पिछले बीस वर्षों से ‘मनरेगा’ दुनिया के सबसे बड़े लोक निर्माण और सामाजिक कल्याणकारी कार्यक्रम के बतौर जाना जाता था. बेशक, इस कानून के क्रियान्वयन में अनियमितताओं और विसंगतियों के बारे में चिंता प्रकट की जा रही थी तथा इसे अधिक सार्थक बनाने के लिए अधिक कारगर प्रावधानों की भी मांग की जा रही थी. हाल ही में मोदी सरकार के प्रतिशोधात्मक व भेदभावमूलक रुख के चलते यह कानून कुछ राज्यों में ठप्प पड़ता जा रहा था. कुछ दिन पहले ही सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल उच्च न्यायालय के उस फैसले को बहाल रखा जिसमें कोर्ट ने मोदी सरकार को उस राज्य में मनरेगा कार्यक्रम पुनः चालू करने का आदेश दिया था. सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण उपेक्षा करते हुए अब मोदी सरकार मनरेगा कानून को ही खत्म करना और उसकी जगह एक नया कानून लाना चाहती है जिसका नाम होगा ‘विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल, 2025’!
अपने चरित्र के अनुरूप ही मोदी सरकार रोजगार गारंटी ढांचे के इस खात्मे के बारे में यह झांसा देना चाहती है कि नये कानून में ग्रामीण रोजगार इच्छुकों के ‘लाभ’ के लिए प्रति वर्ष प्रति व्याक्ति कार्यदिवस को अधिकतम 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है. लेकिन सच तो यह है कि मजदूरों को ब-मुश्किल 50 दिन तक काम मिल पाता है. कार्यदिवस में इस काल्पनिक वृद्धि की आड़ में यह नया बिल दर-हकीकत रोजगार चाहनेवालों से वह अधिकार और गारंटी भी छीन ले रहा है जो उन्हें पुरानी व्यवस्था में हासिल थे. इस नये ऐक्ट का क्रियान्वयन कृषि के मुख्य मौसम के दौरान 60 दिनों तक स्थगित रहेगा. मजदूरी बिल का पहले से कहीं ज्यादा बोझ राज्यों को वहन करना पड़ेगा, और नौकरशाही द्वारा संचालित इस नई व्यवस्था में पंचायतों को वस्तुतः कोई अधिकार नहीं रह जाएगा. मजदूरी में कोई वृद्धि नहीं होगी और न्यूनतम मजदूरी भुगतान की भी कोई गारंटी नहीं रहेगी. इस प्रकार, मांग पर आधारित व अधिकारोन्मुखी कानून के स्थान पर केंद्र-संचालित आपूर्ति-सीमित नगदी भुगतान कार्यक्रम लागू हो जाएगा जो डिजिटल भुगतान प्रणाली की अनियमितताओं का शिकार बना रहेगा.
सरकार हमें यह यकीन दिलाना चाहेगी कि कृषि के व्यस्त मौसम में इस कानून के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की नई व्यवस्था से किसानों और मजदूरों, दोनों को फायदा होगा. वस्तुतः पूरे देश के किसान ग्रामीण रोजगार गारंटी और कृषि के बीच और नजदीकी जुड़ाव की मांग करते रहे हैं. ‘किसान सम्मान’ के नाम पर सरकार जो पैसा बांटती है उससे कृषि संकट तथा खेती के लगातार बढ़ती लागत खर्च का बोझ तनिक भी कम नहीं होता है. रोजगार गारंटी कानून और कृषि के बीच नजदीकतर जुड़ाव किसानों के नजरिये से सब्सिडी होगा और इससे खेतिहर मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी की भी गारंटी हो सकेगी. मोदी सरकार ने इससे बिल्कुल उलट रास्ता चुनकर रोजगार गारंटी कानून को कृषि से अलग कर दिया है.
मशहूर विकास कार्यकर्ता और 2005 में ‘नरेगा’ के एक मुख्य रचयिता ज्यां द्रेज ने सही तौर पर वीबी-ग्रामजी बिल को न केवल पुराने कानून का पुनर्नामकरण और महात्मा गांधी का नाम हटाना कहा है, बल्कि इसे उस कानून की सीधी हत्या बताया है जो खुद गांधी की हत्या के समान है. ऐसे वक्त में जब पूरा देश और भी मजबूत ग्रामीण रोजगार गारंटी ऐक्ट का क्रियान्वयन और चरम शहरी गरीबी के मुद्दे को हल करने के लिए शहरी इलाकों तक में इस ऐक्ट का विस्तार चाह रहा था, मोदी सरकार श्रम कोड और वीबी-ग्रामजी का संयुक्त पैकेज लेकर सामने आ रही है जो रोजगार गारंटी और श्रम अधिकारों के लिए मौत की घंटी ही है.
मोदी सरकार के लिए यह यूपीए शासनकाल के अत्यंत महत्वपूर्ण कानून पर किया जाने वाला चिरप्रतीक्षित सर्जिकल स्ट्राइक है. नरेगा (जिसे बाद में मनरेगा नाम दिया गया) और सूचनाधिकार (आरटीआई) से लेकर वन अधिकार कानून और भूमि अधिग्रहण ऐक्ट (भूमि अधिग्रहण में समुचित मुआवजा तथा पारदर्शिता, पुनर्वास और स्थान-परिवर्तन अधिकार ऐक्ट) तक, यूपीए शासन काल में ऐसे अनेक कानून बने जो लंबे संषर्घों और समर्पित लोक हित शोधकार्यों व सक्रियता की उपज थे. मोदी का शासन काल एक अध्यादेश के जरिये भूमि अधिग्रहण ऐक्ट को खत्म करने के प्रयास से शुरू हुआ, किंतु किसान आन्दोलन और विपक्ष इस प्रयास को निरस्त करने में सफल रहा. इस कोशिश में मात खाने से सीख लेकर मोदी सरकार ने कुटिल संशोधनों के जरिये इन कानूनों को उलटने की राह चुनी.
अब बिहार चुनावों के सफल अपहरण से उत्साहित इस सरकार ने जनता से कोई सलाह-मशविरा अथवा संसदीय बहस किये बगैर मनरेगा की आनन-फानन हत्या करने के लिए इस मौके को चुना है. अब यह भारत के खेतिहर व अन्य ग्रामीण मजदूरों, श्रमिकों व किसानों की बारी है कि वे व्यापक एकता का निर्माण करें और श्रम कोड और वीबी-ग्रामजी के संयुक्त पैकेज के खिलाफ उसी दृढ़ता, शक्ति व संकल्प के साथ लंबी लड़ाई चलाएं, जिस दृढ़ता और संकल्प ने भारत के किसानों को अब रद्द का दिए गए कृषि कानूनों के मुद्दे पर ऐतिहासिक सफलता दिलाई थी.