वर्ष 35 / अंक - 12 / मनरेगा से वीबी-ग्राम जी : संविधान और मेहनतकशों पर...

मनरेगा से वीबी-ग्राम जी : संविधान और मेहनतकशों पर हमला

मनरेगा से वीबी-ग्राम जी : संविधान और मेहनतकशों पर हमला

-- वंदना प्रभा

मनरेगा की हत्या कर दी गयी है. जिस काम के अधिकार को देश के मेहनतकशों और गरीबों ने दशकों के संघर्ष से हासिल किया था, उस अधिकार को खत्म कर दिया गया है. मनरेगा सिर्फ एक योजना नहीं था बल्कि यह गरीब मेहनतकश वर्ग के सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकार की जीत थी. कॉरपोरेट समर्थित मोदी सरकार मनरेगा को रद्द कर उसकी जगह नया काला कानून लेकर आयी है जिसका नाम है ‘विकसित भारत -गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन’ (वीबी ग्राम जी). यह कानून भारतीय संविधान की मूल भावना, संघीय ढांचे और नागरिक अधिकारों पर सीधा हमला है. इस काले कानून के तहत गरीब-मेहनतकशों के अधिकार पूरी तरह केंद्र की सत्ता की मर्जी पर निर्भर रहेंगे. आश्चर्य और दुःख की बात यह है कि इस कानून को संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन जबरदस्ती पारित किया गया और मजदूरों, जन संगठनों, यूनियनों या जनता से किसी भी तरह के संवाद या सलाह-मशविरा किए बिना थोप दिया गया.

मनरेगा ऐसे दौर में लागू किया गया था जब नवउदारवादी आर्थिक नीतियां भारत की अर्थव्यवस्था को पुनर्गठित कर रही थीं. उन नीतियों का सबसे बड़ा बोझ मेहनतकश गरीबों पर पड़ रहा था. आर्थिक विकास के नाम पर ग्रामीण भारत “बिना रोजगार के विकास” (jobless growth) का शिकार बन रहा था. ऐसे समय में हर ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिन के मजदूरी की गारंटी वाले कानून ने केवल आमदनी ही नहीं दी, बल्कि मजदूरों की आवाज और मजदूरी के मोलभाव की ताकत (wage bargaining power) को मजबूत किया.

यह सच है कि मनरेगा का क्रियान्वयन जैसा होनी चाहिए थी वैसे नहीं हो पाया. भ्रष्टाचार और लालफीताशाही ने एक मजबूत कानून को निष्क्रिय और अलोकप्रिय बना दिया. इन कमियों को ठीक करने के बजाय मौजूदा सरकार ने मनरेगा को ही निरस्त कर दिया. लगभग बीस वर्षों तक मनरेगा ग्रामीण भारत अकुशल मजदूर के लिए मजबूत दीवार बनकर खड़ा रहा. सूखा हो या आर्थिक मंदी या फिर कोविड-19 जैसी आपदा, जब सभी रोजगार खत्म हो गए थे, तब मनरेगा की वजह से ही लाखों-करोड़ों घरों में चूल्हा जल सका था.

वीबी ग्राम जी के तहत सरकार मनरेगा के बजट और संसाधनों को केंद्रीकृत करने, मजदूरों की ताकत तोड़ने और कॉरपोरेट हितों को आगे बढ़ाने की राजनैतिक मंशा को साध रही है. यह अधिकारों और लोकतंत्र की जगह कॉरपोरेट शैली की हुकूमत को बढ़ावा देता है. इससे ताकत फिर से ठेकेदारों, सामंती वर्ग और बड़ी कंपनियों के हाथ में जा रही है और मेहनतकश मजदूर वर्ग फिर से गरीबी और भूख के कुचक्र में धकेले जा रहे हैं.

आइये, इन दोनों कानूनों में अंतर को समझते है :


मनरेगा क्यों था जरूरी ?

मनरेगा जैसा प्रगतिशील कानून लम्बे समय के जन संघर्षों और जन आंदोलनों से बन पाया था. 1990 और 2000 के दशक में – जब पूरा देश गरीबी, भूख, बेरोजगारी व पलायन के आग से जूझ रहा था – मजदूरों, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और जन संगठनों की लंबी लड़ाई से काम के अधिकार की मांग उठी. 2005 में दोनों संसदों ने राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर मनरेगा जैसे मजबूत कानून को पारित किया. मनरेगा ने सभी ग्रामीण परिवारों को बिना शर्त 100 दिन काम का अधिकार सुनिश्चित किया. अब सरकार संवैधानिक रूप से मजदूरों को काम और काम का पूरा दाम देने के लिए बाध्य थी. बीस साल पुरानी योजना आज भी करोड़ों परिवारों की आजीविका का आधार बनी हुई है. साल 2006 से अब तक मनरेगा के अंतर्गत 15.55 करोड़ जॉब कार्ड जारी किए जा चुके हैं और 26.6 करोड़ मजदूर इस योजना के तहत पंजीकृत हैं. इनमें से 8.63 करोड़ जॉब कार्ड और 12.17 करोड़ मजदूर आज भी सक्रिय हैं. ये आंकड़े इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि मनरेगा ग्रामीण आजीविका के लिए आज भी कितना प्रासंगिक और आवश्यक है. इस योजना के क्रियान्वयन में चाहे कितनी कमियां रही हों लेकिन पुरे देश के गरीबों के जीवन में इसने अमिट छाप छोड़ी है. इसे निम्नलिखीत बिंदुओं से समझा जा सकता है :

1. मजदूरी की सुरक्षा और आय में स्थिरता  

मनरेगा की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने ग्रामीण इलाकों में मजदूरी की एक न्यूनतम सीमा तय की. पिछले वर्ष मनरेगा के तहत औसत मजदूरी लगभग 267 रुपये प्रतिदिन रही. इससे खेतिहर मजदूरों के शोषण पर रोक लगी और साथ ही कई राज्यों में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं की भी दैनिक आमदनी में वृद्धि हुई. आंकड़े बताते है कि केवल वित्तीय वर्ष 2024-25 में 73,321.95 करोड़ रुपये सीधे मजदूरों के हाथों में मजदूरी भुगतान के रूप में पहुंचे.

2. सम्मानजनक काम और सामाजिक ढांचों में बदलाव 

ग्रामीण भारत में सम्मानजनक और सुरक्षित काम के अवसरों की भारी कमी के बीच मनरेगा गरीबों के लिए गरिमा के साथ रोजगार का एक बड़ा स्रोत बना. कई गांवों में पारंपरिक श्रम व्यवस्थांएं, जैसे जाति आधारित जजमानी व्यवस्था, मनरेगा के कारण कमजोर पड़ीं. वैकल्पिक रोजगार ने मजदूरों को पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही जमींदारों और दबंगों की मनमानी और शोषण से बाहर निकलने का रास्ता दिया. तमाम खामियों और बजटीय सीमाओं के बावजूद, 2025-26 में मनरेगा के तहत 4.87 करोड़ ग्रामीण परिवारों को रोजगार मिला. 2024-25 में लगभग 40.7 लाख परिवारों ने पूरे 100 दिन का काम पूरा किया.

3. विकेंद्रीकरण और स्थानीय लोकतंत्र 

मनरेगा दुनिया के सबसे विकेंद्रीकृत सामुदायिक कार्यक्रमों में से एक था. इसमें ग्राम सभा और ग्राम पंचायतों की भूमिका केंद्रीय थी. ग्राम सभा में मजदूरों को यह अधिकार था कि वे अपनी स्थानीय जरूरतों के अनुसार कामों की पहचान करें, प्लानिंग करें. फिर ग्राम सभा से ही लेबर बजट तैयार होकर ऊपर सरकार को भेजा जाता था. फिर तब केंद्र सरकार बजट आवंटित करती थी. सरकार ऊपर से अपने हिसाब से फैसले नहीं थोप सकती थी. सरकार को भी ग्राम सभा के समक्ष अपनी फाइल रखनी पड़ती थी. मनरेगा के वजह से रोजगार के साथ-साथ स्थानीय लोकतंत्र को भी मजबूती मिली .

4. विश्व में सबसे बड़ी समावेशी और जनभागीदारी वाली श्रम कार्यक्रम

यह योजना विशेष रूप से सबसे हाशिए पर खड़े समुदायों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी और यही कारण है कि यह भारत के सबसे समावेशी श्रम कार्यक्रमों में से एक बनी जिसमें करोड़ों मजदूरों ने भाग लिया और जिनमें महिलाओं, दलितों और आदिवासियों की हिस्सेदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही. 2024-25 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मजदूरों ने मिलकर कुल काम का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा पूरा किया.

5. मनरेगा और महिलाओं का सशक्तीकरण

मनरेगा ने ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी में गहरा बदलाव लाया. लाखों ग्रामीण गरीब महिलाओं के लिए यह पहली बार स्वतंत्र आमदनी का स्रोत बना. इसमें महिलाओं के लिए कम से कम एक तिहाई भागीदारी तय की गई थी लेकिन वास्तविकता में महिलाओं की हिस्सेदारी 50% से भी कहीं अधिक रही. घर के पास काम मिलने से महिलाओं के लिए रोजगार तक पहुंच आसान हुई और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति मजबूत हुई. कोरोना काल के बाद महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक रूप से बढ़ी और लगभग 59% तक पहुंच गई. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में कुल व्यक्ति-दिनों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 58.08% रही. इससे पहले 2023-24 में यह लगभग 59%, 2022-23 में 57.5% और 2021-22 में लगभग 54.8% थी. ये आंकड़े दिखाते हैं कि पिछले एक दशक में मनरेगा में महिलाओं को बढ़ी संख्या में रोजगार मिला.

मनरेगा केवल रोजगार सृजन की योजना नहीं थी. यह गरिमा, सुरक्षा और सामाजिक न्याय का एक ढांचा था. इसने ग्रामीण गरीबों को अधिकार दिए, मजदूरी की रक्षा की, सामाजिक असमानताओं को चुनौती दी और स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत किया. मनरेगा ने यह साबित किया कि अगर राज्य चाहे, तो रोजगार को अधिकार बनाया जा सकता है.

वीबी ग्राम जी बिल (2025) का बहिष्कार क्यों ?

वीबी ग्राम जी बिल, 2025 मनरेगा का  ‘सुधार’ नहीं है बल्कि उसकी मूल आत्मा का विध्वंस है. अधिकार आधारित व्यवस्था को एक आपूर्ति-नियंत्रित, मनमानी योजना में बदल दिया गया है. इस हमले का सबसे खतरनाक रूप है खेती के मौसम में 60 दिनों का अनिवार्य ‘नो-वर्क पीरियड’. मनरेगा के तहत मजदूर साल के किसी भी समय काम मांग सकते थे, जिससे उनकी मोलभाव की ताकत बनी रहती थी और वे शोषण से बचे रहते थे. वीबी ग्राम जी बिल इस अधिकार को छीनकर सर्वाधिक व्यस्त कृषि मौसम में काम पर पूरी तरह रोक लगाता है, जिसका नतीजा यह होगा कि मजदूर फिर से कम मजदूरी वाले असुरक्षित और सामंती श्रम में धकेल दिए जाएंगे. इसका सबसे ज्यादा नुकसान दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और हाशिए के अन्य समुदायों को होगा जिनके लिए मनरेगा शोषण से बाहर निकलने का एक रास्ता था. मनरेगा की एक और बुनियादी विशेषता थी कि उसका लेबर बजट मांग के अनुसार बनता था. काम की जरूरत जितनी होती थी, उसी के हिसाब से धन की व्यवस्था की जाती थी और केंद्र सरकार ज्यादातर खर्च उठाती थी, ताकि गरीब राज्यों पर बोझ न पड़े. वीबी ग्राम जी बिल इस सिद्धांत को खत्म कर देता है और उसकी जगह “नॉर्मेटिव एलोकेशन” यानी एक तयशुदा बजट सीमा लगा देता है.

जहां मनरेगा एक सार्वभौमिक अधिकार था – कोई भी व्यक्ति, कभी भी, कही भी काम कर सकते थे. वीबी ग्राम जी बिल इस सार्वभौमिकता खत्म कर देता है. केंद्र सरकार द्वारा “नोटिफाइड” गांव में ही काम मिल पायेगा. अगर आपका गांव केंद्र की सूची में नहीं है, तो आपके पास काम मांगने का कोई अधिकार ही नहीं बचेगा. इससे ग्राम सभा और पंचायतों की ताकत और स्वायत्तता को गंभीर रूप से कमजोर होगी. पंचायती राज अधिनियम (73वें संविधान संशोधन) के अनुसार ग्राम सभा स्थानीय जरूरतों के अनुसार काम तय करती थी. वीबी ग्राम जी बिल में इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया को एक केंद्रीकृत “नेशनल रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर स्टैक” से बदल दिया गया है.

पारदर्शिता और जवाबदेही के मामले में भी वीबी ग्राम जी बिल पीछे ले जाता है. मनरेगा में सीएजी की भूमिका अहम थी. नए बिल में ऑडिट के नियम केंद्र सरकार के नियंत्रण में होंगे. सीएजी को केवल सलाहकार की भूमिका में सीमित कर दिया गया है. इससे भ्रष्टाचार और मनमानी की गुंजाइश और बढ़ जाती है. मनरेगा के केंद्र में सबसे गरीब और सबसे जरूरतमंद अकुशल मजदूर (unskilled manual worker) थे. लेकिन वीबी ग्राम जी बिल का झुकाव अब ‘कुशल’ और ‘अर्धकुशल’ इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की ओर है, जिससे वही लोग बाहर हो जाएंगे जिन्हें काम की सबसे ज्यादा जरूरत है. इसके अलावा, “कन्वर्जेंस” को इस योजना का मुख्य उद्देश्य बनाकर एक और खतरा पैदा किया गया है. मनरेगा में साफ नियम था कि उसके पैसे विभागीय योजनाओं की जगह नहीं ले सकते. वीबी ग्राम जी बिल में यह दीवार तोड़ दी गई है, जिससे मजदूरी के पैसे दूसरी योजनाओं के इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च किए जाने का रास्ता खुल जाता है. इसके साथ ही, यह बिल टेक्नोलॉजी पर अत्यधिक निर्भरता थोपता है जैसे कि बायोमेट्रिक हाजिरी, जियो-टैगिंग, जीआइएस और एआइ आदि  अनिवार्य कर दिए गए हैं. जबकि पुराने अनुभव साफ बताते हैं कि तकनीकी विफलताओं के कारण लाखों मजदूर पहले ही काम और मजदूरी से वंचित होते रहे हैं.

अंततः इस बिल में योजना का मूल उद्देश्य ही बदल दिया गया है. वीबी ग्राम जी बिल में फोकस इंफ्रास्ट्रक्चर टार्गेट, लेबर मैनेजमेंट पर है. मनरेगा ने मजदूरों को अधिकार-सम्पन्न नागरिक बनाया था जबकि वीबी ग्राम जी उन्हें फिर से लाभार्थी बनाने की ओर ले जा रहा है.

राज्यों पर वित्तीय बोझ : गरीब राज्यों को सजा

नया वीबी-ग्रामजी ढांचे ने मनरेगा की वित्तीय व्यवस्था को पूरी तरह पलट दिया है. मनरेगा के तहत केंद्र-राज्य हिस्सेदारी सीमित थी और गरीब राज्यों पर अपेक्षाकृत कम बोझ पड़ता था.  इसके विपरीत, वीबी-ग्रामजी योजना में मजदूरी और सामग्री लागत के लिए 60:40 (केंद्रःराज्य) का अनिवार्य बंटवारा तय किया गया है, जबकि उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 रखा गया है. यह बदलाव बिहार जैसे आर्थिक रूप से कमजोर राज्य के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है.

बिहार की वित्तीय स्थिति पहले से ही काफी गंभीर है. बिहार बजट 2025-26 के अनुसार, राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियां लगभग 2.6 लाख करोड़ रुपये हैं, जबकि राजस्व व्यय करीब 2.52 लाख करोड़ रुपये है. इसका मतलब है कि पूरे साल के लिए राज्य के पास केवल लगभग 8,800 करोड़ रुपये का राजस्व अधिशेष बचता है. वहीं, राजकोषीय घाटा लगभग 32,700 करोड़ रुपये आंका गया है, जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3% की राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) सीमा के करीब है. केवल ब्याज भुगतान ही सालाना लगभग 23,000 करोड़ रुपये है और जब इसमें वेतन व पेंशन जैसे प्रतिबद्ध खर्च जोड़ दिए जाएं, तो राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का 40% से अधिक हिस्सा पहले ही बंध चुका होता है. बिहार पर कुल सार्वजनिक ऋण लगभग 3.1 लाख करोड़ रुपये का है. चुनाव से ठीक पहले ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत अतिरिक्त 21 हजार करोड़ रूपये खर्च कर चुकी है. साधारण भाषा में समझे तो बिहार नयी वित्तीय जिम्मेदारियां उठाने की हालत में बिलकुल नहीं है.

मनरेगा के तहत बिहार में हाल के वर्षों में ग्रामीण रोजगार पर कुल खर्च लगभग 5,800 करोड़ से 8,000 करोड़ रुपये के बीच रहा है. लेकिन इसमें राज्य सरकार का सीधा योगदान अपेक्षाकृत कम था क्योंकि योजना का मुख्य वित्तपोषण केंद्र सरकार करती थी. आमतौर पर 550 करोड़ से 1,100 करोड़ रुपये प्रति वर्ष का एडमिनिस्ट्रेटिव खर्च राज्य सरकार करती है . अगर वीबी-ग्राम जी के तहत ग्रामीण रोजगार की मांग मनरेगा के हालिया वर्षों के बराबर भी बनी रहती है तो बिहार पर सालाना वित्तीय बोझ बढ़कर लगभग 2,400 से 3,400 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. यानी राज्य को हर साल अतिरिक्त 1,500 से 2,500 करोड़ रुपये का बोझ उठाना पड़ेगा, जो पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा है. व्यावहारिक रूप से इसका मतलब यह है कि सिर्फ एक योजना ही बिहार के पूरे राजस्व अधिशेष का एक-तिहाई से लेकर दो-पांचवां हिस्सा खा सकती है. यह राशि राज्य के सालाना ब्याज भुगतान का लगभग 10 से 15% है. अगर सूखा पड़ा, आर्थिक मंदी आई या ग्रामीण संकट बढ़ा, तो रोजगार की मांग बढ़ेगी और यह वित्तीय बोझ अपने आप और ज्यादा हो जाएगा.

स्थिति को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि वीबी-ग्राम जी में केंद्र सरकार की “मानक” या तयशुदा राशि खत्म हो जाने के बाद, अतिरिक्त मांग का पूरा बोझ राज्यों पर डाल दिया जाएगा. इसके अलावा, बेरोजगारी भत्ता या मुआवजा देने की जिम्मेदारी भी राज्यों पर ही बनी रहेगी. इसका मतलब है कि वित्तीय जोखिम पूरी तरह राज्य सरकारों के कंधों पर डाल दिया गया है, जबकि संसाधनों पर केंद्र का नियंत्रण और बढ़ जाता है. इस तरह वीबी-ग्राम जी योजना केवल मनरेगा का विकल्प नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा ढांचा है जो गरीब और पिछड़े राज्यों को उनकी गरीबी के लिए दंडित करता है. बिहार जैसे राज्यों के लिए यह न केवल आर्थिक दबाव बढ़ाने वाला कदम है, बल्कि ग्रामीण गरीबों के रोजगार अधिकार को भी अस्थिर और अनिश्चित बना देता है.

वीबी ग्राम जी बिल और 60 दिनों का ‘ब्लैकआउट’: किसान-मजदूर को बांटने की साजिश

वीबी-ग्राम जी कानून किसानों और मजदूरों, दोनों के साथ धोखा करता है. लेकिन मोदी सरकार ने बहुत चालाकी इस कानून को किसानो के पक्ष में जताया है. सरकार मजदूरी के अधिकार को खेती के संकट का दोषी ठहरा कर खुद की नाकामियों से बच निकलना चाहती है. इस कानून के अंतर्गत खेती के 60 दिनों तक मजदूरों को कोई काम नहीं मिलेगा ताकि किसानो को खेती के लिए मजदूर उपलब्ध हो सकें. यानि सरकार मानना है की मनरेगा की वजह से कृषि के लिए मजदूर नहीं मिल रहे थे जिसकी वजह से किसान घाटे में जा रहे हैं. यह सोच हास्यप्रद है. सरकार किसानों की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी की वर्षों पुरानी मांग पर काम करने के बजाय इस बिल को ‘किसान हितैषी’ बताकर पेश कर रही है. हकीकत में यह बिल खेती को मजबूत नहीं करता बल्कि मजदूरों के अधिकारों को कमजोर करता है और कॉरपोरेट हितों को सुरक्षित करता है.

यह सरलीकरण कोई भूल नहीं है बल्कि एक जानबूझकर रची गई राजनीतिक चाल है, जिसका मकसद नीतिगत असफलताओं से ध्यान हटाना और किसानों तथा मजदूरों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना है. हकीकत तो यह है कि खेती संकट में इसलिए है क्योंकि किसानों को उनकी फसलों का कानूनी रूप से सुनिश्चित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) नहीं मिलता, बाजार से जोड़ने की ठोस व्यवस्था नहीं है, भंडारण और कोल्ड-चेन जैसी बुनियादी संरचनाएं नदारद हैं. खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, कर्ज बढ़ता जा रहा है और फसल बीमा लगभग पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है. ये सभी संरचनात्मक समस्याएं हैं, जो मनरेगा की नहीं, सरकार की अक्षमता और नीतिगत विफलता का नतीजा हैं.

इस सरकार ने किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए कोई गंभीर और ठोस कदम नहीं उठाया. सार्वजनिक खरीद, मूल्य समर्थन और बाजार नियमन को मजबूत करने के बजाय, सरकार ने महामारी के बीच तानाशाही तरीके से किसान कानून थोपने की कोशिश की. उनकी नियत से यह बात तभी साफ हो गई थी कि ये कानून बड़े कॉरपोरेट घरानों और एग्रीबिजनेस कंपनियों खासतौर पर अडानी जैसे समूहों के हित में बनाए गए हैं. देश के किसानों को पूरे एक साल तक ऐतिहासिक संघर्ष करना पड़ा, तब जाकर सरकार को ये कानून वापस लेने पड़े. पर इसके बावजूद भी सरकार का किसानों के प्रति रवैया नहीं बदला. ‘किसान सम्मान निधि योजना’ के तहत 500 रुपये की मामूली रकम से किसानों को एक बोरा खाद भी नसीब नहीं हो पाता.

किसानो के साथ-साथ यह बिल मजदूरों के साथ भी उतना ही बड़ा धोखा है. मनरेगा को कमजोर या खत्म करके यह उस न्यूनतम मजदूरी  (floor wage ) को तोड़ देता है, जिसने ग्रामीण मजदूरों को भीषण शोषण से बचाया था. पारंपरिक ग्रामीण समाज में जजमानी जैसी व्यवस्थाएं दलितों, आदिवासियों और हाशिए के समुदायों के लिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी बंधन का कारण रही हैं. जमीन के मालिक मजदूरी तय करते थे और मजदूरों के पास अपनी मजदूरी के मोलभाव की ताकत नहीं होती थी. मनरेगा ने पहली बार मजदूरों को एक वैकल्पिक रास्ता दिया और यही वजह है कि आज उस पर हमला किया जा रहा है.

यह सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है – किसानों और मजदूरों के बीच कृत्रिम टकराव पैदा करने की रणनीति. जबकि दोनों समुदायों की लड़ाई एक ही व्यवस्था के सताये हुए हैं और उसके खिलाफ हैं.

इस काले कानून का असर केवल गरीबों तक सीमित नहीं रहेगा. यह देश के संघीय ढांचे (federalism) को कमजोर करता है, राज्यों को आर्थिक रूप से और निर्भर बनाएगा, पंचायती राज संस्थाओं को खोखला करेगा. आज अगर रोजगार का अधिकार छीना जा सकता है तो कल शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे अन्य अधिकार भी इसी तरह ‘बजट की बाध्यता’ के नाम पर खत्म किए जा सकते हैं. यह एक खतरनाक मिसाल है.

इसलिए इस लड़ाई को केवल मनरेगा की लड़ाई समझना एक भूल होगी. यह संघर्ष संविधान की आत्मा को बचाने का संघर्ष है. यह उस विचार के खिलाफ लड़ाई है जिसमें नागरिकों को लाभार्थी बनाया जा रहा है.

सभी वर्गों को संगठित  होकर इस लड़ाई को लड़ना होगा.  ग्राम सभाओं, पंचायतों, ट्रेड यूनियनों, किसान संगठनों, महिला संगठनो और छात्र-युवा आंदोलनों को एक साझा मंच पर आना होगा. इस बिल के खिलाफ संघर्ष सड़कों के साथ  गांवदृगांव में जनदृसंवाद, संविधान की बात और अधिकारों की पुनःस्थापना के जरिए आगे बढ़ना होगा.


21 March, 2026