-- शहद अबुसलामा
मैं 17 साल की थी जब 2008 में इजरायल ने गाजा पर ‘ऑपरेशन कास्ट लीड’ शुरू किया. मैं हाई स्कूल के आखिरी साल के मॉक इम्तिहान दे रही थी, तभी ऐसा महसूस हुआ जैसे जहन्नुम के सारे दरवाजे खोल दिए गए हों. पूरे 22 दिनों तक गाजा पर जमीन, समुंदर और आसमान – हर तरफ से बमबारी की गई. अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए गाजा पूरी तरह बंद था. गाजा को हथियारों की टेस्टिंग और इंसानी जिस्मों को मिटाने की लैब बना दिया गया, जबकि दुनिया नए साल के जश्न में मशगूल थी.
इस हमले ने मेरी जिंदगी में एक टर्निंग पॉइंट ला दिया – कि इसलिए कि यह पहला था जो मैंने सहा, बल्कि इसलिए कि मैं इतनी बड़ी हो चुकी थी कि इस जुल्म को एक सिस्टमैटिक नस्ली सफाए की मुहिम के हिस्से के तौर पर समझ सकूं, जो 1948 से लगातार जारी है.
इस जुल्मत के दौर में हुई बर्बरताओं की तहकीकात करने वाली गोल्डस्टोन रिपोर्ट ने दर्ज किया कि इजरायल ने जानबूझकर एक बड़ी पॉलिसी के तहत आम नागरिकों और नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया, जो आज भी बिला-सजा जारी है.
हम इस खौफनाक वाकये से पहले दो इंतिफादा से गुजर चुके थे, फिर भी किसी चीज ने हमें इस सर्दियों की बर्बरता के लिए तैयार नहीं किया. हमारा घर बेघर होने वाले परिवारों के लिए पनाहगाह बन गया, जिनमें मेरी बचपन की दोस्त आलिया अल-खतीब भी थी. 5 जनवरी 2009 को, उसके वालिद अली अपने परिवार के लिए कुछ जरूरी चीजें लेने और जबालिया में अपने बुजुर्ग मां-बाप का हाल जानने गए, जिन्होंने अपना घर छोड़ने से इंकार कर दिया था, लेकिन वह कभी वापस नहीं आए. एक इजरायली ड्रोन हमले में उन्हें मौके पर ही मार दिया गया.
कुछ दिन बाद हमारे एक पड़ोसी को धमकी मिली कि अब हमारे घरों को निशाना बनाया जाएगा. हम फौरी तौर पर नंगे पांव सड़क पर भागे, और तीन दिन एक करीबी घर में खौफ और बेचैनी के साए में गुजारे.
यह पूरी तरह जेहनी जंग थी; बमबारी कभी हुई ही नहीं. 18 जनवरी 2009 को सीजफायर का ऐलान हुआ, जिसके बाद हमें अपने घर लौटने की इजाजत मिली.
फिर “नॉर्मल” जिंदगी में वापस आने की हकीकत ने अजीब-सी उम्मीद हम पर थोप दी. फिर से स्कूल जाओ. आगे बढ़ो, जैसे कुछ हुआ ही न हो.
इजरायल ने 1,400 से ज्यादा फिलिस्तीनियों को मार डाला, जिनमें ज्यादातर आम नागरिक, बच्चे और औरतें थीं. इसके बाद जिंदगी कैसे आगे बढ़ाई जाए?
मैं इस हकीकत से खुद को तसल्ली देने की कोशिश करती रही कि मेरा परिवार अभी जिंदा था. लेकिन इस ख्याल से कभी पीछा नहीं छूटा कि मैं भी मारे गए लोगों में एक और गुमनाम नाम हो सकती थी.
इसके बाद, मैंने अपने इर्द-गिर्द मौजूद दूसरे बचे हुए लोगों की ओर रुख किया – उनमें मेरे वालिद भी थे, जिन्होंने इजरायली जेलों में 16 साल से ज्यादा कैद की यातनाएं बर्दाश्त करते हुए प्रतिरोध किया. मैंने फैसला किया कि मैं भी जिंदा रहने की जद्दोजहद करूंगी – और जो भी औजार मेरे पास हों, उनके जरिये अपने शरणार्थियों, शहीदों और कैदियों की लड़ाई को दुनिया भर के लोगों तक पहुंचाऊंगी.
तेरह हिरोशिमा
एक जापानी जंगी फोटोग्राफर और पत्रकार रेई शिवा इजरायल के हमलों के बाद गाजा में हुई तबाही की सूरतेहाल कवर करने आए थे. मेरे भाई माजिद उनके जमीनी मददगार थे. वह तकरीबन एक महीने तक हमारे परिवार के साथ अल-सफ्तावी स्ट्रीट वाले घर में रहे, जहां लगातार खतरों के साए में और बिजली की मुसलसल कमी के बावजूद हमने अपनी जिंदगियों की तफसीलें उनके साथ साझा कीं.
मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि 16 साल बाद रेई से हुई यह मुलाकात मुझे जापान तक ले जाएगी.
इजरायल के जनसंहार और उसकी खौफनाक तबाही ने मुझे इतना झकझोर दिया कि मैंने यह फैसला किया कि अपने खघनदान के बचे हुए लोगों के लिए, और उन बेबस मजलूमों के लिए भी, जो अभूतपूर्व अमानवीयकरण का सामना कर रहे हैं, मैं दिल-ओ-जान से मेहनत करूं – जिनकी इंसानियत और वजूद को इतनी बेरहमी से मिटाया जा रहा है कि इतिहास में उसकी मिसाल नहीं मिलती.
मेरी किताब ‘बिटवीन रियलिटी एंड डॉक्युमेंट्री’ (2025) के प्रकाशन के बाद – जिसमें गाजा के शरणार्थियों के हालात को उपनिवेशवादी, मानवीय और फिलिस्तीनी दस्तावेजी फिल्मों के नजरिए से परखा गया है – रेई और उनकी साथी रेना मसुयामा ने मुझे इस पर बात करने के लिए बहुत दरियादिली के साथ बुलावा भेजा.
मुझे गाजा में इजरायल की दो साल से ज्यादा अरसे से जारी ताजातरीन जनसंहार के पस-मंजर के बीच – जिसे दुनिया ‘सीजफायर’ का नाम दे रही है – जापान की पार्लियामेंट को संबोधित करने का मौका मिला. मैंने यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी, टोक्यो की सेंशू यूनिवर्सिटी, और यूरेशिया वर्ल्ड फिल्म वीक के दौरान कई सिनेमाओं और कल्चरल सेंटरों में अपनी बात रखी.
हिरोशिमा और नागासाकी पर अमरीका की एटमी बमबारी से लेकर फिलिस्तीनी संघर्ष में भारी कीमत चुकाकर साथ देने वाली जापानी रेड आर्मी तक – जापान लंबे अरसे से मेरे ख्यालात और तसव्वुर का हिस्सा रहा है.
हिरोशिमा का मंजर खास तौर पर मेरे लिए बेहद बेचैन कर देने वाला था, लेकिन शायद लोगों को हैरानी हो कि इससे मुझे कुछ सुकून भी मिला. देखिए, यह शहर इस बात की जिंदा मिसाल है कि 1945 में अमरीका की सर्वनाश कर देने वाली एटमी बमबारी के बावजूद, राख से उठ खड़े होने की इंसानी जिद को कोई तोड़ नहीं सकता.
हिरोशिमा पीस मेमोरियल म्यूजियम जाना मेरे लिए कैथार्टिक था – एक किस्म का रूहानी सुकून.
फिलिस्तीनियों के लिए सब कुछ मटियामेट कर देने वाली – इंसानी वजूद को भी मिटा देने वाली – ऐसी तबाही कोई बीता हुआ इतिहास नहीं जिसे माना जाए, पढ़ा जाए या याद किया जाए. यह इतिहास भी है और जारी हकीकत भी.
न कोई हिसाब-किताब, न जवाबदेही, न याद-मातम-तामीर की जगह – सिर्फ जिंदा रहने की अंतहीन जंग.
अक्टूबर 2025 में एक्सपर्ट्स ने कहा कि गाजा पर इजरायल की बमबारी 13 से ज्यादा हिरोशिमाओं के बराबर थी – जो एक छोटे से इलाके पर गिराई गई, लेकिन उससे कहीं ज्यादा आबादी वाली जगह पर.
और फिर भी, गाजा में कोई मेमोरियल नहीं, “नेवर अगेन” का कोई वादा नहीं, जुर्म पर कोई इत्तिफाक नहीं, और न कोई नाम, न जवाबदेही. इसके उलट, गुनहगारों को इनाम मिल रहा है.
मेरी यात्रा के दौरान खबरें व्हाइट हाउस में हनुक्का रिसेप्शन को संबोधित करते डोनल्ड ट्रम्प से भरी पड़ी थीं, जहां वह दावा कर रहे थे : “मैंने गोलान हाइट्स के हक इजरायल को दस्तखत कर दिए,” और इशारा किया कि इस गैर-कानूनी कब्जे ने इजरायल को “खरबों डॉलर” से अमीर बना दिया.
जापान का ‘शांति का दिखावा’
जापान आने का मेरा न्योता मुझे इस मुल्क की अपनी विरोधाभासी सच्चाइयों से भी रू-ब-रू कराता है. हिरोशिमा मेमोरियल में इजरायली राजदूतों की हर साल शिरकत – और यह दावा कि “इजरायल अमन का पैगाम देता है” – उस राज्य को “सामान्य” बनाती है जिसकी बुनियाद ही फिलिस्तीनियों की बेदखली और जनसंहार पर टिकी है, और जो एटमी हथियारों से जुड़े बुनियादी अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल को मानने से भी इनकार करता है.
यह उन सबकों के साथ गद्दारी है जो “अतीत की गलतियों” से सीखने चाहिए, जैसा कि हिरोशिमा का सेनोटाफ हमें याद दिलाता है.
फिर भी, पास ही होने वाली साप्ताहिक विजिल में शामिल होना मुझे कुछ सुकून देने वाला लगा. वहां मेरी मुलाकात उन एकजुटता एक्टिविस्टों से हुई जो इजरायली जुर्मों में जापान की मिलीभगत के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे हैं – जिसमें जापानी रोबोटिक्स कंपनी फानुक के इजरायल के सबसे बड़े हथियार निर्माता एलबिट सिस्टम्स से रिश्ते को देखते हुए पूरी फौजी पाबंदी की मांग भी शामिल है.
उन समर्पित एक्टिविस्टों के बीच फिलिस्तीनी संस्कृति की स्कॉलर और फर्राटेदार अरबी में माहिर आओए तानामी से मुलाकघत होने पर मुझे फख्र्र हुआ. उन्होंने बताया कि वह मेरे मरहूम आर्ट टीचर फतही गाबेन को जानती थीं – जो जबालिया रेफ्यूजी कैम्प के मशहूर आर्टिस्ट थे – और 2024 में कैंसर से उनका इंतिकाल हो गया, क्योंकि इजरायल ने उनके परिवार की इलाज के लिए मेडिकल इवैक्यूएशन की तमाम अपीलें ठुकरा दी थीं.
उस मौके पर तानामी और मैंने फिलिस्तीनी नज्म “उनादीकुम” – मैं तुम्हें पुकारता/पुकारती हूं – गाई. वह मेरे लिए जिंदगी के सबसे ताजादम, पुर-सुकून देने वाले और कभी न भूलने वाले लम्हों में से एक था. उन लम्हों ने मुझे यकीन दिलाया कि हमारे संघर्ष और इतिहास गहराई से एक-दूसरे से जुड़े हैं, और हमारी इंसानियत हर सरहदों को लांघ जाती है.
अमरीका को न तो जापान में मानवता के खिलाफ किए गए अपने अपराधों के लिए, और न ही दुनिया के दूसरे कोनों में की गई उसकी सीधी और परोक्ष, तबाही मचाने वाली फौजी दखलअंदाजियों के लिए कभी जवाबदेह ठहराया गया. सजा से छूट एक ऐसी मिसाल बन गई जो आज भी खुलेआम जारी है, खासतौर पर फिलिस्तीन में.
और जब ट्रंप, नेतन्याहू और गाजा को मिटाने की कोशिशों के जिम्मेदार दूसरे लोग उसे “गैर-आबाद” या “बंजर जमीन” करार देते हैं, तब हिरोशिमा का वजूद उस झूठ के खिलाफ एक जीता-जागता जवाब बन खड़ा है. अगर हम इसे दोबारा बनाने के काबिल होते, तो गाजा भी हिरोशिमा की तरह राख के ढेर से फिर उठ खड़ा होगा.
(‘फ्राम हिरोशिमा टू गाजा, देयर इज नो पीस विदाउट जस्टिस’, द न्यू अरब, 27 जनवरी, 2026)