-- स्मृति चौधरी
[ फासीवाद के लिए सबसे बड़ा खतरा एक आजाद सोच रखने वाला इंसान और ऐसी शैक्षिक ‘स्पेस’ होती है जो आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा दे. जेएनयू से लेकर पंजाब यूनिवर्सिटी, लखनऊ और देश भर के कैंपसों तक, हम दमन की एक नई लहर देख रहे हैं जिसे संघ-बीजेपी का पूरा तंत्र राज्य ‘मशीनरी’ के साथ मिलकर चला रहा है.
कैंपसों में छात्र बराबरी, सम्मान, कैंपस लोकतंत्र और सस्ती शिक्षा के लिए खड़े हो रहे हैं. इसके जवाब में बीजेपी-एबीवीपी की मशीनरी विश्वविद्यालयों को नफरत के मैदान में बदलने की कोशिश कर रही है, सांप्रदायिक, मनुवादी और पितृसत्तात्मक राजनीति को आगे बढ़ाते हुए हर असहमति की आवाज को कुचलने की कोशिश की जा रही है.
जेएनयू में छात्रों को जातिवादी भेदभाव और एक जातिवादी कुलपति के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने पर जेल में डाल दिया गया. पंजाब में आरएसएस की नफरत की राजनीति का विरोध करने वाले छात्रों को हिरासत में लिया गया. बेंगलुरु में सैन्यीकरण और यौन हिंसा के खिलाफ बोलने वालों पर संगठित दक्षिणपंथी हमले हुए. लखनऊ में तो मुस्लिम छात्रों के नमाज पढ़ने के बुनियादी अधिकार तक को निशाना बनाया गया, और एकजुटता के विरोध प्रदर्शनों को भी राज्य दमन का सामना करना पड़ा.
कैंपसों को आलोचनात्मक शिक्षा और संघर्ष के ‘स्पेस’ के रूप में देखने वाली इस श्रृंखला के पहले हिस्से में कामरेड स्मृति जेएनयू, नई शिक्षा नीति (NEP) और उस बड़े वैचारिक हमले की चर्चा करती हैं जो शिक्षा को अंदर से खोखला कर देने, उसकी आलोचनात्मक ताकत को खत्म करने और उसे फासीवादी नियंत्रण का औजार बनाने की कोशिश कर रहा है. कॉमरेड नितीश, जो जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष हैं और जिन्हें गिरफ्तार करके तिहाड़ जेल भेजा गया था, इस पूरे सिस्टम के विस्तार के रूप में जेलों पर अपने अनुभव साझा करते हैं. ]
27 फरवरी की सुबह जेएनयू के चौदह छात्रों को तिहाड़ जेल ले जाया गया. जिस पूरी घटनाक्रम ने हमें इस मुकाम तक पहुंचाया है, वह इस बात का साफ संकेत है कि भारत में विश्वविद्यालय की धारणा को धीरे-धीरे बदला जा रहा है.
जेएनयू में जो कुछ हो रहा है, पाठ्यक्रम में बदलाव से लेकर निजीकरण तक और विरोध को अपराध बना देने तक, ये सब आरएसएस के उस राजनीतिक प्रोजेक्ट का हिस्सा है जो बराबरी वाली शिक्षा की पूरी संभावना को खत्म करना चाहता है.
इस बदलाव के केंद्र में नई शिक्षा नीति (NEP) की वह सोच है जो अकादमिक ढांचे, पाठ्यक्रम और संस्थानों की प्राथमिकताओं पर अभूतपूर्व केंद्रीकरण को बढ़ावा देती है. व्यवहार में यह नीति ऐसे विश्वविद्यालय का रास्ता खोलती है जो आलोचनात्मक सोच को बढ़ाने से ज्यादा आज्ञाकारी और गैर-राजनीतिक नागरिक तैयार करने में दिलचस्पी रखता है.
“इंडियन नॉलेज सिस्टम्स” (IKS) कोर्सों की शुरुआत और वैल्यू ऐडेड कोर्सेज (VACs) को सिद्धांत फाउंडेशन जैसे निजी संस्थान को सौंप देना इसी बड़े बदलाव का हिस्सा है. ये कोर्स सिर्फ अतिरिक्त नहीं हैं, ये इस बात को ही बदल रहे हैं कि ‘ज्ञान’ किसे माना जाएगा. इसमें एक संकीर्ण ब्राह्मणवादी ढांचे को ऊपर रखा जा रहा है और वैज्ञानिक सोच तथा जाति विरोधी परंपराओं को हाशिये पर धकेला जा रहा है.
इसके लागू होने से कई गंभीर सवाल भी खड़े हुए हैं. छात्रों को एक निजी और गैर-जवाबदेह संस्था के बनाए गए घटिया, पहले से रिकॉर्ड किए गए, ऑनलाइन कोर्स पढ़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है. इन कोर्सों में लगातार तकनीकी दिक्कतें रहती हैं, फिर भी छात्रों को इन्हें बिना किसी विकल्प के पढ़ना पड़ रहा है.
पढ़ाई को मुनाफे के लिए निजी संस्थाओं को सौंप कर विश्वविद्यालय ने ज्ञान को एक ‘कमोडिटी’ में बदल दिया है. सरकारी पैसे निजी हाथों में जा रहे हैं, और जेएनयू प्रशासन अकादमिक जिम्मेदारी से बच रहा है.
अगर पाठड्ढक्रम में बदलाव इस पूरी प्रक्रिया का एक पहलू है, तो निगरानी का बढ़ता दायरा इसका दूसरा पहलू है. हाल ही में जेएनयू प्रशासन ने लाइब्रेरी में फेशियल रिकग्निशन और स्मार्ट-कार्ड एंट्री सिस्टम लगाने की कोशिश की.
सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि प्रशासन जहां एक तरफ हर बार फंड की कमी का बहाना बनाता है, वहीं निगरानी के इन महंगे सिस्टमों पर खर्च करने में उसे कोई दिक्कत नहीं होती. छात्र लंबे समय से हॉस्टल की कमी, खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और किताबों व जर्नल्स जैसे बुनियादी संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं.
जब भी छात्र अपनी बुनियादी मांगें रखते हैं, उन्हें कहा जाता है कि पैसे नहीं हैं. लेकिन निगरानी के सिस्टम लगाने के लिए अचानक पैसे मिल जाते हैं. इससे साफ हो जाता है कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं? दिमाग को विकसित करने से ज्यादा शरीरों को नियंत्रित करना.
इन फैसलों को बिना किसी चर्चा या सलाह-मशवरे के लागू करना कैंपस के लोकतांत्रिक ढांचे को भी कमजोर करता है. ऐसे फैसले जो पूरे कैंपस की जिंदगी को बदल देते हैं, उन्हें छात्रों, शिक्षकों या कर्मचारियों से बात किए बिना ही लागू कर दिया जाता है. ‘सुरक्षा’ और ‘कुशलता’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके इस तानाशाही रवैये को छिपाने की कोशिश की जाती है.
इसी के साथ-साथ हाशिये के समुदायों के लिए बने संस्थागत सुरक्षा तंत्र को भी व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया जा रहा है. यूजीसी इक्विटी नियमों को वापस लेना सामाजिक न्याय के उस वादे से पीछे हटना है जिस पर भारत की सार्वजनिक उच्च शिक्षा की नींव रखी गई थी. इन नियमों पर रोक लगने के बाद हाशिये के छात्रों के साथ भेदभाव का खतरा और बढ़ गया है.
खुद जेएनयू के अंदर भी कई ऐसी प्रक्रियाएं हैं जो दलित, आदिवासी और दूसरे वंचित समुदायों के छात्रों को सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं. पीएचडी एडमिशन में कट-ऑफ से छेड़छाड़, पक्षपातपूर्ण वाइवा, एससी/एसटी छात्रों की घटती संख्या, हॉस्टल आवंटन में भेदभाव, ये सब व्यवस्थित भेदभाव के उदाहरण हैं. इसके अलावा दलित और महिला छात्रों को अकादमिक स्तर पर भी निशाना बनाया जा रहा है और उन्हें कोई संस्थागत समर्थन नहीं मिल रहा.
मौजूदा कुलपति की भूमिका को इसी संदर्भ में समझना होगा. उनके सार्वजनिक रूप से सामने आए दलित विरोधी और अश्वेत विरोधी बयान इस बात का सबूत है कि उनके नेतृत्व में ऐसा माहौल बना है जिसमें इस तरह की सोच को सामान्य माना जाने लगा है. पाठ्यक्रम में ब्राह्मणवादी सोच को बढ़ावा देना, भेदभावपूर्ण प्रक्रियाओं को नजरअंदाज करना और जवाबदेही की कोई व्यवस्था न होना, ये सब दिखाता है कि नेतृत्व इस वैचारिक बदलाव का विरोध करने के बजाय उसका हिस्सा बन चुका है.
ऐसे में यह स्वाभाविक है कि छात्रों ने लगातार इसका विरोध किया है. जेएनयू का एक लंबा लोकतांत्रिक इतिहास रहा है जहां छात्रा कैंपस की बौद्धिक और राजनीतिक जिंदगी को सक्रिय रूप से आकार देते रहे हैं. मौजूदा हालात के खिलाफ छात्रों ने हड़ताल की और एक रेफरेंडम कराया जिसमें भारी बहुमत ने वाइस-चांसलर को हटाने की मांग की.
लेकिन प्रशासन की प्रतिक्रिया दमन को और तेज करने की रही है. विरोध में शामिल होने के लिए छात्रों पर जुर्माना लगाया गया, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई. पांच छात्रों, जिनमें जेएनयूएसयू की अध्यक्ष अदिति और पूर्व अध्यक्ष नितीश भी शामिल हैं, को रेस्टिकेट कर दिया गया और उन्हें कैंपस से बाहर कर दिया गया. चौदह छात्रों को बराबरी वाली शिक्षा के लिए आवाज उठाने पर तिहाड़ जेल भेज दिया गया. अब विरोध को लोकतांत्रिक अधिकार नहीं बल्कि एक खतरे के रूप में देखा जा रहा है जिसे खत्म करना है.
जेएनयू जिस रास्ते पर जा रहा है, अर्थात NEP के नाम पर वैचारिक थोपना, बराबरी की नीतियों को खत्म करना और असहमति को अपराध बनाना, ये सब एक ही राजनीतिक प्रोजेक्ट के हिस्से हैं. पाठ्यक्रम सोच को नियंत्रित करता है, निगरानी आज्ञाकारिता सुनिश्चित करती है, सुरक्षा तंत्र को कमजोर करके भेदभाव को आसान बनाया जाता है और दमन विरोध की आवाज को खत्म करता है. धीरे-धीरे विश्वविद्यालय एक ऐसी जगह में बदल रहा है जो ज्ञान का नहीं, बल्कि नियंत्रण का औजार बनता जा रहा है.
असल में विश्वविद्यालय सिर्फ इमारतों, कोर्सों और प्रशासन का नाम नहीं है. यह एक ऐसी जगह होती है जहां विचार टकराते हैं, जहां बहस और असहमति से ज्ञान पैदा होता है, और जहां लोग मौजूदा असमानताओं को चुनौती देना सीखते हैं. लेकिन जब ये सब खत्म कर दिया जाता है, तो विश्वविद्यालय अपनी असली पहचान खो देता है.
इसलिए जेएनयू में चल रहा संघर्ष सिर्फ कुछ नीतियों या किसी एक वाइस-चांसलर के खिलाफ नहीं है. यह विश्वविद्यालय को एक लोकतांत्रिक और बराबरी वाली जगह के रूप में बचाने का संघर्ष है. यह शिक्षा को एक वैचारिक हथियार और प्रशासनिक नियंत्रण के औजार में बदलने की कोशिश के खिलाफ संघर्ष है. और यह इस बात का दावा है कि असली ज्ञान डर, निगरानी और भेदभाव के माहौल में नहीं पनप सकता.
अगर विश्वविद्यालयों को आजादी और संभावनाओं की जगह बनाए रखना है, तो इस बदलाव का विरोध करना होगा. सिर्फ जेएनयू में नहीं, बल्कि पूरे देश में. क्योंकि दांव पर सिर्फ एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि पूरे उच्च शिक्षा तंत्र का भविष्य है.
(लिबरेशन से साभार)
हिंदी अनुवाद – सबा आफरीन