वर्ष 35 / अंक - 14 / कामरेड सुखदेव भागोकांवा एक आदर्श कम्युनिस्ट थे

कामरेड सुखदेव भागोकांवा एक आदर्श कम्युनिस्ट थे

कामरेड सुखदेव भागोकांवा एक आदर्श कम्युनिस्ट थे

-- गुरमीत सिंह बख्तपुरा

27 मार्च 2026 को सैकड़ों लोगों ने भाकपा(माले) वरिष्ठ नेता कामरेड सुखदेव भागोकांवा को लाल झंडे के साथ उनके पैतृक गांव (पंजाब के गुरदासपुर जिले के भागोकांवा) में अंतिम विदाई दी. 25 मार्च को कुछ दिन बीमार रहने के बाद अचानक उनका निधन हो गया था. क्षेत्र में पिछले पांच दशकों से जन संघर्षों और कम्युनिस्ट विचारधारा के लिए समर्पित कामरेड भागोकांवा पंजाब के माझा क्षेत्र और हमारी पार्टी में काफी लोकप्रिय थे.

उनकी इस अंतिम यात्रा में भाकपा(माले) के पंजाब प्रभारी पुरुषोत्तम शर्मा, राज्य सचिव गुरमीत बख्तपुरा, केन्द्रीय कमेटी सदस्य कंवलजीत सिंह, अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रूलदू सिंह, पार्टी के राज्य प्रवक्ता सुखदर्शन नत्त, पंजाब किसान यूनियन के महासचिव गुरनाम सिंह भिखी, राज्य कमेटी सदस्य गुलजार, बलबीर सिंह झामका, बलबीर सिंह मुध्ल, अश्विनी कुमार, विजय सोहल, भाकपा(माले) के होशियारपुर जिला सचिव अशोक महाजन सहित कई नेताओं-कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया.

भाकपा(माले) न्यू डेमोक्रेसी, आरएमपीआई व भाकपा से जुड़े स्थानीय नेताओं सहित अन्य राजनीतिक, सामाजिक और किसान संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं के साथ आम ग्रामीणों ने भी उन्हें अंतिम विदाई दी.

सुखदेव सिंह का जन्म वर्ष 1953 में पंजाब प्रांत की गुरदासपुर तहसील के भागोकांवा गांव में एक गैर-राजनीतिक और बहुत ही साधारण किसान परिवार में हुआ था. गांव के नाम की वजह से उनका नाम सुखदेव सिंह भागोकांवा पड़ गया. वह अपने पांच भाइयों और दो बहनों में बड़े भाई थे. पूरे परिवार ने कभी उनके मुश्किल कम्युनिस्ट रास्ते का विरोध नहीं किया. सुखदेव ने अपनी प्राथमिक शिक्षा अपने गांव के गुरुद्वारे में चल रहे प्राइमरी स्कूल से और दसवीं तक की पढ़ाई 4 किलोमीटर दूर स्थित कस्बे बहरामपुर के सरकारी हाई स्कूल से की. गणित में उनकी खास रूचि थी. आगे की पढ़ाई के लिए गुरदासपुर के गुरु नानक कॉलेज में दाखिला लिया. 1977-78 में जब वे बीए पूरा करने ही वाले थे कि उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी और मार्क्सवाद का अध्ययन में जी लगाया. यह उनके जीवन का एक अहम मोड़ साबित हुआ, जिसने उनके निजी सपनों को समाज से जोड़ दिया और क्रांति के लिए समर्पित जीवन का मार्ग प्रशस्त किया. वे आजीवन कम्युनिस्ट बने रहे.

कामरेड सुखदेव ने मार्क्सवादी विचारधारा का विद्यार्थी बनने की शुरूआत में ही यह जान लिया था कि मानव जीवन सिर्फ अपने लिए या पैसे-दौलत की अंतहीन दौड़ लगाने भर के लिए नहीं है, बल्कि समाज के हित में कुछ कार्य करने के लिए है. उस समय देश और पंजाब की राजनीति में नक्सलवादी आंदोलन और उसका नेतृत्व कर रही भाकपा(माले) की चर्चा जोरों पर थी. वे बहुत जल्द ही भाकपा(माले) से जुड़ गए. इसी दौरान उन्होंने कार्ल मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और माओत्से तुंग की रचनाओं का गहन अध्ययन किया, इस विचारधारा के प्रभावशाली व सच्चे शिक्षकों को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया और छात्रों, युवाओं व मेहनतकश किसानों को संगठित करना शुरू कर दिया. बिना थके और बिना रुके वे इस रास्ते पर अपने जीवन के अंत तक चलते रहे.

वे शहीद भगत सिंह जिन्होंने पंजाब की राजधानी लाहौर में फांसी का फंदा चूमा था, के साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष से भी गहरे प्रभावित थे. वे पंजाब की शहीदी परंपरा के सच्चे वारिस थे. उन्हें भाकपा(माले) का रास्ता सही लगा – साम्राज्यवाद व सामंतवाद के खिलाफ-इंकलाब का रास्ता.

वे एक ऐसे कम्युनिस्ट थे, जिन्होंने घरेलू कठिनाइयों का सामना करते हुए भी, पार्टी के काम को प्राथमिकता दी. तब पार्टी के लिए कोई कार्यालय या निश्चित स्थान नहीं था. उन्होंने हमेशा अपने साथियों को संयम से रहने और निराशा से बचने की शिक्षा दी. उन्होंने कभी भी किसी पार्टी में किसी पद की लालसा नहीं रखी और न ही किसी भी गलत काम का समर्थन किया. वे कई बार गुरदासपुर, पटियाला और चंडीगढ़ जेलों में बंद रहे. पार्टी बैठकों में वे बहुत कम बोलते थे लेकिन बहुत निडर और बेबाक बोलते थे. लेकिन वे जिंदगी के आखिरी दिन तक कम्युनिस्ट बने रहे, इसकी मिसाल बनकर जिए.


04 April, 2026