प्रदूषण और बीमारियों की मार झेलने वाले आम लोगों की जिम्मेदारी किसपर?
-- डॉ. नुजरत जहां
फरवरी 2026 में, भारत सरकार ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट’ सम्मेलन का आयोजन किया. सरकारी अधिकारियों, टेक दिग्गजों और शोधकर्ताओं के इस जमावड़े का मकसद भारत को एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की वैश्विक बहस के केंद्र में खड़ा करना था. ‘लोग, पर्यावरण और प्रगति’ की लुभावनी थीम के साथ इस मिशन को विकास और सार्वजनिक सेवाओं के एक नए युग की शुरुआत के तौर पर पेश किया गया.[1]
लेकिन, एआई को बढ़ावा देने की यह कवायद एक ऐसे दौर में हो रही है जहां दुनिया तेजी से बदल रही है – या कहें कि ढह रही है. यह वह समय है जब अमेरिका और इजराइल के नेतृत्व में फिलिस्तीन और ईरान में जनसंहार जारी है, लैटिन अमेरिका से लेकर अफ्रीका तक साम्राज्यवादी हमले तेज हो रहे हैं, और अमेरिका-चीन की आपसी प्रतिद्वंद्विता वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजारों को झकझोर रही है. इस उथल-पुथल भरी दुनिया में एआई महज एक तकनीक नहीं, बल्कि सैन्य ताकत और आर्थिक वर्चस्व का एक सामरिक हथियार बन चुकी है.
विज्ञान कभी भी शून्य में पैदा नहीं होता; वह अपने दौर की भौतिक स्थितियों और उत्पादन के संबंधों की उपज होता है और उन्हीं को पुख्ता करता है. भारत के लिए इस नई एआई व्यवस्था के असली मायने समझने के लिए हमें कंप्यूटर विज्ञान के राजनीतिक अर्थशास्त्र और इसके इतिहास को खंगालना होगा. नई दिल्ली के इसी सम्मेलन में जब ‘ओपन एआई’ और ‘एंथ्रोपिक’ जैसी महाकाय कंपनियों के सीईओ प्रधानमंत्री मोदी और अन्य राष्ट्राध्यक्षों के साथ हाथ में हाथ डाले खड़े थे, तो वह तस्वीर साफ बता रही थी कि भविष्य की इस तकनीक की कमान असल में किसके हाथों में है.
तस्वीर बिलकुल साफ थी : सरकारों और टेक-कंपनियों का एक सधा हुआ गठजोड़ – जो असल में एक उभरता हुआ ‘तकनीक-साम्राज्यवादी’ गुट है. आज एंथ्रोपिक जैसी कंपनियां ‘क्लॉड’ जैसे सिस्टम को ‘नैतिक एआई’ के नाम पर बेच रही हैं. उनकी गढ़ी हुई कहानी के मुताबिक, एआई एक बेहद सतर्क, इंसानों के हित में ढली हुई तकनीक है, जो एक ‘जिम्मेदार नवाचार’ की कोख से पैदा हुई है. साथ ही, यह बात भी फैलाई जा रही है कि अब सेनाएं सिलिकॉन वैली की तरफ रुख कर रही हैं ताकि नागरिक तकनीकों को युद्ध के सांचे में ढाला जा सके.
लेकिन कड़वा सच इस कहानी के ठीक उलट है. डिजिटल अर्थव्यवस्था की जितनी भी बुनियादी तकनीकें हैं – चाहे वह नेटवर्क्ड कंप्यूटिंग हो, इंटरनेट हो या शुरुआती एआई रिसर्च – ये सब व्यावसायिक प्लेटफॉर्म बनने से बहुत पहले सैन्य प्रोग्रामों और सरकारी फंडिंग के जरिए विकसित हुई थीं. (डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी) (DARPA) – जो अमेरिकी रक्षा विभाग की एक स्वतंत्र रिसर्च विंग है – खुद मानती है कि उसका एआई पर काम 1960 के दशक से जारी है और शुरुआती एआई की सफलताओं का श्रेय उसी के शोध को जाता है. 2017 के ‘प्रोजेक्ट मेवेन’ – जो एक एआई ड्रोन निगरानी प्रोग्राम था – के बाद से तो पेंटागन के एआई कॉन्ट्रैक्ट्स में बाढ़ सी आ गई है. साफ है कि एआई और कंप्यूटर साइंस कभी भी ‘सिविलियन’ क्षेत्र नहीं थे[2] जिन्हें बाद में जबरन जंग में घसीटा गया हो; बल्कि सैन्य शोध ही इस पूरे क्षेत्र की बुनियाद रही है. आज की ‘दोहरे उपयोग’ वाली तकनीकें इसी खूनी इतिहास का विस्तार मात्र हैं.
लेकिन यह तो अभी झांकी भर है. कंप्यूटिंग और एआई ने आज यह शक्ल क्यों ली, इसे समझने के लिए हमें एल्गोरिदम के सामाजिक इतिहास और उन्नीसवीं सदी के औद्योगिक पूंजीवाद की तहों में जाना होगा. इंसान सदियों से गिनती, लेखा-जोखा और तालमेल के सिस्टमों का इस्तेमाल करता आया है, लेकिन उसका मकसद हमेशा श्रम को व्यवस्थित करना और संसाधनों पर कब्जा जमाना ही रहा है. इसका सीधा अर्थ है कि एल्गोरिदम कभी भी केवल गणितीय गणनाएं नहीं रहे, बल्कि वे काम, ज्ञान और अधिकार को सत्ता के पक्ष में मोड़ने वाले सामाजिक औजार रहे हैं.
औद्योगिक पूंजीवाद के उदय के साथ जो सबसे बड़ा बदलाव आया, वह यह था कि इन औजारों को बड़े पैमाने पर संगठित किया गया – ताकि साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक ताकतों की विस्तारवादी जरूरतों को पूरा किया जा सके. चार्ल्स बैबेज उस औद्योगिक इंग्लैंड का प्रतिनिधि था, जहां भाप की शक्ति उत्पादन के पूरे ढांचे को बदल रही थी और ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें समुद्री व्यापार और गुलाम उपनिवेशों पर टिकी थीं. उसकी ‘कैलकुलेटिंग मशीन’ इन्हीं हालातों की उपज थी. उसे समुद्री व्यापार के लिए सटीक गणितीय तालिकाएं बनाने के लिए डिजाइन किया गया था. दिलचस्प बात यह है कि इसे बनाने में उन्हीं मैकेनिकल सिस्टमों और कारखाने के मजदूरों के ‘हाड़-तोड़ श्रम’ का इस्तेमाल हुआ, जिनसे फैक्टरियां चलती थीं. यहां विज्ञान समाज से कटकर किसी प्रयोगशाला में पैदा नहीं हुआ, बल्कि वह अपने दौर की भौतिक स्थितियों से उपजा और बदले में उन्हीं शोषणकारी स्थितियों को और मजबूत करने का जरिया बना.
इसी प्रक्रिया के गर्भ से ‘कम्प्यूटेशन’ का जन्म होता है, जिसमें औद्योगिक उत्पादन का पूरा तर्क समाहित है : यानी सटीकता, मानकीकरण, नियंत्रण और विस्तारशीलता.[3]
कार्ल मार्क्स ने इस प्रक्रिया को बहुत गहराई से देखा और समझा था. उन्होंने गौर किया कि मशीनें न केवल शारीरिक श्रम को निगल रही हैं, बल्कि वे इंसान की याददाश्त और निर्णय लेने की क्षमता को भी अपने सांचे में ढाल रही हैं. वह सामूहिक बुद्धिमत्ता, जो समाज के आपसी सहयोग से पैदा होती है – जिसे मार्क्स ने ‘जनरल इंटेलेक्ट’ (General Intellect) कहा था – उसे तेजी से मशीनी बुद्धिमत्ता (एआई) के पिंजरे में कैद किया जाने लगा.[4]
आज बड़ा सवाल यही है : हम सब मिलकर जो ज्ञान और समझ पैदा करते हैं, उस पर नियंत्रण किसका होगा? क्या वह चंद कंपनियों के मुनाफे और साम्राज्यवादी वर्चस्व का हथियार बनेगा, या उसका इस्तेमाल सामाजिक जरूरतों और समूची मानवता की मुक्ति के लिए किया जाएगा?
इसलिए एआई का सवाल उतना ही राजनीतिक है, जितना तकनीकी.
एआई का यह दौर एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव के भीतर घट रहा है – जो जंगों, खनिजों के दोहन, ऊर्जा के ठिकानों और बुनियादी ढांचे की लड़ाई से चल रहा है.
एआई की भौतिक बुनियाद खनन से शुरू होती है : कोबाल्ट, लिथियम, दुर्लभ पृथ्वी तत्व और दूसरे अहम खनिज – जिनमें से ज्यादातर अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से निकाले जाते हैं – यही सेमीकंडक्टर्स, बैटरियों और डेटा सेंटर के हार्डवेयर की रीढ़ हैं.
फिर भी, पहले के दोहन के तौर-तरीकों की तरह, ये खनिज देने वाले इलाके इस मूल्य में से बहुत कम हिस्सा पाते हैं – क्योंकि यहां पर्यावरणीय तबाही, मजदूरों का शोषण और अनवरत हिंसा चलती है.[5]
फरवरी 2026 के अंत से, अमेरिका-इजराइल के साम्राज्यवादी हमलों ने होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध कर दिया है, खाड़ी देशों में तेल और गैस के बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया है, और वेनेजुएला के तेल को लूटा है – असर यह हुआ कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के केंद्रीय इलाके अस्थिर हो गए हैं.[6]
डेटा सेंटरों को भारी मात्रा में लगातार बिजली चाहिए. तेल और गैस की आपूर्ति में जो रुकावटें आती हैं, वे वैश्विक बाजारों पर असर डालती हैं, और यह तय करती हैं कि एआई का बुनियादी ढांचा कहां बनाया और चलाया जा सकता है.
एआई के बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए स्थिर ऊर्जा तो चाहिए ही, साथ में अनुमानित मुनाफा और सुरक्षित राजनीतिक हालात भी चाहिए.
खाड़ी के देशों में यही विरोधाभास साफ दिखता है. यहां तेल की कमाई को एआई में लगाया जा रहा है – डेटा सेंटर और क्लॉड सिस्टम खड़े किए जा रहे हैं – लेकिन यही इलाका पानी और बिजली के मामले में बहुत बुरी हालत में है. यहां पीने का पानी समंदर के पानी को साफ करके बनाना पड़ता है, जिसमें भारी बिजली जलती है, और एआई के डेटा सेंटर को ठंडा रखने के लिए भी अजीबोगरीब तरकीबें अपनानी पड़ रही हैं. ऊपर से सैन्य झड़पें और दूसरे देशों पर निर्भर सुरक्षा की व्यवस्था – यानी अपने पांव पर खड़े होने की जगह दूसरों के सहारे टिके हैं.[7]
यह भी गौरतलब है कि अमेरिकी टेक कंपनियां भारत में फैल रही हैं, और इसके साथ-साथ भारत-इजराइल के रक्षा संबंध भी गहरे हो रहे हैं – भारत को एक बड़ी तकनीकी-सैन्य संरचना में शामिल किया जा रहा है.[8]
भारत के लिए, जिसे ‘तकनीकी संप्रभुता’ का नाम दिया जा रहा है, वह दरअसल एक नई तरह की गुलामी से ज्यादा कुछ नहीं है. यहां बुनियादी ढांचा और मजदूरी तो स्थानीय है, लेकिन सामरिक नियंत्रण और दिशा बाहर के हाथ में रहती है. पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य का खामियाजा, हालांकि, दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले इस इलाके को ही भुगतना पड़ता है.
अतीत और वर्तमान की इस पड़ताल से जो सामने आता है, वह इंसानियत और इस धरती के भविष्य की दिशा को लेकर एक सवाल है.
इस पर दो बातें साफ होती हैं :
पहली, मजदूरों के नजरिए से : संगठन की शुरुआत हमारी सामूहिक ज्ञान को वापस अपने हाथ में लेने से होनी चाहिए. यह तय करना होगा कि यह ज्ञान कैसे पैदा हो, कैसे इस्तेमाल हो, और किस तरह बंटे.
दूसरी, राजनीतिक अर्थव्यवस्था के नजरिए से : एआई का बुनियादी ढांचा ऊर्जा, वित्तीय पूंजी और भू-राजनीतिक ताकत के तालमेल के मुताबिक चलता है.
इन दोनों को साथ रखें तो साफ होता है कि हमें महज ‘एआई को रेगुलेट करो’ या ‘नैतिक एआई’ जैसी सीमित मांगों से आगे बढ़ना होगा. दरअसल जरूरत है एक बड़ी सभ्यतागत दिशा बदलने की – ऐसी दिशा जो विज्ञान और तकनीक को मुनाफे, जंग और अंतहीन दोहन की राह से हटाकर, सामूहिक योजना, पारिस्थितिकीय संतुलन और टिकाऊ इंसानी विकास की राह पर ले जाए.
आज की असली चुनौती सिर्फ एआई को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उन हालातों को बदलना है जिनमें ज्ञान पैदा होता और पुनरुत्पादित होता है.
( लेखिका अमेरिका की ब्लूमिंग्टन यूनिवर्सिटी में शोध छात्रा हैं. हिंदी अनुवाद – मनमोहन )
[1] “India AI Impact Summit 2026,” India AI Impact Summit 2026, accessed March 19, 2026, https:èkèkai-impact-summit.vercel.app
[2] AI Next Campaign | DARPA, accessed March 19, 2026,
https:ekekwww.darpa.milekresearchekprogramsekai-next-campaign
[3] Matteo Pasquinelli, The Eye of the Master: A Social History of Artificial Intelligence (Verso Books, 2023)
[4] Karl Marx, Grundrisse: Foundations of the Critique of Political Economy (Rough Draft), trans. Martin Nicolaus (London: Penguin, 1973), 383–423; Karl Marx, Capital: A Critique of Political Economy, Volume I, trans. Ben Fowkes (London: PenguinèkNew Left Review, 1976), 492–507.
[5] “Critical Minerals, Critical Moment: Africa’s Role in the AI Revolution,” ODI: Think Change, February 10, 2025.
[6] “Strait of Hormuz: As Iran Blocks Key Oil Shipping Route, Can Naval Escorts Help? – Bloomberg”
[7] “Silicon Valley Giants Invest Billions in Gulf AI Infrastructure,” Jordan Daily.
[8] “Israel and India Expand Defense Ties with $10 Billion Deal | The Jerusalem Post,” “How India Replaced Europe as Israel’s Reliable Arms Supplier,” Palestine Chronicle, December 28, 2025.