अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अखिल भारतीय महिला एसोसियेशन (ऐपवा) एवं श्रद्धा सदन के संयुक्त तत्वावधान में ‘वर्तमान में महिलाओं के न्याय एवं बराबरी के अधिकार : चुनौतियां और समाधान’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें उदयपुर शहर की विभिन्न बस्तियों से महिलाओं ने उत्साहपूर्ण भागीदारी की. संगोष्ठी में बोलते हुए ऐपवा की राज्य सचिव प्रो. फरहत बानू ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की मूल भावन, उसके प्रयोजन, बुनियादी सवाल, चुनौतियां और उसकी मंजिल की ऐतिहासिक जड़ों की सही शिनाख्त आज के अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की महती जरूरत है. आज भी महिलाओं के बुनियादी सवाल वहीं के वहीं खड़े हैं.
श्रद्धा सदन की सिस्टर जोना इरुदी ने कहा कि 8 मार्च, 1857, में अमेरिका के न्यूयार्क शहर की कपड़ा मिल में काम करने वाली मजदूर महिलाओं ने कार्यस्थलों पर जिन बुनियादी सुविधाओं (काम के कम घंटे, मजदूरी बढ़ाने, बाल मजदूरी बंद करने और महिलाओं के मताधिकार) के लिए, जिस जुझारू प्रदर्शन की शुरुआत की, वह भविष्य में महिलाओं की नागरिक समानताओं की ऐसी आत्मिक ताकत बनेगा, यह शायद उन्होंने सोचा भी नहीं था.
मुख्य वक्ता डा. कुसुम मेघवाल ने कहा कि ‘महिला’ से ‘इंसान’ और ‘देवी’ से ‘मनुष्य’ बनने के इस गौरवपूर्ण संघर्षमय इतिहास ने अनेक पड़ावों को पार करते हुए आज 8 मार्च विश्वभर के महिला आंदोलनों के सपने को साकार करने की ताकत और ऊर्जा बना हुआ है. पूरी दुनिया में यह दिन महिला स्वाधीनता के लिए संघर्ष के रूप में याद किया जाता है. किंतु यह बड़े अफसोस की बात है कि हमारे देश की सरकारें महिला दिवस की मूल भावना और उसके सपने को तिरोहित करते हुए उसकी केवल रस्म अदायगी करती हैं.
प्रो. हेमेन्द्र चंडालिया ने कहा कि क्लारा जेटकिन और अलेक्सांद्र कलतिया जैसी समाजवादी देशों की शीर्ष महिला नेताओं द्वारा शुरु किए गए इस दिन की क्रांतिकारी विरासत महिलाओं के तमाम नागरिक अधिकारों की पूरक बन गई, जिसको आगे बढ़ाने की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है.
भाकपा(माले) राज्य सचिव शंकरलाल चौधरी ने कहा कि पूंजीवाद के इस दौर में महिला केवल सस्ता-श्रम और उपभोग की वस्तु है. पूंजीपतियों की इस लूट में सबसे अधिक श्रमिक-गरीब महिलाओं की यातनाएं बढ़ी हैं. पूंजी, धर्म, सत्ता और सामन्ती तत्वों का गठजोड़ यह सब करके 8 मार्च की असली संघर्षमय विरासत और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ महिलाओं के रहे ऐतिहासिक नकारभाव को उनकी सामाजिक चेतना से विस्मृत करा देना चाहता है. असली सवाल महिलाओं की सत्ता और संपति में भागीदारी व हिस्सेदारी का है.
ऐक्टू के राज्य सचिव सौरभ नरुका ने मोजूदा साम्राज्यवादी दौर में प्रतिक्रियावादी शक्तियों द्वारा महिलाओं के बढ़ती नागरिक अधिकारों की सामूहिक आवाज को तरह-तरह के कुतर्कों से दमन और हर तरह की महिला हिंसा को जायज ठहराने के खिलाफ प्रतिरोध पर बल दिया.
प्रशासक यासीन पठान ने महिलाओं की शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि महिला इस सोच और विचार के साथ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की मूल भावना को हासिल करना चाहती है कि हमारा बुनियादी सवाल एक नागरिक के रूप में जीवन जीने का है. इसलिए, आज के दिन महिला सवालों, सपनों और चुनौतियों की प्रकृति को समझना और उनके सामाजिक-ऐतिहासिक कारणों का सही विश्लेषण करना जरूरी है. कारणों का गलत विश्लेषण व खंडित सोच हमें गलत समाधानों का पक्षपाती बनाकर दिग्भ्रमित करती है.
पार्षद हिदायतउल्ला ने कहा कि सामाजिक श्रम विभाजन में महिला का कार्य घरेलू कामकाज निबटाना है जिसका कोई आर्थिक मूल्य नहीं है. रात-दिन काम करने के बावजूद वह अपनी हर जरूरत व इच्छा पूर्ति केलिए पुरुष के मातहत करती है, आर्थिक हिंसा का दंश झेलने के लिए अभिशप्त है. इस अवसर पर आशीष, ऐपवा की सकीला, शहजादी, हसीना, मुन्नी बाई, इत्यादि ने भी अपने विचार रखे. श्रद्धा सदन की अध्यापिका जीनत वारसी लिसा ने धन्यवाद ज्ञापित किया.
पंजाब के मानसा में इस अवसर पर ऐपवा द्वारा बाबा बूझा सिंह यादगार भवन में बलविंदर कौर खारा, किरण शर्मा भीखी, मनजीत कौर आलोअरख, वीरपाल कौर रल्ला और चरणजीत कौर की अध्यक्षता में महिलाओं का जिला स्तरीय कन्वेंशन आयोजित हुआ.
ऐपवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य जसबीर कौर नत्त ने उपस्थित महिलाओं को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के इतिहास के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि आज पूरी दुनिया में पूंजीवाद गहरी आर्थिक मंदी का शिकार है. जिसमें से निकलने के लिए अमेरिका और रूस जैसी बड़ी ताकतें छोटे देशों के तेल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को लूटने के लिए युद्धों और हमलों में हजारों-लाखों निर्दाष लोगों – महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों तक की हत्या कर रही हैं. पूरी दुनिया की जागरूक महिलाएं गाजा, यूक्रेन वेनेजुएला और ईरान में हो रहे नरसंहार के खिलाफ आवाज उठा रही हैं. लेकिन भारत के लिए यह राष्ट्रीय शर्म की बात है कि बेहद घिनौने सेक्स क्राइम के अपराधी जेफ्री एपस्टीन के साझेदार नरेंद्र मोदी और हरदीप पुरी जैसे लोग अभी भी देश के शीर्ष पदों पर विराजमान हैं.
ऐपवा की राष्ट्रीय पार्षद बलविंदर कौर खारा ने कहा कि बीजेपी सरकार कॉर्पारेट कंपनियों के मुनाफे बढ़ाने के लिए मजदूर महिलाओं द्वारा कड़े संघर्षों के द्वारा हासिल किए गए अधिकारों को छीनने के लिए हर हथकंडा अपना रही है. महिलाओं को राज्य और देश में अपना एक मजबूत क्रांतिकारी संगठन बनाने की तत्काल आवश्यकता है. कन्वेंशन को वीरपाल कौर, परमजीत कौर अकलीया, देविंदर कौर, सुखनदीप कौर और सुखदीप कौर खियाला ने भी संबोधित किया.
कन्वेंशन ने संगठन की मजबूती के लिए ऐपवा की एक ग्यारह सदस्यीय नई जिला टीम चुनी गई और केंद्र सरकार से जी राम जी को रद्द करके और साल में दो सौ दिन काम तथा पांच सौ रुपये मजदूरी के साथ पुरानी मनरेगा योजना को बहाल करने, पंजाब की मान सरकार की ओर से पेश किए गए बजट में एससी महिलाओं को 1500 रुपये और सामान्य वर्ग की महिलाओं को 1000 रुपये प्रति माह सम्मान भत्ता देने के ऐलान को धोखा करार देते हुए इसका भंडाफोड़ करने समेत कई प्रस्ताव पारित किए.