जब जून में पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, तो जंतर-मंतर सिर्फ एक जगह थी. 20 जुलाई को संसद मार्च और उसके बाद 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के पश्चात जंतर-मंतर भारत में लोगों के प्रतिवाद प्रदर्शनों के एक नए दौर का प्रतीक बन गया है. कहने की जरूरत नहीं है कि जंतर-मंतर की घटना बिल्कुल अकस्मात नहीं हो गई. इसे मोदी सरकार के दौर में हुए हर पिछले लोकप्रिय प्रतिवादों की ऊर्जा और अनुभव से बल मिला – रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या के बाद हुए छात्र प्रतिवादों से लेकर हाल ही में नोएडा-मानेसर में मजदूरों के वेतन वृद्धि के संघर्ष तक, और इनके बीच निश्चय ही शाहीन बाग में समान नागरिकता का अभूतपूर्व आंदोलन, दिल्ली की सीमाओं पर ऐतिहासिक किसान आंदोलन और जंतर-मंतर पर महिला पहलवानों का आंदोलन भी शामिल हैं.
इन पिछले संघर्षों से मिले सबक के साथ और अभूतपूर्व पैमाने व तीव्रता वाले युवा आक्रोश से प्रेरित इस ‘जेन-जी’ प्रतिवाद ने मोदी सरकार को अचानक से चौंका दिया. मोदी-शाह सरकार का प्रतिवादों को कुचलने का आजमाया हुआ और भरोसेमंद नुस्खा पूरी तरह नाकाम साबित हुआ और आंदोलन की स्वाभाविक ताकत व मजबूती, चालाकी और हिंसा के खतरनाक गठजोड़ पर भारी पड़ी. अपनी साख और प्राधिकार को स्पष्ट रूप से खो देने के बाद सरकार अब राज्य दमन और मीडिया ट्रायल के जरिए आंदोलन को दबाने की पुरजोर कोशिश कर रही है. सभी प्रदर्शनकारियों के लिए आम माफी पर सहमत होने के बावजूद बिहार, पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों की सरकारों ने बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में लेना शुरू कर दिया. हालांकि हिरासत में लिए गए ज्यादातर प्रदर्शनकारियों को रिहा कर दिया गया है, लेकिन दूसरे तरीकों से निशाना बनाकर उन्हें डराना-धमकाना जारी है.
दमन के अलावा मोदी सरकार हर आंदोलन के खिलाफ विमर्श की लड़ाई के लिए भी विख्यात है. जेनयू के छात्र आंदोलन को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के तौर पर बदनाम करने की कोशिश की गई, सीएए-विरोधी प्रदर्शनों को राष्ट्र-विरोधी कहा गया और किसान आंदोलन को खालिस्तानी साजिश करार दिया गया. जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की भारी संख्या और उनकी विविधता को देखते हुए – जहां अलग-अलग वर्गों, जातियों, समुदायों, संस्कृतियों और पीढ़ियों के लोग एकजुटता और प्रतिरोध के उत्सव में शामिल हुए – मोदी सरकार और उसके गोदी मीडिया के लिए उन्हें एक ही चश्मे से देखना मुश्किल हो गया. जो सरकार कभी भारत के ’डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (जनसांख्यिकीय लाभांश) की बड़ी-बड़ी बातें करती थी, वह अब पूरी पीढ़ी, और खासकर युवा महिला प्रदर्शनकारियों को गुमराह समूह मानकर निशाना बनाती दिख रही है. जाहिरन, सरकार को चिंता है कि जंतर-मंतर आंदोलन आरएसएस की उस सामाजिक-सांस्कृतिक पकड़ और वैचारिक नियंत्रण के लिए खतरा पैदा कर रहा है, जो ‘हिंदू राष्ट्र’ के एजेंडा के लिए केंद्रीय औजार है. मोदी का ‘प्रदर्शनकारियों के प्रति दया’ का दिखावा असल में युवा महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पितृसत्तात्मक प्रतिक्रिया भड़काने की एक अध-छिपी कोशिश है, जिसने महिलाओं को बलात्कार और जान से मारने की धमकियां देने के लिए पहले ही उनके समर्थकों का मन बढ़ा दिया है.
जुलाई 2026 में जंतर-मंतर से पैदा हुई उम्मीद और गूंज-अनुगूंज को हम कैसे आगे बढ़ाएं ? तात्कालिक संदर्भ में, यह आंदोलन पेपर लीक और एनटीए की साबित हो चुकी अक्षमता और भ्रष्टाचार के खिलाफ लक्षित था. केंद्रीकृत परीक्षा प्रणाली और नई शिक्षा नीति (2020) के नीति ढांचे पर भी सवाल उठे हैं. मोदी सरकार ने अब तक जो कदम उठाए हैं, उनमें धर्मेंद्र प्रधान की जगह प्रह्लाद जोशी को लाना, ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम 2024’ में ज्यादा सख्त सजा के प्रावधान जोड़ना और इंफोसिस के चेयरमैन व ‘आधार’ पहचान परियोजना के निर्माता नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स का गठन करना शामिल है.
स्पष्ट है कि सरकार भारत की शिक्षा और परीक्षा प्रणालियों के बढ़ते संकट के लिए जिम्मेदार पांच मुख्य वजहों – केंद्रीकरण, निजीकरण, व्यवसायीकरण, तकनीक पर अतिशय जोर और आरएसएस की विचारधारात्मक जकड़बंदी – में से किसी पर भी ध्यान नहीं देना चाहती. असल में, अगर हम प्रस्तावित वीबीएसए (विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान) बिल पर नजर डालें तो समस्याएं और बढ़ेंगी ही. इसीलिए उच्च शिक्षा और परीक्षा के क्षेत्रों में तुरंत और असरदार सुधारों के लिए आंदोलन को और तेज करना होगा.
अब भारत की स्कूली व्यवस्था की बदहाल स्थिति के खिलाफ बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और उत्तर भारत के दूसरे राज्यों से ‘जेन अल्फा’ (2012 के बाद की पीढ़ी) के प्रतिवादों की बहुत प्रेरणादायक खबरें आ रही हैं. हजारों सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए हैं, स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है, और पर्याप्त मात्रा में शिक्षकों की नियुक्ति तथा पढ़ाने की स्थितियों व शैक्षिक माहौल में सुधार अभी भी बहुत दूर की कौड़ी है. ‘नीति आयोग’ की अपनी रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक दशक में लगभग 94,000 स्कूल बंद हुए हैं – यानी, हर दिन औसतन 25 स्कूल! भारत में लोकतंत्र के भविष्य के लिए इससे ज्यादा दिलासा दिलाने वाली बात और क्या हो सकती है कि युवा भारत सभी के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा की मांग को लेकर जोरदार ढंग से आगे आ रहा है. रोजगार का मुद्दा भी शिक्षा के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है. जंतर-मंतर पर हुए प्रतिरोध-प्रदर्शन में शामिल लोगों का एक बड़ा हिस्सा असल में बेरोजगार नौजवानों या असुरक्षित और बहुत कम वेतन वाली नौकरियों में काम करने वाले लोगों का था. भारत के आर्थिक विकास के किसी भी जरूरी एजेंडे के केंद्र में तथाकथित अर्थव्यवस्था का आकार नहीं, बल्कि शिक्षा का अधिकार, सम्मानजनक व सुरक्षित रोजगार (जिसमें गुजारे लायक वेतन मिले) का अधिकार, सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा और आवास का अधिकार तथा पर्यावरण की सुरक्षा शामिल रहना चाहिए.
जंतर-मंतर पर भारत की जेन-जी पीढ़ी की अभूतपूर्व राजनीतिक जागरूकता और दावेदारी का नजारा दिखा. यह वह पीढ़ी है जो पूरी तरह से मोदी के दौर में बड़ी हुई है, हर बात से बहुत वाकिफ है और मोदी-शाह के विनाशकारी शासन के अपने कड़वे प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर राजनीतिक नतीजे निकाल रही है. यह एक डिजिटल पीढ़ी है जिसने विरोध और असहमति जताने के लिए हास्य और व्यंग्य को अपनी भाषा बनाया है; इसने न केवल गोदी मीडिया की पोल खोली और उसे नकारा, बल्कि अपना वैकल्पिक मीडिया भी खड़ा किया. बार-बार पेपर लीक होने और हर तरफ फैले भ्रष्टाचार ने जंतर-मंतर पर प्रतिरोध की लहर को जन्म दिया, लेकिन युवाओं का यह उभार सिर्फ इन्हीं मुद्दों तक सीमित नहीं रहेगा. असली एजेंडा भारत की शिक्षा व्यवस्था और रोजगार के माहौल में असरदार बदलाव लाना और जवाबदेही के बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांत को लागू करना है. और जवाबदेही की यह कसौटी सभी पर लागू होगी, जैसा कि जेन-जी के लोकप्रिय नारा में कहा गया है – “धर्मेंद्र प्रधान तो झांकी है, मोदी-शाह बाकी हैं” या “पिक्चर अभी बाकी है”. इस बीच, हमने पटना के बांकीपुर उपचुनाव में एक और ट्रेलर देखा, जहां बीजेपी अपनी पारंपरिक सीट हार गई – यह सीट पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन ने हाल ही में खाली की थी, और यहां पार्टी का वोट शेयर नवंबर 2025 में 63% से गिरकर इस उपचुनाव मेेें 33% हो गया!