उत्तराखंड आजकल बाघ (तेंदुए) और भालुओं के हमले से हो रही मानव हानि के कारण काफी चर्चा में है. गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक कोई भी पहाड़ी जिला ऐसा नहीं है, जहां इनके आतंक के कारण लोग भयभीत न हों. जिन गांवों में बाघ व भालू के हमले से जन हानि नहीं हुई है, वहां भी लोगों के पालतू पशु बड़े पैमाने पर इनके शिकार बन रहे हैं. हालात ऐसे हैं कि जिन पहाड़ों में कभी पांच से पंद्रह वर्ष के बच्चे भी बेखौफ अपने स्कूल या रिश्तेदारों के घर चले जाते थे, वहां अब बड़ी उम्र के लोग भी अकेले कहीं जाने से डर रहे हैं. खुद हमारी ग्राम पंचायत सुरमोली में पिछले 3 वर्षों में बाघ ने प्रतिमाह औसतन 2 पालतू पशुओं को अपना निवाला बनाया है. इन 3 वर्षों में बाघ द्वारा मारे गए पालतू पशुओं की यह संख्या पहले के 60 वर्षों में मारे गए पालतू पशुओं से दोगुनी है. पिछले 15 दिनों में ही यहां बाघ ने 1 भेड़ और 1 बकरी पर लोगों के सामने ही हमला किया. अभी तीन दिन पहले गांव की आबादी के बीच दिन के उजाले में और फिर रात दस बजे मैंने खुद गांव वालों के साथ बाघ को देखा. ऐसे में आबादी विहीन हो रहे गांवों में रात को मकान से हट कर बने शौचालयों में जाने से भी लोग भय खा रहे हैं.
आज से पच्चीस वर्ष पहले गांव से सटे जंगल में, जहां बाघों के परम्परागत निवास की कुछ गुफाएं हैं, अपने गाय, बकरियां चराने, जलौनी लकड़ी व घास के लिए लगभग डेढ सौ लोग दिन भर जंगल में रहते थे. ये पशुपालक तालेश्वर, उगालियासीम, धारकोट, लालनगरी, सुरमोली, चक केलानी, नहलगैर, पंतगांव, बहरागांव और समैय्या के किसान और भूमिहीन शिल्पकार (दलित) होते थे. जंगल में लगभग आठ सौ से ज्यादा पालतू जानवरों के कई झुंड के साथ डेढ सौ लोगों की मौजूदगी के कारण बाघ दिन भर अपनी गुफाओं से बाहर नहीं निकलते थे. इतने पशुओं का चारागाह होने के कारण हमारे जंगल और सामलाती जमीनों में कभी झाड़ियां नहीं उग पाती थीं. ऐसे में दूर तक हर चीज और हर पशु को साफ-साफ देखा व पहचाना जा सकता था. आज ये क्षेत्र घनी झाड़ियों में तब्दील हो गए हैं, जहां बाघ द्वारा निवाला बनाए गए पशुओं की लाशों को भी ढूंढना मुश्किल है. यही कारण है कि बाघ द्वारा मारे गए ज्यादातर पशुओं का कोई मुआवजा पशुपालकों को नहीं मिल पाता है. उन दिनों बाघ अन्धेरा होने से पहले पालतू जानवरों गाय या बकरी के शिकार के लिए तभी निकलते थे, जब वे ज्यादा दिनों से भूखे हों. उसमें भी उनकी पहली प्राथमिकता शाम होते ही हमारे घर-आंगन में बैठे कुत्तों को निवाला बनाने की होती थी. शाम होते ही बाघ आबादी के नजदीक आकर दहाड़ मारते थे. उनकी दहाड़ सुन कर कुत्ते भौंकते और फिर कुत्तों की आवाज वाले घर उनके निशाने पर आ जाते. इसीलिए पहाड़ के बाघों को लोग ‘कुकुरी बाघ’ के नाम से ही पुकारते थे.
अलग राज्य बने उत्तराखंड में गौ रक्षा कानून बनने के बाद पहाड़ में गौ वंश की खरीद-बिक्री प्रतिबंधित हो गयी. इस कानूनी प्रतिबंध ने कृषि की लगातार हो रही उपेक्षा के बाद हमारी आजीविका के दूसरे महत्वपूर्ण साधन पशुपालन पर हमला कर दिया. धीरे-धीरे यहां के किसानों और भूमिहीनों ने गौ वंश को पालना कम किया और उपयोग लायक नहीं रह गए पशुओं को खुले में छोड़ दिया. कुछ वर्षों तक खुले में छोड़े गए इन पालतू गौ वंश का आसान शिकार यहां के बाघों को मिला, जिससे बाघों की आगे की पीढ़ियों को ऐसे आसान शिकार की आदत पड़ गयी, जो पहले सिर्फ अपवाद स्वरुप ही था. मुझे याद है कि जब भी पांच-दस वर्षों में कभी हमारे किसी जानवर को बाघ निवाला बनाता था, तो हमारे बुजुर्ग कहते थे ‘भूयो बाघ को इसके लिए आदेश भगवान ने दिया होगा’. यानी वे अपने समाज के हजारों वर्षों के अनुभव से यह मानते थे कि पालतू जानवरों पर हमला करने की आदत बाघों की नहीं है. मगर इधर के कुछ वर्षों में न सिर्फ पालतू जानवरों पर बाघ के हमले बढे हैं, बल्कि अब हर तरफ मनुष्य भी उनके शिकार हो रहे हैं. इस वर्ष मानव जीवन पर बाघ ही नहीं बल्कि भालू भी बड़ा खतरा बनकर सामने आए हैं.
पहाड़ में बाघों और भालुओं को लेकर अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों के अनुसार यहां बाघों की संख्या में गुणात्मक उछाल आ गया है. वन विभाग के अनुसार पहाड़ में अभी सत्रह सौ के करीब बाघ हैं. जबकि बाघों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के अनुसार पहाड़ में इस वक्त लगभग 5 हजार बाघ मौजूद हैं. यानी एक बाघ के आहार क्षेत्र में लगभग तीन बाघ मौजूद हैं. इससे इन बाघों का आहार क्षेत्र घटकर एक तिहाई रह गया है. जाहिर है ऐसे में प्राकृतिक रूप से मिल रहा शिकार उनके लिए कम पड़ रहा है. दूसरी तरफ अब जंगल या खाली स्थानों में छोड़ी जाने वाली गायों की संख्या कम हो गयी है, क्योंकि लोगों ने गौ वंश को पालना छोड़ दिया है. कई जगह आवारा गायों के लिए गौशाला भी बन गयी हैं. ऐसे में भूखे बाघों के लिए पालतू जानवरों के शिकार पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, जो कहीं-कहीं मनुष्यों के आसान शिकार तक पहुंच रही है. जहां तक भालुओं की बात है तो विशेषज्ञों के अनुसार, पर्यावरण और पारिस्थतिकीय तंत्र में आए भारी बदलावों ने मध्य हिमालयी क्षेत्र के भालुओं की शीत निद्रा में खलल डाल दिया है. उन्हें इस समय गुफाओं की शीत निद्रा के बजाय बाहर आहार की तलाश में भटकना पड़ रहा है, जिसके कारण उनके व्यवहार में बदलाव आया है. इस समय उनके आवास क्षेत्रों में उनके लिए उनका प्राकृतिक भोजन उपलब्ध होने का मौसम नहीं है, इसलिए वे मानव बस्तियों में अपना शिकार व आहार ढूंढ़ रहे हैं.
रोजगार के अवसरों का लगभग खत्म होना, खेती में बड़े पैमाने पर जंगली सूअरों व बंदरों का हमला, गौ रक्षा कानून और बाघों के बढ़ते हमले के कारण खत्म होता पशुपालन, मृतप्राय स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकार द्वारा बर्बाद की जा रही सरकारी शिक्षा व्यवस्था ने पहाड़ के गांवों को वीरान बना दिया है. मेरे गांव तालेश्वर में जहां साठ वर्ष पहले तक लगभग एक सौ एकड़ जमीन में खेती होती थी, वहां आज मात्र 4 एकड़ जमीन में ही घरों में बचे हुए लोग अपने उपयोग के लिए सब्जी बोते हैं. पर इस सब्जी को भी बंदरों और सूअरों के हमले से बचाने के लिए सरकार द्वारा कोई योजना नहीं बनाई जा रही है. सरकार की नीतियों से निराश होकर मजबूरी में लोगों ने पलायन को ही जिंदा रहने का एकमात्र रास्ता मान लिया है. जो बड़े शहरों में नहीं जा सकते, उन्होंने नजदीक के छोटे कस्बों में स्थानांतरित होना शुरू कर दिया है. इसके नतीजे पहाड़ के गांवों में साफ दिख रहे हैं. मेरे गाँव का ही उदाहरण देखें तो साढ़े तीन सौ की आबादी के तालेश्वर में अब मात्र 34 लोग बचे हैं. यही स्थिति रही तो आने वाले दस वर्षों में तालेश्वर भी मानव विहीन गांवों की गिनती में शामिल हो जाएगा. यही स्थिति आज पहाड़ के पचास प्रतिशत से ज्यादा गांवों की है. राज्य की भाजपा सरकार पलायन रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाने के बजाय खाली हो रहे गांवों की जमीनों को खुर्द-बुर्द करने, तथा साम्प्रदायिक विभाजन की राजनीति से सामाजिक तनाव और हिंसा को बढ़ाने में जुटी है.