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समानता का संवैधानिक हक पाने के लिए कितनी औरतों को बेपर्दा होना पड़ेगा?

समानता का संवैधानिक हक पाने के लिए कितनी औरतों को बेपर्दा होना पड़ेगा?

नीतीश कुमार हिजाब उतार मामला

-- ऐश्वर्या खोसला

पटना के एक हॉल में सरकारी समारोह चल रहा था, जो प्रोफेशनल कामयाबी का जश्न मनाने के लिए था. लेकिन एक गुरूर भरी हरकत ने उसे औरतों पर मर्दाना ताकत के घटिया नमूने में बदल दिया.

वीडियो में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नई नियुक्त आयुष डॉक्टर नुसरत परवीन के सामने खड़े हैं. वो हिजाब पहने अपना अपॉइंटमेंट लेटर ले रही हैं. कैमरे फ्लैश मार रहे हैं फोटो खींचने को.

सीएम इशारा करते हैं कि हिजाब नीचे कर लो, शायद फोटो के लिए. फिर बिना इंतजार किए उनका हाथ झट से बढ़ जाता है और खुद हिजाब नीचे खींच देते हैं. वहां मौजूद कुछ चमचे हंस पड़ते हैं. उन्हें कुछ गलत हुआ महसूस नहीं होता.

डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी बीच-बचाव करने आते हैं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. माफी-वाफी कुछ नहीं मांगी जाती. वीडियो तो छोटा सा है, लेकिन उसमें जो हिंसा हुई वो साफ महसूस होती है.

कुछ लोग इसे बूढ़े आदमी की बेवकूफी बता कर टाल देते हैं, जिसके दिमागी हालत पर तो पहले से सवाल उठते आए हैं. लेकिन असल में ये खतरनाक पितृसत्तात्मक सोच का जबरदस्ती का प्रदर्शन था. फिर वही पुराना ढर्रा चला – पीड़िता ट्रॉमा अंदर ही दबा लेती है और सत्ता का तंत्र इसे छोटा बना देता है.

परवीन के परिवार ने बताया कि वो इतनी आहत हैं कि सरकारी नौकरी जॉइन ही नहीं करेंगी. उनका पीछे हटना अपने आप में एक राजनीतिक बयान है. वो उस सत्ता के नीचे काम नहीं करना चाहतीं जो उन्हें अपनी मर्जी की मालकिन नहीं मानती.

आखिर मर्द हैं न!

फिर शुरू हुआ बचाव और निंदा का शोर, जो असल घटना से कहीं ज्यादा कुछ बयान करता है. यूपी के मंत्री संजय निषाद मुस्कुराते हुए सबसे सटीक टिप्पणी कर देते हैंः “मर्द हैं आखिर, छू लिया हिजाब. कहीं और छू लेते तो क्या हो जाता?” यही वो सोच है जो ऐसी हरकतों को हवा देती है.

मतलब ये कि मर्द का हक हर स्केल पर है, और औरतों को शुक्र मनाना चाहिए कि बस इतना ही हुआ. ये रेप कल्चर की सबसे साफ भाषा है. उनकी बात का लब्बोलुआब यही था कि औरत की देह पर उसका हक कभी पूरा नहीं होता. वो हमेशा मोलभाव की चीज रहती है, और मोलभाव मर्द ही तय करता है.

वह देखती है, मगर खुद देखी नहीं जाती!

सीएम ने आयुष डॉक्टर को इशारा किया हिजाब नीचे करने को, फिर खुद खींच लिया.

ये पूरा वाकया औरतों की उस पुरानी लड़ाई को फिर से उजागर कर देता है, जिसमें वो अपनी मर्जी से अदृश्य रहने का हक मांगती हैं. पोस्ट-कॉलोनियल विचारक फ्रांज फैनन ने लिखा था कि उपनिवेशक की नजर कितनी अमानवीय होती है. यह इंसान को माल में बदल देनेवाली नजर होती है.

उनका मशहूर कथन हैः “वह औरत जो सबको देख सकती है लेकिन खुद देखी नहीं जाती, वो उपनिवेशक को हताश कर देती है.”

औरत जिस हिजाब को खुद चुनती है, वो नजर को कंट्रोल करने का एक रैडिकल तरीकघ है. वो देखती तो है, लेकिन पूरी तरह देखी नहीं जाती. सार्वजनिक जिंदगी में हिस्सा लेती है, मगर अपनी निजता बचाए रखती है. ये बात पितृसत्तात्मक सिस्टम को बुरी तरह खटकती है, जो सत्ता को सबको दबोचने के हक के साथ जोड़ कर देऽता है.

भारत जैसे देश में, जहां औरतों का प्रोफेशनल दुनिया में कदम रखना वैसे भी कितना मुश्किल भरा है, ऐसी हरकत का असर बहुत गहरा और तबाह करने वाला होता है. ये संदेश देता है कि सरकारी नौकरी मेरिट का न्यूट्रल मैदान नहीं है, बल्कि वो जगह है जहां बहुसंख्यकों की सुविधा के लिए अल्पसंख्यक पहचान पर शारीरिक दबाव डाला जा सकता है.

एक झटके में सालों की नाजुक तरक्की पर पानी फिर गया. उन परिवारों के डर को सही साबित कर दिया जो सोचते हैं कि बाहर निकलने की कीमत अपनी सांस्कृतिक पहचान मिटाना है. पूरे देश को बता दिया कि यहां एंट्री सिर्फ परीक्षा पास करने से नहीं मिलती, बल्कि उस ताकतवर नजर के सामने सरेंडर करना पड़ता है जो आपको बेनकाब करने का हक रखती है.

परवीन का पब्लिक हेल्थ सिस्टम से दूर रह जाना बिहार के लिए ठोस नुकसान है. लेकिन ये पूरी सोसाइटी के लिए एक प्रतीकात्मक हार है, जो औरतों के सशक्तिकरण की बड़ी-बड़ी बातें तो करती है, लेकिन पितृसत्ता की बुनियाद को जस की तस छोड़ देती है.

आयुष क्लिनिक में जो कुर्सी अब शायद खाली रहे, वो इस नाकामी का स्मारक बन जाएगी. वो बर्बाद प्रतिभा और टूटे भरोसे की गवाही देगी. वो एक डरावना सवाल पूछती हैः कितनी औरतों को सचमुच और रूपक दोनों तरह से बेनकाब करना पड़ेगा, तब जाकर समझ आएगा कि असली बराबरी अपनी सीमाएं खुद तय करने के उस अटूट हक से शुरू होती है?

नीतीश कुमार के दफ्तर से आई खामोशी ही इसका जवाब है. सहमति ही सभ्य समाज का सबसे बड़ा समझौता है. वो अनकहा वादा कि किसी दूसरे का शरीर, उसका ईमान और उसकी स्वतंत्रता हमारी जबरदस्ती की चीज नहीं है. अभी तो बस एक और प्रोफेशनल औरत को उस राज्य से पीछे हटते देख अफसोस होता है जिसने उसे ऊपर उठाने की बजाय नीचे खींच लिया.

(लेखिका इंडियन एक्सप्रेस की साहित्य संपादक हैं.)

20 December, 2025