही करेगा. दूसरे शब्दों में, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश देने के अधिकार को ही नकार दिया.
आयोग का यह अहंकारी दावा सीधे सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के खिलाफ है. वे ऐसा कहने की हिम्मत किस आधार पर कर रहे हैं? क्या इसलिए कि उनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री और उनके चुने हुए मंत्री करते हैं और वे उन्हीं की मर्जी से काम करते हैं? शायद यह उनका मानसिक आधार हो, लेकिन जाहिर है कि इस दावे का एक कानूनी सहारा भी है.
संविधान पर आधारित दलील उतनी मजबूत नहीं दिखती, मगर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) कानून, 2023 की धारा 16 सभी चुनाव आयुक्तों (सीईसी और ईसी) को साफ-साफ कानूनी छूट देती है. यह नया और अहम प्रावधान है. पहले संविधान का अनुच्छेद 324(5) सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने से जुड़ी सुरक्षा देता था – यानि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही संसद में महाभियोग के जरिए हटाया जा सकता था. लेकिन 2023 का यह कानून चालाकी से सभी आयुक्तों को ऐसी ढाल दे देता है कि अपने आधिकारिक कामकाज में कही या की गई किसी भी बात पर उनके खिलाफ कोई सिविल या आपराधिक मुकदमा अदालत में दर्ज नहीं हो सकता.
एकजुट लड़ो, जीतने तक लड़ो
दो साल पहले ही मोदी-शाह सरकार ने चुनाव आयोग को न्यायिक निगरानी से बाहर करने की साजिश रची थी, ताकि उसकी पूरी ताकत कार्यपालिका यानी सरकार के हाथ में रहे. अब हालिया हलफनामे के साथ उनके नुमाइंदों ने एक और कदम आगे बढ़ा दिया है. अब यह देखना होगा कि दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच यह टकराव किस दिशा में जाएगा.
लेकिन एक बात साफ हैः हम आज एक फासीवादी सरकार का सामना कर रहे हैं, जिसने सोच-समझकर संविधान के ‘नियंत्रण और संतुलन’ के पूरे ढांचे को खोखला कर दिया है और कई तरीकों से न्यायपालिका को कमजोर किया है. ऐसे में केवल जनता की सीधी और ताकतवर कार्रवाई ही दुश्मन को हरा सकती है. इससे न केवल अपनी सरकार चुनने का कीमती अधिकार सुरक्षित होगा, बल्कि भारत के नागरिकों के सभी मौलिक अधिकारों की भी रक्षा होगी. अगर बिहार के हमारे भाई-बहन इतने कम समय में इतनी बहादुरी से लड़ सकते हैं और कामयाबी पा सकते हैं, तो पूरे देश की जनता क्यों नहीं एकजुट हो सकती और दुश्मन को धूल चटा सकती है?
(डाउन विद द सर्वाइल सी.ई.सी. एंड हिज मैलिशस मास्टर्स! पीपल्स पावर मस्ट प्रेवेल! – अरिन्दम सेन, लिबरेशन, अक्टूबर 2025)
हिंदी अनुवाद : मनमोहन