साल 2025 में भारत के संविधान के लागू होने के 75 साल पूरे हुए. संविधान को अपनाए जाने से ठीक पहले, 26 नवंबर 1949 को, संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष के रूप में बाबा साहेब अंबेडकर ने अपने ऐतिहासिक भाषण में कुछ बेहद दूरदर्शी बातें कही थीं. उनमें से एक अहम चेतावनी संविधान को लागू करने वालों की भूमिका को लेकर थी. डॉ. अंबेडकर ने कहा था, “संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे लागू करने वाले लोग खराब होंगे, तो उसका नतीजा भी खराब ही होगा.” इसके जरिए वे “हम भारत के लोग” को लगातार चौकन्ना रहने का आह्वान कर रहे थे – ताकि हम अपनी आजादी की हिफाजत कर सकें, अपने अधिकारों को सुरक्षित रख सकें और भारत के गणराज्य की संवैधानिक बुनियाद, उसके धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक चरित्र और समाजवादी दिशा को मजबूत कर सकें. आज देश के जो हालात हैं, वे हर पल यह याद दिला रहे हैं कि बाबा साहेब की वह चेतावानी कितनी सच साबित हो रही है.
साल 2025 ने संविधान पर कुछ सबसे घातक हमले देखे, वह भी बिना कोई स्पष्ट संशोधन किए ही. संविधान को कमजोर करने की यह प्रक्रिया कई स्तरों पर चल रही है. संविधान के वे बुनियादी उसूल, जो नागरिकों के सशक्तिकरण, राज्य की जवाबदेही और सत्ता के विभाजन पर केंद्रित थे, अब उन्हें बदलकर नागरिकों पर थोपे जाने वाले कर्तव्यों की एक लगातार फैलती हुई संहिता में तब्दील किया जा रहा है. इस संहिता को लागू करने के लिए राज्य की बेलगाम डिजिटल निगरानी शक्ति का इस्तेमाल हो रहा है और सत्ता को बेरोकटोक कार्यपालिका के हाथों में केंद्रित किया जा रहा है. आज हालात यह हैं कि कार्यपालिका रोजमर्रा के तौर पर न्यायपालिका को दरकिनार कर रही है और विधायिका को कुचल रही है. वहीं चौथा स्तंभ, जिसे सत्ता पर निगरानी रखने और सच बोलने की भूमिका निभानी थी, उसे प्रभावी रूप से कार्यपालिका की प्रचार मशीन में बदल दिया गया है.
जनता के विरोध-प्रदर्शन और नियमित अंतराल पर होने वाले चुनाव ही आज इस कार्यपालिका आक्रामकता पर लगाम लगाने के संभावित हथियार बचे हैं. पिछले छह वर्षों में भारत ने कुछ बेहद ताकतवर जनआंदोलनों को देखा है. सीएए के खिलाफ आंदोलन और खेती पर कॉरपोरेट कब्जे के विरोध में चला ऐतिहासिक किसान आंदोलन इसके सबसे अहम उदाहरण हैं. इन्हीं आंदोलनों की ताकत और संविधान की बुनियादी संरचना से छेड़छाड़ रोकने के बढ़ते दृढ़ जन-संकल्प के बल पर, भारत की जनता ने 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को कुछ जोरदार झटके भी दिए. भाजपा की सीटों की संख्या घटकर 240 रह गई और दिल्ली में सत्ता थामे रहने के लिए उसे आंध्र प्रदेश की टीडीपी और बिहार की जेडीयू जैसे सहयोगियों के समर्थन पर निर्भर होना पड़ा. 400-पार के अपने सपने को 2024 में लगे इस झटके से बौखलाई भाजपा ने तब से राज्य दमन और चुनावी हेरफेर की अपनी दोहरी रणनीति को और तेज कर दिया है, और फासीवादी हमले को एकदम नए और खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है.
साल 2025 में हमने ‘ऑपरेशन कगार’ के नाम पर माओवादी धारा के खिलाफ न्यायेतर सफाए का एक खुला अभियान देखा है. इसके साथ-साथ यूएपीए जैसे क्रूर काले कानूनों का बेरोकटोक और मनमाना इस्तेमाल किया गया है, जिसके जरिए कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमा चलाए, बिना जमानत के, लंबे समय तक जेलों में बंद रखा जा रहा है. जहां एक ओर वरिष्ठ माओवादी नेताओं को न्यायेतर, फर्जी मुठभेड़ों में मार दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जमीन और जंगल के अधिकार, पर्यावरण संरक्षण, जलवायु न्याय, सामाजिक-आर्थिक बराबरी, अल्पसंख्यक अधिकार, सांस्कृतिक आजादी या अलग राज्य की मांग जैसे लोकतांत्रिक सवाल उठाने वाले कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में फंसाकर महीनों-सालों तक बिना जमानत और बिना सुनवाई के कैद किया जा रहा है. आज शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों से एकजुट होने और विरोध दर्ज करने की आजादी पर भारी पाबंदियां लगी हुई हैं. हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि अदालतें नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने के बजाय, लोगों को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने से हतोत्साहित करने और रोकने लगी हैं, बल्कि यहां तक बताने लगी हैं कि किन मुद्दों पर बात की जाए और किन पर नहीं.
विरोध की आवाजों को चुप कराने के साथ-साथ अब चुनावी प्रक्रिया को भी व्यवस्थित तरीके से तबाह किया जा रहा है. आज चुनावी सफाया (इलेक्टोरल पर्ज) और चुनावी धांधली को एक साथ अंजाम दिया जा रहा है, और यह सब चुनाव आयुक्तों के एक आज्ञाकारी, मनोनित पैनल के जरिए कराया जा रहा है. भारत की ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ चुनावी प्रणाली, जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार ही विजेता घोषित होता है, में पहले से ही कई खामियां रही हैं, और पैसे व बाहुबल की भूमिका हमेशा से चुनावों में अहम रही है. लेकिन अब ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) के नाम पर जिस तरह बड़े पैमाने पर लोगों को वोट के अधिकार से वंचित किया जा रहा है, और जिस तरह चुनाव आयोग ने पारदर्शिता व जवाबदेही से लगभग पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया है, उसने चुनावी प्रक्रिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को बिलकुल समाप्त कर दिया है. संघ-भाजपा की यह फासीवादी रणनीति अब खतरनाक ढंग से धरातल पर उतरती दिख रही है, जिसका मकसद भारत को एक-दलीय शासन में तब्दील करना है. एक के बाद एक चुनावों में गढ़े हुए, कृत्रिम जनादेश थोपकर भाजपा-एनडीए के लिए स्थायी बहुमत सुनिश्चित किया जा रहा है, ताकि वह आने वाले दशकों तक सत्ता में अपनी जड़ें जमाए रखे.
75 साल का हमारा यह गणतंत्र आज जिस मुकाम पर खड़ा है, वहां से बाहर निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं है. भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ी इस सबसे बड़ी चुनौती का मुकाबला करने के लिए हमें अपनी उन बुनियादी ताकतों को फिर से जगाना होगा, जिनसे यह गणतंत्र बना है. हमें एकजुट होना होगा – सामाजिक समानता की लड़ाई के लिए, तर्कशीलता और इंसानियत की तलाश के लिए; भारत की साझा और मिली-जुली संस्कृति की ताकत के लिए; और उस एकता और जोश के लिए, जो अंग्रेजों के खिलाफ हमारी लंबी आजादी की लड़ाई के दौरान हुए औपनिवेशिक-विरोधी राष्ट्रीय जागरण ने हमें दी थी. हमें आजादी के बाद के इन वर्षों के अपने लोकतांत्रिक अनुभवों को भी अपनी ताकत बनाना होगा. यह ‘हम भारत के लोग’ का ही दृढ़ संकल्प था, जिसने हमें ब्रिटिश औपनिवेशिक गुलामी से आजादी दिलाई थी. अब हमें उसी पैमाने के एक नए राष्ट्रीय जागरण की जरूरत है, ताकि हम एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के अपने संवैधानिक सपने को दोबारा हासिल कर सकें. 2025 का साल फासीवाद की बढ़त का साल रहा है. आइए, 2026 को भारत के लोकतंत्र में नई जान फूंकने और उसकी जोरदार वापसी का साल बनाएं!