जेन-जी के हिंसक और पीड़ादायक आन्दोलन के बाद, 5 मार्च 2026 को नेपाल में सम्पन्न शांतिपूर्ण चुनावों में जनता ने नेपाल में पहली बार एक स्थाई सरकार के लिए जनमत देकर उन घावों के भरने की उम्मीद जगाई थी. पर नई सरकार के शपथ लेते ही नेपाल की जनता की उन उम्मीदों को भारी धक्का लगा है. 26 मार्च को शपथ लेने वाली बालेन्द्र शाह सरकार द्वारा राजनितिक प्रतिशोध की कार्यवाही के तहत 27 मार्च की सुबह 4 बजे ही नेकपा एमाले अध्यक्ष, पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली व उनके साथ गृह मंत्री रहे नेपाली कांग्रेस नेता रमेश लेखक को गिरफ्तार कर लिया गया. यही नहीं छात्रा संगठनों तथा छात्र संघ चुनावों पर प्रतिबंध लगाने और बिना कोई चर्चा कराये नई नीति लागू कर 15 दिनों के अन्दर सभी कोचिंग सेंटरों को बंद करने का फरमान जारी कर दिया गया. नई सरकार की इन कार्यवाहियों को नेपाल के भविष्य के लिए चिन्ताजनक कदमों के तौर पर देखा जा रहा है.
याद रहे कि नेपाल में सदियों पुरानी राजशाही को उखाड़ फेंकने और एक संवैधानिक-लोकतान्त्रिक नेपाल की स्थापना के लिए 6 दशकों तक अनवरत चले आन्दोलन में नेपाल के छात्रा-युवाओं की भारी कुर्बानी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. अभी 6 माह पूर्व छात्र-युवाओं और स्कूली ड्रेस पहने बच्चों को जेन-जी आन्दोलन के नाम पर काठमांडू की सड़कों पर उतार कर ही आज की बालेन्द्र सरकार सत्तासीन हुई है. ऐसे में छात्रा संगठनों व छात्र संघ चुनाओं पर प्रतिबंध बालेन सरकार के अलोकतान्त्रिक, संविधान विरोधी और फासिस्ट रुख को उजागर करता है. मात्र एक दिन पुरानी नेपाल सरकार पर एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा “पहलो गास ढूंगो भर्या भेटियो” यानी पहले निवाले में ही पत्थर भरा मिला. स्वाभाविक था कि नई सरकार के इस कदम का विरोध होना था.
सरकार ने घोषणा की कि ये गिरफ्तारियां हिंसक जेन-जी आन्दोलन में हुई पुलिस गोलीबारी के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को जिम्मेदार मानते हुए की गयी हैं. इस घटना की जांच के लिए कार्यवाहक प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने एक आयोग का गठन किया था जिसे ‘कार्की आयोग’ के नाम से जाना जाता है. इस आयोग को विपक्षी दल नेकपा(एमाले) ने अविश्वसनीय बताते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता में नया आयोग गठित करने की मांग की थी. अभी भी कार्की आयोग की रिपोर्ट सरकार ने जारी नहीं की है. पर उस रिपोर्ट के लीक होने पर आई खबरों को आधार बनाकर बालेन्द्र सरकार ने सत्ता संभालते ही आनन-फानन में उक्त गिरफ्तारियों की कार्यवाही कर दी. गिरफ्तारियों की खबर फैलते ही काठमांडू और देश के अन्य हिस्सों में नेकपा(एमाले) के हजारों कार्यकर्ता इसे राजनीतिक प्रतिशोध की कार्यवाही बताते हुए सड़कों पर उतर गए. नेकपा(एमाले) ने 28 मार्च को पूरे देश में संगठित प्रदर्शनों का आह्वान किया.
विरोध प्रदर्शनों पर नेपाल प्रहरी (पुलिस) ने जगह-जगह लाठीचार्ज किया और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया. पुलिस लाठीचार्ज में नेकपा(एमाले) के कई नेता-कार्यकर्ता गंभीर रूप से घायल हुए हैं. अखिल नेपाल किसान महासंघ की महासचिव कामरेड सरिता भुसाल को भी गंभीर चोटें लगी हैं. आश्चर्य की बात है कि नेपाली कांग्रेस ने गिरफ्तारी की सिर्फ निंदा की और कोई विरोध कार्यक्रम नहीं लिया. वहीं नवगठित नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेता पुष्प कमल दहल ने न सिर्फ इन नेताओं की गिरफ्तारी का समर्थन किया, बल्कि पिछली सरकार के कुछ और मंत्रियों की गिरफ्तारी की भी मांग कर डाली. नेपाल की नई बालेन्द्र सरकार द्वारा की जा रही राजनितिक बदले की कार्यवाहियां – संसद, संविधान और कानूनों की प्रक्रिया को अपनाए बिना व्यक्तिगत आदेशों से बड़े फैसले लेना तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं और आवाजों को दबाना – नेपाल में भी मोदी-योगी युग की शुरुआत सी लगती हैं, जिसने भारत में लोकतंत्र, संविधान और कानून के राज की जगह एक व्यक्तिवादी फासीवादी शासन प्रणाली को बढ़ावा दिया है.
इधर बालेन्द्र सरकार ने अपने प्रमुख राजनीतिक सलाहकार असीम शाह के नेतृत्व में संविधान संशोधन के लिए एक कार्यदल के गठन की घोषणा कर दी है. असीम शाह पेशे से फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर हैं. वे पहले पत्रकारिता के पेशे से भी जुड़े रहे और 2022 के चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की ओर से मुस्लिम कोटे में सांसद चुने गए थे. संविधान संसोधन में राष्ट्रपति प्रणाली (राज्य प्रमुख का सीधे चुनाव) की बात जेन-जी आन्दोलन और प्रचंड की पार्टी की प्रमुख मांगों में रही है. उम्मीद थी कि लम्बे संघर्षों और भारी नुकसान के बाद संवैधानिक लोकतंत्र की राह पर आगे बढ़ रहे नेपाल में पहली बहुमत की सरकार टकराव के बजाय संवैधानिक लोकतंत्र को मजबूत कर देश को विकास और खुशहाली के मार्ग पर आगे ले जाएगी. लेकिन अब इन उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आने लगा है.