बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) का खतरनाक हमला अब अपने दूसरे महीने में प्रवेश कर चुका है. तथाकथित घर-घर गणना के पहले चरण के अंत में, भारत के चुनाव आयोग ने एक मसौदा मतदाता सूची जारी की है, जिसमें जनवरी 2025 की संशोधित सूची से लगभग 66 लाख नाम हटा दिए गए हैं. आयोग ने इन नामों को हटाने के तीन कारण बताए हैं : 36 लाख मतदाता जो कथित तौर पर बिहार से स्थायी रूप से चले गए हैं या ‘अपने पते पर नहीं मिले’, 22 लाख मतदाता जिनकी मृत्यु हो चुकी है, और 7 लाख मतदाता जो कहीं और वोटर लिस्ट में दर्ज हैं. हैरानी की बात यह है कि ये आंकड़े पूर्ण संख्या में नहीं, बल्कि प्रतिशत के रूप में दिए गए हैं, और आयोग ने हटाए गए नामों की सूची के साथ उनके हटाने का कारण साझा करने से भी इनकार कर दिया है.
इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के बारे में तीन और अहम बातें गौर करने लायक हैं. पहली, गणना के आखिरी कुछ दिनों में हटाए गए नामों की संख्या में अचानक भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई. 19 जुलाई को ‘अपने पते पर नहीं पाए गए’ मतदाताओं की कुल संख्या 41,64,814 (लगभग 41.6 लाख) थी, जो एक सप्ताह बाद बढ़कर 66 लाख हो गई – यानी सात दिन में करीब 25 लाख की बढ़ोतरी.
दूसरी, इस पूरी प्रक्रिया में विदेशी नागरिकता के आधार पर एक भी नाम नहीं हटाया गया. लेकिन गणना के बीच में ही कुछ दिन पहले मीडिया में ‘चुनाव आयोग के सूत्रों’ के हवाले से खबरें फैलाई गईं कि बिहार की वोटर लिस्ट में बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल से आए विदेशी नागरिक बड़ी तादाद में घुसपैठ कर गए हैं.
तीसरी, अंतिम समय में ‘एक से ज्यादा जगह दर्ज/डुप्लीकेट नाम’ के मामलों की संख्या अचानक 7.5 लाख से घटकर 7 लाख रह गई. अब खोजी रिपोर्टों में पता चला है कि पश्चिम चंपारण जिले के एक ही विधानसभा क्षेत्र में ‘एसआइआर’ से ‘सुधारी गई’ मसौदा सूची में उत्तर प्रदेश से आए पांच हजार संदिग्ध मतदाता शामिल हैं. और फिर बिहार के उप-मुख्यमंत्री और भाजपा नेता विजय सिन्हा का सनसनीखेज मामला – जिनका नाम दो जगह दर्ज है, जबकि उनका दावा है कि उन्होंने एक जगह से नाम हटाने की अपील की थी. अगर बिहार के डिप्टी सीएम तक ‘एसआइआर’ धोखाधड़ी के शिकार हैं, तो समझा जा सकता है कि पूरी प्रक्रिया कितनी फर्जी और हास्यास्पद रही है.
फिर भी हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि यह धोखाधड़ी अभी शुरू हुई है. मान लें कि मृत्यु और डुप्लीकेट नामों के आंकड़े कुछ हद तक सही हैं, तो भी जनवरी 2025 की मतदाता सूची से हटाए गए 66 लाख नामों में से कम-से-कम 40 लाख तो निश्चित तौर पर ‘एसआइआर’-धोखाधड़ी के शिकार हैं. उनके लिए ‘एसआइआर’ का मतलब बन चुका है – “नाम सफाचट अभियान”.
अब दस्तावेजों की जांच के दूसरे चरण में, कई लाख और मतदाताओं का भविष्य संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) के हाथ में है. इस चरण में सामाजिक और राजनीतिक पूर्वाग्रह का शामिल होना आसानी से समझा जा सकता है. इन चुनिंदा नाम हटाने की कार्रवाइयों को शायद महाराष्ट्र के महादेवपुरा जैसे बड़े पैमाने पर ‘नए’ मतदाताओं को शामिल करके संतुलित किया जाएगा, जहां फर्जी मतदाताओं को सूची में जोड़ा गया था. अगर ‘एसआइआर’ (विशेष गहन पुनरीक्षण) पर रोक नहीं लगी, तो बिहार की मतदाता सूची और भी त्रुटिपूर्ण और पक्षपाती हो जाएगी.
हमारी शुरुआत से ही इस ‘एसआइआर’ प्रक्रिया में दखल का मकसद इसे जमीनी स्तर पर बेनकाब करना, चुनौती देना और बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने के खतरे के बारे में जागरूकता व सतर्कता पैदा करना रहा है. गणना के फॉर्म जमा करने को अनिवार्य सहायक दस्तावेजों को जमा करने की शर्त से अलग कर देने से कई मतदाताओं को गलतफहमी में झूठी सुरक्षा के अहसास में डाल दिया. साथ ही, संघ-भाजपा का तथाकथित ‘घुसपैठियों’ के खिलाफ अभियान, जो दरअसल मुसलमानों के खिलाफ छिपा हुआ नफरत भरा अभियान रहा है, ने आम मतदाता के मन में जहर घोलने की कोशिश की. लेकिन अब जब सारा ध्यान उस ‘नाम काटने की लटकती तलवार’ पर टिक गया है, जिसने पहले ही बड़ी तादाद में प्रवासी मजदूरों और बहुजन समुदाय को प्रभावित किया है, तो सांप्रदायिक नैरेटिव का असर ज्यादा नहीं हो पाया.
इस बीच, बिहार में मताधिकार-छीनने के खिलाफ चल रहे अभियान को राहुल गांधी द्वारा महादेवपुरा में हुए बड़े पैमाने के वोट चोरी के भंडाफोड़ से काफी ताकत मिली है. अचानक शुरू किया गया यह ‘एसआइआर’ (विशेष गहन पुनरीक्षण), जिसने मतदाता सूची के मुद्दे को देशव्यापी नागरिकता रजिस्टर जैसी विवादित योजना से जोड़ दिया है, और जिस अकड़ और हठ के साथ चुनाव आयोग इसे आगे बढ़ा रहा है, यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की सलाह को भी ठुकरा रहा है, उसने जनता के संविधान बचाने और फासीवादी हमले का डटकर मुकाबला करने के संकल्प को और मजबूत कर दिया है. भारतीय गणतंत्र के इतिहास में चुनाव आयोग कभी इतना बदनाम और अविश्वसनीय नहीं रहा.
‘एसआइआर’ पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का जो भी नतीजा निकले, बिहार के मतदाताओं और भारत की जनता को अपनी पूरी ताकत और दृढ़ संकल्प के साथ प्रवासी मजदूरों, हाशिए पर मौजूद अन्य तबकों और अल्पसंख्यकों का मताधिकार छीनने और बिहार के चुनाव लूटने की साजिश को नाकाम करना होगा. एकजुट जनता को कभी हराया नहीं जा सकता.