वर्ष 34 / अंक-30-31 / गांधी का जन्मदिन, आरएसएस का विजयादशमी और आरएसएस का...

गांधी का जन्मदिन, आरएसएस का विजयादशमी और आरएसएस का हिसाब-किताब

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अक्टूबर का महीना आते ही पूरी दुनिया मोहनदास करमचंद गांधी को याद करती है. वही गांधी जिन्हें हम बापू कहते हैं. अहिंसा और इंसाफ के रास्ते पर चलने वाले गांधी ने न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया पर असर डाला. दक्षिण अफ्रीका  मार्टिन लूथर किंग जूनियर तक ने कहा कि उनकी लड़ाई में गांधी का रास्ता ही सबसे बड़ी सीख थी. गांधी ने साबित कर दिया कि सच्चाई और नैतिक साहस से बड़े से बड़ा साम्राज्य भी हिल सकता है.

लेकिन अक्टूबर सिर्फ गांधी का महीना नहीं है. यही महीना 1925 में आरएसएस की पैदाइश का भी है. उस वक्त जब देश के करोड़ों लोग अंग्रेजी हुकूमत से लड़ रहे थे, जेल जा रहे थे, जान दे रहे थे – आरएसएस दूर खड़ा था. न लड़ाई में, न कुर्बानी में. बल्कि इसके नेता हिटलर और मुसोलिनी जैसे यूरोपीय फासिस्टों से सीख रहे थे और एक ‘हिंदू राष्ट्र’ का ख्वाब देख रहे थे, जहां अल्पसंख्यक दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाएं.

आरएसएस में मेरे साल

ये सब बातें मेरे लिए किताबों का इतिहास नहीं हैं. मैं खुद करीब बीस साल आरएसएस और उसकी शाखाओं भाजपा और एबीवीपी के साथ रहा. छोटे कार्यकर्ता से लेकर जिम्मेदार पदों तक पहुंचा. अनुशासन और मेहनत के लिए तारीफ भी मिली. मेरे पिता भी पुराने प्रचारक थे और वाजपेयी-अडवाणी जैसे नेताओं के करीबी. गांधी की हत्या के बाद जब आरएसएस पर थोड़े दिनों के लिए पाबंदी लगी थी तो वो जेल भी गए थे.

जवानी में मुझे लगता था कि मैं देश की सेवा कर रहा हूं. लेकिन धीरे-धीरे असली तस्वीर सामने आई. मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों और सेक्युलर हिंदुओं को दुश्मन बताया जाता था. गांधी को ‘कमजोर’ कहकर मजाक उड़ाया जाता था. और नाथूराम गोडसे – जिसने गांधी को गोली मारी थी – उसकी चुपके से तारीफ की जाती थी.

तब मुझे समझ आया कि यह विचारधारा आजाद और बराबरी वाला भारत बनाने की नहीं है. यह तो सांप्रदायिक और तानाशाही सोच को फैलाने का प्रोजेक्ट है. चालीस साल पहले मैंने यह रास्ता छोड़ दिया. परिवार से रिश्ते बिगड़ने का दर्द भी झेला, लेकिन इस फैसले ने मुझे लोकतंत्र, इंसाफ और इंसानियत के लिए काम करने की आजादी दी.

गांधी का भारत बनाम आरएसएस का भारत

आज हालत ये है कि गांधी के कातिलों के वारिस सत्ता चला रहे हैं. भाजपा दरअसल आरएसएस का ही राजनीतिक चेहरा है. मोदी, शाह, गडकरी, राजनाथ – ये सब आजीवन संघी रहे हैं. उनकी नीतियां – मुसलमानों पर हमले, दलितों और ईसाइयों को निशाना बनाना, असहमति दबाना, इतिहास को तोड़-मरोड़ कर लिखना – ये सब कोई इत्तेफाक नहीं है. यह उसी विचारधारा का नतीजा है जो शुरू से भारत की बहुलता और लोकतांत्रिक आत्मा से नफरत करती रही.

आरएसएस ने कभी आजाद भारत के सपने को नहीं माना. इसके विचारक सावरकर खुलकर यूरोपीय फासिस्टों की तारीफ करते थे. गोलवलकर ने तो यहां तक कहा कि नाजी जर्मनी ने यहूदियों के साथ जो किया, वो एक ‘मॉडल’ है. उसी नफरत ने गांधी की जान ली.

मीडिया की चुप्पी और संलिप्तता

दिक्कत यह है कि आज का मीडिया इन सच्चाइयों को दबा देता है. अखबार और टीवी पर शायद ही कभी सुनने को मिलता है कि आरएसएस ने अंग्रेजों के खिलाफ कभी संघर्ष नहीं किया, कि यह तिरंगे का विरोध करता था, या इसके नेताओं को हिटलर-मुसोलिनी पसंद थे.

मुख्यधारा की बहसों में गांधी की हत्या को शायद ही कभी उस विचारधारा से जोड़ा जाता है जो आज सत्ता में बैठी है. इस चुप्पी से करोड़ों लोग यह मान बैठते हैं कि भाजपा बस एक और सामान्य पार्टी है, जबकि असलियत यह है कि यह एक सदी पुराने सांप्रदायिक फासीवादी आंदोलन का राजनीतिक मुखौटा है.

इस बार गांधी जयंती और विजयादशमी एक साथ पड़ रहे हैं. यह सिर्फ कैलेंडर का इत्तेफाक नहीं है, बल्कि एक प्रतीक है : गांधी बनाम उनके कातिल. सवाल साफ है – हम गांधी के अहिंसा और बराबरी वाले रास्ते पर चलेंगे या गोडसे के वारिसों को देश सौंप देंगे?

गांधी ने कहा था : ‘भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम आज क्या करते हैं.’ आज का भारत हमसे यही मांग कर रहा है कि हम सच का सामना करें. यह याद रखें कि किसने आजादी की लड़ाई लड़ी और कौन किनारे खड़ा रहा. और तय करें कि हमें कैसा भारत चाहिए – गांधी का समावेशी भारत, या आरएसएस का तानाशाही भारत.

(डॉ. पार्थ बनर्जी न्यूयॉर्क में रहने वाले कार्यकर्ता, शिक्षक और लेखक हैं. वे धर्म और मीडिया की वैश्विक राजनीति पर काम करते है.)

-- पार्थ बनर्जी

11 October, 2025