-- अशोक दानवथ और प्रवीण कोल्लुगुरी
दुनिया के हर हिस्से में भारतीय प्रवासी मजदूर शोषण और जुल्म के सबसे भयावह रूपों का शिकार होते दिखाई देते हैं. खाड़ी के देशों में ईरान पर अमेरिकी जंग के नतीजे में उनकी मौतें होती हैं, ठीक वैसे ही जैसे कुछ साल पहले कतर में फुटबाॅल विश्व कप के स्टेडियम बनाते हुए भीषण गर्मी में उनकी जानें गई थीं. अक्टूबर 2023 के बाद फिलिस्तीनी मजदूरों की जगह लेने के लिए उन्हें इजराइल के निर्माण स्थलों पर लाया गया. इटली के खेतों में वे आधुनिक गुलामी जैसी हालत में फंसे हुए हैं, तो कहीं धोखे से उन्हें रूसी सेना में भर्ती करा दिया जाता है.
यह महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी ढांचागत व्यवस्था है. यह समझने के लिए कि भारतीय मजदूर सबसे खतरनाक जगहों पर, सबसे असुरक्षित काम और सबसे सस्ती मजदूरी पर हमेशा क्यों उपलब्ध रहते हैं, हमें बिहार की किसी दलित बस्ती, आंध्र प्रदेश के किसी मैला ढोने वाले समुदाय की बस्ती, या झारखंड के किसी आदिवासी गांव से शुरुआत करनी होगी.
वैश्विक पूंजी को भारतीय मजदूरों में जो ‘आज्ञाकारिता’ दिखाई देती है, वह सबसे पहले भारत के भीतर ही पैदा की गई थी. यह जाति व्यवस्था, भूमिहीनता और काम के लगातार असंगठित किए जाने की प्रक्रिया के जरिये काम करती है. यह पूरी सामाजिक व्यवस्था इन मेहनतकशों को किसी भी सरहद को पार करने से बहुत पहले ही ऐसा इंसान मान लेती है जिसे आसानी से खपाया और फेंका जा सकता है.
जाति आधारित श्रम व्यवस्था
भारत के असंगठित क्षेत्र में लगभग 40 से 50 करोड़ लोग काम करते हैं. इसका मतलब है कि उनके पास लिखित नियुक्ति-पत्र नहीं होता, लागू होने वाली न्यूनतम मजदूरी की गारंटी नहीं होती, बीमार पड़ने पर वेतन नहीं मिलता, मातृत्व अवकाश नहीं मिलता, स्वास्थ्य बीमा नहीं होता, पेंशन नहीं होती और मनमाने ढंग से नौकरी से निकाले जाने के खिलाफ कोई कानूनी सुरक्षा भी नहीं होती.
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के ई-श्रम पोर्टल के आंकड़े बताते हैं कि पंजीकृत असंगठित मजदूरों में 94 प्रतिशत से ज्यादा की मासिक आमदनी 10,000 रुपये से भी कम है. इनमें से 74 प्रतिशत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के समुदायों से आते हैं, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से सबसे असुरक्षित और सबसे अपमानजनक किस्म के कामों में धकेला गया है.
अक्सर अर्थशास्त्री असंगठित रोजगार को विकास की प्रक्रिया में पीछे रह जाने वाली एक अस्थायी समस्या के रूप में देखते हैं. लेकिन भारत में इसे सामाजिक व्यवस्था के रूप में समझना ज्यादा सही होगा. यहां जाति सिर्फ यह तय नहीं करती कि सबसे गंदा, सबसे खतरनाक और सबसे असुरक्षित काम कौन करेगा, बल्कि यह भी तय करती है कि मजदूरी न मिलना, कर्ज के जाल में फंसना, अपमान झेलना और औद्योगिक दुर्घटनाओं का सबसे ज्यादा शिकार कौन बनेगा.
काम की जगह होने वाली मौतों और हादसों के आंकड़े इसकी साफ गवाही देते हैं. 2017 से 2020 के बीच भारत की पंजीकृत फैक्ट्रियों में औसतन हर दिन तीन मजदूरों की मौत हुई और 11 मजदूर घायल हुए. दिसंबर 2024 तक इंडस्ट्रीऑल ग्लोबल यूनियन ने केवल उसी साल विनिर्माण, खनन और ऊर्जा क्षेत्रों में कम से कम 240 कार्यस्थल दुर्घटनाएं दर्ज कीं, जिनमें 400 से ज्यादा मजदूर मारे गए और 850 से अधिक गंभीर रूप से घायल हुए.
जून 2025 में तेलंगाना स्थित सिगाची इंडस्ट्रीज के एक संयंत्र में हुए विस्फोट में कम से कम 54 मजदूर मारे गए. इनमें अधिकांश उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा से आए प्रवासी मजदूर थे. यह कंपनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध एक दवा निर्माता है, जो दर्जनों देशों को निर्यात करती है. मृतकों के परिवारों ने बताया कि पुराने और जर्जर उपकरणों को लेकर दी गई चेतावनियों को लगातार नजरअंदाज किया गया था. तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने प्रत्येक मृतक मजदूर के परिवार को एक करोड़ रुपये मुआवजा देने की घोषणा की. लेकिन सिगाची ने अदालत में दलील दी कि उसकी जिम्मेदारी अधिकतम 42 लाख रुपये तक ही सीमित है और बाकी राशि राज्य सरकार दे. जबकि विदेशों में काम कर रही उसकी सहायक कंपनियों में कहीं ज्यादा सख्त सुरक्षा मानकों का पालन किया जाता है.
मजदूरों की ऐसी मौतें भी होती हैं जिन्हें यह श्रम व्यवस्था निराशा के जरिये पैदा करती है. 2019 के बाद से दिहाड़ी मजदूरों की आत्महत्याओं में 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और औसतन हर दिन 129 दिहाड़ी मजदूर अपनी जान दे रहे हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकाॅर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ‘भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं’ रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में 47,170 दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की.
ये सिर्फ दर्ज किए गए मामले हैं. ठेका प्रथा, हादसों की कम रिपोर्टिंग और कानूनों के कमजोर पालन वाली श्रम व्यवस्था में वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा है. अब जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गहरा कर दिया है. खेती और निर्माण क्षेत्र के मजदूरों, डिलीवरी कर्मियों तथा खुले में काम करने वाले अन्य मेहनतकशों की गर्मी से होने वाली मौतों का तो विश्वसनीय रिकाॅर्ड तक नहीं रखा जाता.
यही वजह है कि भारत में असंगठित श्रम को महज कोई तकनीकी या प्रशासनिक समस्या नहीं माना जा सकता. यह असल में जाति आधारित श्रम व्यवस्था का एक हिस्सा है, जहां असुरक्षा को एक आम बात बना दिया जाता है, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया जाता है और काम के दौरान होने वाली मौतों को राजनीतिक रूप से स्वीकार्य बना दिया जाता है. इंडस्ट्रीऑल के गौतम मोदी के शब्दों में, भारत आज भी ‘दुनिया का सबसे असुरक्षित कार्यस्थल है, जहां औद्योगिक हादसों में सबसे ज्यादा मजदूर मारे जाते हैं.’ भोपाल गैस त्रासदी के चालीस साल बाद भी बिना किसी सजा के बच निकलने का यह पूरा तंत्र जस का तस बना हुआ है.
असुरक्षा को कानूनी जामा पहनाना
नवंबर 2025 में भारत सरकार ने चार नए श्रम संहिता (लेबर कोड) लागू किए, जिन्होंने पहले से मौजूद 29 श्रम कानूनों की जगह ले ली. सरकार ने इसका तर्क यह दिया कि इससे श्रम कानून सरल होंगे, उनमें एकरूपता आएगी और उन्हें बदलती हुई कामकाजी दुनिया के मुताबिक बनाया जाएगा. लेकिन भारत के ट्रेड यूनियन आंदोलन ने इन नए कानूनों को अलग नजरिए से देखा. उनके मुताबिक, ये श्रम कानूनों को मालिकों के पक्ष में झुकाने की कोशिश हैं, जिन्हें ‘लचीलापन’ और ‘कारोबार करने में आसानी’ के नाम पर छिपाया गया है.
यहां तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े ट्रेड यूनियन भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने भी इनका विरोध किया. यानी इन लेबर कोडों के खिलाफ प्रतिरोध पूरे भारतीय मजदूर आंदोलन में देखने को मिला, जिनमें वे संगठन भी शामिल थे जिन्हें नरेंद्र मोदी सरकार का विरोधी कहकर आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता.
इन बदलावों के कई गंभीर असर हैं. औद्योगिक संबंध संहिता (इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड) के तहत अब छंटनी, कर्मचारियों की संख्या घटाने (रिट्रेंचमेंट) या किसी प्रतिष्ठान को बंद करने के लिए सरकार से पूर्व अनुमति केवल उन संस्थानों को लेनी होगी जहां कम-से-कम 300 मजदूर काम करते हों. पहले यह सीमा 100 मजदूरों की थी. इसी कानूनी ढांचे ने निश्चित अवधि (फिक्स्ड-टर्म) के रोजगार का दायरा भी बढ़ा दिया है और मालिकों को यह छूट दे दी है कि वे अनिश्चित काल तक मजदूरों को अस्थायी आधार पर काम पर रख सकें. व्यवहार में इन बदलावों का मतलब है कि नौकरी की सुरक्षा कम होगी, सामूहिक सौदेबाजी की ताकत कमजोर पड़ेगी और मजदूर पहले से भी ज्यादा आसानी से बदले जा सकने वाले बन जाएंगे.
नए श्रम कानूनों ने कार्यस्थल की सुरक्षा व्यवस्था का पूरा संदर्भ भी बदल दिया है. इन संहिताओं ने श्रम निरीक्षण व्यवस्था को मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बजाय ‘अनुपालन’ (काॅम्प्लायंस) आधारित ढांचे की ओर मोड़ दिया है, जो कारखानों के निरीक्षण को सिर्फ कागजी औपचारिकता या नियमों को मानने तक सीमित करता है. वहीं, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियां संहिता (ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड) के तहत तैयार मसौदा नियम हर तिमाही में 125 घंटे तक ओवरटाइम की इजाजत देते हैं. ऐसे देश में, जहां पहले से ही औद्योगिक लापरवाही आम है और सुरक्षा कानूनों का पालन बेहद कमजोर है, इस तरह के ‘लचीले’ प्रावधान असल में जोखिम का पूरा बोझ मजदूरों के कंधों पर डाल देते हैं. यानी असुरक्षा को कानूनी रूप देकर उसे जायज ठहराया जा रहा है.
इन श्रम संहिताओं को लागू करने के साथ-साथ मोदी सरकार ने ग्रामीण रोजगार की उस व्यवस्था को भी खत्म कर दिया है, जो मजदूरों को मांग के आधार पर काम मिलने की गारंटी देती थी. दिसंबर 2025 में संसद ने ‘वीबी-ग्राम जी’ कानून पारित किया, जिसने 2005 के महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की जगह ले ली. इस बदलाव ने मांग-आधारित रोजगार की व्यवस्था को समाप्त कर ग्रामीण श्रम उपलब्ध कराने की एक ज्यादा केंद्रीकृत व्यवस्था लागू कर दी.
करीब दो दशकों तक मनरेगा, तमाम कमियों के बावजूद, भारत के सबसे गरीब ग्रामीण मेहनतकशों की आजीविका का एक अहम सहारा रहा. उसने न तो जातिगत उत्पीड़न खत्म किया और न ही जमींदारों की सत्ता को तोड़ा. लेकिन उसने भूमिहीन और जाति उत्पीड़न झेलने वाले परिवारों को इतनी ताकत जरूर दी कि वे, खासकर उन दिनों में जब खेती के मालिकों को सबसे सस्ते श्रम की जरूरत होती थी, बेहद कम मजदूरी पर काम करने से इंकार कर सकें.
इस प्रावधान को कमजोर करने का मतलब है गांवों में सामाजिक ताकत के संतुलन को बदल देना. इसका नतीजा एक ऐसी घरेलू श्रम व्यवस्था के रूप में सामने आता है, जिसमें मजदूर और भी सस्ते, ज्यादा आसानी से नियंत्रित किए जा सकने वाले और पहले से कहीं ज्यादा खपाऊ बना दिए जाते हैं.
खपाऊ मजदूर
भारतीय मजदूरों के हालिया प्रवासन को सिर्फ इस नजरिए से नहीं देखना चाहिए कि वे किन देशों में जा रहे हैं, बल्कि इस सवाल से भी देखना चाहिए कि आखिर उन देशों को उनकी जरूरत क्यों पड़ रही है. बार-बार यही दिखाई देता है कि भारतीय मजदूर किसी स्वाभाविक श्रम की कमी को पूरा करने नहीं पहुंच रहे, बल्कि उन्हें वहां उन श्रम, जमीन और राजनीतिक संकटों के बीच उतारा जा रहा है, जहां पहले से मौजूद किसी दूसरे मजदूर तबके को हटा दिया गया है, बाहर कर दिया गया है या राजनीतिक तौर पर असुविधाजनक मान लिया गया है.
मई 2023 में भारत और इजराइल के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत निर्माण और नर्सिंग क्षेत्रों में 42,000 तक भारतीय मजदूरों को भेजने का रास्ता खोला गया. अक्टूबर 2023 के बाद, जब फिलिस्तीनी मजदूरों को इजराइल के लेबर मार्केट के बड़े हिस्से से बाहर कर दिया गया, तब भारतीयों की भर्ती का काम अचानक बहुत तेज हो गया. इससे इस पूरे मामले का राजनीतिक मतलब ही बदल गया. इस तरह दोनों देशों के बीच श्रम प्रवासन का समझौता व्यवहार में उस मजदूर तबके की जगह लेने का जरिया बन गया जिसे उसकी जमीन और रोजगार से बेदखल किया जा चुका था. उसकी जगह ऐसे समाज से मजदूर लाए गए, जो खुद पहले से ही भयंकर असुरक्षा और तंगहाली झेल रहा है.
2024 में ऐसे कई मामले सामने आए, जिनमें भारतीय युवकों को रूस में नागरिक नौकरियों या विश्वविद्यालयों में दाखिले का झांसा देकर बुलाया गया, लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन्हें यूक्रेन के खिलाफ जंग में लड़ने के लिए रूसी सेना में धकेल दिया गया. भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, कम-से-कम 35 लोगों को ऐसे नेटवर्कों के जरिये भेजा गया. इनमें कई मारे गए और बाद में भारत सरकार ने स्वीकार किया कि इस युद्ध में उसके चार नागरिकों की मौत हुई. परिवारों ने बताया कि उन्हें धोखे से फंसाया गया, उनके दस्तावेज छीन लिए गए और लंबे समय तक उनका अपने घरवालों से कोई संपर्क नहीं हो पाया.
खाड़ी के देशों में कफाला जैसी स्पाॅन्सरशिप व्यवस्था के तहत किसी मजदूर की कानूनी हैसियत पूरी तरह उसके मालिक से बंधी होती है. इससे मजदूरों की आवाजाही और कानूनी इंसाफ पाने की संभावना बेहद सीमित हो जाती है. दशकों से इस व्यवस्था ने खाड़ी की अर्थव्यवस्थाओं को बड़े पैमाने पर सस्ता श्रम हासिल करने और उसका शोषण करने की छूट दी है, जबकि नागरिकों और प्रवासी मजदूरों के बीच गहरी असमानता बनाए रखी गई है. भारतीय मजदूरों, खासकर पहले से ही हाशिये पर पड़े समुदायों के लिए, खाड़ी के देश भारत की जाति आधारित श्रम व्यवस्था से मुक्ति नहीं देते. वे उसी व्यवस्था का अंतरराष्ट्रीय विस्तार हैं, जहां सिर्फ कानूनी ढांचा बदल जाता है, लेकिन इंसानों को खपाऊ समझने का सामाजिक तर्क वही बना रहता है.
ब्रिटेन में ब्रेक्जिट के बाद सोशल केयर सेक्टर में लगभग 1,65,000 रिक्तियां पैदा हो गईं. सरकार ने केयर वर्कर वीजा के जरिये विदेशी मजदूरों की भर्ती बढ़ाई, लेकिन उन्हें प्रायोजक नियोक्ताओं से इस तरह बांध दिया कि शोषण करना पहले से कहीं आसान हो गया. खुद ब्रिटिश सरकार के अनुसार, 2022 से अब तक 470 से ज्यादा केयर सेवा प्रदाताओं के लाइसेंस निलंबित किए जा चुके हैं, जिससे 28,000 मजदूर रोजगार से वंचित हो गए.
ब्रिटेन की राजनीति में पहले तो इन शोषित केयर वर्कर्स की बड़ी तारीफ हुई और उन्हें बहुत जरूरी बताया गया, लेकिन बाद में उन्हीं के बहाने माइग्रेशन के नियमों को और सख्त करने की वकालत की जाने लगी. यह बात बिल्कुल भुला दी गई कि कंपनियों ने इन मजदूरों का फायदा उठाया, पूरा वीजा सिस्टम ही ऐसा था कि मजदूर उनके रहमोकरम पर रहें और इस पूरे सोशल केयर सेक्टर में हमेशा से बहुत कम पैसा दिया जाता रहा. न्यू-लिबरल माइग्रेशन पाॅलिसी के तहत कामकाजी मजदूरों को सिर्फ इस्तेमाल की वस्तु समझने का तरीका यही है: पहले भर्ती करो, फिर बांधकर रखो, जमकर शोषण करो और बाद में कचरे की तरह फेंक दो.
अधीनता और प्रतिरोध
अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था भी इस पूरी प्रक्रिया को और गहरा करती है. 2025 में हुए भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते की मजदूर संगठनों ने इसलिए आलोचना की क्योंकि उसमें मजदूरों के अधिकारों से जुड़े प्रावधान बेहद कमजोर थे. यूरोपीय ट्रेड यूनियन काॅन्फेडरेशन ने चेतावनी दी कि ऐसे समझौतों में मजदूर अधिकारों की भाषा अक्सर केवल दिखावटी होती है. वह लागू कराए जा सकने वाले अधिकारों की बजाय महज एक आदर्शवादी घोषणा बनकर रह जाती है. इसके उलट, शुल्क, बाजार तक पहुंच और बौद्धिक संपदा जैसे मुद्दों पर समझौते पूरी तरह बाध्यकारी होते हैं.
भारतीय प्रवासी मजदूरों पर होने वाली वैश्विक बहस में लगभग कभी जाति का जिक्र नहीं किया जाता. यही सबसे बड़ी चुप्पी है. इजराइल के निर्माण स्थलों पर भेजे गए मजदूर, युद्ध के मुहाने पर धकेले गए गए मजदूर, खाड़ी देशों के बंधक बनाने वाले नियमों के तहत करने वाले मेहनतकश, या ब्रिटेन के केयर सेक्टर में खपाए गए मजदूर किसी अलग दुनिया से नहीं आए हैं. इनमें बड़ी संख्या उन समुदायों की है जिनके लिए जातिगत भेदभाव, भूमिहीनता, अपमान और और आर्थिक तंगी झेलना रोज का काम है.
मालिकों की नजर में ऐसी मेहनतकश आबादी, जिसे गहरी गैर-आजादी की परिस्थितियों में जीने की आदत डाल दी गई हो, ‘लचीली’, ‘सहनशील’ और ‘सस्ती’ श्रमशक्ति बन जाती है. इस नजरिए से देखें तो भारतीय मजदूरों का बाहर जाना सिर्फ माइग्रेशन की कहानी नहीं है. यह उस प्रक्रिया की कहानी है, जिसमें जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था को वैश्विक पूंजी के लिए आर्थिक मूल्य में बदल दिया जाता है.
लेकिन यह कहानी सिर्फ अधीनता की नहीं, प्रतिरोध की भी है. नोएडा और दूसरे औद्योगिक इलाकों में हाल के वर्षों में हुए मजदूर आंदोलनों ने दिखाया है कि बढ़ती असुरक्षा, मालिकों के दमन और श्रम अधिकारों के लगातार क्षरण के बावजूद मजदूर लड़ना नहीं छोड़ते. कई जगह उन्होंने औपचारिक ट्रेड यूनियनों के समर्थन के बिना भी संघर्ष खड़ा किया.
भारतीय राज्य भी इस पूरी व्यवस्था से फायदा उठाता है. उसे प्रवासी मजदूरों द्वारा भेजी गई रकम (रेमिटेंस) से लाभ मिलता है, जबकि विदेशों में उन्हें अधूरी सुरक्षा मिलती है और देश के भीतर भी उनके अधिकार लगातार कमजोर किए जाते हैं. नए लेबर कोड, ग्रामीण रोजगार कानून में बदलाव और ऐसे व्यापार समझौते जिनमें मजदूर अधिकारों के प्रावधान कमजोर हैं – ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं. ये सब एक ही नवउदारवादी राजनीतिक अर्थव्यवस्था के हिस्से हैं, जिसने तय कर लिया है कि कुछ इंसानों को आसानी से खपाया और फेंका जा सकता है.
जब तक हम जाति आधारित आर्थिक पदानुक्रम को केवल दक्षिण एशिया की सांस्कृतिक विरासत मानने के बजाय अंतरराष्ट्रीय श्रम अधिकारों का केंद्रीय सवाल नहीं बनाएंगे, तब तक यह सिलसिला नहीं रुकेगा. खपाऊ मजदूरों की यह अंतहीन आपूर्ति और उनका वैश्विक शोषण यूं ही जारी रहेगा.
https:èkèkjacobin.comèk2026èk07èkindia-caste-migrant-labor-exploitationèkIndian Workers Are on the Front Line of Global Exploitation, Jacobin,10 July 2026