प्रो. हेमन्त कुमार झा
ट्रंप का उदय और ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा
अमेरिकी पूंजीवाद पिछले कुछ दशकों से गहरे संकट में है और उससे पार पाने का कोई रास्ता नहीं निकल पा रहा. मध्यवर्गीय लोगों की आय ठहर-सी गई है जबकि कॉरपोरेट मुनाफा बढ़ता जा रहा है. अमेरिकी कामगारों का तबका भी गहरे आर्थिक दबावों में है क्योंकि रोजगार के अवसरों की बड़े स्तर पर आउट सोर्सिंग चीन, मेक्सिको आदि देशों में हो चुकी है. सस्त और कुशल श्रम को प्राथमिकता देना कॉरपोरेट सेक्टर की स्वाभाविक प्रवृत्ति है और वैश्वीकरण के दौर में श्रम का आउटसोर्स इसकी स्वाभाविक परिणति भी. इसने अमेरिकी लोगों के लिए अवसर कम किए.
2008 में आए आर्थिक संकट में आम लोगों ने बहुत अधिक कठिनाइयां झेली थीं. लाखों लोगों का रोजगार छीन गया, छोटे उद्योगों पर बुरा असर पड़ा. कालांतर में लोगों ने महसूस किया कि सिस्टम ‘इलीट’ लोगों के संरक्षण के लिए अधिक तत्पर है और उनके हितों को हाशिए पर डाल दिया गया है. अमेरिका में जिसतरह कॉरपोरेटवाद का बोलबाला बढत़ा गया उसमें आम लोगों में बढत़ी निराशा और उभरे गुस्से ने ट्रंप के लिए अपनी राजनीतिक जमीन का विस्तार करना आसान बना दिया. ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नारे के साथ वो पूंजीवाद के राष्ट्रवादी और संरक्षणवादी संस्करण के साथ सामने आए. उन्होंने खुद को “एंटी इस्टैब्लिशमेंट” नेता के रूप प्रस्तुत किया और परेशान हाल आमलोगों के बड़े हिस्से ने उनमें अपनी समस्याओं का समाधान देखना शुरू किया.
पूंजीवाद का राष्ट्रवादी और संरक्षणवादी संस्करण आर्थिक स्तरों पर प्रभावित लोगों को प्रारंमिक रुझानों में आकर्षक तो लगता है किन्तु यह उनकी समस्याओं और चिंताओं के साथ वास्तविक तादात्म्य बैठाने में प्रायः अक्षम ही साबित होता है. यह अक्षमता नेताओं को अंततः पाखंड और नारेबाजियों की ओर खींच कर ले जाती है. वह जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए ऐसे रास्तों को भी अपनाता है जो लोकप्रियतावादी हातेे हैं लेकिन सिस्टम को समाधान की दिशा में ले जाने के बजाय समस्याओं के मकड़जाल में उलझा देती हैं. ट्रंप ने आप्रवासन नीतियों को बाहर कामगारों के साथ दुर्व्यवहार के स्तर पर उतर कर भी कार्यान्वित करने की कोशिश की. ऐसी नीतियां रोजगार के क्षेत्र में कोई खास सकारात्मक प्रभाव छोड़ने में तो असफल रही हीं, उन्होंने अमेररकी विदेश नीति में भी एक उलझाव पैदा कर दिया. इसने अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को नुकसान तो पहुंचाया ही, आंतरिक आर्थिक असुरक्षा को एड्रेस करने में भी असफल ही रहीं.
पहले कार्यकाल के बाद हुए चुनावों में ट्रंप जो बायेन से पराजित हो गए और इसे पूंजीवाद के राष्ट्रवादी, लोकप्रियातावाद और संरक्षणवादी संस्करण की असफलता भी मान लिया गया. किन्तु संकट गहरे थे और अमेरिकी राजनीति इन संकटों से पार पाने में लगातार असफल होती रही. आर्थिक असमानता बढत़ी गई, महंगाई बढत़ी ही गई, साथ ही बेरोजगारी भी. जो रोजगार में थे उनकी आय एक ठहराव का शिकार होने लगी. अमेरिकी समाज की इन बेचैनियों ने ट्रप की राजनीतिक जमीन को फिर से खाद-पानी दिया और वे दोबारा चुनाव जीत कर, फिर से राष्ट्रपति बन गए.
‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के साथ पुनर्वापसी :
दुबारा सत्ता हासिल करने के बाद ट्रंप ने ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का नारा दिया. इतिहास के सबक से सभी यह जानते हैं कि जो नेता अपने देश को ‘फिर से’ महान बनाने की बात करे, वह संदिग्ध है. वह अतीत की गलत व्याख्या कर सकता है, वर्तमान के साथ उसके ट्रीटमेंट में फासिज्म की बू आ सकती है और अंततः वह देश को और अपने मतदाताओं को समस्याओं के मकड़जाल में उलझा कर विफल घोषित हो सकता है. हालांकि, ऐसा नेता कभी नहीं मानेगा कि वह विफल हो रहा है. वह नागरिकों को दोष देगा, संस्थाओं को कोसेगा, प्रेस को धमकायेगा.
भारत जैसे अर्द्धशिक्षित व अर्द्धविकसित देशों में, जहां लोकतांत्रिक चेतना का अपेक्षित विकास नहीं हो सका है वहां ऐसा नेता संस्थाओं पर कब्जा करने का प्रयास करता है और प्रायः कर ही लेता है. वह मीडिया को अपना प्रवक्ता बना लेता है और विरोध के स्वरों को ‘देश के खिलाफ द्रोह’ की संज्ञा देकर देशभक्ति की जनविरोधी परिभाषायें करने लगता है. शिक्षित और चेतना सम्पन्न लोकतांत्रिक समाज में संस्थाओं और मीडिया पर कब्जा संभव नहीं होता, तो ऐसा नेता झूठ और आरोप-प्रत्यारोप के खेल खेलने लगता है.
ट्रंप यह सब कर रहे हैं. उन्होंने अमेरीकी कोर्ट को जी भर कर कोसा जब जजों ने टैरिफ को अंतरराष्ट्रीय राजन्य का हथियार बना लेने पर उनकी मुश्कें कस दीं. उन्होंने जजों की देशभक्ति पर सवाल उठा दिया और उन्हें ‘विदेशी हितों से प्रेरित’ तक कह दिया.
‘फिर से’ देश को महान बनाने का नारा देने वाले ट्रंप ने देश को इस मुकाम पर ला कर खड़ा कर दिया कि बढत़ी बेरोजगारी बदस्तूर कायम रही है, आप्रवासन नीतियों में सख्ती और उनके बेढंगे क्रियान्वयन ने सर्विस सेक्टर में अफरातफरी और तनाव का माहौल बना दिया. अपने दूसरे कार्यकाल के शुरुआती दौर में ही ट्रंप अपने पिछले अवतार से अलग नजर आने लगे थे. अधिक उग्र, अधिक अधीर, अधिक आक्रामक...और, अधिक एकाधिकारवादी भी.
ऐपस्टीन फाइलों ने अमेरिका के अति इलीट तबके के नैतिक पतन की जो गाथा प्रस्तुत की है उसने उस समाज की भौतिक समृद्ध और सामरिक अजेयता के बावजूद उसके खोखलेपन, उस समाज के भीतर की दुनिया में व्याप्त अंधेरों को सबके सामने ला दिया है. इन संदर्भों में क्लिंटन सहित कई बड़े नामों के आने के साथ ही ट्रंप के नाम की चर्चा भी खूब हो रही है. एपस्टीन फाइल, ईरान के साथ युद्ध, उसमें नाटो का असहयोग, विश्व जनमानस में ईरान के प्रति नैतिक और भावनात्मक समर्थन, स्वयं अमेरिकी सत्ता तंत्र में युद्ध को लेकर भीषण मतांतर. अमेरिकी समाज व्यथित है, आंदोलित है. विश्व जनमानस में देश का सम्मान गिर रहा है.
‘फिर से’ महान बनने के फेर में अमेरिका तो सांसत में आ ही गया है, दुनिया को उससे भी बड़े सांसत में उसने डाल दिया है.
ट्रंप की रास कोई नहीं थाम सकता. यह अमेरिकी जनता ही कर सकती है. वह इस ओर बढ़ने भी लगी है. नो किंग आंदोलन का यह तीसरा चरण है. ट्रंप की इमिग्रेशन नीतियों और प्रांतीय गवर्नरों के अधिकारों के अतिक्रमण के खिलाफ ऐसे आंदोलनों के दो दौर बीत चुके हैं.
अमेरिकी जनता अपनी संस्थाओं की विश्वसनीयता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है. इसलिए वहां के कोर्ट सबसे अधिक शक्तिशाली और दबावों से परे हैं, वहां के विश्वविद्यालय दुनिया में सर्वोत्कृष्ट हैं और नागरिक अधिकारों से जुड़ी तमाम संस्थाएं जीवित हैं.
‘नो किग्स’ आंदोलन : अमेरिका में बढ़ता जनरोष
अमेरिकी जनता को पता है कि उसके शहरों की चकाचौंध के पीछे दुनिया के न जाने कितने देशों में पसरे अंधेरों की भूमिका है. खनिजों से संपन्न किन्तु निर्बल और निर्धन देशों में अपने गुर्गों को तानाशाह के रूप में स्थापित कर अमेरिकी नेताओं और कंपनियों ने खनिजों की लूट के लिए करोड़ों लोगों का जीवन नारकीय बनाया, उन्हें गुलाम से भी बदतर जिंदगी दी.
लेकिन, अमेरिकी लोकतंत्र में स्पेस है – इनकी आलोचना के लिए, इनके खिलाफ विरोध दर्ज करवाने के लिए. अमेरिकी मीडिया में इतना साहस है कि आज भी वहां के कई बड़े अखबार ट्रंप के ईरान अभियान की बखिया उधेड़ती रिपोर्ट लगातार प्रकाशित कर रहे हैं.
हजारों शहरों और कस्बों में सड़कों पर उतरा 80-90 लाख लोगों का काफिला दुनिया को बता रहा था कि अमेरिका क्यों महान लोकतंत्र है और किसतरह लोग नागररक अधिकारों के प्रति सचेत हैं. रिपोर्ट्स में बताया गया है कि लगभग 3200 जगहों पर ऐसे युद्ध विरोधी प्रदर्शन आयोजित हुए. ट्रंप के राजनीतिक विरोधियों की इनमें सक्रियता थी ही, प्रायः हर जगह स्वतःस्फूर्त प्रेरणा से भी बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी रही. इनमें मध्य वगीय प्रोफेशनल्स थे, फैक्ट्रियों के कामगार थे, गिग वर्कर्स थे, विश्वविद्यालयों के छात्रा थे और उल्लेखनीय रूप से उन गृहणियों की भी बड़ी संख्या शामिल थी जिनके लिए इस युद्ध ने घर चलाने और बच्चों के पोषण पर महंगाई के बढ़ते असर के कारण परेशानियां बढ़ा दी हैं. सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में कटौती कर युद्ध में अपार धन राशि झोंकने की ट्रंप सरकार की नीतियों ने आम लोगों में असुरक्षा और असंतोष की भावना उत्पन्न की है और ऐसी भावनाएं निरंतर बलवती होती जा रही हैं. वे ट्रप के उन तौर-तरीकों के खिलाफ एकजुट होते जा रहे हैं जो लोकतांत्रिक और संवैधानिक मर्यादाओं का अतिक्रमण करते हैं. ट्रंप की मनमानियों के खिलाफ जनता में बढ़ता विरोध और उसकी मुखर अभिव्यक्ति वहां के जीवित लोकतंत्र का प्रतीक है.
ट्रंप ने लोगों को कई सब्जबाग दिखाए थे, उन्हें उम्मीद दिलाई थी कि वे अमेरिका का “पुराना” गौरव और वैभव पुनः वापस लाएंगे. लेकिन, लोगों को लग रहा है कि चीजें उनके दावों के प्रतिकूल जा रही हैं और ट्रंप अपनी नीतियों को लेकर खुद अस्पष्ट हैं. उनकी लोकप्रियता तेजी से गिर रही है. लोगों का उनके प्रति विश्वास कम होता जा रहा है.
दोबारा जीतने के कुछ ही महीनों के बाद फिर से ट्रंप की लोकप्रियता में भारी गिरावट अमेरिकी समाज में वैश्वीकरण की मौलिक प्रवृत्तियों और उदारवाद को लेकर गहरे अनिश्चय और संशय को रेखांकित करती हैं. वैश्वीकरण और नवउदारवाद का अगुआ देश अब वैचारिक रूप से गहरे संशय में प्रतीत होता है क्योंकि वह देख रहा है कि खुद उसका समाज इन नीतियों से अनेक तरह के अंतरविरोधों से घिर गया है और इनसे निजात का कोई स्पष्ट रास्ता नजर नहीं आ रहा.
अमेरिकी धीरे-धीरे समझने लगे हैं कि उन्हें ‘अगेन ग्रेट’ बनाने का सपना दिखा उनके वोट ले उड़ा नेता उन्हें कहीं नहीं पहुंचा सकता, उल्टे समस्याओं के गहरे मकड़जाले में उलझा कर छोड़ जाएगा. उन्होंने उस ट्रंप को वोट दिया था जो दुनिया भर से अमेरिकी सेना को समेटने की बात कहता था, जो अमेरिका फर्स्ट की बात करता था. वह ट्रंप अब एक ही सांस में वेनेजुएला, कनाडा, ईरान, ग्रीनलैंड, क्यूबा – सबको कब्जा कर लेने की बात करने लगा है.
ट्रंप का इजरायल प्रेम, ईरान युद्ध और दुनिया से अलगाव
ईरान पर हमले ने अमेरिका को इस हाल में पहुंचा दिया कि ट्रंप के आह्वान के बावजूद कोई नाटो देश उसके सक्रिय समर्थन में आगे नहीं आया. नाटो की अगुआई करने वाला आज पीछे मुड़ कर देख रहा है तो उसे नाटो नजर ही नहीं आ रहा. यह नाटो के इतिहास का भी दिलचस्प मोड़ है और बाकी दुनिया के लिए एक आश्वस्ति भी. कनाडा ट्रंप की कटु आलोचना कर रहा है, जबकि स्पेन, फ्रांस, इटली और ऑस्ट्रिया तो इस हद तक उतर आए हैं कि उन्होंने इस युद्ध को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन घोषित कर अपने एयरस्पेस को भी प्रतिबंधित कर देने की घोषणा कर दी है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका का सबसे विश्वसनीय रहा ब्रिटेन असहयोग और असहमति की मुद्रा में आ चुका है और कह रहा है कि वह अपने युवा सैनिकों को बेवजह की मौत मरने युद्ध में नहीं भेजेगा.
विश्व जनमत में अमेरिका के प्रति विरोध अब विक्षोभ का रूप लेते जा रहा है. खाड़ी देशों के हुक्मरान भले ही अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अमेरिका के समर्थन और ईरान के विराध की आक्रामक मुद्रा में हैं किन्तु वहां की आम जनता ईरान के समर्थन में है. इन देशों की राजनीतिक प्रणाली गहरे दबावों में है जो राजतंत्रात्मक शैली की है. ईरान के इस्लामिक नेताओं ने कई अवसरों पर खुल कर अपनी राय व्यक्त की है कि इस्लामी संस्कृति में वंशानुगत राजनीतिक प्रणाली का कोई स्थान नहीं है. खाड़ी देशों के सत्तासीन घरानों में ईरान को लेकर असुरक्षा के भाव और खुद के अस्तित्व को लेकर अमेरिका पर निर्भरता के मनोविज्ञान को समझा जा सकता है. उनका इस युद्ध में बहुत कुछ दांव पर लगा है और कई अरब देश चाहते हैं कि युद्ध चलता रहे और अमेरिका ईरान के वर्तमान सत्तातंत्र को नेस्तनाबूद कर दे.
भारत, पाकिस्तान सहित तमाम दक्षिणी एशियाई देशों के सत्ताधारी नेताओं की अपनी राजनीतिक और कूटनीतिक विवशताएं हैं और वे अमेरिका-ईरान के युद्ध में खुल कर सामने भी आ रही हैं. लेकिन, इन देशों की जनता की भावनाएं अमेरिका के विरोध में और ईरान के समर्थन में है. यह एक दिलचस्प स्थिति है और अमेरिकी प्रतिष्ठा और विश्व मानस में उसकी विश्वसनीयता के सर्वथा प्रतिकूल है. वैश्विक स्तर पर अमेरिका की प्रतिष्ठा में गिरावट खुद अमेरिकी जनता भी महसूस कर रही है.
अमेरिका की सत्ता संरचना में भी ईरान युद्ध को लेकर अंतरविरोध खुल कर सामने आए हैं. ट्रंप के राजनीतिक विरोधी युद्ध के विरोध में आवाज उठा रहे हैं, उनके सहयोगियों और सलाहकारों के बीच भी मतभेद सामने आ रहे हैं. आम धारणा है कि अमेरिका के उपराष्ट्रपति और ट्रंप के प्रमुख सहयोगी जेडी वेंस ईरान युद्ध के समर्थक नहीं हैं. वे जल्द से जल्द इस युद्ध पर विराम चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि आगामी राष्ट्रपति चुनावों में अगर वे उम्मीदवार बनते हैं तो यह युद्ध उनके लिए भारी पड़ सकता है. वे जन भावनाओं को समझ रहे हैं जो युद्ध के विरोध में है. ट्रंप के कई सलाहकार युद्ध के विरोध में बयान जारी करते हुए अपने पदों से त्यागपत्र दे चुके हैं. इनमें सबसे अधिक चर्चा हुई अमेरिका के काउंटर टेररिज्म सेंटर के निदेशक जो केंट के इस्तीफे की. उन्होंने इस युद्ध के विरोध में अपने पद से इस्तीफा देते हुए बयान जारी किया कि ‘मैं अच्छे जमीर के साथ ईरान में चल रहे युद्ध का समर्थन नहीं कर सकता.’ केंट ने दावा किया कि ट्रंप ने यह युद्ध इजरायल के दबाव में शुरू किया है और इसका कोई औचत्य नहीं है.
अमेरिका में ही नहीं, दुनिया के अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप अमेरिका की उस इजरायल समर्थक लॉबी के दबाव में हैं जो ईरान को बर्बाद देखना चाहते हैं. धारणाएं बलवती होती जा रही हैं कि खुद ट्रंप भि युद्ध के खात्मे के पक्ष में हैं किंतुं इजरायल के दबाव में युद्ध है कि थमने का नाम नहीं ले रहा. स्वयं ट्रंप के रोजाना के बयान उलझे कहते हैं. कभी वे कुछ कहते हैं, कभी कुछ और कहते हैं.
अमेरिका के प्रसिद्ध विपक्षी नेता और विचारक बनी सैंडर्स ने ट्रंप की मध्यपूर्व नीतियों की कटु आलोचना की और इसे देश के दीर्घकालीन हितों के खिलाफ बताया. उनकी बतों को अमेरिकी समाज गंभीरता से सुनता है. विपक्ष हो या सत्ता पक्ष, या विश्लेषकों का समूह हो, तमाम विवेकशील लोगों ने ईरान में अचानक छेड़ दिए गए युद्ध की निंदा की है. हालांकि स्वयं ट्रंप इसे “मिलिट्री ऑपरेशन” की संज्ञा देते हैं क्योंंक युद्ध में उतरने में अमेरिकी कांग्रेस की अनुमति की जरूरत है.
ट्रंप ईरान से वार्ता की बातें भी कर रहे हैं और यह भी कह रहे हैं कि ईरान को बर्बाद कर पाषाण युग में पहुंचा दिया जाएगा. दुनिया आशंकाओं से घिर गई है और स्वयं अमेरिकी सत्ता संरचना भी असमंजस में है. इस कशमकश के बेहद गंभीर नतीजे सामने आने लगे हैं जिनमें ट्रंप सरकार ने अमेरिकी सेना के चीफ ऑफ स्टाफ जनरल रैडी जॉज्र को बर्खास्त कर दिया है और 12 अन्य जनरलों को भी हटाए जाने की खबरें हैं. बताया जा रहा है कि ईरान में जमीनी हमले की योजनाओं को लेकर सैन्य प्रतिष्ठान और सरकार के बीच मतभेद गहरे होने लगे थे.
ईरान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है लेकिन उसे ‘5000 साल पहले के पाषाण युग’ में पहुंचा देने की धमकी देने वाले अमेरिका का भी बहुत कुछ दांव पर लग चुका है. दुनिया में उसका सम्मान भो कम हो रहा है, उसके भू राजनीतिक प्रभाव में भी कमी आने के संकेत मिलने लगे हैं.
यह है ‘अगेन ग्रेट’ बन रहा अमेरिका. अपने ही अंतरविरोधों से ग्रस्त हो रहा, त्रस्त हो रहा, दुनिया के स्तर पर समर्थन और सम्मान खो रहा अमेरिका. ट्रंप एक दिन जाएंगे लेकिन ‘फिर से’ वाला झूठ पर आधारित राजनीति का मलबा छोड़ जाएंगे अमेरिका में.
भारत भी ‘फिर से विश्वगुरु’ बन रहा है. यह ‘फिर से’ सरीखे शब्दों पर आधारित प्रतिगामी राजनीति जितनी उम्मीदें जगाती है, उससे अधिक आशंकित करती हैं.
जब ट्रंप जाएंगे और अमेरिका पर से ‘अगेन ग्रेट’ बनने का खुमार उतरेगा और फिर मोदी जाएंगे और भारत पर से ‘फिर से विश्वगुरु’ बनने का खुमार उतरेगा तो दोनों देश हिसाब लगाएंगे कि हमें कहां ले जाने का सपना दिखाया गया था और कहां पहुंचा दिया गया है.
(लेखक एमडीएम कॉलेज, नौबतपुर में हिंदी विभागाध्यक्ष और बिहार प्रोगेसिव टीचर्स एसोसिएशन - बिपुटा के राज्य अध्यक्ष हैं)