वर्ष 35 / अंक - 15 / भारत में सामाजिक समता और मुक्ति के सबसे बड़े ध्वजवा...

भारत में सामाजिक समता और मुक्ति के सबसे बड़े ध्वजवाहक - ज्योतिबा फुले

भारत में सामाजिक समता और मुक्ति के सबसे बड़े ध्वजवाहक - ज्योतिबा फुले

(11 अप्रैल, जयंती पर विशेष)


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मूल भावना केवल राजनीतिक आजादी हासिल कर लेने भर की नहीं थी, बल्कि एक ऐसे समाज का निर्माण करना था जहां हर व्यक्ति – जाति, वर्ग, लिंग या धर्म की परवाह किए बिना – सम्मान और समान अधिकार के साथ जी सके. यह विडंबना ही कही जाएगी कि लंबे अर्से तक भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के लिखे इतिहास व विमर्शों में सामाजिक संघर्षों को या तो उचित जगह नहीं मिली अथवा उसे राष्ट्रीय आंदोलन के खिलाफ ही घोषित कर देने की प्रवृत्ति हावी रही. धीरे-धीरे उस संकुचित अवधारणा से भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास बाहर निकल रहा है और अब वह एक नया फलक ग्रहण कर रहा है तथा यह माना जाने लगा है कि इस आंदोलन की कई धाराएं थीं और उसके विभिन्न स्वर थे. उसमें आपसी टकराहटें भी थी, लेकिन सभी धाराएं एक ऐसे भारत के निर्माण के लिए लड़ रही थीं जिसका अक्स देश के संविधान में दिखता है.

आज देश में जिस प्रकार से फासीवाद-ब्राह्मणवाद की ताकतें हावी दिख रही हैं, आजादी के आंदोलन के विभिन्न स्वरों की एकता पिछले किसी भी दौर से ज्यादा समावेशी और दृष्टिसंपन्न हो रही है. यह महसूस किया जा रहा है कि हमें आजादी आंदोलन के दौरान या आजादी के बाद चले सभी प्रकार के संघर्षों का एक नया आख्यान व संश्लेषण तैयार करना होगा. जमींदार विरोधी कोई किसान आंदोलन जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही महत्वपूर्ण ज्योतिबा फुले द्वारा जातीय उत्पीड़न के खिलाफ शुरू किया गया संघर्ष था, उतना ही महत्वपूर्ण फातिमा शेख और सावित्री बाई द्वारा लड़कियों के लिए खोले गए स्कूल थे.

2027, भारत में ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन के अगुआ क्रांतिदूत ज्योतिबा फुले का द्विशताब्दी वर्ष है. अपने संघर्ष भरे जीवन में फुले ने भारतीय समाज की संरचना का गहन विश्लेषण करते हुए बताया था कि यहां की सामाजिक विषमता – विशेषकर जाति व्यवस्था – के कारण बड़ी आबादी सदियों से शोषण और वंचना की शिकार रही है. उनके अनुसार, अगर केवल अंग्रेजों को हटाकर सत्ता भारतीय उच्च वर्गों के हाथ में चली जाए, तो आम जनता की स्थिति में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आएगा. इस प्रकार उन्होंने आजादी की अवधारणा को सामाजिक परिवर्तन से जोड़ने का काम किया था. 1873 में स्थापित सत्यशोधक समाज के माध्यम से उन्होंने समाज के शूद्रों, अतिशूद्रों, किसानों, मजदूरों और महिलाओं को संगठित करने का प्रयास किया. यह संगठन न केवल सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लड़ता था बल्कि आत्मसम्मान, वैज्ञानिक सोच और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी बढ़ावा देता था. उन्होंने शेतजी और भटजी (सुदखोरों और पुरोहितों) द्वारा कामगार तबके के शोषण को उद्घाटित किया और इसकी जड़े ब्राह्मणों द्वारा निचली जातियों को शिक्षा से वंचित करने में तलाशी. इस दृष्टि से यह स्वतंत्रता संग्राम की सामाजिक आधारशिला को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम था.

फुले का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी पहल था. उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले के साथ मिलकर लड़कियों और दलितों के लिए स्कूल खोले. तब जब शिक्षा पर उच्च जातियों का एकाधिकार था, यह कदम सामाजिक क्रांति का सूत्रपात था. उन्होंने शिक्षा को मुक्ति का सबसे बड़ा साधन माना, क्योंकि जागरूक और शिक्षित समाज ही अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर सकता है.

भारत में सामाजिक आंदोलनों का इतिहास क्षेत्रीय विषमता के बावजूद उत्तर से दक्षिण भारत तक दिखाई पड़ता है. जरूर जो ताप दक्षिण भारत में था वह उत्तर भारत में नहीं दिखता. इन आंदोलनों का चरित्र और उसका प्रभाव भी अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग महसूस होता है. कुछेक विचार ऐसे भी हैं जो इन जातिगत आंदोलनों को संस्कृतिकरण की सीमाओं में बांधकर देखने के शिकार रहे हैं. हालांकि, जातियों की गतिशीलता भी अपने आप में एक प्रगतिशील कदम ही कहा जाएगा. लेकिन, इससे परे कई जातिगत विरोधी आंदोलन ऐसे हुए जिन्होंने अन्यायपूर्ण जाति व्यवस्था की चूलें हिला दीं. ज्योतिबा फुले से लेकर पेरियार तक के आंदोलनों में यही तत्व प्रधान दिखते हैं.

एक सोच यह भी हावी रही कि सामाजिक आंदोलन साम्राज्यवादी व्यवस्था की तरफदारी करने में लगे रहे. लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है. ऐसा नहीं था कि फुले या अंबेडकर साम्राज्यवादी ताकतों यानी अंग्रेजों की हकीकत नहीं समझते थे. एक तो उनकी प्राथमिकताएं दूसरी थीं, बावजूद वे अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे सुधारों की सीमाओं को साफ-साफ समझते थे. सत्य के करीब यह तथ्य है कि जाति विरोधी आंदोलनों और विशेषकर दलित आंदोलनों ने अंग्रेजी शासन के सकारात्मक पक्ष को स्वीकार करते हुए राष्ट्रवादी नेतृत्व के साथ अपने अंतर्विरोधों के मद्देनजर सामाजिक सुधार और सत्ता में निचले तबकों की भागीदारी व हिस्सेदारी के लिए दबाव बनाया. लेकिन उन्हें इसका पूरा एहसास था कि इनका भी हित साम्राज्यवादी शासन के समाप्त होने में ही है.

ज्योतिबा फुले ने किसानों और श्रमिकों की स्थिति को जाति विरोधी आंदोलनों से अलग करके नहीं देखा, बल्कि उनकी रचनाओं में साहूकारों का शोषण खुलकर सामने आता है. अपनी रचना ‘शेतकर्याचा असूड’ (किसान का कोड़ा) में उन्होंने किसानों के आर्थिक शोषण और प्रशासनिक अन्याय को उजागर किया. इस तरह उन्होंने जाति आधारित अन्याय को आर्थिक न्याय और वर्गीय शोषण के प्रश्नों से जोड़ा, जिससे यह संघर्ष और अधिक व्यापक और समावेशी बन सका. महाराष्ट्र के सतारा किसान आंदोलन की सरजमीं फुले के संघर्षों से ही निर्मित हुई. बाद के दिनों में महाराष्ट्र में कांग्रेस और गांधी जी ने जो राजनीतिक जमीन हासिल की उसकी पृष्ठभूमि भी फुले और उनके जैसे सामाजिक सुधारकों ने ही तैयार की थी. फुले के ही शिष्य लोखंडे ने मजदूरों को संगठित करने की शुरूआत की. केरल में एझवा आंदालन ने व्यापक सामाजिक बदलाव की आधारशिला रखी. उसी आधार पर सीपीएम लंबे समय से केरल में टिकी हुई है. पेरियार के आंदोलनों की धमक इतनी मजबूत रही है कि तमिलनाडु में आज भी भाजपा को कोई खास जगह नहीं मिल सकी है. बिहार में भी किसान सभा आंदोलन के साथ-साथ त्रिवेणी संघ ने बदलाव का एक बड़ा फलक तैयार करने में भूमिका निभाई. त्रिवेणी संघ का ऊपरी हिस्सा भले कांग्रेस के साथ एकात्म हो गया हो, लेकिन उससे प्रभावित जनता आरडीपी की तरफ गई. भोजपुर आरडीपी का गढ़ बना और वह 70 के दशक में भाकपा(माले) के नेतृत्व में चले मूलगामी संघर्षों की आधारशिला बनी.

फुले के विचारों का प्रभाव बाद के अनेक नेताओं और आंदोलनों पर पड़ा. अंबेडकर उनसे बेहद प्रभावित थे. उन्होंने सामाजिक न्याय, समानता और संवैधानिक अधिकारों के लिए जो संघर्ष किया, उसमें फुले की वैचारिक विरासत स्पष्ट रूप से दिखाई देती है.

इस प्रकार, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक वैचारिक क्रांतिकारी, सामाजिक सुधारक और समावेशी दृष्टिकोण के प्रवर्तक के रूप में ज्योतिबा फुले अत्यंत महत्वपूर्ण है. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि सच्ची आजादी केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक समानता के बिना अधूरी है. उनकी दृष्टि ने स्वतंत्रता संग्राम को एक नई गहराई और व्यापकता प्रदान की – जहां आजादी का अर्थ हर व्यक्ति की गरिमा, अधिकार और समान अवसर सुनिश्चित करना है.

आज जब देश में समाज से लेकर कैंपसों में दलितों-पिछड़े समुदाय के बच्चों से अत्याचार हो रहा है, उसके खिलाफ समता की मांग करने पर खुलेआम ‘ब्राह्मणवाद जिंदाबाद’ के नारे लगाए जा रहे हैं, ज्योतिबा फुले के विचार और अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं. ब्राह्मणवादी सोच के रूप में असमानता, जातिवाद और भेदभाव आज भी बदस्तुर जारी है. फुले का संदेश हमें सचेत करता है कि बिना शिक्षा और जागरूकता के मुक्ति संभव नहीं. भाजपा और संघ आज पूरी शिक्षा व्यवस्था को ही नष्ट करने पर तुली हुई है.

भाजपा-आरएसएस के ब्राह्मणवादी-कॉरपोरेटपरस्त उभार के इस दौर में फुले द्वारा सामाजिक और वैचारिक स्तर पर किए गए काम आगे की लड़ाई का रास्ता दिखलाती है. वे सामाजिक समता और मुक्ति के सबसे बड़े ध्वजवाहक हैं.


11 April, 2026