वर्ष 35 / अंक - 06 / यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन (समानता नियमावली) पर खतरना...

यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन (समानता नियमावली) पर खतरनाक स्थगन के खिलाफ लड़ाई

यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन (समानता नियमावली) पर खतरनाक स्थगन के खिलाफ लड़ाई

रोहित वेमुला की चौंकाने वाली संस्थागत हत्या को दस साल हो गए हैं, जिसने भारत को उच्च शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों में जातिगत भेदभाव की क्रूर सच्चाई से जगाया था. दस साल बाद, सुप्रीम कोर्ट और मोदी सरकार ने भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और न्याय की तलाश को धोखा देकर रोहित वेमुला की फिर से हत्या कर दी है. सामाजिक भेदभाव, अन्याय और उत्पीड़न को खत्म करने की हर कोशिश के खिलाफ भारत में ऐतिहासिक रूप से हमेशा शक्तिशाली और विशेषाधिकार प्राप्त लोगों की तरफ से तीखी सामाजिक प्रतिक्रिया होती रही है. लेकिन इस बार सरकार और न्यायपालिका दोनों ने शर्मनाक तरीके से इस सामाजिक प्रतिक्रिया का साथ दिया और मनगढ़ंत गुस्से को बहाना बनाकर सामाजिक न्याय के मकसद को ही मिट्टी में मिला दिया.

कैंपस में जातीय और लैंगिक भेदभाव और अन्याय के मुद्दे को हल करने की पहली गंभीर कोशिश के फलस्वरूप 2012 में यूजीसी नियमन (रेगुलेशन) को अपनाया गया. लेकिन जनवरी 2016 में रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या ने उस नियमन की कमी को उजागर कर दिया. तब से पूरे भारत में छात्र और प्रगतिशील नागरिक कैंपसों में जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए रोहित वेमुला के नाम पर प्रभावी कानून बनाने की मांग कर रहे हैं. लेकिन मोदी सरकार ने उस मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया. इसके विपरीत जब जेएनयू, एचसीयू और अन्य विश्वविद्यालयों के छात्रों ने रोहित के लिए न्याय की मांग में अगुवाई की, तो उन्हें संघ ब्रिगेड द्वारा शिकार बनाया गया और बदनाम किया गया. मई 2019 में महाराष्ट्र में एक और संस्थागत हत्या हुई जब एक युवा आदिवासी पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल छात्रा डा. पायल तड़वी ने जातिगत भेदभाव के कारण अपनी जान गंवा दी.

पायल तड़वी की संस्थागत हत्या के बाद रोहित एक्ट की मांग एक बार फिर जोर-शोर से उठी. रोहित और पायल की मां, राधिका वेमुला और अबेदा तड़वी, न्याय और भेदभाव-मुक्त कैंपस की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट गईं, जहां किसी भी हाशिए के सामाजिक पृष्ठभूमि के छात्र, शोधकर्ता या शिक्षक को रोहित या पायल की तरह मरना न पड़े. इसी कानूनी लड़ाई और भेदभाव रोकने के लिए कड़े उपायों की लगातार मांग के कारण यूजीसी ने आखिरकार रोहित वेमुला की दसवीं बरसी से कुछ दिन पहले इक्विटी रेगुलेशन जारी किए. 2012 के रेगुलेशन की तुलना में, नए 2026 के इक्विटी नियमों में अधिक विशिष्ट और कालबद्ध समाधान प्रक्रिया और ढांचा दिया गया था और उसमें ओबीसी समुदायों के साथ-साथ एससी/एसटी लोगों द्वारा की गई शिकायतों और भेदभाव पर भी ध्यान दिया गया था.

यूजीसी के नए इक्विटी नियमों के खिलाफ ऊंची जाति के लोगों के कुछ ही दिनों के गुस्से के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया और इन नियमों पर रोक लगा दी. वही सुप्रीम कोर्ट जिसने सितंबर 2025 में ही यूजीसी से भेदभाव रोकने के लिए कड़े रेगुलेशन बनाने का आग्रह किया था, अब उसने एससी/एसटी-ओबीसी व बहुजन समुदायों द्वारा झेले गए जातिगत भेदभाव पर यूजीसी के केंद्रित नजरिये को भारत की जाति-विहीन सामाजिक व्यवस्था की यात्रा में एक प्रतिगामी बाधा बता दिया! उतनी ही परेशान करने वाली बात यह थी कि यूजीसी और सरकार पूरी तरह चुप थे और उन्होंने उन नियमों का बचाव करने से इनकार कर दिया जिन्हें उन्होंने कुछ ही दिन पहले अधिसूचित किया था, जबकि वे उस समय इस ऐतिहासिक कदम के लिए खुद की पीठ थपथपा रहे थे!

इस बीच, भारत की सड़कों पर कृत्रिम रूप से निर्मित आक्रोश के साथ ऊंची जाति के लोग ‘उलटा भेदभाव’ और ऊंची जाति के लोगों के पीड़ित होने के बारे में चिल्लाने लगे, यहां तक कि इस आक्रोश को नाटकीय बनाने के लिए मोदी-शाह के पुतले भी जलाए गए और हर तरह का जाना-पहचाना जातिवादी जहर उगला गया.

इन नियमों में कई कमियां थीं, जिनमें भेदभाव को परिभाषित करने में अस्पष्टता और शिकायत निवारण के प्रस्तावित ढांचे और प्रणाली की कमजोरी शामिल थी. लेकिन ऊंची जाति के लोगों को बहिष्कृत करने और उन्हें बदनाम करने के दावे साफ तौर पर गलत हैं और नए नियमों के दुरुपयोग का कथित खतरा जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है. इसका उपाय यह है कि नियमों को और ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए उनमें सुधार किया जाए और निश्चित रूप से भेदभाव और उत्पीड़न को प्राकृतिक व्यवस्था के रूप में स्वीकार न किया जाए और प्रभावशाली जातियों के सुस्थापित विशेषाधिकारों को उनके हक के रूप में संरक्षित न किया जाए. यह तथ्य, कि सभी प्रकार के भेदभाव को खत्म करने और सामाजिक समानता स्थापित करने व सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की संवैधानिक प्रतिबद्धता की घोषणा के पचहत्तर साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी राज्य में संविधान की भावना को लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिख रही है, हमें दिखाता है कि जाति व्यवस्था हर कदम पर भारत को कैसे पीछे खींच रही है.

ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित और हाशिए पर पड़े समूहों के लिए आरक्षण के रूप में सकारात्मक कार्रवाई की प्रणाली को भारत में समय-समय पर तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा है. महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने के प्रयासों ने भी औपनिवेशिक काल से ही पितृसत्तात्मक प्रतिक्रिया को जन्म दिया है, जब राममोहन राय ने विधवाओं को जलाने पर प्रतिबंध लगाने के लिए लड़ाई लड़ी या ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं और दलितों के लिए शिक्षा की शुरूआत की. यह प्रतिक्रिया स्वतंत्रता मिलने और संविधान अपनाने के बाद भी जारी रही. 1950 के दशक में हिंदू कोड बिल के अधिनियमन से लेकर बाद में दहेज-विरोधी या बलात्कार-विरोधी कानूनों या महिला आरक्षण बिल पारित होने तक, हर प्रगतिशील कदम को गहरे जड़ जमाये जाति पदानुक्रम और पितृसत्ता की तरफ से कट्टर मनुवादी विरोध का सामना करना पड़ा है. 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के प्रति ऊंची जाति के उन्मादपूर्ण विरोध और वीपी सिंह को भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने की यादें अभी भी काफी ताजा हैं.

मौजूदा हालात को इस लड़ाई का ही अगला कदम माना जा सकता है. मोदी राज में भाजपा ने ओबीसी-समर्थक छवि बनाकर और एससी व एसटी, दोनों जातियों को उप-विभाजित करके, एक ग्रुप को दूसरे के खिलाफ खड़ा करके और अपने मुख्य उच्च जाति के समर्थन आधार के इर्द-गिर्द एक बड़ा सामाजिक गठबंधन बनाकर अपनी असली मनुवादी पहचान को छिपाने में किसी तरह से कामयाबी हासिल की है. यूजीसी नियमों में ओबीसी को एससी और एसटी के साथ रखने से यह सोशल इंजीनियरिंग की योजना गड़बड़ा सकती है. इसलिए, यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट का स्थगन संघ-भाजपा सरकार के लिए बड़ी राहत बनकर सामने आया है. जहां भाजपा इसे संकट से निकलने का मौका मान रही है, वहीं उच्च जाति की लॉबी को जीत की खुशबू मिल रही है, और यूजीसी नियमों को रोकने के बाद अब वे सामाजिक समानता और अलग-अलग क्षेत्रों में समान प्रतिनिधित्व की हर कोशिश को रोकना चाहेंगे और सकारात्मक कार्रवाई की पूरी दिशा को उलटने की कोशिश करेंगे.

भूमि अधिकारों का आंदोलन एक सीखने लायक उदाहरण पेश करता है. वाजपेयी सरकार और उसके ‘इंडिया शाइनिंग’ नारे की हार के बाद हमने भारत में भूमि संरक्षण और भूमि अधिकार कानूनों के लिए एक नई लहर देखी थी. यह वह दौर था जब वन अधिकार और ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम पारित किए गए थे, नीतीश कुमार सरकार द्वारा गठित भूमि सुधार आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी और भूमि अधिग्रहण अधिनियम पारित किया गया था, जिसमें किसी भी भूमि अधिग्रहण के लिए सहमति और पर्याप्त मुआवजे को अनिवार्य बनाया गया था. हालांकि बिहार भूमि सुधार रिपोर्ट को सरकार ने सामंती लॉबी को खुश करने के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया था, और सत्ता में आने के बाद से मोदी सरकार लगातार इन कानूनों को कमजोर करने और उलटने की कोशिश कर रही है. भले ही भूमि अधिग्रहण अधिनियम को खत्म करने की उसकी कोशिश सफल नहीं हुई और कॉरपोरेट समर्थक कृषि कानूनों को भी रद्द करना पड़ा, लेकिन सरकार ने अब जितना संभव हो सके उतनी जमीन हड़पने के लिए पूरी तरह से बुलडोजर राज शुरू कर दिया है.

जहां सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी नियमों पर रोक लगा दी है, वहीं वीबीएसए (विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान) बिल 2025 में यूजीसी के साथ-साथ ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एआइसीटीई) और नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (एनसीटीई) को एक ही केंद्रीकृत नियामक निकाय से बदलने का प्रस्ताव है. उच्च शिक्षा का पूरा क्षेत्र अभूतपूर्व केंद्रीकरण, निजीकरण और हिंदुत्व वैचारिक नियमन के अधीन किया जा रहा है. और, रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या के बाद जेएनयू, एचसीयू और अन्य प्रगतिशील छात्र आंदोलन वाले कैंपसों पर हुए हमले की तरह सामाजिक न्याय, शैक्षणिक स्वतंत्रता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक रोजगार के लिए छात्रों के बीच उथल-पुथल के इस मोड़ पर एक बार फिर जूएनयू के खिलाफ हमला हुआ है. कैंपस लोकतंत्र पर एक चौंकाने वाली हमलावर कार्रवाई में, जेएनयू प्रशासन ने जेएनयू छात्र संघ के सभी चार केंद्रीय पदाधिकारियों – अध्यक्ष अदिति, उपाध्यक्ष गोपिका, महासचिव सुनील व संयुक्त सचिव दानिश और साथ ही, पूर्व अध्यक्ष नीतीश को डा. बी. आर. अंबेडकर सेंट्रल लाइब्रेरी में निगरानी प्रणाली लगाने के विरोध में प्रदर्शन करने के लिए निष्कासित कर दिया है. वास्तविक सामाजिक न्याय, समान प्रतिनिधित्व और कार्यात्मक लोकतंत्र चाहने वालों के लिए साफ तौर पर यूजीसी रेगुलेशन से कहीं ज्यादा कुछ दांव पर लग गया है. इस मोड़ पर एक शक्तिशाली छात्र आंदोलन ही भारतीय लोकतंत्र के भविष्य और उच्च शिक्षा कैंपस के अंदर और बाहर जाति के विनाश की राह की कुंजी है.





07 February, 2026