पिछले दो हफ्तों से संघर्ष का अखाड़ा बनी स्पोर्टकिंग फैक्टरी, जीदा (जिला बठिंडा) के मजदूरों की हड़ताल को शानदार जीत हासिल हुई है. जहां मोदी सरकार के लेबर कोड के अनुसार ड्यूूटी के कानूनी 12 घंटे कर दिए गए थे, वहीं इस संघर्ष के कारण फिर से 8 घंटे की ड्यूटी लागू करवाने में सफलता मिली है.
इसके अलावा अकुशल मजदूरों की दैनिक मजदूरी 451 रुपये से बढ़ाकर 500 रुपये और अर्द्ध-कुशल मजदूरों की दैनिक मजदूरी 550 रुपये करवाने में भी कामयाबी हासिल हुई है. सबसे बड़ी बात यह है कि फैक्टरी में यूनियन बन चुकी है. पहले मजदूरों को तनख्वाह का कोई हिसाब-किताब नहीं दिया जाता था, लेकिन अब पूरी तनख्वाह सैलरी स्लिप पर दी जाएगी. मजदूरों के वाहनों के लिए पार्किंग का प्रबंध किया जाएगा, ईएसआइ अस्पताल में इलाज और दवाइयों का प्रबंध ठीक किया जाएगा. मजदूरों के लिए खाने का अच्छा प्रबंध, हॉस्टलों की साफ-सफाई और काम की जगह की हालत सुधारने जैसी मांगें भी मान ली गई हैं. साथ ही, पंजाब और केंद्र सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी कानून में संशोधन के बारे में पिछले 14 सालों से कोई विचार नहीं किया जा रहा, उस मनमानी के खिलाफ संघर्ष आगे जारी रहेगा.
याद रहे कि मजदूरों (जिनमें महिलाओं की बड़ी संख्या है) द्वारा अपनी मांगों के लिए हड़ताल करके 27 अप्रैल को बठिंडा-अमृतसर मुख्य सड़क को जाम करने पर प्रबंधकों के कहने पर पुलिस ने लगभग सौ पुरुष और महिला मजदूरों तथा उनके समर्थन में पहुंचे युवा नेता कॉमरेड मंगा सिंह आजाद को भी गिरफ्तार कर लिया था.
लेकिन अगले ही दिन अन्य मजदूर, किसान और युवा संगठनों द्वारा आंदोलनकारी मजदूरों के हक में विशाल धरना लगा देने के दबाव के कारण प्रशासन और फैक्टरी प्रबंधन को हड़ताली मजदूरों से समझौता करने और सभी गिरफ्तार आंदोलनकारियों को रिहा करने के लिए मजबूर होना पड़ा. किरती किसान यूनियन, नौजवान भारत सभा, पंजाब स्टूडेंट्स यूनियन, भारतीय किसान यूनियन (एकता) उग्राहां, पंजाब खेत मजदूर यूनियन और कुछ अन्य संगठनों द्वारा मजदूरों के इस संघर्ष को मजबूत समर्थन दिया गया.
इस प्रकार जहां दिल्ली-एनसीआर में पुलिस प्रशासन द्वारा हड़ताली मजदूरों और उनका समर्थन करने वाले एक्टिविस्टों को विभिन्न पुलिस मामलों में उलझाकर मजदूर आंदोलन को कुचलने की साजिश की जा रही है, वहीं पंजाब में व्यापक जनाधार वाले किसान-मजदूर संगठनों के समर्थन के कारण प्रशासन और मैनेजमेंट को तीसरे दिन ही झुकना पड़ा और हड़ताली मजदूरों की कुछ मुख्य मांगें मानकर समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा. यह फैक्ट्री मजदूरों की एक उत्साहवर्धक जीत है.
– सुखदर्शन नत्त