भारत के पड़ोसी देशों में पहले श्रीलंका, फिर बांग्लादेश और अब नेपाल उबाल में हैं. इस उबाल के केंद्र में है एक पूरी पीढ़ी का आक्रोश – वो नौजवान जो जनयुद्ध, राजशाही के अंत और संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की कठिन तामीर के दौर में बड़े हुए. जिस पीढ़ी को लोकतंत्र और बेहतर जिंदगी के सपने दिखाए गए थे, वही आज ऐसी राजनीति और अर्थव्यवस्था से टकरा रही है जो उसके भविष्य के दरवाजे बंद कर रही है. भ्रष्टाचार-विरोधी मंच से उठे जेन जी के आंदोलन ने वहां के प्रधानमंत्री और पूरी सरकार को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया है.
इसकी तात्कालिक वजह बनी सरकार का तानाशाही कायदा-कानून. बीते 4 सितंबर को 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को लोकल रजिस्ट्रेशन का हुक्म दिया गया और जो न माने उन पर पाबंदी लगा दी गइ, जिनमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर) और यूट्यूब शामिल थे. चिंगारी सोशल मीडिया बैन था, मगर बारूद असली राजनीतिक-आर्थिक संकट था. बाहर से देखने वाले इसे डिजिटल आजादी की लड़ाई कहकर सिमटा सकते हैं, लेकिन असलियत इससे कहीं गहरी है.
8 सितंबर को नौजवान “जेन जी आंदोलन” के बैनर तले भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था और अंधकारमय भविष्य के खिलाफ सड़कों पर उतर आए. शुरुआत में शांतिपूर्ण रहे प्रदर्शन के खिलाफ सरकार द्वारा भारी सुरक्षा बलों की तैनाती के बाद आंदोलन हिंसक हो गया. पुलिस गोलीबारी में कम से कम 19 लोग मारे गए और हजार से ज्यादा जख्मी हुए. नेपाल के इतिहास में किसी प्रदर्शन का यह सबसे खूनखराबे वाला दिन बन गया.
9 सितंबर की सुबह, गम और गुस्से से भरे हजारों लोग कर्फ्यू तोड़ कर फिर सड़कों पर उमड़ पड़े. देशभर में सरकार और राजनीतिक जमात से जुड़ी हर चीज निशाने पर आ गई. राजनीतिक दलों के दफ्तर और नेताओं के घर जलने लगे. मंत्रियों ने इस्तीफे देने शुरू कर दिए; गृहमंत्री रमेश लेखक ने सबसे पहले पद छोड़ा. विपक्षी सांसदों ने सामूहिक इस्तीफा देकर सरकार भंग और नए चुनाव की मांग तेज कर दी. दोपहर तीन बजे से पहले ही तीसरी बार सत्ता में आए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भी इस्तीफे का ऐलान कर दिया. बीते 17 सालों में नेपाल में 14 सरकारें बनीं, मगर कोई भी अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी.
यह जन आंदोलन 2008 के उन ऐतिहासिक प्रदर्शनों के बाद सबसे अहम ठहरता है, जब जनता ने राजा ज्ञानेंद्र शाह को गद्दी छोड़ने पर मजबूर किया और नेपाल की 240 साल पुरानी पूर्ण राजशाही का औपचारिक अंत कर दिया था. इस बार आंदोलन का रंग भी अलग था – तेज, बराबरी पर टिका और समाज के हर तबके को जोड़ने वाला. नेपाल के इतिहास में पहली दफा इतना बड़ा आंदोलन पूरी तरह जेनरेशन जी (करीब 1997–2012 में जन्मी पीढ़ी) की अगुवाई में खड़ा हुआ. लगभग 3 करोड़ आबादी वाले देश में तकरीबन 40% लोग इसी पीढ़ी से हैं. इसमें बांग्लादेश के छात्र आंदोलनों और श्रीलंका के अरागलया की झलक साफ दिखी. स्कूल-कॉलेज की यूनिफॉर्म में बच्चे, बेरोजगार ग्रेजुएट, गिग वर्कर, मजदूर और आम नाराज जनता हुकूमत की नाकामी पर सब एकजुट होकर गरज रहे थेः “ओली चोर, देश छोड़!”, “रोजगार दो, अवसर दो!”, “भ्रष्टाचार बंद करो, सोशल मीडिया नहीं!” जैसे नारे गूंज रहे थे.
नेपाल का युवा विद्रोहः क्षेत्रीय समानताएं
नेपाल के युवा प्रदर्शन हाल ही में दक्षिण एशिया के अन्य देशों, जैसे बांग्लादेश और श्रीलंका में हुए आंदोलनों से काफी हद तक मिलते-जुलते हैं, जहां जनाक्रोश ने सरकारों को सत्ता से बेदखल कर दिया. इंडोनेशिया में हाल के हफ्तों में हुए छात्र प्रदर्शनों की तरह, नेपाल के प्रदर्शनकारी भी पारंपरिक राजनीतिक दलों पर निर्भर नहीं रहे. इसके बजाय, उन्होंने मीम्स, हैशटैग और डिजिटल नेटवर्क के जरिए अपनी आवाज को संगठित किया, जिसने उनके आंदोलन को एक नई ताकत दी.
इन नौजवानों का आक्रोश सिर्फ डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर पाबंदियों तक सीमित नहीं रहा. उनके नारे और तख्तियां भ्रष्टाचार, नेताओं और नौकरशाही की मनमानी, और विकास की टूटी उम्मीदों पर करारा प्रहार कर रहे थे. यही कारण है कि यह आंदोलन महज सोशल मीडिया की लड़ाई से आगे बढ़कर पूरे सिस्टम की वैधता को चुनौती देने वाला एक तूफान बन गया.
आर्थिक संकटः रोजगारविहीन अर्थव्यवस्था
पूरे नेपाल को अपनी चपेट में लेने वाला यह तूफान देश की कमजोर और रोजगारविहीन अर्थव्यवस्था की गहरी जड़ों से उपजा है. नेपाल दुनिया के सबसे गरीब देशों में शुमार है, जहां हर चार में से एक व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे जी रहा है. पिछले साल बेरोजगारी दर 10.7% थी, जो युवाओं (15-24 वर्ष) में 20.84% तक पहुंच गई. आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि नेपाल की अर्थव्यवस्था अभी भी पिछड़े पूंजीवादी ढांचे में फंसी है, जो पर्यटन, कृषि और विदेशों में काम करने वाले मजदूरों की कमाई पर निर्भर है. 67% से अधिक मजदूर कृषि क्षेत्र में हैं, लेकिन इसका जीडीपी में योगदान एक चौथाई से भी कम है.
औद्योगिक उत्पादन न के बराबर है, आयात पर अत्यधिक निर्भरता है, और जीडीपी का बड़ा हिस्सा विदेशों से आने वाले धन पर टिका है. हर साल छह लाख से अधिक नेपाली खाड़ी देशों, मलेशिया, कोरिया और जापान में काम की तलाश में पलायन कर रहे हैं. एक चौंकाने वाली प्रवृत्ति यह है कि हताश युवा रूस-यूक्रेन युद्ध में भी पैसे और स्थायी निवास के लालच में लड़ने जा रहे हैं. यह न केवल अवसरों की कमी, बल्कि भविष्य से उम्मीदों के खात्मे का प्रतीक है. औसतन हर दिन 1,700 लोग देश छोड़ते हैं, और लाखों छात्र विदेशी अवसरों की तलाश में पलायन कर रहे हैं. ज्यादातर नेपाली परिवारों का सहारा विदेशों में कठिन परिस्थितियों में कमाया गया रेमिटेंस है. 2024 में रेमिटेंस जीडीपी का 33% था, जो वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक है. 2024/25 में विदेश रोजगार विभाग ने 8,39,266 मजूरी परमिट जारी किए – 3 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए यह आंकड़ा नेपाल के भविष्य पर गंभीर सवाल उठाता है.
लोकतंत्र का खोखलापन और असमानता
इस बीच, नेपाल में असमानता की खाई और गहरी हो गई है. ऑक्सफैम के 2019 के अध्ययन “Fighting Inequality in Nepal - The Road to Prosperity” के अनुसार, सबसे अमीर 10% नेपाली सबसे गरीब 40% की तुलना में 26 गुना अधिक संपत्ति रखते हैं, और उनकी आय तीन गुना ज्यादा है. आर्थिक तंगी के साथ-साथ मानव विकास सूचकांक भी गिर रहा है – शिक्षा तक पहुंच रुकी हुई है, स्वास्थ्य सेवाएं जर्जर हैं, जलवायु आपदाएं जैसे बाढ़ और भूकंप बार-बार त्रासदी ला रहे हैं, और खाद्य व आवास की बढ़ती महंगाई गरीब परिवारों को और सता रही है.
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल का करप्शन परसेप्शन्स इंडेक्स नेपाल को दक्षिण एशिया के सबसे भ्रष्ट देशों में गिनता है. आम लोग हर कदम पर रिश्वतखोरी की शिकायत करते हैं – चाहे नौकरी पाना हो या बुनियादी सेवाएं हासिल करना. इससे युवाओं में यह यकीन गहराता गया है कि जनता के बलिदानों से हासिल लोकतंत्र अब खोखला हो चुका है. नौजवानों के लिए मौके न के बराबर हैं और उनकी बढ़ती बेचैनी को कोई भी पारंपरिक पार्टी राह नहीं दिखा पाई.
करीब दो दशक पहले जनयुद्ध ने राजशाही का अंत कर नए लोकतांत्रिक दौर की उम्मीदें जगाई थीं. माओवादियों ने हथियार छोड़कर लोकतंत्र में कदम रखा और न्यायपूर्ण समाज का सपना दिखाया. मगर जिन माओवादियों ने कभी क्रांतिकारी बदलाव का नारा बुलंद किया था, वे आज सबसे बड़े अवसरवादी माने जाते हैं. उन्होंने अपने आदर्शों को ताक पर रखकर उसी व्यवस्था में सत्ता के लिए समझौते किए. प्रचंड का निजी संपत्ति और सत्ता के प्रति झुकाव इसका सबसे बड़ा प्रतीक है.
नया संविधान, जो ऐतिहासिक और प्रगतिशील हो सकता था, इतना कमजोर कर पास किया गया कि वह निष्प्रभावी साबित हुआ. हर चुनाव में नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-यूएमएल और माओवादी जैसी “पार्टियां” बंद कमरे की सौदेबाजी और जनता के साथ विश्वासघात दोहराती रहीं. नतीजा यह कि आर्थिक और सामाजिक संकट किसी के बस में नहीं रहा. ओली की सीपीएन-यूएमएल और माओवादी भी उतने ही भ्रष्ट निकले, जितनी पुरानी नेपाली कांग्रेस.
तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके पुष्प कमल दाहाल (प्रचंड) ने बड़े पूंजीपतियों के हित में खुले तौर पर बाजार-समर्थक नीतियों को बढ़ावा दिया. अप्रैल में अन्नपूर्णा एक्सप्रेस ने लिखाः “अर्थव्यवस्था तबाह है, नागरिक कराह रहे हैं, और सत्ताधारी धन के ढेर पर बैठकर जनता की पुकार को अनसुना कर रहे हैं.”
यह हालात वामपंथी राजनीति के लिए गहरी चोट हैं. आपसी झगड़े, सत्ता की लालसा और ठोस क्रान्तिकारी नीतियों की कमी ने युवाओं में वामपंथ की साख लगभग मिटा दी है. जब वामपंथी नाम वाली सरकार रोजगार देने के बजाय आजादी छीनती है, तो वह नेता-पूजा करने वाली, तानाशाही और राजतंत्र समर्थक ताकतों के लिए जमीन तैयार करती है. राजशाही के समर्थक पहले ही दावा कर रहे हैं कि शांति वही बहाल कर सकते हैं. यही सबसे बड़ा खतरा है – लोकतंत्र और आम जनता के अधिकारों के असली दुश्मन इस गलती का फायदा उठा सकते हैं.
वर्तमान अनिश्चितता, भू-राजनीतिक जटिलताएं और भविष्य की चुनौतियां
काठमांडू की सड़कों पर आज सेना गश्त कर रही है और पूरे देश पर अनिश्चितता के बादल छाए हैं. जरूरत है ऐसी बातचीत की, जो नेपाल के गणतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को मजबूती दे. अगर जल्द चुनाव होते हैं तो माना जा रहा है कि वोट पुराने नेताओं के खिलाफ जाएगा, और राजशाही समर्थक ताकतें इसका फायदा उठाने की कोशिश करेंगी.
नेपाल के मौजूदा आंदोलन को अगर बांग्लादेश और श्रीलंका के हालिया उभार से जोड़ दें, तो इसे “दक्षिण एशियाई स्प्रिंग” कहना आसान लगता है. मगर याद रखना जरूरी है कि अरब स्प्रिंग का अंजाम फिर से तानाशाही और लोकतंत्र का दम घुटने में हुआ था. 2022 में श्रीलंका की आर्थिक तबाही ने लोगों को सड़कों पर ला खड़ा किया. सरकारी खर्च में कटौती (ऑस्टरिटी) और कर्ज के जाल ने सरकार को गिरा दिया, और पुरानी जमात से अलग बनी नई सरकार अपने एक-एक वादे तोड़ रही ह – कोई नया उजाला वहां भी नहीं आया. फिर बांग्लादेश में छात्रा आंदोलन ने शेख हसीना की सत्ता को हटा दिया. कहानी लगभग वही रहीः “रोजगारविहीन विकास”, नौजवानों में बेरोजगारी और बढ़ती असमानता का गुस्सा. अब जब देश नए चुनाव की तरफ बढ़ रहा है, वहां भी अगली सरकार ताकतवर कट्टरपंथी तबके को फिर आगे ला सकती है.
नेपाल को दुनिया में चल रहे भू-राजनीतिक टकराव और साम्राज्यवादी वर्चस्व की जंग से अलग नहीं देखा जा सकता. भारत और चीन के बीच फंसा नेपाल एक ऐसी शतरंज की बिसात है, जहां चीन, भारत और अमेरिका जैसे बड़े खिलाड़ी अपना प्रभुत्व जमाने की होड़ में हैं. चीन अपनी बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव के जरिए नेपाल को कर्ज और परियोजनाओं के जाल में बांधा रहा है – सत्ताधारी इसे तोहफे की तरह लेते हैं, पर आम नेपाली इसे अपनी संप्रभुता पर मंडराता खतरा मानते हैं. भारत, जो कभी नेपाल का सबसे करीबी साथी था, 2015 की नाकाबंदी के जख्मों के बाद कमजोर हुआ, फिर भी नेपाल को अपनी सुरक्षा रणनीति के लिए अहम समझता है. अमेरिका भी मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन जैसे कार्यक्रमों से नेपाल को इंडो-पैसिफिक रणनीति में खींचने में लगा है, ताकि चीन के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके. ऐसे में नेपाल की अशांति और अस्थिरता बाहरी ताकतों के लिए अपने हित साधने का मंच बन सकती है.
लेकिन यह आंदोलन किसी बाहरी “कलर रिवॉल्यूशन” की साजिश नहीं है, बल्कि यह वास्तविक घरेलू समस्याओं और उन नवउदारवादी आर्थिक नीतियों से पैदा हुआ है, जो पूरी दुनिया में असमानता बढ़ा रही हैं और नौजवानों को बेकारी व गरीबी में धकेल रही हैं. इंडोनेशिया में हाल ही में नौजवान महंगाई पर भड़के, फ्रांस में लोग सरकारी कटौती के खिलाफ सड़कों पर उतर आए. यह साफ दिखाता है कि पूंजीवाद का नवउदारवादी ढांचा – जिसे वैश्विक साम्राज्यवादी ताकतें थोप रही हैं – जनता के गुस्से को और भड़का रहा है.
जब सिस्टम पढ़े-लिखे नौजवानों को रोजगार नहीं देता, तो सड़कें – ऑनलाइन और ऑफलाइन – उनकी आवाज का मंच बनती हैं. उस मंच को बंद करने की हर कोशिश का नतीजा विस्फोट ही होगा. हमारे शासक वर्ग के लिए यह सीधी चेतावनी है कि नौजवानों की आजीविका और रोजगार के सवाल को नजरअंदाज करना उनके लिए खतरनाक साबित होगा.
नेपाल अपने गहरे संकट से झांकते हुए एक नई सुबह का सपना देख रहा है. जेन जी का यह विद्रोह सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोश नहीं, बल्कि बराबरी और इंसाफ की नयी नींव डालने की पुकार है. यह सपना तभी सच होगा जब नवउदारवादी नीतियों को पलट कर जनता के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए, युवाओं को सम्मानजनक रोजगार मिले और पूरी व्यवस्था को जनता के हक में बुनियादी तौर पर बदला जाए.
(प्रस्तुतिः मनमोहन)
संदर्भ
1. https://www.aljazeera.com/news/liveblog/2025/9/9/nepal-protests-live-nepali-congress-of-fice-top leaders-homes-set-on-fire
2. https://www.greenleft.org.au/content/nepals-gen-z-uprising-much-needed-revolutionary-reawakening
3. https://www.nepsetrading.com/blog/remittance-growth-boosts-nepals-economy-in-fy-202425
4. https://www.himalmag.com/politics/nepal-gen-z-uprising-oli-resignation
5. Oxfam: "Fighting Inequality in Nepal: The Road to Prosperity" (2019).