पश्चिम बंगाल में खाने को लेकर जातिवादी राजनीति का एक खतरनाक रूप सामने आ रहा है. वहां की भाजपा सरकार स्कूलों में बच्चों को मिलने वाले मिड-डे मील से अंडे हटाने की तैयारी कर रही है. कोलकाता के स्कूलों में भोजन तैयार करने की जिम्मेदारी सरकार ने धार्मिक संस्था इस्काॅन को दी है. इस्काॅन की ‘सात्विक भोजन’ की नीति में सभी तरह के ‘मांसाहारी’ भोजन के साथ-साथ प्याज और लहसुन भी शामिल नहीं हैं. यह उस राज्य में बेहद विडंबनापूर्ण है, जहां राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2019-21) के आंकड़ों के मुताबिक 99.3 प्रतिशत आबादी, अगर उनकी आर्थिक स्थिति इजाजत दे, तो मछली, मांस या अंडा खाना पसंद करती है.
मिड-डे मील योजना में अंडे शामिल किए जाने को लेकर खड़ा किया गया यह विवाद कोई नया नहीं है. बच्चों के लिए राज्य की कल्याणकारी व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण कड़ी और उनका कानूनी अधिकार रहे मिड-डे मील को पिछले कुछ समय से छोटी और संकीर्ण लड़ाइयों का अखाड़ा बना दिया गया है. एक छोटी-सी शाकाहारी जाति-धार्मिक अल्पसंख्यक आबादी पूरे समाज के खाने-पीने की नीति और पसंद तय करने लगी है.
अंडे को दुनिया भर में सस्ता और भरपूर प्रोटीन देने वाला भोजन माना जाता है. इसमें विटामिन बी-12, विटामिन डी, कोलीन, आसानी से पचने वाला जिंक और आयरन जैसे जरूरी पोषक तत्व होते हैं. अंडे में शरीर के लिए जरूरी सभी अमीनो एसिड ऐसे रूप में मौजूद होते हैं, जिन्हें शरीर आसानी से ग्रहण कर लेता है. इसके मुकाबले केवल वनस्पति आधारित प्रोटीन उतना प्रभावी नहीं होता. पोषण संबंधी आंकड़ों के अनुसार, पूरे अंडे से मिलने वाले प्रोटीन की शरीर में उपयोग होने की क्षमता 94 प्रतिशत तक होती है, जबकि चना 76 प्रतिशत और सोयाबीन 54 प्रतिशत तक ही पहुंचता है. इसलिए वनस्पति प्रोटीन, पशु प्रोटीन का पूरी तरह बराबर विकल्प नहीं है.
कुछ दशक पहले तक नीति बनाने वालों और आम जनता को यह बात अच्छी तरह समझ में आती थी. यही वजह थी कि नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी का मशहूर अभियान – ‘संडे हो या मंडे, रोज खाओ अंडे’ – इतना लोकप्रिय हुआ था. रोज अंडा खाना तब सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार की एक जरूरी पहल माना जाता था.
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जैसे-जैसे हिंदुत्व की राजनीति के तहत लोगों के खाने-पीने पर पहरेदारी बढ़ती गई, बच्चों के पोषण पर भी इसका सीधा असर पड़ा है. भाजपा जिन 22 राज्यों में अकेले या गठबंधन के साथ सत्ता में है, उनमें से इस समय केवल पांच राज्यों में मिड-डे मील की पूरक पोषण योजना के तहत बच्चों को अंडे दिए जा रहे हैं. छत्तीसगढ़, गोवा और महाराष्ट्र में भी, पश्चिम बंगाल की तरह, भाजपा के सत्ता में आने के बाद भोजन की सूची से अंडे हटा दिए गए.
कई राज्यों में बच्चों के भोजन में अंडा शामिल करने की कोशिशों का धार्मिक और सांप्रदायिक संगठनों ने जोरदार विरोध किया. यह समझ से परे है कि एक ऐसे देश में, जहां बहुसंख्यक लोग मांसाहारी भोजन करते हैं, एक छोटा-सा धार्मिक समूह गरीब, वंचित और कुपोषित बच्चों के लिए सरकार की भोजन नीति कैसे तय कर सकता है?
बहुत से बच्चों के लिए मिड-डे मील ही दिन का एकमात्र पौष्टिक और भरपेट भोजन होता है. यह भी सामने आया है कि जिन दिनों बच्चों को अंडा दिया जाता है, उन दिनों स्कूल में उनकी उपस्थिति बढ़ जाती है. ऐसे में जबरन शाकाहार थोपना देश के भूखे-गरीब बच्चों के खिलाफ राज्य द्वारा की जा रही पोषण संबंधी हिंसा है. इसका नतीजा यह है कि गरीब बच्चों को सस्ते अनाज, पतली दाल और उसके अलावा लगभग कुछ नहीं खाने को मजबूर किया जाता है.
इसके साथ यह सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है कि क्या इस्काॅन जैसी धार्मिक संस्थाओं को राज्य की मिड-डे मील योजना अपने हाथ में लेने की अनुमति दी जानी चाहिए?
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत बच्चों को मिड-डे मील योजना के अंतर्गत हर दिन अच्छा और पौष्टिक भोजन मिलना उनका कानूनी अधिकार है. सरकार जब इस अधिकार को ऐसी संस्थाओं के हवाले कर देती है, तो वह अधिकार की भाषा को पीछे धकेलकर दान और कृपा की भाषा को आगे बढ़ाती है.
इस्काॅन और उसकी अक्षय पात्र फाउंडेशन पर पहले भी भोजन की विविधता सीमित करने और ऐसा बेस्वाद, फीका भोजन देने के आरोप लगते रहे हैं, जिसमें स्थानीय खान-पान की परंपराओं और संस्कृतियों की पूरी तरह अनदेखी होती है. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2010 से 2014 के बीच इस्काॅन द्वारा तैयार किए गए 187 भोजन के नमूने पोषण संबंधी तय मानकों पर खरे नहीं उतरे थे.
ओडिशा जैसे राज्यों में, जहां मिड-डे मील की जिम्मेदारी इस्काॅन के पास है, उसकी शाकाहारी विचारधारा के कारण सरकार को बच्चों को अंडे देने के लिए अलग से व्यवस्था करनी पड़ी. यह सार्वजनिक कल्याण की मूल भावना को उलट देने जैसा है. होना यह चाहिए कि भोजन उपलब्ध कराने वाली संस्थाएं सरकार के पोषण संबंधी मानकों के अनुसार काम करें. लेकिन यहां उल्टा हो रहा है – सरकार अपनी कल्याणकारी व्यवस्था को ही ठेकेदार संस्थाओं की विचारधारा के मुताबिक ढाल रही है.
इस्काॅन पर यह आरोप भी बार-बार लगता रहा है कि वह मिड-डे मील के लिए सरकार से मिले चावल को बाजार में बेच देता है और भोजन उपलब्ध कराने के नाम पर विदेशों में धन जुटाता है, जो वित्तीय अनियमितता का मामला बनता है.
इस्काॅन की केंद्रीकृत विशाल रसोइयां भी मिड-डे मील की उस सरकारी नीति के बिल्कुल विपरीत हैं, जिसका उद्देश्य विकेंद्रीकृत तरीके से भोजन उपलब्ध कराना, स्थानीय खाद्य परंपराओं का सम्मान करना और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करना है – खासकर समाज के वंचित तबकों के लिए.
सरकारों को ऐसी पोषण-विरोधी संस्थाओं के साथ किए गए समझौतों पर फिर से विचार करना चाहिए. इसके बजाय उन्हें केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों के सफल मिड-डे मील कार्यक्रमों से सीखना चाहिए, जहां बच्चों को पौष्टिक भोजन देने की व्यवस्था मजबूत, लोकप्रिय और प्रभावी रही है.
पिछले करीब एक दशक से भारत में खाना भी हिंसक पहरेदारी और नियंत्रण की राजनीति का मैदान बना दिया गया है. शाकाहार के नाम पर ऐसी हिंसा बच्चों के शरीर पर नहीं थोपी जा सकती.
अंडा प्रकृति के सबसे पौष्टिक और सबसे सस्ते खाद्य पदार्थों में से एक है. हमारे बच्चों को अंडा खाने दीजिए. अंडे को लेकर राजनीति करना बंद कीजिए और इस बहाने बच्चों को उस प्रोटीन से वंचित मत कीजिए, जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है.
(साभारः EPW, 30 जुलाई 2026)