वर्ष 35 / अंक - 18 / नोएडा प्रदर्शन की एफआइआर: साजिशाना झूठ रचने के जरि...

नोएडा प्रदर्शन की एफआइआर: साजिशाना झूठ रचने के जरिए दमन का बहाना

नोएडा प्रदर्शन की एफआइआर: साजिशाना झूठ रचने के जरिए दमन का बहाना

13 अप्रैल 2026 को नोएडा में हुए मजदूरों के विरोध प्रदर्शनों के सिलसिले में कई प्राथमिकियां (एफआइआर) विभिन्न थानों में दर्ज की गई हैं – 116/2026, 117/2026, 164/2026, 165/2026, 172/2026 आदि.

इनमें इस घटना को एक बड़े जमावड़े के रूप में बताया गया है, जो मजदूरी, ओवरटाइम और बोनस से जुड़ी मांगों को लेकर किया गया था. इसके बाद गैर-कानूनी जमावड़ा, रुकावट डालने, हिंसा, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिस या कंपनी के परिसर पर हमले करने के आरोप लगाए गए हैं. यह बात सबमें है कि इनमें भीड़ को बहुत बड़ा बताया गया है, पूरे समूह को जिम्मेदार ठहराया गया है और सख्त कानूनी धाराएं लगाई गई हैं.

मदरसन कंपनी (फेज-2) की एफआइआर

यह एफआइआर 164/2026, 14 अप्रैल 2026 की सुबह 02:50 बजे मदरसन कंपनी के एक प्रतिनिधि की शिकायत पर दर्ज की गई थी.

आरोप लगाया गया है कि 13 अप्रैल 2026 को सुबह 6.15 से दोपहर 2.00 बजे के बीच, करीब 1500-2000 अज्ञात लोगों की भीड़ – जिसमें इस कंपनी और दूसरी कंपनियों के मजदूर भी शामिल थे – जबरन सेक्टर 84 स्थित कंपनी के परिसर में घुस गई.

उन्होंने गेट तोड़ दिया, सीसीटीवी कैमरे, रिसेप्शन का शीशा और रेलिंग तोड़ दी. कंपनी के कर्मचारियों और पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की, कंपनी का काम रोक दिया, सड़क जाम कर दी, पत्थरबाजी की, आस-पास की कंपनियों, आम लोगों और पुलिस के वाहनों को नुकसान पहुंचाया और कुछ वाहनों में आग लगा दी.

एफआइआर में बीएनएस की धारा 191(1), 191(2), 115(2), 127(2), 333, 324(3) और 352 के साथ-साथ आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 1932 की धारा 7 और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान से बचाव अधिनियम 1984 की धारा 3 और 4 का जिक्र किया गया है.

क्योंकि एफआइआर में एक बहुत बड़ी, बिना नाम वाली भीड़ द्वारा हिंसा, चोट पहुंचाने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और आगजनी जैसी तबाही मचाने का आरोप लगाया गया है. इसलिए इसे इस तरह से तैयार किया गया है कि इससे असीमित संख्या में गिरफ्तारिया संभव हो सकें और जमानत मिलना कठिन हो जाए – खासकर उन लोगों के लिए, जिन्हें बाद में आम आरोपों के आधार पर उस भीड़ से जोड़ा जाता है.

विपुल मोटर्स (फेज-2) की एफआइआर 

165/2026, 15 अप्रैल 2026 को सुबह 5:45 बजे दर्ज की गई थी. इसमें कहा गया है कि 13 अप्रैल 2026 को, जब पुलिस और अन्य बल सेक्टर-84 के मदरसन कंपनी के पास कानून-व्यवस्था की ड्यूटी पर तैनात थे, तो मजदूरी में बढ़ोतरी, ओवरटाइम और बोनस की मांग को लेकर विरोध कर रहे मजदूरों की एक बड़ी भीड़ वहां जमा हो गई. उन्होंने सड़क जाम कर दी और अधिकारियों के साथ बातचीत के बाद, कथित तौर पर हिंसक हो गए.

एफआइआर में कहा गया है कि 450-500 अज्ञात लोगों ने लाठियों, डंडों, ईंटों, पत्थरों आदि से पुलिस पर हमला किया, जानलेवा नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, और जान-बूझकर कई सरकारी और निजी वाहनों – जिनमें पुलिस के वाहन, वायरलेस उपकरण, दस्तावेज और निजी सामान शामिल थे – को निशाना बनाया और उन्हें जला दिया या नुकसान पहुंचाया.

इसमें बीएनएस की धारा 109(1), 191(1), 191(2), 121(2), 132, 333, 125, 127(2), 115(2), 352, 351(3) और 324(6) के साथ-साथ सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम 1984 की धारा 3 और 4, और आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 1932 की धारा 7 का जिक्र किया गया है.

इस एफआइआर में संगठित साजिश, पुलिस पर हमला, जान से मारने की कोशिश, आगजनी, रुकावट डालने और बड़े पैमाने पर संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप जोड़े गए हैं, इसलिए जमानत के मामले में यह विशेष रूप से गंभीर है और इसका इस्तेमाल हिरासत में पूछताछ की दलील देने और रिहाई का और भी मजबूती से विरोध करने के लिए किया जा सकता है.

फेज-1 की एफआइआर

फेज-1 की एफआइआर 172/2026, 13 अप्रैल 2026 की घटनाओं के संबंध में दर्ज की गई है, जिसकी जानकारी पुलिस स्टेशन को 14 अप्रैल 2026 को 1.46 बजे मिली थी. इस एफआइआर में कुछ पहचाने गए लोगों के नाम हैं, ‘150 से ज्यादा’ आरोपियों का जिक्र है, और साथ ही अज्ञात लोगों की बड़ी भीड़ का भी हवाला दिया गया है.

इसमें बीएनएस की धारा 191(2), 115(2), 121(1), 127(2), 324(4) और 3(5) के साथ-साथ आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 1932 की धारा 7 का जिक्र किया गया है.

आरोप यह है कि नामजद लोग और एक बड़ी भीड़ विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में इकट्टा हुई, फेज-1 इलाके के फैक्ट्री गेटों और सड़कों की ओर बढ़ी, रुकावट पैदा की, सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया और पुलिसकर्मियों तथा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के उपायों के खिलाफ बल का प्रयोग किया.

भले ही इस एफआइआर में कुछ दूसरी एफआइआर की तुलना में ज्यादा नाम दिए गए हों, फिर भी इसमें नामजद आरोपों के साथ-साथ एक बड़ी शेष भीड़ का आरोप भी शामिल है; और हिंसा, रुकावट तथा सामूहिक दायित्व से संबंधित गंभीर धाराओं को शामिल करने से सीधे तौर पर जमानत मुश्किल होती है.

क्योंकि इस मामले को इस तरह से तैयार किया गया है कि घटना को किसी अलग-थलग या मामूली उल्लंघन के बजाय एक संगठित समूह हिंसा के रूप में पेश किया जा सके.

पीएस सेक्टर-58 की एफआइआर

पीएस सेक्टर-58 में एफआइआर 116/2026, 14 अप्रैल 2026 को दर्ज की गई थी. इसमें कहा गया है कि 13 अप्रैल 2026 को सुबह लगभग 8:30 बजे, लगभग 1000-1200 उत्तेजित लोग फेज-3 की तरफ से सेक्टर 62 के पास वाली सड़क, इलेक्ट्रॉनिक एरिया और आस-पास के इलाकों की ओर बढ़े. वे विरोध प्रदर्शन की मांगों से जुड़े नारे लगा रहे थे. पुलिस ने भीड़ को रोकने की कोशिश की लेकिन वे आगे बढ़ते रहे.

आरोप लगाया गया है कि भीड़ ने बैरिकेडिंग तोड़ दी, पुलिस को धकेलते हुए आगे बढ़ी, सेक्टर 62 के पास वाली सड़क और आस-पास के रास्तों पर आ गई, ट्रैफिक में रुकावट डाली, सड़क पर चलने वालों में दहशत फैलाई और वहां से गुजर रहे वाहनों तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया.

इसमें बीएनएस की धारा 115(2), 352, 351(2), 3(5), 126, 191, 132 और आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 1932 की धारा 7, तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान से बचाव अधिनियम 1984 की धारा 3(1) के तहत आरोप लगाए गए हैं.

हालांकि इस एफआइआर में गाड़ियों को जलाने का जिक्र नहीं है (जैसा कि एफआइआर 165 में है), फिर भी इसमें भीड़ से जुड़े आरोप, रुकावट डालना, बल का इस्तेमाल और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना शामिल हैं.

इन सभी बातों का हवाला देकर जमानत का विरोध किया जा सकता है, खासकर तब, जब सरकारी वकील भीड़ में सिर्फ मौजूद होने को ही अपराध में शामिल होना मान ले.

पीएस सेक्टर-58 की एफआइआर 

पीएस सेक्टर-58 की दूसरी एफआइआर 117/2026 14 अप्रैल 2026 को दर्ज की गई थी. इसमें बताया गया है कि 13 अप्रैल 2026 को दोपहर 12.00 से एक बजे के बीच, लगभग 500-600 अज्ञात लोगों ने सेक्टर 58 में शिकायतकर्ता की जगह पर तोड़-फोड़ की. कहा गया है, ‘वे बेतरतीब तरीके से अंदर घुसे और लगभग 50 शीशे के पैनलों के साथ-साथ ऑफिस के फर्नीचर और रिकॉर्ड को भी नुकसान पहुंचाया.’

इस एफआइआर में बीएनएस की धारा 191, 333, 324(4) और 3(5) लगाई गई हैं.

ऊपर से देखने पर, यह मामला एफआइआर 165 से छोटा लगता है, क्योंकि इसमें मुख्य रूप से अंदर घुसने, तोड़-फोड़ करने और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की बात कही गई है, न कि कई पुलिस गाड़ियों में आग लगाने जैसी लंबी-चौड़ी कहानी. फिर भी, गैर-कानूनी जमावड़े जैसे आरोप, शरारत और सामूहिक जिम्मेदारी के मिले-जुले आरोप जमानत पर असर डाल सकते हैं. भले ही एफआइआर में किसी व्यक्ति के किसी खास काम का जिक्र न हो. बाद में किसी भी व्यक्ति को भीड़ से जुड़े किसी गंभीर मामले में फंसाया जा सकता है.

पुलिस की ताकत का गलत इस्तेमाल

कुल मिलाकर, ये प्राथमिकियां अपराध को जरूरत से ज्यादा बड़ा बनाकर पेश करने का वही पुराना तरीका दिखाती हैं, जो बड़े मजदूर आंदोलनों के दौरान अक्सर देखने को मिलता है.

ये एफआइआर बार-बार अलग-अलग संख्या वाली (150 से 2000 लोगों तक की) विशाल और बिना नाम वाली भीड़ पर आरोप लगाती हैं, जबकि कभी-कभी ही कुछ गिने-चुने लोगों के नाम बताती हैं, और बाकी समय सामूहिक बयानों पर ही निर्भर रहती हैं.

वे कई कानूनी धाराओं को एक साथ जोड़कर लगाई जाती हैं, जैसे गैर-कानूनी जमावड़ा, रुकावट डालना, चोट पहुंचाना, आपराधिक बल का इस्तेमाल, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और कुछ एफआइआर में तो पुलिस पर हमला करने जैसे बहुत गंभीर आरोप भी शामिल होते हैं.

दस्तावेजों को सीधे तौर पर देखने पर, यह ढांचा पुलिस को मजदूरों के आंदोलन को एक ऐसे बड़े आपराधिक मामले में बदलने की छूट देता है, जिसमें किसी व्यक्ति की पहचान करना गौण हो जाता है और भीड़ में शामिल होने का सिद्धांत ही मुख्य बन जाता है.

इसके गंभीर व्यावहारिक परिणाम होते हैं. एक बार जब किसी विरोध प्रदर्शन को एक बड़ी भीड़ द्वारा रची गई पहले से तय हिंसक साजिश के रूप में पेश किया जाता है, तो जमानत मिलना मुश्किल हो जाता है. बदनामी का बोझ और बढ़ जाता है, और यह पूरी प्रक्रिया ही, दोषी साबित होने से पहले ही, एक सजा की तरह काम कर सकती है.

– आदित्य कृष्ण, सूर्यप्रकाश, सुपांथा सिन्हा


02 May, 2026