वर्ष 35 / अंक - 32 / महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना एक राजनैतिक धूर्त...

महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना एक राजनैतिक धूर्तता

महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना एक राजनैतिक धूर्तता

-- वंदना प्रभा 

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी आज भी बेहद सीमित है. तत्कालीन 18वीं लोकसभा में 543 सांसदों में सिर्फ 74 महिलाएँ हैं यानी सिर्फ 13.6 प्रतिशत है और पूरे देश में करीब 4,123 विधायकों में सिर्फ 390 महिलाएँ हैं जोकि केवल 10 प्रतिशत है . आधी आबादी का प्रतिनिधित्व लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में आज भी 10-14 प्रतिशत के आसपास सिमटा हुआ है. यही असंतुलन महिला आरक्षण की सबसे बड़ी जरूरत है. लेकिन महिलाओं की बात करते समय यह भी याद रखना होगा कि महिलाएँ एक जैसी सामाजिक पृष्ठभूमि से नहीं आतीं. दलित, आदिवासी, पिछड़े और अन्य वंचित समुदायों की महिलाओं के सामने राजनीति में आने की बाधाएँ और ज्यादा हैं. इसलिए महिला आरक्षण के साथ ओबीसी महिलाओं के लिए सब-कोटा की मांग सामाजिक न्याय का सवाल है. अगर प्रतिनिधित्व का उद्देश्य समाज की विविधता को संसद तक पहुँचाना है तो उस विविधता महिला आरक्षण के भीतर भी दिखाई देना चाहिए.

इसी पृष्ठभूमि में 2023 में महिला आरक्षण कानून का संसद में सर्वसम्मति से पारित होना ऐतिहासिक क्षण था. भाजपा ने इसे देश की ‘नारी शक्ति’ को समर्पित बताया और यह भी कहा कि पिछली सरकारों ने दशकों तक महिलाओं के साथ धोखा किया है. यह आलोचना पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं है. 1996 से महिला आरक्षण का वादा बार-बार हुआ लेकिन कानून नहीं बन पाया. 1996 से महिला आरक्षण का प्रस्ताव बार-बार संसद में आया लेकिन राजनीतिक सहमति के अभाव में कानून नहीं बन सका.

इसिलए जब लम्बे इंतजार के बाद जब 2023 में पारित हुई तो एक उम्मीद जगी की अब महिलाओं के सासंद तक पहुँचने के रास्ते थोड़े सरल होंगे. मजबूरीवश ही सही पर पार्टियों पर भी दवाब बनेगा की वो ज्यादा महिलाओं को टिकट दे.लेकिन बिल पास होने के बावजूद सरकार ने उससे जानबूझ कर लटका कर रखा. महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था मौजूद है लेकिन यह अभी लागू नहीं हुई है. सरकार ने बड़ी चालाकी से इस कानून को 2027 के जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ दिया. अब जबतक ये दोनों प्रक्रिया पूरी नहीं होतीं, तब तक महिला आरक्षण भी लागू नहीं हो सकेगा.आने वाले राज्यो में होनेवाले विधानसभा चुनावों में देखना होगा की महिला आरक्षण लागू होता है या नहीं .

महिला आरक्षण और परिसीमन दो अलग-अलग विषय हैं. एक का उद्देश्य महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना है, जबकि दूसरा संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों के पुनर्वितरण से जुड़ा है. कानून ने इन दोनों प्रक्रियाओं को एक-दूसरे पर निर्भर बना दिया. भारत की राजनीति में परिसीमन एक गंभीर और जटिल मुद्दा है. क्योकि यह तय करेगा कि किन राज्यों को कितनी संसदीय सीटें मिलेंगी और देश के राजनीतिक संतुलन पर उसका क्या असर होगा. दक्षिण भारत के कई राज्य पहले ही इस प्रक्रिया को लेकर अपनी चिंताएँ व्यक्त कर चुके हैं. ऐसे समय में महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने का अर्थ यह है कि महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बहस अब परिसीमन की राजनीति से अनावश्यक जोड़ देना है. महिला आरक्षण की व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता परिसीमन की प्रक्रिया को एक नैतिक आधार देती है इसकी वजह से भाजपा बार बार परिसीमन पर उठने वाली राजनीतिक आपत्तियाँ को महिला विरोधी बता देती है. यदि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी लोकतंत्र की तत्काल आवश्यकता है, तो उसके लिए स्पष्ट समय-सीमा और राजनीतिक प्रतिबद्धता भी दिखाई देनी चाहिए.

महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन की शर्तों से मुक्त कर तत्काल लागू करने की मांग को लेकर अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (एपवा) और नेशनल कोलिशन फाॅर वीमेन रिजर्वेशन से जुड़े अन्य महिला संगठनों लगातार संघर्ष कर रही है. 21 जुलाई से संसद के मानसून सत्र के दौरान जंतर-मंतर पर महिलाओं का अनवरत धरना जारी है. इसी अभियान के तहत कोलिशन के प्रतिनिधिमंडल विभिन्न दलों के सांसदों से मिलकर ज्ञापन सौंप रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं की वर्तमान सीटों पर ही 33 प्रतिशत महिला आरक्षण तत्काल लागू किया जाए तथा इसे जनगणना और परिसीमन से अलग किया जाए.

इसी कड़ी में बिहार में एपवा की जिला इकाइयों ने राज्यव्यापी एकदिवसीय धरना-प्रदर्शन आयोजित कर इस मांग को गांव-गाँव और शहर-शहर तक पहुँचाया. प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार से महिला आरक्षण को और टालने की राजनीति बंद करने तथा संसद के वर्तमान मानसून सत्र में ही इसे लागू करने की मांग की. आंदोलन के अगले चरण में 11 अगस्त को जंतर-मंतर पर राष्ट्रीय प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा, जिसमें देशभर से महिलाएं और लोकतांत्रिक जनसंगठन बड़ी संख्या में भाग लेंगे. तीन दशक तक कानून का इंतजार करने के बाद महिलाओं से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे अब इसके लागू होने का भी अनिश्चितकाल तक इंतजार करें.


08 August, 2026