वर्ष 34 / अंक-22 / मोदी 3.0 : न्याय का विध्वंस, संप्रभुता की कुर्बानी

मोदी 3.0 : न्याय का विध्वंस, संप्रभुता की कुर्बानी

इस माह जब हम ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन और अपनी आजादी के जन्म को याद कर रहे हैं, तो हमें हमारे बुनियादी मूल्यों, हमारे संवैधानिक लोकाचार तथा न्याय, एकता व आजादी के लिए जीवन खोने वालों की कुर्बानियों के प्रति गद्दारी करने वाली मोदी हुकूमत का प्रतिरोध करने का संकल्प नए सिरे से दुहराना होगा.

हमारे गणतंत्र को आकार देने वाले मूल्यों पर ही मोदी शासन द्वारा खतरनाक हमले किए जा रहे हैं.

इस माह भारत अपनी आजादी और ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन की वर्षगांठ मनाता है. इन दोनों की बुनियाद स्वतंत्रता, न्याय और संप्रभुता के लिए जनता के समझौता-विहीन संघर्षों में धंसी हुई है. लेकिन हमारे गणतंत्र को आकार देने वाले मूल्यों पर ही मोदी शासन द्वारा खतरनाक हमले किए जा रहे हैं. आज हम स्वतंत्रता आन्दोलन की गर्भ से निकले संवैघनिक लोकाचार का महज क्षरण नहीं, बल्कि उसका विध्वंस होता देख रहे हैं.

न्याय का विध्वंस


जिस दिन गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में बयान दिया कि कोई हिंदू आतंकवादी नहीं है, उसके दूसरे ही दिन विशेष एनआइए कोर्ट ने भाजपा की पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर और लेफ्टनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी सात लोगों को 2008 में मालेगांव में मस्जिद के निकट हुए बम विस्फोट मुकदमे से बरी कर दिया, जिसमें छह व्यक्तियों की जान गई थी. इस विस्फोट के 17 वर्ष बाद उस कोर्ट ने कहा कि सरकारी वकील उन अभियुक्तों के खिलाफ आतंकी गतिविधियों का आरोप सिद्ध नहीं कर सके, जो उस मुकदमे के लगातार विध्वंस की तार्किक परिणति को रेखांकित करता है.

उस मुकदमे की जांच हेमंत करकरे, जिन्होंने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ एक दक्षिणपंथी साजिश का भंडाफोड़ किया था और जिन्हें बाद में मार डाला गया, के नेतृत्व में महाराष्ट्र का आतंक-निरोधी स्क्वाड (एटीएस) कर रहा था. एटीएस द्वारा दायर चार्जशीट में उस विस्फोट की योजना के लिए देश में कई जगहों पर की गई बैठकों से लेकर लेफ्टनेंट कर्नल पुरोहित द्वारा सैन्य भंडार से विस्फोटक हासिल करने और अभियुक्तों द्वारा इस योजना के क्रियान्वयन के तौर-तरीकों का विस्तृत विवरण शामिल था. उसमें महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत कई अभियोग लगाए गए थे.

2011 में एनआइए ने वह मुकदमा अपने हाथ में ले लिया और उसने 2016 में बिल्कुल उलट चाल चलते हुए मकोका के अभियोगों को दरकिनार कर एक पूरक चार्जशीट दायर किया और प्रज्ञा ठाकुर समेत सातों अभियुक्तों को बरी कर दिया. एनआइए ने यह भी आरोप लगाया कि एटीएस ने आरोप के सिलसिले में कोई औपचारिक जांच किए बगैर गवाहों को प्रताड़ित कर उन्हें बयान देने के लिए मजबूर किया था. लेकिन आशा के विपरीत, विशेष कोर्ट ने एनआइए द्वारा प्रज्ञा ठाकुर को निर्दोष बताने के बावजूद उसे रिहा करने से इन्कार कर दिया.

एक साल पहले 2015 में मालेगांव मुकदमे की सरकारी अभियोजक रोहिणी सैलियन, जिन्हें अचानक इस मुकदमे से हटा दिया गया, ने रिकॉर्ड पर कहा कि सरकार ने एनआइए के मार्फत उनसे कहा कि वे इस मुकदमे के दक्षिणपंथी नेताओं के साथ ‘नरमी’ बरतें. अब इस फैसले के बाद वे कह रही हैं कि असली साक्ष्य को सामने आने से रोक दिया गया है. दुखद बात यह है कि सुनवाई के दौरान प्रमुख साक्ष्य कोर्ट के रेकॉर्ड से ‘गायब’ हो गया, जिसमें सीआरपीसी 164 और मकोका के तहत लिए गए अनेक मुख्य गवाहों और दो अभियुक्तों के इकबालिया बयानात तथा प्रज्ञा ठाकुर और एक अन्य अभियुक्त रामजी कलसांगरा के बीच हुई वार्ता भी शामिल है – ये दोनों मालेगांव बम विस्फोट की योजना पर वार्ता कर रहे थे. अंततः, फोटोकॉपियों पर भरोसा किया गया.
सिलसिलेवार विध्वंस से न्याय क्षत-विक्षत हुआ है

इस जघन्य अपराध के पीड़ितों के लिए न्याय, उनलोगों के लिए न्याय जो इस दक्षिणपंथी आतंक से मुक्ति चाहते थे. लंबे 17 वर्षों के बाद उन पीड़ितों के परिजन अभियुक्तों को छुट्टा घूमते देख रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे कि अन्य बमबारियों के पड़ित देख रहे हैं – 2003 में परभानी मस्जिद बम विस्फोट, 2008 में नान्देड मस्जिद पर बमबारी, 2007 में समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद और ख्वाजा चिश्ती दरगाह में बम विस्फोट. इनमें से हर मामले में यह स्पष्ट हो गया कि ये सब विस्फोट संघी गिरोहों ने किए थे. सच तो यह है कि एक व्यापक हिंदुत्ववादी साजिश के अंग के बतौर मालेगांव विस्फोट के एटीएस सिद्धांत पर एनआइए ने चुपचाप पर्दा डाल दिया.

गायब कर दिए गए दस्तावेजों, विरोधी गवाहों, राजनीतिक हस्तक्षेप, कर्तव्यपालन में जानबूझकर की गई लापरवाही और सांस्थानिक गड़बड़ियों के साथ आतंकी कार्रवाई के इस मुकदमे ने न्याय पर करारा प्रहार किया किया है.

जहां हिंदुत्ववादी आतंकियों को वैध ठहराकर उन्हें मौजूदा निजाम बचा लेता है, वहीं अमित शाह संसद में यह दावा करने की हद तक चले जाते हैं कि कोई हिंदू आतंकी नहीं हो सकता है. उनकी हिंसा बेरोकटोक जारी है. कर्नाटक के हुलीकट्टी गांव में अति दक्षिणपंथी ग्रुप श्रीराम सेना के सदस्यों ने एक स्कूल की पानी टंकी में जहर घोलने की साजिश की थी, ताकि उस स्कूल के मुस्लिम प्रधानाध्यपक को फंसाया जा सके. अनेक बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. यह कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि अल्पसंख्यकों को बदनाम करने और भय फैलाने की वृहत्तर मुहिम का ही हिस्सा थी.

इसी के साथ, भाजपा-शासित राज्यों में बांग्ला-भाषी मुस्लिम प्रवासियों को अत्यधिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है. हाल ही में, ग्ररुग्राम में सैकड़ों मजदूरों को पकड़ लिया गया और उन्हें भयानक अपमान, परेशानी और यहां तक कि हिंसा का शिकार बनाया गया. इस घृणित अभियान के अंग के बतौर भाजपा नेता अमित मालवीय और दिल्ली पुलिस हद से बाहर जाकर बांग्ला को ‘बांग्लादेशी’ भाषा तक बता दे रहे हैं, जबकि बांग्ला भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल आधिकारिक रूप से मान्यता-प्राप्त भाषा है.


मोदी की ‘मिगा’ खामोशी और भारतीय संप्रभुता की कुर्बानी


जहां देश के अंदर न्याय खून उगल रहा है, वहीं बाहर भारत की संप्रभुता को गिरवी रखा जा रहा है. हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने खुलेआम भारत के अर्थतंत्र को ‘मृत’ कहकर मजाक उड़ाया है और बेहद अपमानजनक तरीके से भारत के सामानों पर 25% का दंडात्मक टैरिफ लगा दिया. ट्रंप ने यह टैरिफ और बढ़ाने की धमकी दी है, क्योंकि भारत तेल खरीद रहा है, और तेल के आयात से परे इसलिए भी क्योंकि भारत ‘ब्रिक्स’ का सदस्य देश है. और यह सब तब हो रहा है, जब मोदी ट्रंप को खुश करने के लिए अपनी सारी हदें पार करते हुए 2020 में अमेरिका जाकर ‘अबकी बार, ट्रंप सरकार’ का नारा लगा आए और ‘मागा’ नारे की नकल करते हुए ‘मेक इंडिया ग्रेट अगेन’ (मिगा) का अपना मुहावरा गढ़ दिया.

भड़कीली तस्वीरों और खोखले नारों के प्रदर्शन के साथ मोदी की विदेश नीति सिर्फ और सिर्फ अपमानजनक आत्मसमर्पण साबित हुई है. डोनाल्ड ट्रंप के साथ उनकी बहु-प्रचारित दोस्ती ने सिर्फ टैरिफ और व्यापार दंड की धमकियां पैदा की हैं. पश्चिमी मुल्कों से हामी भरवाने की लगातार कोशिशों ने दक्षिणी दुनिया में भारत के ऐतिहासिक नेतृत्व को दांव पर लगा दिया है. ‘सार्क’ को मूर्छा लग गई और ‘ब्रिक्स’ को समय के बाद का ख्याल समझा रहा है. ‘नाम’ (गुट निरपेक्ष आन्दोलन) – एक ऐसा मंच जिसने भारत को औपनिवेशिकोत्तर राष्ट्रों के शीर्ष पर ला खड़ा किया था – अब लगभग परित्यक्त पड़ा हुआ है.

संप्रभुता की कमजोरी गाजा में जनसंहारी युद्ध के सम्मुख भारत की गहरी खामोशी में भी झलकती है. इजरायल की नस्ली सफाये की मुहिम में बच्चों समेत हजारों फिलिस्तीनियों को मारा जा रहा है, लेकिन मोदी सरकार ने उनके साथ एकजुटता के बजाय उनके कत्लेआम पर चुप्पी और सहमति को ही तरजीह दी है. हत्यारी अमेरिका-इजरायल धुरी के साथ भारत की बढ़ती नजदीकी की अब बेशर्मी से शान बघारी जा रही है. मोदी शासन ने उन्हीं औपनिवेशिक शक्तियों के साथ जाना पसंद किया है, जिनके खिलाफ देश ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी.

इसका नतीजा? भारत अपने ही क्षेत्रा में अलग-थलग पड़ गया और दक्षिणी विश्व से भी दूर हट गया, जिसे इसने कभी अगुवा बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. हमारी उपनिवेशवाद-विरोधी विरासत को कमजोर बनाने से लेकर नव-उदारवादी एजेंडा की पूर्ति तथा अडानी-अंबानी सरीखे क्रोनियों के मुनाफे के लिए राष्ट्रीय संसाधनों व आर्थिक स्वायत्तता को बेच डालने तक, मोदी ने भारत को वैश्विक मंच पर कोने में धकेल दिया है.

इस माह जब हम ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन और अपनी आजादी के जन्म को याद कर रहे हैं, तो हमें हमारे बुनियादी मूल्यों, हमारे संवैधानिक लोकाचार तथा न्याय, एकता व आजादी के लिए जीवन खोने वालों की कुर्बानियों के प्रति गद्दारी करने वाली मोदी हुकूमत का प्रतिरोध करने का संकल्प नए सिरे से दुहराना होगा. यह हम पर स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों, हिंसा और बेदखली के पीड़ितों और आने वाली पीढ़ियों का कर्ज है, और गणतंत्र के मूलाधार को पुनः हासिल करने व न्याययुक्त, संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और स्वतंत्र भारत बनाने के लिए हमें यह कर्ज चुकाना होगा.


09 August, 2025