-- शत्रुघ्न सहनी/प्रेमराज आनंद
अखिल भारतीय खेत एवं ग्रामीण मजदूर सभा (खेग्रामस) ने दलित गरीबों की बस्तियों-टोलों को उजाड़े जाने के बुलडोजर राज के खिलाफ राज्यव्यापी प्रतिरोध खड़ा करने का प्रस्ताव विधानमंडल के बजट सत्र के पहले दिन आयोजित विराट जन सम्मेलन से लिया जिसमें 25 जिलों से हजारों लोगों ने हिस्सा लिया. इससे पूर्व दर्जनों जगहों पर बुलडोजर कारवाई के खिलाफ जुझारू प्रतिवाद हुआ और 5 और 6 जनवरी को राज्य के तकरीबन 130 आंचलों पर जुझारू प्रदर्शन हुआ. भूमि वंचितों ने आवाज बुलंद की कि जो जहां बसा है उसे पीपीएच एक्ट 1947 के तहत पर्चा/पट्टा दिया जाये. यह कानून दलित वंचितों और दर रैयतों के लिए आजादी का गिफ्ट था जो ऐतिहासिक किसान आंदोलन के गर्भ से निकला था. इस कानून को नकारते हुए और न्यायालयों के निर्देशों – बिना वैकल्पिक व्यवस्था के किसी को उजाड़ा नहीं जाना चाहिए – की धज्जियां उड़ाते हुए राज्य में भाजपा की नीतीश सरकार ने बुलडोजर का आतंक पैदा कर दिया है. सैकड़ों गरीबों की बस्तियों को उजाड़ा गया है, हजारों लोगों पर फर्जी मुकदमा लाद दिया गया है और लाखों परिवारों को उजाड़ने का नोटिस थमा दिया गया है. गरीब लड़ रहे हैं, महिलाएं लड़ रही हैं और हेराफेरी से बनाई गयी तानाशाह सरकार को लानतें भेज रही हैं. तीन-तीन दशकों से बसी-बसाई बस्तियों को रौंद दिया गया है. पूरे बिहार में गरीबों के उपर बुलडोजर का आतंक है. लोग आतंक के साये में जीने को अभिशप्त हैं.
खेग्रामस ने अपनी उच्चस्तरीय टीम ने 14 से 17 फरवरी तक टीम ने प्रभावित जिलों – नालंदा, नवादा, बेगूसराय, समस्तीपुर, दरभंगा और मधुबनी के दर्जनों गांवों में गरीबों की टूटी-फूटी और जमींदोज कर दी गयी बस्तियों का जायजा लिया और बिलखते और परेशान परिवारों के दर्द को जानने-समझने, उनको सांत्वना देने तथा बुलडोजर राज के खिलाफ संघर्ष का संकल्प भरने की कोशिश की.
इस टीम में खेग्रामस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सह पूर्व विधायक सत्यदेव राम, राज्य अध्यक्ष सह पूर्व विधायक मनोज मंजिल, राज्य सचिव शत्रुघ्न सहनी और राज्य कार्यालय सचिव प्रेमराज आनंद स्थायी तौर पर शामिल थे. संगठन के राष्ट्रीय महासचिव धीरेंद्र झा और मधुबनी के साथी नवल यादव, योगनाथ मंडल, विजय दास आदि समेत जिलों के खेग्रामस और भाकपा(माले) नेता विभिन्न स्थानों पर टीम के सहभागी बने.
शिवनंदन नगर : जदयू-लोजपा (आर) के नेताओं के नेतृत्व में पुलिस-प्रशासन का बुलडोजर अभियान
नालंदा जिले के रहुई प्रखंड स्थित शिवनंदन नगर में 1989 में भाकपा के नेतृत्व में हुए भूमि आंदोलन के तहत यह बस्ती बसाई गयी थी. पासवान जाति के 150 परिवार और मुशहर जाति के 2 परिवार बिहार सरकार की पोखर के भिंड पर बसे हुए हैं.
सोनसा गांव के कुर्मी जाति के संपन्न लोगों के द्वारा इस भूमि आंदोलन को विरोध किया गया था. कुर्मी जाति के दर्जनों संपन्न परिवारों ने इस पोखर के साथ-साथ बिहार सरकार की जमीन पर भी कब्जा कर रखा है. पोखर के भिंड से बाहर वास भूमि के अलावा खेती करने योग्य भूमि भी है जिसका रकबा लगभग 35 बीघा है. पोखर और भिंड लगभग तीन एकड़ में फैला हुआ है. इस जमीन का खेसरा संख्या 1616 और 1617 है और थाना नंबर 16 है.
इस जमीन पर 35 वर्षों से लोग बसे हैं. स्थानीय कुलकों और भू-माफियाओं की ओर से इन्हें उजाड़ने की कोशिश लगातार की जाती रही है लेकिन जुझारू प्रतिवाद की वजह से वे हर बार पीछे हटते रहे. लेकिन इस बार राजस्व व भूमि सुधार मंत्री सम्राट चौधरी, जो राज्य के उपमुख्यमंत्री भी हैं, के बयान से उन ताकतों का मनोबल बढ़ा. दिसंबर 2025 में ही यहां बसे दो परिवारों का घर को बुलडोजर से तोड़ दिया गया. जब इसका विरोध होने लगा तो प्रशासन, स्थानीय जमींदार, जदयू के नालंदा सांसद और लोजपा(आर) जिला अध्यक्ष सत्येंद्र मुकुट ने लोगों पर जगह खाली करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया. इसी पृष्ठभूमि में यहां बुलडोजर कारवाई हुई है, कोर्ट का आदेश तो बहाना है. इसके पीछे स्थानीय दबंगों, जमींदारों और जदयू नेताओं का प्रत्यक्ष हाथ है.
जब इस बुलडोजर कार्रवाई का प्रतिवाद और प्रतिरोध शुरू हुआ है तो यहां बसे 70 परिवारों को पंचाने नदी के गर्भ में बिहार सरकार की जमीन पर प्रति परिवार 2 डि. जमीन का पर्चा दिया गया है. यह जमीन बसने के अनुकूल नहीं है इसलिए लोगों ने वहां जाने से इनकार कर दिया है. पीड़ित परिवारों का कहना है, ‘हम जहां बसे हुए हैं वहीं का बासगीत पर्चा हमें दिया जाए. 35 वर्षों से यह बसावट है और इन वर्षों में हम लोगों ने लड-भिड़ कर सड़क, नाला, बिजली, पानी आदि की सुविधाएं हासिल कर ली हैं. हमें इंदिरा आवास के तहत आवास भी मिला हुआ है.’
यह सच्चाई है कि पिछले 30-35 वर्षों में इस जमीन का चरित्र बदल गया है. पीपी एक्ट 1947 भी कहता है कि जमीन का चरित्र अगर बदल गया हो तो उस जमीन की बंदोबस्ती हो सकती है.
दलित समुदाय – पासवान व मुसहर जाति – के इन परिवारों पर बर्बर बुलडोजर एक्शन के बाद किसी भी राजनीतिक दल के लोग यहां नहीं पहुंचे. भाकपा(माले) और खेग्रामस की टीम ही यहां पहुंची है. भाकपा की ओर से भी कुछ कार्यक्रम हुए हैं. विदित हो कि पासवान जाति के लोगों ने एनडीए गठबंधन को ही वोट दिया था इसलिए सरकार के खिलाफ लोगों में भारी गुस्सा है. इस बस्ती में पासवान जाति के देवता सल्हेश का गहबर भी है.
जयमंगला गढ़ : ऐतिहासिक मुसहरी को बचाने की लडाई
जयमंगला गढ़ की ऐतिहासिक मुसहरी बेगूसराय जिला के चेरिया बरियारपुर अंचल में है. लोगों का कहना है कि यहां मुसहरों की बसावट बहुत पुरानी है और वे पाल वंश के काल से यहां रहते हैं. इतना तो प्रमाणित है कि यह बसावट आजादी के पूर्व से है और 1952 के वोटर लिस्ट में भी यहां के लोगों के नाम हैं. यहां इंटर स्तरीय स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र सहित बसावट की सारी सुविधाएं हैं. कांग्रेसी सरकार में यहां क्लस्टर के तहत दर्जनों घर बनाये गए थे. कांवर झील देखने गए मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने यहां इको पार्क बनाने का ऐलान किया और प्रशासन ने आनन-फानन में बस्ती को अनधिकृत घोषित करते हुए उसे उजाड़ने का नोटिस जारी कर दिया. इसके खिलाफ यहां जुझारू प्रतिरोध शुरू हुआ. एक बड़ी प्रतिरोध सभा आयोजित हुई जिसमें नागरिक समाज की भी व्यापक हिस्सेदारी थी. भाकपा(माले) और खेग्रामस के संयुक्त बैनर तले और खेग्रामस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सह पूर्व विधायक सत्यदेव राम, भाकपा(माले) जिला सचिव दिवाकर व खेग्रामस के नेता चंद्रदेव वर्मा आदि के नेतृत्व में जिलाधिकारी के समक्ष विशाल प्रदर्शन भी हुआ.
इस बुलडोजर अभियान के खिलाफ नागरिक समाज, स्थानीय अधिवक्ताओं, पीयूसीएल और जन बुद्धिजीवी पुष्पराज की पहल पर पटना हाईकोर्ट में अपील की गयी हाईकोर्ट ने इस बस्ती को अधिकृत बस्ती करार दिया और बुलडोजर कार्रवाई पर रोक लगा दी.
लेकिन विस्थापन का खतरा टला नहीं है क्योंकि सरकार के एजेंडे में दलित-महादलित परिवारों का वास-आवास बिल्कुल नहीं है. ऐसे में आदोलन को व्यापकता प्रदान करते हुए प्रतिरोध का बड़ा मंच बनाना, क्योंकि दलित-वंचितों की ऐसी बहुत बस्तियां हैं जिन पर बुलडोजर की तलवार लटकी हुई है, बहुत जरूरी है.
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि पीपी एक्ट-1947 के रहते हुए यहां बसे 300 से ज्यादा परिवारों को पर्चा/पट्टा क्यों नहीं मिला?
मंगलगढ़ : न्याय की बाट जोह रहे हैं गरीब
मंगलगढ़ (प्रखंड-हसनपुर, समस्तीपुर) का गरीब उजाड़ो अभियान हाल के दिनों में दलित वंचितों पर सबसे बड़े हमले के बतौर सामने आया है जहां जमींदार, भू-माफिया व स्थानीय दबंगों ने प्रशासन से मिलकर 33 साल पुरानी बस्ती को राख में मिला दिया है. 1992 में भूदान, केशर-ए-हिंद और सरकारी जमीन पर यह बस्ती बसी थी. माकपा के तत्कालीन नेता दिवंगत रामदेव वर्मा व शहीद रामनाथ महतो आदि के नेतृत्व में यह बस्ती बसाई गयी थी. प्रशासन को सामने करके स्थानीय जमींदार ने गुंडावाहिनी को संगठित कर सभी घरों को जमींदोज कर दिया और बस्ती में आग लगा दी. दुखद बात है कि माकपा की ओर से इसका कोई प्रतिवाद नहीं हुआ. लोगों ने खेग्रामस टीम को बताया कि माकपा के स्थानीय नेता लागों को उजड़वाने में ही लगे हुए थे. माकपा के ऊपरी नेतृत्व से भी उनको कोई मदद नहीं मिली. भाकपा(माले) नेत्री मंजू प्रकाश व अन्य साथियों के साथ सबसे पहले घटना का जायजा लेने आईं.
इस बस्ती में मुसहर (150 घर), पासवान (100), जुलहा (150), सहनी (100), कंजर (100), यादव (4) और धानुक (1) घर बसे हुए थे. जमीन का रकबा करीब 35 एकड़ है. अधिकांश परिवार खेतिहर मजदूर हैं और नौजवान बाहर काम करते हैं. लोगों ने बताया कि जमींदार विपिन सिंह भूमिचोर है जिसके पास अकूत नाजायज जमीन है और इसने थाना, पुलिस और स्थानीय प्रशासन के लोगों को जरखरीद बना रखा है.
भाकपा(माले) और खेग्रामस ने न्याय के लिए संघर्ष करने का भरोसा दिया है. अगले महीने जिलाधिकारी समस्तीपुर के समक्ष गरीबों को उजाड़ने पर रोक लगाने और उजड़े हुए लोगों को बसाने की मांग को लेकर आंदोलन की योजना बनाई गयी है.
दरभंगा : उजाड़ने के खिलाफ बढ़ता प्रतिरोध
दरभंगा के बहादुरपुर प्रखंड के शाहपुर में दशकों से बसी दलित बस्ती को उजाड़ने की साजिश छपरा से दरभंगा आकर बसे नवोदित जमींदार कामाख्या नारायण सिंह ने रची थी. भाकपा(माले) की ओर से इसको लेकर कानूनी और जमीनी संघर्ष चल रहा था. कोर्ट में पैसे खर्च कर उजाड़ने का आदेश जमींदार ले आया जबकि उसका उस जमीन से कोई नाता नही था. स्थानीय प्रशासन बुलडोजर लेकर बस्ती में पहुंच गया और घरों को उजाड़ना शुरू कर दिया. जनता में भारी आक्रोश था. भाकपा(माले) नेता अभिषेक के नेतृत्व में आमने-सामने का प्रतिवाद हुआ. जेसीबी गाडी – जिसे गांव में लोग ‘मुंहनोचबा गाड़ी’ कहते हैं – के सामने लोग खड़े हो गए. प्रशासन को पीछे हटना पड़ा लेकिन भाकपा(माले) नेता अभिषेक को पुलिस ने डिटेन कर लिया गया. जिले के नेताओं के जरिये दबाव बनाया गया और तबं प्रशासन ने उसको छोड़ा. इसके बाद भी आंदोलन जारी रहा. जिला मुख्यालय में पीड़ित परिवारों के कई दिनों तक चले धरना और जिलाधिकारी के समक्ष हुए एक बड़े प्रदर्शन के बाद करीब 150 परिवारों को बासगीत पर्चा मिला है.
डरहार मुसहरी को बचाने की लडाई भी जारी है जहां नहर किनारे बसे परिवारों को बसाने को लेकर भाकपा(माले) और जिला प्रशासन में समझौता हुआ है. सिंहवारा, बहेड़ी, बिरौल और दरभंगा ग्रामीण आदि प्रखंडों के कई स्थानों पर में जो जहां बसे हैं, उनको पर्चा दिलाने का संघर्ष तेज हुआ है. जन प्रतिरोध से ही बुलडोजर रुकेगा और दलित गरीबों की बस्तियां बचेगी. इसी दारम्यान बहादुरपुर में लगभग 100 परिवारों को बसाया गया है. खेग्रामस टीम ने दर्जनों ऐसी बसावटों का दौरा किया जिनके पास मालिकाना कागज नहीं है. दरभंगा जिले में पीपी एक्ट-1947 के तहत पर्चा दिलाने का संघर्ष जारी है और इसमें कुछेक अंचलों में सफलता भी मिली है.
महागठबंधन उम्मीदवार को वोट देने के चलते भी दमन का बुलडोजर चल रहा है
समाजवादी आंदोलन का गढ़ रहे पूर्वी मधुबनी, खासकर फुलपरास में, दलित-वंचित समुदाय के भूमिहीन टोले बुलडोजर के आतंक के साये में जी रहे हैं. इन टोलों पर बुलडोजर का दमन अभियान ऐसे चल रहा है जैसे सीमा पार चढ़ाई की जा रही हो. लोगों को जगह खाली करने और सामानों को सुरक्षित स्थानों पर रखने की छूट भी नहीं दी जा रही है. अनाजों और कपड़े को मिट्टी तले दबा दिया जा रहा है, महिलाओं और बच्चों को पीटा जा रहा है और झूठे मुकदमे दर्ज कर महिलाओं और बूढों तक को जेल में डाल दिया जा रहा है.
70 साल के नन्हकू महतो आज भी जेल में हैं. उनके बेटे अरुण महतो ने कहा, ‘मैं तो राजस्थान में कमा रहा था. घटना सुनकर भागा-दौड़ा आया. जेल में मिलने जाता हूं तो पिताजी रोने लगते हैं.
फुलपरास अंचल के फुलकाही गांव के नोनिया और सहनी टोला पर 15 जनवरी को बुलडोजर आतंक बरपाया गया. यहां के लोगों ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को वोट दिया था. गांव की महिला बुचनी देवी ने कहा कि जदयू के लोगों ने बदला लिया है और जदयू विधायक शीला मंडल के इशारे पर यह हुआ है. कई लोगों पर मुकदमा दर्ज कर हमलोगों को परेशान किया जा रहा है. जिबछि देवी ने बताया कि अनाज-पानी सब मिट्टी में मिला दिए गए. माल-मवेशियों को पीट-पीट कर भगा दिया गया. गंगा प्रसाद सहनी चलने में असमर्थ हैं, फिर भी केस में उनका नाम दर्ज है. 26 लोगों के उपर मुकदमा कर दिया गया है क्योंकि लोगों ने आवाज नही उठाई.
महिलाओं ने प्रशासन से यह मांग की थी कि उनलोगों को समय दिया जाये. वे पुरुष लोगों को बुलाती हैं, उसके बाद नापी कराकर स्कूल की जमीन अलग करा ली जाए. लेकिन नोटिस में जो समय दिया गया था, उससे पहले ही रात के अंधरे में बुलडोजर चलाया गया. जो पैसे वाले लोग थे उनसे पैसे लेकर उनके मकानों को छोड़ दिया गया है. ताज्जुब की बात है कि इन नोनिया और सहनी परिवारों से मिलने कोई नहीं आया है और न ही किसी तरह का मुआवजा मिला है. कहा – ‘आपलोग आईये, हमलोग लाल झंडा से जुड़ेंगे!’
बेलहा : ऐतिहासिक गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है
फुलपरास से सटा यह गांव समाजवादी आंदोलन का प्रमुख केन्द्र रहा है. दिवंगत समाजवादी नेता धनिक लाल मंडल ने जो यहां के ही निवासी थे, कर्पूरी ठाकुर के साथ मिलकर इस इलाके को समाजवादियों का गढ़ बनाया था. जदयू की विधायिका शीला मंडल भी इसी गांव की निवासी हैं. लेकिन जदयू ने समाजवाद का चोला उतार फेंका है. माकपा के भी कई नेता इसी गांव से निकले लेकिन वे सभी आगे चलकर राजद और जदयू में समाहित हो गए. जदयू के भीतर के आपसी टकराव और मूल्यहीनता ने गांव के लगभग 70 परिवारों को सड़क पर ला दिया है. गांव के भीतर बसे इन परिवारों के दशकों से बसे-बसाये आशियाने तबाह कर दिये गये हैं जो केशर-ए-हिंद की जमीन पर दशकों से बसे हुए थे. इस बस्ती को बसाने और आगे बढ़ाने में समाजवादी नेताओं की अहम भूमिका थी. विधायक के अगल-बगल रहने वाले बिसो मंडल ने उजाड़ने का यह काम किया है और इस खेल में पैसे भी कमाए हैं. उजड़े परिवारों में अमात, तेली, मंडल आदि जातियों के लोग हैं. यादव जाति के लोगों के भी कई पक्के मकानों को तोडा गया है.
भाजपा के बुलडोजर राज में सबको अपना हाथ साफ करने का मौका मिल गया है. समाजद्रोही भू-माफिया सब के सब इस अभियान में अपनी रोटी सेंक रहे हैं क्योंकि सरकार की नीतियां लकवा ग्रस्त हैं. सड़क के किनारे, रेलवे लाइन के किनारे और तटबंधों के किनारे बसी बस्तियों को सरकार अतिक्रमण कह सकती है, लेकिन इनके पुनर्वास की व्यवस्था के साथ. अतिक्रमण हटाया जाना एक बात है लेकिन पूरी की पूरी बस्ती को उजाड़ना साफ तौर पर तानाशाही है. राज्य में लाखों परिवार केशर-ए-हिंद की जमीन पर बसे हैं, राजधानी पटना में इसकी बड़ी तादाद है. इन बस्तियों को तोड़ना गैर-कानूनी है. सरकार की ओर से नीतिगत निर्णय नहीं रहने के चलते भू-माफियाओं को इसका मौका मिलता है और न्यायालय आंख मूंदकर अतिक्रमण हटाने का आदेश जारी कर देता है. प्रभावित पक्ष को अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं मिलता. यह सीधे तौर पर अंधेरगर्दी है और भाजपा की सरकार अंधेरगर्दी की वाहक है. वह एक मिशन पर काम कर रही है – दलित गरीबों को उजाड़ो और जमीन अडानी-अंबानी को दे दो! इस बोझ को उतार फेंकने से ही दलित-वंचितों का घर घरारी और वास-आवास का अधिकार बचेगा और जन प्रतिरोध ही इसका एकमात्र रास्ता है.
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बुलडोजर राज पर विधानसभा में भाकपा(माले) विधायक दल का वक्तव्य
जाति गणना रिपोर्ट-2023 के अनुसार बिहार की आबादी का 14.09% झोपड़ी में और 26.54 टिन अथवा खपड़ा के मकानों में रहते हैं अर्थात तकरीबन 40% परिवार गंभीर हाउसिंग की समस्या से ग्रस्त हैं. इनमें से अधिकांश को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ इसलिए नहीं मिल रहा है क्योंकि जिस जमीन पर वे दशकों से बसे हैं उसका मालिकाना कागज उनके पास नहीं है. पीपी एक्ट-1948 बिहार के दलित-वंचितों के लिए आजादी का उपहार था, इसके तहत बासगीत पर्चा/पट्टा दलित-वंचितों को क्यों नहीं मिला – इसकी चर्चा किये बिना सैकड़ों बस्तियों को उजाड़ दिया गया है. बुलडोजर कारवाई आम बात हो गयी है. बजट इस पर मौन है.
आपने भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को पुराने नये जमींदारों के दबाव में कूड़ेदान में डाल दिया लेकिन आप बिहार की वास्तविकता से आंखें नहीं चुरा सकते. सभापति महोदय, बिहार में 60% से ज्यादा खेती बटाई पर होती है, उन बटाइदारों के लिए बजट में कुछ नहीं है. पूर्वी बिहार में सिकमीदारों को बेदखल किया जा रहा है लेकिन उन्हें पुस्तैनी हक नहीं देकर हिंसक झड़प को जगह दी जा रही है. राज्य में लाखों पर्चा धारी हैं जिन्हें दखल-दिहानी दिलाने के प्रति विभाग सोया हुआ है.
सभापति महोदय! हमारी आजादी की लड़ाई का संकल्प था कि वास्तविक खेतिहर को जमीन का मालिक बनाया जायेगा. लगता है कि हम उस संकल्प को भूल गए हैं.
जमीन सर्वे का काम जोर-शोर से चल रहा है, लैंड रिकॉर्ड्स को अद्यतन किया जा रहा है लेकिन सर्वे में मौजूदा दखल-कब्जा अथवा घर-घरारी को आधार नहीं बनाया जा रहा है. सर्वे को बेदखली का अभियान नहीं बनाया जाये जिसकी आशंका लोगों में बन रही है. खगड़िया मामले में उच्च न्यायालय ने रेयतों को हक दिलाया है. सुपौल जिला में किसान लड़ रहे हैं क्योंकि सरकार 1948 से खेत जोत-आबाद कर रहे किसानों को बेदखल कर रही है.
सभापति महोदय! आग्रह होगा कि सरकार किसानों और दशकों से बसी बस्तियों को उजाड़ो अभियान नहीं चलाये. भूमि सुधार के एजेंडा को जमीन पर उतारे जो हमारे पूर्वजों का संकल्प था. महान किसान नेता सहजानंद सरस्वती का नाम आजकल सब ले रहे हैं लेकिन उनके आदर्शों को मिटाने में लगे हैं. उन्होंने अंतिम दिनों में अपनी किताब ‘महारुद्र का महातांडव’ में कहा कि जमींदारी उन्मूलन के बाद दर रैयतों अर्थात भूमिहीनों और मजदूरों का लैंड राइट्स अहम है.
डोम, मेहतर, पासवान, रविदास, सहनी, ततमा, मंडल, नोनिया, धोबी, पासी, चंद्रवंशी, भर, नोनिया, आदिवासी आदि के हजारों टोलों को आजतक नियमित नहीं किया गया. भारत रत्न कर्पूरी जी की बात बहुत होती है लेकिन उनके विधानसभा के भीतर व्यक्त संकल्प को भुला दिया गया है.