मजदूर अधिकारों की लड़ाई को फासीवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी प्रतिरोध की एक निर्णायक धारा में बदल डालें !
इस हफ्ते हम मोदी सरकार द्वारा नए श्रम कानूनों (कोड) को 1 अप्रैल से लागू किए जाने के बाद का पहला अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस, या मई दिवस मना रहे हैं. श्रमिक अधिकारों की गुणवत्ता को बढ़ाने, उनके दायरे का विस्तार करने और श्रम कानूनों के पालन में सुधार लाने के बजाय ये नए कानून भारतीय श्रमिकों के बड़े तबके को कॉरपोरेट जंगल राज, यानी मालिकों की तरफ से थोपी गई सरकारी तानाशाही के हवाले कर दे रहे हैं. आठ घंटे का कार्यदिवस अब कोई सार्वभौमिक अधिकार नहीं रह गया है, बल्कि ठेके पर काम और अस्थायी रोजगार के इस दौर में यह अब तेजी से विशिष्ट अधिकार बनता जा रहा है. काम के घंटे बढ़ने पर अब कोई ओवरटाइम भुगतान नहीं मिलता – इसका सीधा मतलब है और भी ज्यादा शोषण. अब यूनियन बनाना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है, सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति काफी कमजोर पड़ गई है, जबकि मालिक अब कर्मचारियों को मनमाने ढंग से नौकरी से निकालने के आदेश और भी आसानी से जारी कर सकते हैं.
गुलामी के इन नए कानूनों को ऐसे समय में लागू किया गया, जब अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध के कारण अचानक आर्थिक संकट और विघटन पैदा हो गया है. इंधन संकट की जबरदस्त मार पड़ने के कारण कई उद्यमों ने अपना काम-काज समेटना या पूरी तरह से बंद करना शुरू कर दिया है. प्रवासी श्रमिकों को एक बार फिर गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से अपने घर, यानी उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल लौटने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. एनसीआर क्षेत्र और पूरे भारत के औद्योगिक केंद्रों में बड़े पैमाने पर ठेका श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनमें वे अपनी मजदूरी में तत्काल बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं. यह समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है कि एनसीआर क्षेत्र के बेहद कम मजदूरी पाने वाले और असुरक्षित श्रमिक अब अपना वजूद बचाने के लिए क्यों संघर्ष करने को मजबूर हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश की ‘डबल इंजन’ वाली मोदी-योगी सरकार के लिए तो श्रमिकों के ये विरोध प्रदर्शन ‘राष्ट्र-विरोधी साजिश’ हैं! श्रमिकों के हितों के लिए आवाज उठाने वाले कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में फंसाकर उन्हें मुख्य साजिशकर्ता के तौर पर गिरफ्तार किया जा रहा है – उन पर आरोप है कि वे श्रमिकों को भड़का रहे हैं और भारत को बदनाम कर रहे हैं. जहां सरकार किसानों के आंदोलन का बेरहमी से दमन करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, वहीं वह श्रमिकों के विरोध प्रदर्शनों को बर्बर शक्ति का इस्तेमाल करके कुचलने की कोशिश कर रही है.
अंतरराष्ट्रीय मजदूर वर्ग को बुनियादी ट्रेड यूनियन अधिकार हासिल करने और पूंजीवाद की क्रूर दुनिया में, जिसने औपनिवेशिक लूट और साम्राज्यवादी आक्रमण के जरिए दुनिया भर में अपने पैर पसारे थे, एक नियम-आधारित व्यवस्था की कुछ झलक लाने के लिए दशकों तक दृढ़ संघर्ष करने पड़े थे और उन्होंने बड़े बलिदान भी दिए थे. आठ घंटे का कार्य-दिवस पूंजीवादी व्यवस्था की ओर से कोई सभ्यतागत उपहार नहीं था, यह एक ऐसा अधिकार था जिसे बड़े उथल-पुथल, लगातार संघर्षों और शिकागो के हे-मार्केट शहीदों (मई 1886) के सर्वोच्च बलिदान के जरिए बड़ी मुश्किल से हासिल किया गया था. कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स और यूरोप तथा अमेरिका के अन्य समकालीन समाजवादी अग्रदूतों के सीधे नेतृत्व में पहले इंटरनेशनल (इंटरनेशनल वर्किंगमेन्स एसोसिएशन, 1864-1872) के बैनर तले श्रमिक संघर्षों के बीच अंतरराष्ट्रीय समन्वय और एकजुटता के उदय के बाद हे-मार्केट नरसंहार और मजदूर नेताओं को दी गई फांसी ने अंतरराष्ट्रीय मजदूर वर्ग के संघर्षों को जबरदस्त गति प्रदान की. 1889 आते-आते मई दिवस मजदूरों का अंतरराष्ट्रीय दिवस बन गया और इसे इसी रूप में मनाया जाने लगा.
भारत में भी आठ घंटे के कार्य-दिवस के लिए संघर्ष लगभग उसी समय शुरू हुआ. रेलवे से लेकर कपड़ा उद्योग तक, कई क्षेत्रों के मजदूरों ने हड़ताल करना और यूनियन बनाना शुरू कर दिया. 1918 तक भारत में मद्रास लेबर यूनियन के रूप में पहली संगठित मजदूर यूनियन बन चुकी थी, और 1920 में ‘ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ के बैनर तले पहला राष्ट्रीय केंद्र सामने आया. इस पृष्ठभूमि में जो श्रम कानून बने – 1881 के फैक्ट्री एक्ट से लेकर 1923 के वर्कमैन कंपनसेशन एक्ट और 1926 के ट्रेड यूनियंस एक्ट तक – वे भी मजदूर वर्ग के इस बढ़ते संगठन और उनकी बढ़ती दावेदारी से प्रभावित थे. 1930 और 1940 के दशक में कम्युनिस्ट पार्टी, अंबेडकर की इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी, और साथ ही कांग्रेस के भीतर और उसके इर्दगिर्द मजबूत वाम समाजवादी धारा के उदय के साथ इस प्रक्रिया को और भी गति मिली.
नए श्रम कानूनों (कोड) को लागू करने और मजदूर-विरोधी दमन तथा कम्युनिस्ट-विरोधी मुहिम को तेज करने के जरिये मोदी सरकार भारतीय मजदूर वर्ग आंदोलन द्वारा हासिल की गई ऐतिहासिक उपलब्धियों को खत्म करने की कोशिश कर रही है. क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को ठेका मजदूरों और कामगार्रों के विभिन्न हिस्सों – विशेष रूप से युवाओं और महिला मजदूरों – के बढ़ते संघर्षों को एक शक्तिशाली राजनीतिक धारा में शामिल करके और किसानों, छात्रों तथा मजदूरों के बीच घनिष्ठ व जीवंत एकता बनाकर इस साजिश को नाकाम करना होगा. आजादी से पहले हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के बीच के गठजोड़ की तरह ही आज भारतीय फासीवादियों का साम्राज्यवाद-परस्त चरित्र एक बार फिर पूरी तरह बेनकाब हो गया है – मोदी सरकार और आरएसएस अमेरिका-इजरायल धुरी के सामने घुटने टेकने और उनके साथ साठगांठ करने के अपने लगातार किए जा रहे कृत्यों में रंगे हाथों पकड़े जा चुके हैं. श्रमिक अधिकारों की लड़ाई को फासीवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी प्रतिरोध की एक निर्णायक धारा के रूप में विकसित होना चाहिए, और आजादी के आंदोलन के इस नए चरण में भारत को आगे ले जाना चाहिए.