वर्ष 35 / अंक - 17 / महिलाओं के लिए आरक्षण तुरंत लागू करो !

महिलाओं के लिए आरक्षण तुरंत लागू करो !

महिलाओं के लिए आरक्षण तुरंत लागू करो !

जाति जनगणना जल्द से जल्द पूरी करके प्रकाशित करो !

निष्पक्ष परिसीमन के लिए राष्ट्रीय सहमति बनाओ !


तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनावों से ठीक एक हफ्ता पहले मोदी सरकार ने संसद का एक विशेष सत्र बुलाया. इस सत्र में एक संविधान संशोधन विधेयक और दो अन्य विधेयक पेश किए गए जो निर्वाचन क्षेत्रों के अगले दौर के परिसीमन और लोकसभा तथा राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने से संबंधित थे. महिला आरक्षण विधेयक सितंबर 2023 में ही पारित कर दिया गया था. संविधान संशोधन विधेयक तभी पारित हो सकता है, जब उसे उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो. मौजूदा लोकसभा के अंकगणित को देखते हुए एनडीए के सदस्यों की संख्या दो-तिहाई के मानक से काफी कम थी, और इसलिए इस विधेयक के पारित होने की संभावना स्वाभाविक रूप से न के बराबर थी. इसलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि 131वां संविधान संशोधन विधेयक सचमुच पारित नहीं हो सका, क्योंकि 230 सदस्यों ने इसके विरोध में मतदान किया.

यह पहला मौका था जब संविधान में संशोधन करने के प्रयास में मोदी सरकार को हार का सामना करना पड़ा. इस लिहाज से, 131वें संविधान संशोधन विधेयक की हार हाल के वर्षों में मोदी सरकार के लिए तीसरी बड़ी असफलता है – इससे पहले कृषि कानूनों की वापसी और 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का स्वतंत्र बहुमत खोना भी बड़ी असफलताएं थीं. लेकिन यह मानना मुश्किल है कि मोदी सरकार ने वास्तव में इस परिणाम का अनुमान नहीं लगाया होगा. निश्चित रूप से, सरकार इतनी निश्चिंतता से यह उम्मीद नहीं कर सकती थी कि टीएमसी या डीएमके अपने-अपने राज्यों में विधान सभा चुनावों में व्यस्त होने के कारण इस विशेष सत्र से दूर रहेंगी. तो क्या भाजपा ने इस सत्र की योजना केवल इसलिए बनाई थी, ताकि वह खुद को महिला सशक्तीकरण के मामले में शहीद के बतौर पेश करने का प्रयास कर सके?

पेश किए गए बिलों की हार और वापसी के तुरंत बाद भाजपा द्वारा शुरू किया गया हंगामेदार प्रचार अभियान यह दिखाता है कि संघ ब्रिगेड के पास अपनी योजनाएं पहले से तैयार थीं. चुनाव आचार संहिता की भावना का बेशर्मी से उल्लंघन करते हुए मोदी ने प्रधान मंत्री पद का दुरुपयोग किया और राष्ट्र के नाम संबोधन की आड़ में पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण चुनावी भाषण दिया. भाजपा का मानना है कि अब उसे एक नया मुद्दा मिल गया है, जो लोगों का ध्यान गहराते आर्थिक संकट, ईरान पर अमेरिका-इजराइल युद्ध और एसआइआर के कारण बड़े पैमाने पर लोगों के मताधिकारहरण से हटा सकता है. लेकिन मोदी सरकार और संघ ब्रिगेड की नापाक चालों के बारे में अटकलें न लगाते हुए हमें लोकसभा में किए गए सफल विधायी प्रतिरोध से ताकत लेकर जमीनी स्तर पर और भी ज्यादा मजबूत और गतिशील विपक्ष खड़ा करने की जरूरत है.

मोदी सरकार और संघ ब्रिगेड द्वारा फैलाया जा रहा सबसे बड़ा झूठ यह है कि विपक्ष ने महिला आरक्षण के लागू होने में रुकावट डाली है. नरेंद्र मोदी ने परिसीमन बिल की हार को महिलाओं के सपनों की हत्या बताया है, और इसे महिला भ्रूण हत्या तक कह दिया है. असल में, महिला आरक्षण पर बिल सितंबर 2023 में संसद में सर्वसम्मति से पारित हो गया था, और अब भाजपा को यह बताना होगा कि उसने इसे लागू करने की दिशा में अब तक क्या किया है. यह मोदी सरकार ही थी जिसने बेवजह जनगणना और परिसीमन को संसद और विधान सभाओं में महिला आरक्षण के लिए जरूरी शर्तों के तौर पर शामिल कर दिया. जनगणना के मोर्चे पर बहुत कम प्रगति होने के कारण सरकार ने अब महिला आरक्षण को एक संदिग्ध और पूरी तरह से अपारदर्शी परिसीमन प्रक्रिया से बांध देने का प्रयास किया, जिसका जनगणना से कोई लेना-देना नहीं था. यही वह कुटिल चाल है जिसका अब पर्दाफाश हो गया है और जिसे हरा दिया गया है. 20 और 21 सितंबर 2023 को लोकसभा और राज्यसभा में पारित हुआ महिला आरक्षण बिल संविधान के 106वें संशोधन के तौर पर अब भी पूरी तरह से लागू है.

अतीत में आरक्षण की कोई भी शुरुआत – चाहे वह एससी/एसटी समुदायों के लिए राजनीतिक आरक्षण हो या अन्य क्षेत्रों में आरक्षण; रोजगार और शिक्षा में ओबीसी आरक्षण हो, या पंचायतों और नगर पालिकाओं में खुद महिलाओं के लिए आरक्षण हो – संसद, विधान सभाओं, पंचायतों या नगरपालिकाओं की कुल संख्या में बढ़ोतरी पर निर्भर नहीं रही है; और न ही वह रोजगार या शिक्षा के उन क्षेत्रों में उपलब्ध सीटों में बढ़ोतरी पर निर्भर रही है, जहां आरक्षण लागू किया गया था. यह विचार कि महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण मौजूदा सीटों में से नहीं, बल्कि अतिरिक्त सीटें बनाकर ही लागू किया जा सकता है, महिलाओं के लिए आरक्षण के मूल विचार और उद्देश्य को ही कमजोर करता है. जो विधेयक अब खारिज कर दिए गए हैं और वापस ले लिए गए हैं, उनसे यह बिल्कुल साफ हो गया था कि महिलाओं के लिए आरक्षण का इस्तेमाल केवल परिसीमन की एक मनमानी और दुर्भावनापूर्ण योजना लाने के बहाने के तौर पर ही किया जा रहा था.

यह सच है कि वाजपेयी सरकार द्वारा 2001 में पारित 84वें संशोधन अधिनियम ने 1976 में संसदीय सीटों की संख्या पर लगाई गई रोक को पच्चीस साल के लिए और बढ़ा दिया था, और इसी के अनुसार अगला परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के बाद होगा. संयोग से, 2021 की जनगणना में देरी हो गई थी और नई जनगणना का काम 2026 में ही शुरू हो पाया. सरकार ने परिसीमन के अगले दौर को इस मौजूदा जनगणना से, और इस तरह नई जनगणना से मिलने वाले जातिगत आंकड़ों पर किसी भी विचार-विमर्श से, अलग करने की कोशिश की. असल में, सरकार ने भविष्य में होने वाले परिसीमन के किसी भी काम को पूरी तरह से अपारदर्शी और मनमाना बनाने का प्रयास किया, ताकि तत्कालीन सरकार संसद में साधारण बहुमत के आधार पर परिसीमन का कोई भी मनचाहा खाका लागू करवा सके. 1976 में संसद की सीटों की संख्या पर रोक लगाने और बाद में 2001 में वाजपेयी सरकार द्वारा इस रोक को आगे बढ़ाने का मुख्य कारण यह था कि भारत की असमान जनसंख्या वृद्धि दर का संसद की संरचना पर पड़ने वाले प्रभाव को कम से कम किया जा सके. सीटों की संख्या पर लगी रोक को बिना किसी शर्त के हटा देने से संसद के क्षेत्रीय संतुलन में भारी उलट-फेर आने का खतरा है – इससे कुछ उत्तरी भारतीय राज्यों का पलड़ा भारी हो जाएगा, जबकि शेष भारत की उपेक्षा हो जाएगी.

मोदी और शाह ने अपने भाषणों में राज्यों और अंचलों के मौजूदा अनुपात को बनाए रखने के बारे में जो तथाकथित गारंटी दी थीं, वे उन बिलों के असली विवरण में पूरी तरह से गायब थीं. 2011 की जनगणना के आधार पर 850 सदस्यों वाली संसद में, दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व 24.3% से घटकर 20.7%, पूर्वी राज्यों का 14.4% से 13.7%, और उत्तर-पूर्वी राज्यों का 4.4% से 3.8% हो जाने की संभावना थी; जबकि हिंदी भाषी राज्यों – उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और दिल्ली – का हिस्सा 38.1% से बढ़कर 43.1% हो जाता. बिलों में इस बात का कोई भी तार्किक स्पष्टीकरण नहीं था कि ये नए आंकड़े – राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 – आखिर कैसे तय किए गए. परिसीमन जैसे संवेदनशील मामले पर, जिसमें भारत की विविधता में एकता और संघीय संतुलन को मजबूत करने के लिए आम सहमति बनाने की एक पारदर्शी और तर्कसंगत लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जरूरत थी, मोदी सरकार ने बेहद लापरवाही भरा और साजिशपूर्ण रवैया अपनाया – विधान सभा चुनावों के ठीक बीच में ही संसद का विशेष सत्र बुला लिया, और बिलों को संसद में पेश करने से ठीक एक दिन पहले उनकी प्रतियां उपलब्धा कराईं, ताकि उनके अध्ययन और जांच-पड़ताल की गुंजाइश कम से कम रह जाए.

परिसीमन आयोग के पास चुनाव आयोग से भी ज्यादा संवैधानिक शक्तियां होती हैं. एक बार अंतिम रूप दिए जाने के बाद परिसीमन का फर्मूला किसी भी संसदीय जांच या न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हो जाता है. और आयोग के पास न केवल संसद या विधान सभाओं के आकार को निर्धारित करने की शक्ति होती है, बल्कि वह चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं भी तय कर सकता है. परिसीमन की इस प्रक्रिया ने जम्मू-कश्मीर और असम में पहले ही भारी उथल-पुथल मचा दी है – वहां चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं फिर से तय की गई हैं और एससी/एसटी आरक्षण फार्मूले का इस्तेमाल इस तरह से किया गया है जिससे विपक्ष के जीतने की संभावनाओं का क्षीण पड़ना और विधायी क्षेत्र में धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों की दावेदारी का ढांचागत रूप से कमजोर होना तय है. जम्मू-कश्मीर और असम में अपनाए गए परिसीमन के पैटर्न को पूरे भारत में दोहराने से भारत का चुनावी परिदृश्य पूरी तरह से भाजपा की बहुसंख्यकवादी और अल्पसंख्यक-विरोधी राजनीति के पक्ष में झुक जाएगा. नवीकृत (अपडेट) करने की एक तर्कसंगत प्रक्रिया होने के बजाय परिसीमन चुनावी क्षेत्रों की मनमानी हदबंदी के सबसे खतरनाक रूप में बदल जाएगा, जहां विपक्ष के वोटों को कम संख्या वाले निर्वाचन क्षेत्रों में ठूंस दिया जाएगा या उन्हें व्यापक रूप से बिखेर दिया जाएगा, ताकि उनका निर्णायक संख्यात्मक प्रभाव खत्म हो जाए.

जब परिसीमन की ऐसी कुटिल योजना को मनचाहे ढंग से व्यवस्थित मतदाता सूची और समकालिक चुनावों के साथ मिलाकर लागू किया जाएगा, जिसमें विधान सभा चुनावों का स्वतंत्र संदर्भ छीनकर उन्हें लोकसभा चुनावों का ही विस्तार बना दिया जाएगा (जैसा कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ फार्मूले के तहत प्रस्तावित है), और इन सब पर हथपकड़ू चुनाव आयोग की टीम निगरानी कर रही होगी, तो भारत की चुनावी व्यवस्था भाजपा के लिए सत्ता का एक स्थायी बंदोबस्त तैयार कर देगी – ठीक वैसे ही, जैसे औपनिवेशिक काल के राजस्व के ‘स्थायी बंदोबस्त’ ने भारत में जमींदारी प्रथा को संस्थागत रूप दे दिया था. संसद में परिसीमन विधेयक की हार इस कुटिल योजना के लिए महज एक शुरुआती झटका है. अब भारत को इस योजना को निर्णायक रूप से खारिज कर देना चाहिए. हमें एक शक्तिशाली राष्ट्रव्यापी आंदोलन की जरूरत है जो संसद और विधान सभाओं की मौजूदा सदस्य संख्या के आधार पर महिलाओं के लिए आरक्षण को तत्काल लागू करने, जनगणना को जल्द से जल्द पूरा करके जातिगत आंकड़े प्रकाशित करने और परिसीमन के अगले दौर पर एक राष्ट्रीय सहमति बनाने की मांग करे, ताकि विभिन्न स्तरों पर प्रतिनिधित्व को हमारे गणतंत्र के संघीय, लोकतांत्रिक स्वरूप के साथ संतुलित किया जा सके.

संसद के विशेष सत्र ने फासीवादी ताकतों की एक अहम रणनीति को बेनकाब कर दिया है और उस पर रोक लगा दी है, अब हमारा फर्ज है कि हम इस संदेश को युद्ध स्तर पर देश के कोने-कोने में आम लोगों तक पहुंचा दें.

25 April, 2026