आजकल दक्षिण बिहार का गया शहर चर्चा के केंद्र में है. भाजपा-जदयू सरकार का दावा है कि उसने विकास की उलटी गंगा बहाने के मुहावरे को साकार करते हुए पटना से लगभग 50 मीटर समुद्र तल की ऊंचाई पर बसे गया में गंगा का पानी पहुंचा दिया है. यह भी दावा है कि रास्ते में पानी संग्रहण के कई डैम बनाए गए हैं और पूरे इलाके को पानी से भरपूर बना दिया है. वाकई, कमाल हो गया है!
लेकिन, असल सवाल यह है कि इलाके की खेती-किसानी के लिए इस योजना का क्या महत्व है? एक बार जब श्री जीतनराम मांझी नीतीश जी से नाराज हो गए थे तो उन्होंने इस योजना की कलई उजागर की थी. बताया था कि यह पूरी योजना फिजूलखर्ची की योजना है, जिसमें भारी भ्रष्टाचार हुआ है. विशेषज्ञों को भी इस योजना का कोई मतलब समझ में नहीं आता है. यदि मतलब कुछ समझ में आता है तो बस यही कि नीतीश जी भी अब मूल मुद्दों की बजाए ‘हिंदू मन’ को तुष्ट करने में लग गए हैं. भाजपा की तरह शायद उनकी भी सोच बन गई है कि असली मुद्दों की बात मत करो, भावनात्मक और धार्मिक मुद्दों के इर्द-गिर्द ही सारा विमर्श बना रहे तो अच्छा है. हिंदू धर्म में मौत के बाद के जटिल कर्मकांड का एक बड़ा केंद्र गया है. दंतकथा है कि गया में कोई भी व्यक्ति पिंडदान करके अपने पितरों को मोक्ष दिलवा सकता है. जाहिर है ऐसे में गंगा के पानी का गया में होना उनकी धार्मिक आस्था को सहलाता है. लेकिन, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं. सच कहा जाए तो यह योजना दक्षिण बिहार खासकर गया, जहानाबाद व नालंदा में पानी के असली संकट और खेती-बाड़ी से जुड़े मुद्दों से ध्यान भटकाने का एक आसान रास्ता बन गई है.
लेकिन, इतने भर से भी उनका काम नहीं चला. दक्षिण बिहार की विद्रोही परंपरा कायम रही. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी इस इलाके में एनडीए को झटका लगा. तो, एक कदम आगे बढ़ते हुए गया शहर के सम्मान में और वृद्धि की गई और उसके नाम के पीछे ‘जी’ जोड़ दिया गया. अब वह हो गया है ‘गयाजी’. एक और धार्मिक-भावनात्मक खेल! विगत दिनों गया में एनडीए की सभा में नीतीश कुमार सभी धार्मिक संप्रदायों को एक साथ साधने की नाकाम कोशिश करते रहे – ‘बोधगया तो पहले से ही था, अब गयाजी भी हो गया. एक जगह ‘बोध’ है तो दूसरी जगह ‘जी’ है, यह इस इलाके का सम्मान है.’ लेकिन नीतीश कुमार जी भाजपा के इतने दबाव में चले गए हैं कि शायद भूल ही गए हैं कि धार्मिक महिमामंडन से लोगों की जिंदगी में कोई खुशहाली नहीं आती. उससे मगध के परेशान किसानों को कोई राहत नहीं मिलेगी. गया में गंगा के पानी से वहां के खेतों को पानी नहीं मिलने वाला है. एक बौद्धिक विमर्श यह भी है कि ‘गया जी’ के जरिए ‘बोधगया’ को कमतर दिखाने की यह एक सोची समझी चाल है.
बहरहाल, सरकार के धार्मिक एंगेल से किए जा रहे ऐसे तमाम डैमेज कंट्रोल के बावजूद इस इलाके में सत्ता विरोधी तेवर में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आई है. उसी रैली के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में जनता का आक्रोश खुलकर दिखा. जबरदस्ती रैली में बुलाई गई जीविका कार्यकर्ताओं ने मोदी-नीतीश को खूब खरी-खोटी सुनाई. कहा कि इन दोनों ने परेशान कर रखा है – ‘न शिक्षा है, न रोजगार है, केवल ये लोग जुमला फेंकते रहते हैं, जबरदस्ती रैली में लाते हैं.’ ये जीविका कार्यकताएं अरवल जिले से आई थीं. रैली में शामिल नहीं होने पर उनका वेतन काट लेने की धमकी दी गई थी. प्रलोभन देने के लिए सरकारी खजाने का पैसा पानी की तरह बहाया गया थ. दूसरा हिस्सा माइक्रोफाइनेंस कंपनियों से कर्ज लेने वाली महिलाओं का था. उनको धमकी दी गई थी कि यदि रैली में शामिल नहीं होंगी तो कर्ज मिलना बंद हो जाएगा और ब्याज सख्ती से वसूल किया जाएगा. कर्ज वसूली तो अभी बिहार में ऐसे भी आम लोगों का जीना मुहाल किए हुए है. महिलाएं शायद यह सोंचकर आई थीं कि मोदी-नीतीश जी उनके कर्जा पर कुछ बोल दें, लेकिन नहीं, भला वे ऐसा क्यों करेंगे? वे गंगा का पानी भी लाएं और कर्ज भी माफ करें! महिलाएं अपनी आवाज उठाती रहीं लेकिन आत्ममुग्ध प्रधानमंत्री गमछा लहराते रहे!
अब, आगे बढ़ते हैं. 1930 के दशक में बिहार में जब जुझारू किसान आंदोलन खड़ा हुआ था, तब उसके नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती ने एक किताब लिखी थी – गया जिले के किसानों की करूण कहानी. तब से लेकर आज तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है. जमींदारी व्यवस्था खत्म हो गई है. विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं. रोड-हाईवे, गांव-गांव बिजली का हंगामा बरपा हुआ है, लेकिन खेती-किसानी लगातार संकटग्रस्त होती गई. कॉरपोरेटों का हमला तो है ही, लेकिन विकास के तथाकथित शोर के बीच मगध रेंज की पारंपरिक सिंचाई व्यवस्था को पूरी तरह से नष्ट करके इस संकट को कई गुणा बढ़ा दिया गया है. आज पूरा इलाका गंभीर सिंचाई संकट से जूझ रहा है. 20 बरसों के अपने शासनकाल में जल प्रबंधन के मामले में एनडीए सरकार पूरी तरह असफल रही है. कहीं बाढ़ है, तो कहीं सूखा. गोया यह कि यह महत्वपूर्ण मसला सरकार के लिए कोई विषय ही नहीं है. वह तो आत्ममुग्ध है कि उसने गया तक गंगा का पानी पहुंचा दिया. फिर उन किसानों की चिंता कौन करे, जिनके खेतों में अब पानी नहीं पहुंचता, जिनके आहर अब समतल हो गए हैं और जिन पर बिना सोचे-समझे सड़कें बना दी गई हैं.
अब उस फल्गू के बारे में कौन सोचे, जिसके पानी से खुद नीतीश कुमार का गृह जिला सदियों से आबाद होता रहा है. वह नदी अब सूख चुकी है. बालू की जगह मिट्टी की परतें हैं. सच कहें तो वह मर चुकी है. फल्गू एक उथली नदी है जिसमें पानी नहीं ठहरता, लेकिन उसे अंतःसलिला कहा जाता रहा है. ऊपर से एकदम सूखी हुई लेकिन अंदर एकदम साफ पानी की धारा बहती रहती थी. गर्मियों के दिन में लोग जगह-जगह कुंए खोदते थे और राहगीर उसका पानी पीकर अपनी प्यास बुझाते थे. इलाके में पानी का स्तर इससे मेंटेन रहता था. अब अनियंत्रित बालू खनन ने नदी को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है. न बालू बचा न उसकी सतह के नीचे बहने वाला पानी. कई दूसरी धाराओं को बेवजह रोक कर मार दिया गया है.
इसी फल्गू नदी से जुड़ा हुआ था उस इलाके की ऐतिहासिक पईन प्रणाली, अब उसके बारे में कौन सोचे, जिसने मगध में साम्राज्यों के उदय की पटकथा लिखी. सांप की तरह टेढ़े-मेढ़े चलने वाले पईन को पक्कीकरण के नाम पर बांध दिया गया है. अब उसे नाला कहना ज्यादा सही होगा. खेती के लिए बिजली नहीं. पेयजल से खेती इस इलाके में बहुत महंगी है क्योंकि अक्सर जमीन के नीचे पत्थर निकल आते हैं. इस कारण इलाके के किसानों के चेहरे पर हमेशा एक फेफनी पड़ी रहती है, उदासी के स्थायी भाव हैं. लेकिन ‘गयाजी’ शहर में मोदी और नीतीश जी का आत्मप्रलाप लगातार जारी है.
मगध क्षेत्र की पईन प्रणाली इस इलाके की पारंपरिक और प्राकृतिक ढलान पर आधारित ऐतिहासिक सिंचाई व्यवस्था है. यह प्रणाली काफी परिष्कृत और सुव्यवस्थित रही है और दक्षिण बिहार के गया, जहानाबाद, नालंदा जैसे जिलों में सिंचाई के सबसे विश्वसनीय स्रोतों में से एक मानी जाती रही है. इस इलाके में वर्षा अपेक्षतया कम होती है, कृषि भूमि ढलानदार और ऊबड़-खाबड़ है और मिट्टी चिकनी या रेतीली होती है, जिसमें जलधारण क्षमता कम होती है. इसलिए प्राकृतिक रूप से पईन प्रणाली विकसित हुई. गया जिले में इस प्रणाली ने विकास और सामाजिक स्वीकृति का सर्वाच्च स्तर प्राप्त किया. आहर-पईन प्रणाली, अपने नेटवर्क की सहायता से, नदी के पानी को निकटवर्ती कृषि क्षेत्रों में स्थानांतरित करने में मदद करती है, जिससे खरीफ (मुख्यतः धान), रबी (गेहूं या चना) की सिंचाई की जा सकती है. आहर, एक जल संग्रहण प्रणाली है, जिसमें तीन तरफ छोटे तटबंध होते हैं और जो पईन द्वारा लाए गए नदी के संचित जल को संग्रहित करते हैं. उपयुक्त भूभाग में, मुख्य पईन अक्सर आपस में जुड़े हुए पईनों और आहर में विभाजित होकर नदियों के जल को खींचने और संग्रहित करने वाले चैनलों का एक नेटवर्क बनाते हैं.
आहर और पईन भूजल के स्तर को मेंटेन रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं. उदाहरण के लिएए नालंदा जिले में सूरजकुंड के नाम से प्रसिद्ध आहर में भूजल पुनर्भरण के लिए पांच कुएं हैं. आहर में अतिरिक्त पानी को बहाने के लिए अपशिष्ट बांध भी हैं, जिसका उपयोग एक नए पईन के रूप में होता है. जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त पानी को एक छोटी सी धारा में भी छोड़ा जा सकता है.
अब आहर-पईन प्रणाली उपेक्षित अवस्था में हैं. इसी पईन व्यवस्था के कारण मगध की खेती उर्वर हुई और मगध एक साम्राज्य बना. जातक कथाओं में इस प्रणाली का जिक्र लगभग 5000 साल पहले मिलता है. मौर्यकाल में इसे और व्यवस्थित किया गया. नालंदा जिले में जहां यह पानी सबसे अधिक फैलाए वह कम से कम एक हजार साल तक पूरे भारत के राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन का केंद्र बना रहा, क्योंकि कोई भी बड़ी व्यवस्था तभी चल सकती थी जब वह सरप्लस पैदा करे – और मगध के खेत वही उपज दे रहे थे.
इस व्यवस्था का विश्लेषण करने वाले निर्मल सेनगुप्त लिखते हैं, “बाहर से दिखने में आहर-पईन व्यवस्था भले ही जितनी बदरूप और कच्ची लगे, पर यह एकदम मुश्किल प्राकृतिक स्थितियों में पानी के सर्वात्तम उपयोग की अद्भुत देसी प्रणाली है.” सिंचाई के अलावा इस व्यवस्था की एक और उपयोगिता है जिसकी चर्चा बहुत कम हुई है. छोटानागपुर के पठारी इलाके और गंगा घाटी के बीच स्थित होने के चलते दक्षिण बिहार में अक्सर बाढ़ का कुछ पानी समा जाता है और पइनों से बाढ़ के पानी की निकासी तेज हो जाती थी. कुल मिलाकर उसकी तबाही बहुत कम हो जाती है. यह व्यवस्था इतनी प्रभावी थी कि यहां की कुछ नदियों का पूरा पानी सिंचाई में प्रयोग कर लिया जाता है और जब तक ये नदियां गंगा या पुनपुन तक पहुंचें एकदम रीत चुकी होती थीं.
गया जिले की बाढ़ सलाहकार कमेटी ने 1949 में लिखा थाः कमेटी की राय है कि जिले में बाढ़ का असली कारण पारंपरिक सिंचाई प्रणालियों में आई गिरावट है. जमीन ढलवा है और नदियां उत्तर की तरफ कमोवेश समांतर दिशा में बहती हैं. मिट्टी बहुत पानी सोखने लायक नहीं है. अभी तक चलने वाली सिंचाई व्यवस्थाएं पूरे जिले में शतरंज के मोहरों की तरह बिछी थीं और ये पानी के प्रवाह पर रोक-टोक करती थीं.
फल्गू एक उथली नदी है, इसलिए उसका पानी तेजी से फैलता है. उसका पानी सीधे गंगा में नहीं जाता, बल्कि कई हिस्सों में बंटकर मोकामा-बड़हिया टाल का निर्माण करता है. हालांकि, हिंदू धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि फल्गू को सीता का श्राप है, इसलिए वह सूखी रहती है और गंगा से नहीं मिल पाती. (प्रसंगवश अभी पुनौराधाम में सीता मंदिर बन रहा है और गया में फल्गू को सीता के श्राप से मुक्त करवाया जा रहा है. पाठक दोनों प्रसंग को एक साथ जोड़कर देख सकते हैं.) जाहिर है कि फल्गू और मगध को लेकर इस तरह का वितंडा खड़ा करने वाली ब्राह्मणवादी व्यवस्था को अब अपना रंग बदलना पड़ रहा है और इसलिए गया में गंगा का पानी और ‘गयाजी’ नामकरण का ढोल पीटा जा रहा है. फिर भी, वे इस इलाके की प्रतिरोध की ऐतिहासिक परंपरा से परेशान हैं और रहेंगे.
अंग्रेजी राज में, 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने नहर प्रणाली का निर्माण शुरू किया. सोन नदी को बांधकर नहरें निकाली गईं. इससे दक्षिण बिहार के सोन तटीय इलाकों में निश्चित रूप से एक समृद्धि आई. लेकिन, इस प्रणाली से पुनपुन से लेकर फल्गू तक फैले इलाके को कोई फायदा नहीं हो सका और अंग्रेज भी इस इलाके की पारंपरिक पईन सिस्टम को समझ नहीं पाए. नहरों पर ज्यादा ध्यान देने के कारण पईन प्रणाली पतन की ओर बढ़ती गई. उसे पिछड़ी हुई प्रणाली मान लिया गया और उसकी जगह कोई दूसरी प्रणाली विकसित न हो सकी.
फिर भी, 20-25 साल पहले तक यह प्रणाली किसी ने किसी रूप में काम कर रही थी. मुझे अच्छे से अपने बचपन के वे दिन याद हैं जब हमारे गांव का पईन और आहर पानी से लबालब भर जाता था. हमारे गांव का आहर लगभग एक किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ था. जब पईन में पानी कम हो जाता था, तो आहर से खेतों में धीरे-धीरे पानी छोड़ा जाता था और पटवन होती थी. बाढ़ वरदान की तरह होती थी. जब आहर में भी पानी सूखने लगता था, तो लोग उसमें मछली मारते थे. आहर के साथ तालाब और पोखर भी हुआ करते थे. जब आहर पूरी तरह सूख जाते, तो उसमें रबी फसल की बढ़िया खेती होती थी. अब आहर ही नहीं रहा, तो वह खेती भी नहीं रही.
फल्गू नदी पर आजादी के बाद उदेरा स्थान परियोजना के तहत बांध का निर्माण हुआ और उसकी एक शाखा मुहाने को बंद कर दिया गया, जिससे नालंदा जिले में एक नया असंतुलन पैदा हो गया. फल्गू की एक धारा नालंदा के उत्तरी हिस्से में और दूसरी दक्षिणी हिस्से में सिंचाई करती थी. दक्षिणी शाखा के बंद हो जाने से वहां के खेत सूख गए और उत्तरी हिस्से में जलजमाव बढ़ गया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने ही जिले की यह पीड़ा पिछले 20 वर्षों में नहीं दिखी.
मुहाने की जलधारा के साथ-साथ नोनाई, चिरईयां, डोरियावां जैसी धाराएं भी सूख गई हैं. गया तक गंगा का पानी इसी रास्ते से पहुंचता है, लेकिन विडंबना यह है कि बीते 20 सालों में यह इलाका तेजी से सूखे की चपेट में आ गया है. मुहाने नदी पूरी तरह सूख चुकी है – कहीं सड़कें बन गई हैं, तो कहीं मकान. कहा जाता है कि देर-सवेर नदियां अपने पुराने रास्ते पर फिर से बढ़ती हैं. अगर ऐसा हुआ, तो इस बदले हुए नक्शे के इलाके का क्या होगा? अनियंत्रित बालू खनन के कारण फल्गू में अब भयवाह बाढ़ आती है. इस साल वहां दो बार बाढ़ आई और उसने काफी तबाही मचाने का काम किया है.
आहर और पईन के पुनरुद्धार का प्रयास तो नीतीश सरकार के एजेंडे पर कभी भी नहीं रहे. लेकिन, हाल के दिनों में नदियों और पईन सिस्टम को बचाने का आंदोलन नए सिरे से शुरू हुआ है. इस प्रणाली को बचाने के लिए इलाके की भूमि की प्राकृतिक परिस्थितियों, वर्षा के पैटर्न और नदी प्रणाली की समुचित समझ विकसित करनी होगी, क्योंकि इन्हीं आधारों पर यह प्रणाली खड़ी थी. जीर्णाद्धार के बाद जल वितरण के लिए समुदाय नियंत्रित और समानुपातिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए. दक्षिण बिहार की नदियां गंगा की सहायक नदियां हैं, और गाद जमाव ने इनका स्वरूप बदल दिया है – इसे समझे बिना कोई भी पुनर्स्थापन प्रयास टिकाऊ नहीं हो सकता. इसलिए जरूरी है कि आहर-पईन नेटवर्क का विस्तृत अध्ययन किया जाए, समुदाय को इसमें शामिल किया जाए और जल विज्ञान के मापदंडों के साथ एक स्थायी और प्रकृति-संगत मॉडल विकसित किया जाए. इसके बिना दक्षिण बिहार की धरती को फिर से उपजाऊ बनाना नामुमकिन है.
पईन-आहर जैसी ऐतिहासिक और पारिस्थितिक रूप से उपयुक्त जल संरचनाओं के पुनर्जीवन की ईमानदार कोशिश की बजाए ‘गया में गंगा’ जैसे प्रतीकात्मक कार्यकलाप के दिखावे की राजनीति जनता की असली समस्याओं से मुंह चुराने के धार्मिक आवरण के सिवा और कुछ नहीं है. यहां पर रैदास बरबस याद आते हैं . मन चंगा तो कठौती में गंगा!