नेपाल में हुए नए संसदीय चुनावों के नतीजे इस हिमालयी गणतंत्र में बड़े बदलाव का इशारा करते हैं. इंजीनियर और रैपर से राजनेता बने पैंतीस साल के बालेंद्र शाह, जो पहले काठमांडू के मेयर थे, के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने बड़ी जीत हासिल की है. उन्होंने पुरानी कम्युनिस्ट पार्टियों और नेपाली कांग्रेस को हराकर भारी बहुमत हासिल किया है. नेपाल को संवैधानिक राजतंत्र से बहुदलीय संसदीय गणतंत्र में बदलने और उसे आकार देने में नेपाल के कम्युनिस्ट सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरे थे. 2017 और 2022 में हुए पिछले दो चुनावों में नेपाली कांग्रेस ने कुछ खोई हुई जमीन वापस पाना शुरू कर दिया था, लेकिन कुल मिलाकर कम्युनिस्टों के पास अभी भी वोटों और सीटों का सबसे बड़ा हिस्सा था. इस चुनाव में नेपाली कांग्रेस काफी पीछे दूसरे स्थान पर रही, और बंटे हुए कम्युनिस्ट गुटों ने तीसरा और चौथा स्थान हासिल किया. इस तरह इस चुनाव ने नेपाल में सितंबर 2025 में ‘जेन-जी’ हिंसक विद्रोह के जरिए केपी ओली सरकार के हटाए जाने को सही और पक्का साबित कर दिया है.
श्रीलंका और बांग्लादेश में हाल के राजनीतिक घटनाक्रम और चुनावी नतीजों से नेपाल की समानताएं बिल्कुल साफ हैं. तीनों ही देशों में हमने मुख्य रूप से ‘जेन-जी’ युवाओं के नेतृत्व में जबरदस्त लोकप्रिय उथल-पुथल देखी है और वह तत्कालीन सरकारों के खिलाफ भारी गुस्से और बदलाव की गहरी चाहत से प्रेरित थी. इन तीनों ही देशों में अब राजनीतिक माहौल काफी बदल गया है. लेकिन इनके बीच अंतर भी गौरतलब हैं. श्रीलंका में इस बदलाव ने जेवीपी जैसी पुरानी लेकिन छोटी पार्टी को हाशिये से उठाकर सत्ता के केंद्र में ला दिया है. बांग्लादेश में पहले की सत्ताधारी पार्टी अवामी लीग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया, और जुलाई के विद्रोह से बनी नई पार्टी ने ‘जमात’ से हाथ मिलाया और वह मुख्य विपक्षी गुट के रूप में उभरी. लगभग दो दशकों तक सत्ता से अलग रहने के बाद बीएनपी फिर से सत्ता में लौटी. लेकिन नेपाल में पूर्व की सत्ताधारी पाटियों ने नवागंतुक ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ के सामने चुनाव लड़ा और वे सब हार गईं.
एक पार्टी के तौर पर आरएसपी ने 2022 में ही अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी थी – वह 275 में से 20 सीटों (165 सीटें फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम से और 110 सीटें आनुपातिक प्रतिनिधित्व से) के साथ चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. यह पार्टी प्रचंड के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में शामिल हो गई थी, जिसके नेता रबी लामिछाने उप प्रधान मंत्री और गृह मंत्रा भी बने थे. लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अवैध नागरिकता के आरोप में उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया. तत्पश्चात लामिछाने एक उपचुनाव जीतकर वापस आए, और पार्टी ने एक उभरते हुए राजनीतिक विकल्प के रूप में अपनी पहचान मजबूत की. इस बीच मई 2022 में कोविड महामारी के ठीक बाद काठमांडू मेयर के चुनाव में स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर बालेंद्र शाह ने जीत हासिल की, और इसी के साथ नेपाल में राजनीतिक विकल्प की बढ़ती तलाश का एक और संकेत दिखने लगा था. बालेंद्र शाह का आरएसपी में शामिल होना और उन्हें प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया जाना 5 मार्च के संसदीय चुनावों में आरएसपी की शानदार बढ़त के मुख्य कारण थे.
इस राजनीतिक बदलाव का क्या मतलब है? 2008 में गणतंत्रीय संक्रमण के बाद से नेपाल में चौदह सरकारें आई हैं. कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और गठबंधन का तरीका लगातार उलझा हुआ और अस्त-व्यस्त होता गया है. जिस बड़े पैमाने पर जनादेश आया है उसमें नेपाल की राजनीतिक स्थिरता की आकांक्षा साफ झलकती है. व्यापक भ्रष्टाचार और व्यवस्था में गहरी होती सड़न की बढ़ती सोच और बुजुर्ग शासकों तथा ज्यादातर युवा मतदातां के बीच पीढ़ीगत दरार ने लोगों के मोहभंग को और बढ़ा दिया है. सोशल मीडिया पर अविवेकपूर्ण प्रतिबंध के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर बिना उकसावे के पुलिस फायरिंग ने लोगों के गुस्से में पलीता लगा दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि नेपाली वोटर अभूतपूर्व रूप से नए चेहरों और साफ-सुथरे शासन के वादे को आजमाने के लिए तैयार हो गए, जिससे बालेंद्र शाह और आरएसपी उम्मीदवारों को भारी जनादेश मिला. बालेन ने अपदस्थ प्रधान मंत्री केपी ओली के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया और नतीजे में ओली को शर्मनाक हार मिली.
आरएसपी खुद को एक मध्यमार्गी (सेंट्रिस्ट) पार्टी बताती है जिसके पास नेपाल के गणतंत्रीय लोकतंत्र के लिए सुधार का एजेंडा मौजूद है. राजशाही की बहाली के लिए कोई समर्थन नहीं दिखता है. असल में, जो पार्टी खुले तौर पर राजशाही की बहाली की वकालत करती है, उसे सिर्फ एक सीट मिली है. नेपाल को हिंदू देश बनाने के लिए भी बहुत कम आग्रह है. लेकिन राष्ट्रति प्रणाली और तकनीकी विशेषता आधारित (टेक्नोक्रेटिक) शासन के लिए ज्यादा मजबूत आकांक्षा दिखती है. यह देखना बाकी है कि नई सरकार एक तरफ मोदी सरकार और आरएसएस के वैचारिक-राजनीतिक दबाव और दूसरी तरफ चीन पर नेपाल की बढ़ती आर्थिक निर्भरता से कैसे निपटेगी. नेपाल के प्रवासी कामगारों द्वारा भेजा गया धन नेपाल के लिए आमदनी का बड़ा स्रोत है, और ईरान के खलाफ अमेरिका-इजराइल युद्ध के बाद खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता, अनिश्चितता और आप्रवास-विरोधी माहौल नेपाल के लिए एक और चुनौती होगी.
नेपाल के कम्युनिस्टों के लिए, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से नेपाल के गणतंत्रीय बदलाव की अगुवाई की थी और 1990 के दशक के बाद जनता के व्यापक समर्थन से कई बार सरकार बनाई, यह चुनावी हार एक बड़ी चेतावनी ही है. नेपाल चारों तरफ से जमीन से घिरा देश है जो दो बड़े और ताकतवर पड़ोसियों के बीच बसा है, और जिसके पास अपना कोई बड़ा संसाधन अथवा औद्योगिक बुनियाद नहीं है. ऐसे में साफ तौर पर नेपाल के सामने बड़ी आर्थिक और विदेश नीति की चुनौतियां हैं जिनका उसे सामना करना है. साथ ही, राजनीतिक रूप से नेपाल उन कुछ एशियाई देशों में से एक रहा है जहां कम्युनिस्टों का मजबूत असर है. नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों को मौजूदा चुनावी हार से सबक लेना चाहिए, ‘जेन-जी’ के संघर्षों और खुशहाल व प्रगतिशील नेपाल की आकांक्षाओं से नई ऊर्जा लेनी चाहिए, और एक फिर से ऐसा कम्युनिस्ट आन्दोलन निर्मित करना चाहिए जो नेपाल को एक स्थिर और मजबूत लोकतांत्रिक भविष्य की ओर ले जा सके.