-- मनमोहन
मानवता आज ऐसे दौर से गुजर रही है, जब साम्राज्यवाद बेलगाम होकर पूरी दुनिया में तबाही मचा रहा है. फिलिस्तीन में जारी सरेआम जनसंहार से लेकर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ अपहरण और तख्तापलट की साजिशों तक, अब इसकी अगली निगाह पहले से ही संकटों से जूझ रहे ईरान पर टिकी है. दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों की मार झेल रहे और बार-बार सैन्य आक्रमणों का सामना कर चुके ईरान ने इस बार खुलकर डटकर खड़े होने का फैसला किया है और साम्राज्यवादी दबदबे के आगे झुकने से इनकार कर दिया है.
ईरान में विद्रोह
ईरानी जनता आज दो पाटों के बीच पिसने को मजबूर है. एक तरफ पश्चिमी साम्राज्यवाद का वह धड़ा है जो इजरायल के साथ मिलकर ‘मानवीय हस्तक्षेप’ का ढोंग रच रहा है. इनके आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य धमकियों का मकसद ईरान में केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि उसका ‘लीबियाकरण’ करना है. यह ईरान की राष्ट्रीय संप्रभुता को कुचलकर उसे एक अंतहीन गृहयुद्ध की आग में झोंकने की सोची-समझी साजिश है.
दूसरी तरफ, ईरान की आंतरिक सत्ता तानाशाही और नवउदारवाद के एक आत्मघाती मेल में बदल चुकी है. यह शासन अपने ही नागरिकों के खिलाफ ‘आर्थिक युद्ध’ छेड़े हुए है. जनकल्याण और शांति को ताक पर रखकर, यह राज्य अपनी जनता पर ‘शॉक थेरेपी’ के तहत कठोर आर्थिक नीतियां थोप रहा है. आज ईरान की जनता दोहरी मार झेल रही है : बाहर से विदेशी साम्राज्यवादी गिद्ध मंडरा रहे हैं, तो अंदर से अधिनायकवादी तंत्र उनका लहू पी रहा है.
अमेरिका के दबाव में संयुक्त राष्ट्र के जरिए लगाए गए ताजा प्रतिबंधों और अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के बोझ ने ईरानी अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला है और जनता को तंगहाली में पहुंचा दिया है. फाइनेंशियल टाइम्स ने इस हालात का सटीक सार पेश किया : ‘ईरान की मुद्रा राख में बदल गई है और अर्थव्यवस्था अंधेरे में डूब चुकी है.’
ईरान में प्रदर्शनों के दौरान होने वाली मौतों को लेकर जो आंकड़े पेश किए जा रहे हैं, उनमें भारी विसंगति है – यह संख्या 2,000 से लेकर 20,000 तक बताई जा रही है. साफ तौर पर ये दावे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं. इन आंकड़ों का मुख्य स्रोत अमेरिका में बैठे संगठन और पश्चिमी मानवाधिकार संस्थान हैं, जिनके दावों को मुख्यधारा की मीडिया ने बिना किसी जांच-परख या सवाल के आंख मूंदकर दोहराया है. फिर भी इतना साफ है कि ईरान के भीतर विरोध प्रदर्शनों का एक नया दौर सामने आया है, जो अब धीरे-धीरे शांत होता दिख रहा है. इस तथ्य को अयातुल्ला अली खमेनेई ने भी 11 जनवरी को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते हुए तीन दिन के राजकीय शोक का ऐलान किया.
कुल मिलाकर, विरोध प्रदर्शनों का यह नया दौर एक ही समय में वास्तविक भी है और भारी पैमाने पर अमेरिकी-इस्राइली धुरी के हेरफेर का शिकार भी. ईरानी जनता को अपनी कठोर और असहनीय आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितियों के खिलाफ आवाज उठाने का पूरा हक है. गरीब तबका और सिकुड़ता मध्यवर्ग भीषण कठिनाइयों से गुजर रहा है, जबकि कामगार वर्ग लगातार बढ़ती वंचना के बोझ तले टूट रहा है. यह दशकों से चले आ रहे नवउदारवादी प्रोजेक्ट – निजीकरण, सब्सिडी में कटौती, श्रम लचीलेकरण – का सीधा परिणाम है. 90» से अधिक श्रमिक अस्थायी अनुबंधों पर हैं, महंगाई 50% से अधिक है, और करीब 40» आबादी गरीबी रेखा से नीचे जी रही है.
प्रोपगंडा और साम्राज्यवाद
ईरान के इस संकट को बड़े पैमाने पर अमेरिका और इस्राइल ने जानबूझकर भड़काया है, जिसका मकसद फिलिस्तीनियों के खिलाफ जारी जनसंहार से वैश्विक ध्यान हटाना है. इजरायल का हिसाब-किताब साफ है : जितनी ज्यादा क्षेत्रीय अराजकता पैदा की जाएगी, दुनिया उतनी ही तेजी से गाजा के जनसंहार को भूलकर आगे बढ़ जाएगी.
दूसरा अहम मकसद ईरान को छोटे-छोटे जातीय राज्यों में विघटन करना है. यह वही रणनीति है, जो इस्राइल पहले लेबनान और सीरिया के लिए आजमाता रहा है. तेल अवीव पूरे पश्चिम एशिया को एक गैरीसन राज्य की छवि में ढालना चाहता है.
मौजूदा विरोध प्रदर्शन 2022 के ‘जिन, जियान, आजादी’ विद्रोह के पैमाने और प्रामाणिकता तक नहीं पहुंचे हैं. वर्तमान आंदोलन असाधारण रूप से हिंसक हैं और इन्हें महिलाओं की अगुवाई में नहीं चलाया जा रहा. महसा अमीनी के बाद उभरा आंदोलन शायद आधुनिक ईरानी इतिहास का सबसे प्रामाणिक जनविद्रोह था.
इसके उलट, ताजा विरोध प्रदर्शनों को मोसाद एजेंटों और बाहरी उकसावे ने गहराई से दूषित किया है. मस्जिदों में आगजनी जैसी कार्रवाइयों का मकसद जानबूझकर भावनाएं भड़काना है. इन प्रदर्शनों में विदेशी दखल की बात केवल अनुमान नहीं है. इसे अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व निदेशक माइक पोम्पियो ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है, और ‘जेरूसलम पोस्ट’ तथा इस्राइल के संस्कृति मंत्री अमीचाई एलियाहू ने भी पुष्टि की है. इसी बीच, बीबीसी और वॉल स्ट्रीट जर्नल जैसे पश्चिमी मीडिया जायोनी एजेंडे के तहत पहलवी को एक ‘लोकप्रिय विकल्प’ के रूप में गढ़ने में लगे हैं.
जून में हुए अमेरिकी-इस्राइली हमलों के बाद – जिनमें ईरान की परमाणु सुविधाओं के साथ-साथ नागरिक ठिकानों को भी निशाना बनाया गया – यह लगभग तय है कि ईरानी राज्य इन विरोध प्रदर्शनों पर सख्ती से कार्रवाई करेगा.
यह विद्रोह वास्तविक और वैध सामाजिक-आर्थिक कारणों से शुरू हुआ था, लेकिन इस्राइल इसे हाईजैक करने की कोशिश कर रहा है. जिस तरह उसने फिलिस्तीन पर कब्जा और जनसंहार अंजाम दिया, उसी तरह अब वह किसी दूसरे देश के सामाजिक विद्रोह को हथियाने की कोशिश में है.
यहां हिंसा की प्रकृति पर कोई अंतिम फैसला सुनाने से पहले हर पहलू को सावधानी से समझना जरूरी है. दमनकारी की हिंसा और दमित की हिंसा एक जैसी नहीं होती. वैश्विक दक्षिण के कई देशों में सरकारों ने जिस हिंसा का सामना किया है, वह साम्राज्यवाद द्वारा समर्थित विपक्षी ताकतों से आई है. इराक में सद्दाम हुसैन, लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी और सीरिया में बशर अल-असद के खिलाफ किए गए सत्ता-परिवर्तन इसके उदाहरण हैं.
क्रांति का मतलब मूलतः वर्ग-सत्ता में बदलाव होता है. क्रांतियां सिर्फ वामपंथ से ही नहीं होतीं – दक्षिणपंथी क्रांतियां भी इतिहास का हिस्सा रही हैं. ईरानी क्रांति शुरू से ही किसी जनवादी-वामपंथी आंदोलन का विस्तार नहीं थी, बल्कि वह मूलतः एक दक्षिणपंथी क्रांति थी.
ऐतिहासिक संदर्भ और आगे का रास्ता
ऐतिहासिक रूप से इसका रास्ता 1950 के दशक में ही साफ कर दिया गया था. उस दौर में कम्युनिस्ट वामपंथ और केंद्र-वाम के उदार राष्ट्रवादी पूँजीवादी विपक्ष-दोनों को ही ईरानी सुरक्षा एजेंसी सावक और सीआईए के संयुक्त दमन के जरिए लगभग पूरी तरह कुचल दिया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि राजशाही-विरोधी संघर्ष अब वामपंथ के नेतृत्व में आगे नहीं बढ़ सकता था. इसी खघली जगह में इस्लामी धर्मगुरुओं ने प्रवेश किया और आंदोलन पर कब्जा जमाने में कामयाब रहे.
विद्रोहों के पीछे आर्थिक कारक हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते हैं. पश्चिमी मीडिया जिन ताजा प्रतिबंधों पर चुप्पी साधे हुए है, उन्होंने पहले से मंदी में फंसी ईरानी अर्थव्यवस्था को और जर्जर कर दिया है. ईरानी रियाल की तेज गिरावट ने उस सच को उजागर किया है कि साम्राज्यवाद के तहत परिधीय अर्थव्यवस्थाएं ‘असमान विनिमय’ और ‘अतिशोषण’ का शिकार होती हैं.
प्रदर्शनकारियों की वर्गीय संरचना पर नजर डालें, तो इसमें व्यापारियों, छोटे पूंजीपतियों और लम्पट सर्वहारा तबकों का वर्चस्व साफ दिखाई देता है. ईरान एक पूंजीवादी गणराज्य है – जो अपने मूल आर्थिक ढांचे में अमेरिका या किसी भी यूरोपीय देश से अलग नहीं है. यहां भी वही बुनियादी बीमारियां मौजूद हैं : भ्रष्टाचार, गहराता वर्ग विभाजन और पूंजीपतियों के हितों का प्रभुत्व.
खोमैनी का ईरान में सत्तासीन होना उन दुर्लभ अवसरों में से एक था, जब क्रांति और प्रतिक्रांति एक ही क्षण में एक साथ मौजूद थीं. यह मध्य पूर्व में वामपंथ की समाप्ति और पूरे क्षेत्र में इस्लामी कट्टठ्ठरपंथ की विचारधारा के उदय का प्रतीक था. समाजवाद का पतन, जो अफगानिस्तान से शुरू हुआ, धीरे-धीरे सोवियत संघ और कोमेकॉन देशों के पतन तक पहुंचा.
ईरान के शाह ने समाजवाद के लिए आवश्यक भौतिक आधार और सांस्कृतिक विरासत को ही नष्ट कर दिया था. सीआईए और एमआई-6 द्वारा प्रधानमंत्री मोसद्देग के खिलाफ तख्तापलट के बाद, ईरान व्यावहारिक रूप से ‘उपनिवेश’ बन गया.
औद्योगिकीकरण की कमी और आर्थिक आधार की कमजोरी ने क्रांति के रास्ते को किसानों और छोटे व्यापारियों के हाथों हाईजैक करवा दिया. नतीजा यह हुआ कि वहां की वामपंथी तूदेह पार्टी के बजाय अयातुल्लाओं का शासन स्थापित हुआ. फिर भी, ईरानी पूंजीपति वर्ग अमेरिका को संतुष्ट करने में विफल रहा. परिणामस्वरूप, ईरान को सद्दाम हुसैन के इराक के खिलाफ दशक लंबा युद्ध झेलना पड़ा और लगातार दम घोंटू अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच जीवित रहना पड़ा.
प्रतिबंधों के बावजूद, ईरान अपने सैन्य-औद्योगिक परिसर के निर्माण में सफल रहा और बारह-दिवसीय युद्ध में इस्राइली हमले को करारा झटका दिया. अमेरिकी-इस्राइली गठजोड़ ईरान को केवल रोकना नहीं चाहता; वह इसे अखंड इस्राइल के खिलाफ आखिरी किले के रूप में देखता है. आधुनिक ‘अखंड इस्राइल’ की अवधारणा बाइबिल में वर्णित मिथकीय भूमि पर आधारित है, लेकिन यह आधुनिक सभ्यता और भू-राजनीतिक हकीकत के बिल्कुल विपरीत है. इस्राइल राज्य पूरी तरह फिलिस्तीनी भूमि की लूट पर टिका है. इसी आधार पर अमेरिकी-इस्राइली गठजोड़ ईरान के विभाजन की योजना में जुटा है.
जिस तरह ईरानी धार्मिक नेताओं ने कम्युनिस्ट पार्टी को कुचला और उसके नेताओं को समाजवाद त्यागने के लिए मजबूर किया, वह वास्तव में भयानक था. कोई भी सामाजिक व्यवस्था तब तक समाप्त नहीं होती जब तक कि उसके भीतर उत्पादक शक्तियों के विकास की सभी संभावनाएं समाप्त न हो जाएं.
ईरानी विद्रोह पर लेफ्ट-लिबरल के खेमे में जो उत्साह देखा जा रहा है, वह लेनिन द्वारा वर्णित एक तरह के बचकानेपन का संकेत है. फैलते साम्राज्यवाद और वामपंथ की अनुपस्थिति के बीच भी, वामपंथ का यह हिस्सा किसी तरह के बदलाव की कामना करता है और अपनी निराशा को उतनी ही तीव्रता से प्रकट करता है जितना अति-दक्षिणपंथी करता है. मार्क्स ने The German Ideology में लिखा था : “हम दुनिया के सामने एक नए सिद्धांत के साथ सिद्धांतवादी के रूप में पेश नहीं होते; यहां सच्चाई है. घुटनों के बल नीचे झुको; हम दुनिया से यह नहीं कहते कि अपना संघर्ष बंद करो; वे व्यर्थ हैं, हम तुम्हें असली मार्गदर्शन देंगे. हम केवल यह दिखाते हैं कि लोग क्यों संघर्ष कर रहे हैं, और खुद को जानना कुछ ऐसा है जो दुनिया को हासिल करना चाहिए, भले ही वह न चाहे.”
यही समझ हम उस नाजुक मोड़ पर ईरानी सरकार के विरोधियों के साथ साझा करना चाहते हैं. लेफ्ट-लिबरल ईरान के ‘मुल्लाओं’ को खारिज कर रहे हैं, लेकिन यहूदी धर्म के नाम पर बनाए गए रंगभेद वाले, बिना सीमा वाले राज्य को देखने से इनकार कर रहे हैं. वे अंधे या भोले नहीं हैं, लेकिन उनका पाखंड साफ नजर आता है – और इसे पहचानना भी जरूरी है. आज ईरान के लिए बड़ी चीज दांव पर लगी है – देश की संप्रभुता, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता.
ईरानी वामपंथ के सामने ऐतिहासिक चुनौती
अब तक इस अवसर का उपयोग तानाशाही के खिलाफ एकजुट संघर्ष को संगठित करने में नहीं हो पाया. फिर भी, वर्तमान संकट में तरक्कीपसंद वाम और राष्ट्रवादी ताकतों के बीच संवाद के लिए एक साझा कार्यक्रम तैयार किया जा सकता है, जिसे जनता के सामने रखा जा सके. अफसोस की बात है कि आज ईरान के भीतर और बाहर सक्रिय वामपंथी ताकतों के पास संघर्ष का केवल एक ही साझा एजेंडा हो सकता है : साम्राज्यवादी युद्ध, तानाशाही नवउदारवादी ईरानी सत्ता और फासीवादी दक्षिणपंथ के खिलाफ एक साथ मोर्चा खोलना. यह रास्ता बेहद कठिन है, लेकिन सच्चाई यही है.
त्रासदी यह है कि आज ईरान में इस वर्ग-संघर्ष को नेतृत्व देने के लिए किसी संगठित और मजबूत वामपंथी ताकत का अभाव है. वामपंथ और श्रमिक आंदोलनों के कुचले जाने से पैदा सांगठनिक शून्य का फायदा उठाकर फासीवादी दक्षिणपंथी ताकतें जनता की हताशा का इस्तेमाल अपने पक्ष में कर रही हैं. जब तक इस सांगठनिक क्षमता का निर्माण नहीं होता, तब तक ईरान का भविष्य दो ही विनाशकारी रास्तों के बीच झूलता रहेगा – या तो चिली के पिनोशे जैसा दमनकारी नवउदारवादी सैन्य राज्य, या फिर नाटो द्वारा तबाह किया गया लीबिया जैसा खंडहर.
इस वैकल्पिक ताकत को खड़ा करना ही आज के समय का सबसे अनिवार्य कार्य है. इस समय ईरान की जनता के साथ खड़े होकर, हमें सुनिश्चित करना होगा कि अमेरिकी-इस्राइली धुरी से परे यह जनसंघर्ष एक ठोस, लोकतांत्रिक और सशक्त राष्ट्रीय आंदोलन में तब्दील हो.