ईरान पर अमेरिका-इजराइल युद्ध का विरोध करें,
ईरान पर अमेरिका-इजराइल के आपराधिक आक्रामक युद्ध ने पश्चिम एशिया को गंभीर संकट और अनिश्चितता की स्थिति में धकेल दिया है. पिछली बार जब इजराइल ने जून 2025 में ईरान पर हमला किया था, तो उससे इजराइल की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं और इजराइल को बचाने के लिए अमेरिका को युद्ध में शामिल होना पड़ा था. इस बार, इजराइल ने पहले दिन से ही अमेरिका को संयुक्त युद्ध में घसीटा है, लेकिन अमेरिका-इजराइल धुरी की सैन्य तथा वित्तीय शक्ति और पश्चिम एशिया के अधिकांश हिस्से पर इसके राजनीतिक वर्चस्व के बावजूद पश्चिमी दुनिया की तो बात ही छोड़ दें, एक बार फिर यह युद्ध नेतन्याहू और ट्रंप की मनचाहे खाके के अनुसार आगे बढ़ता हुआ नहीं दिख रहा है.
ट्रंप इस युद्ध को अमेरिका में अपने समर्थकों के सामने भी सही ठहराने की स्थिति में नहीं हैं. असल में, 2024 में उन्होंने अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करने और युद्ध में न उतरने का वादा करके राष्ट्रपति चुनाव जीता था. कोई भी अमेरिका के उस झूठ पर यकीन नहीं करता जिसमें कहा गया है कि अमेरिका या उसके किसी भी ‘नैटो’ संश्रयकारी की सुरक्षा के लिए ईरान कोई खतरा पैदा कर रहा है. जून में ईरान पर हमले के बाद ट्रंप ने खुद दावा किया था कि उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म कर दिया है. अगर बात ईरान की बची हुई परमाण्विक क्षमता पर लगाम लगाने की थी, तो ईरान कूटनीतिक समाधान के लिए बातचीत करने को तैयार था. वस्तुतः, ओमान में एक समझौता काफी हद आगे भी बढ़ चला था, लेकिन इजराइल और अमेरिका ने संयुक्त रूप से हमला करके इस प्रक्रिया में रुकावट डाल दी.
दुनिया यकीनन ट्रंप-नेतन्याहू के ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के पीछे की असली वजह जानती है. यह अमेरिका की जानी-पहचानी सरकार बदलने की कोशिश है. फरवरी 1979 में अमेरिका की समर्थक शाह सरकार के हटाये जाने के बाद से ही अमेरिका ईरान पर फिर से नियंत्रण जमाने का मौका ढूंढ रहा था. इराक, लीबिया, सीरिया में एक के बाद एक सरकार बदलने के बाद, अमेरिका-इजराइल धुरी को लगा कि ईरान में भी इसी तरह के अभियान का मौका तैयार है. ईरान में सच में बदलाव के लिए जबरदस्त लड़ाई हो रही है और खेमनेई सरकार ने सत्ता पर काबिज रहने के लिए बेरहमी से जुल्म किया है. ईरान की पितृसत्तात्मक धर्मशासित व्यवस्था के खिलाफ ईरानी महिलाओं की साहसिक लड़ाई ने दुनिया भर में शुभेच्छा पैदा की हैैै. ईरान के सर्वोच्च शासक और उनके इर्द-गिर्द के कई अन्य खासमखास लोगों की हत्या के बाद ट्रंप ने ईरानी लोगों को सत्ता की बागडोर संभालने का न्योता दिया, लेकिन इससे ईरान के अंदर कोई बगावत नहीं हुई.
पश्चिमी देशों में ईरानी प्रवासियों के कुछ हिस्सों में खुशी तो दिखती है, मगर ईरान के अंदर हम अयातुल्ला खेमनेई की ‘शहादत’ और एक प्राइमरी स्कूल में ईरानी लड़कियों के नरसंहार पर दुख और गुस्से का सैलाब देख रहे हैं, यह हिंसा का एक ऐसा पैटर्न है जो गजा में बच्चों और महिलाओं के नरसंहार जैसा है. ईरानी लोग साफ तौर पर खुद का भविष्य बनाने का अपना अधिकार इजराइल और उसके रक्षक अमेरिका द्वारा रची गई शासन परिवर्तन की साजिश के आगे नहीं छोड़ने वाले हैं. दशकों से अमेरिका-इजराइल धुरी द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों और सैन्य दबाव को सफलतापूर्वक झेलने के बाद, ईरानी लोग अमेरिका के कृत्सित सैनिक हमले या मोसाद और सीआइए की खतरनाक मुहिम के मौजूदा दौर में झुकते नहीं दिख रहे हैं.
ईरान के आसपास अमेरिकी ठिकानों पर ईरान के जवाबी हमले ने निश्चित रूप से अमेरिका-इजराइल युद्ध मशीनरी के लिए चुनौतियां खड़ी करना शुरू कर दिया है. अमेरिका को पहले ही कुछ बड़े नुकसानों को स्वीकार करना पड़ा है, जिसमें तीन सैन्य विमान भी शामिल हैं, जिनके बारे में उसका दावा है कि कुवैत में ‘आपसी गोलीबारी’ के दौरान वे नष्ट हुए हैं. ईरान में जल्दी सरकार बदलने के ट्रंप-नेतन्याहू के सपने की जगह उन्हें अब एक ऐसे युद्ध को अनिच्छा से स्वीकार करना पड़ा है जो कम से कम कई हफ्ते तक चलेगा और जिसमें कुछ अमेरिकियों की जान जाएगी – ऐसा कुछ जो ट्रंप अब कहते हैं कि युद्ध में होता ही है. खाड़ी देशों ने युद्ध की सैनिक व आर्थिक कीमत पर अपनी बेचैनी जाहिर करना शुरू कर दिया है, और अमेरिका पर निर्भर अपनी खुद की हुकूमतों की संभावित अस्थिरता उन्हें अलग से बेचैन कर रही है.
युद्ध जितना लंबा चलेगा, दुनिया के अर्थतंत्र पर इसका उतना ही बुरा असर पड़ेगा. तेल और गैस की कीमतें आसमान छू सकती हैं और उनकी सप्लाई लाइनें बाधित हो सकती हैं. यह जंग पहले से ही एक क्षेत्रीय युद्ध जैसा दिख रहा है और अगर चीन सच में वही करता है जो उसने ईरान को “उसकी संप्रभुता, सुरक्षा, क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा” में समर्थन देने के बारे में कहा है, तो दुनिया संभावित तृतीय विश्व युद्ध की ओर बढ़ जा सकती है. भारत की चिंताएं बहुत बड़ी और खास हैं, क्योंकि भारत की ऊर्जा आपूर्ति काफी हद तक अस्थिर पश्चिम एशिया क्षेत्र पर निर्भर करती है और वहां करीब एक करोड़ भारतीय काम करते हैं.
भारत की ऊर्जा आपूर्ति और प्रवासी भारतीय कामगारों की इस बड़ी संख्या की जिंदगी की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि भारत ईरान पर अमेरिका-इजराइल के हमले को तुरंत खत्म करने के लिए सक्रिय होकर काम करे. लेकिन तमाम शुरुआती संकेत न सिर्फ मोदी सरकार की तरफ से पूरी तरह चुप्पी दिखाते हैं, बल्कि कुछ हद तक मिलीभगत भी दिखाते हैं. ईरान पर हमला मोदी के चौंकाने वाले सरकारी इजराइली दौरे में नेतन्याहू के साथ खुलेआम हेलमेल के तुरंत बाद शुरू हुआ, और ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या के बाद भी मोदी सरकार ने भर्त्सना या चिंता का एक शब्द भी नहीं कहा. ऐसी भी खबरें हैं कि इस युद्ध में सैन्य सहयोग देने के लिए भारत को अप्रत्यक्ष रूप से घसीटा जा रहा है.
श्रीलंका के साथ भारत की समुद्री सीमा के पास अमेरिकी पनडुब्बी के हमले में ईरानी युद्धपोत ‘आइरिस डेना’ के डूबने से भारत के करीब पहुंच चुकी जंग का गंभीर सवाल उठ रहा है. वह ईरानी युद्धपोत 16 फरवरी को भारत के बुलावे पर एक अंतरराष्ट्रीय नौसेना अभ्यास में हिस्सा लेने के लिए विशाखापत्तनम बंदरगाह पर आया था और अभ्यास के बाद वापस ईरान लौटते समय उस पर टॉरपीडो से हमला किया गया था. आइरिस डेना पर सवार 180 लोगों में से श्रीलंकाई बचाव मिशन ने अब तक 87 लोगों की लाशें बरामद की हैं, जबकि 78 घायल लोगों को बचाया गया है जिनमें से 31 की हालत गंभीर है. आयोजक देश होने के बावजूद भारत अमेरिकी पनडुब्बी की आपराधिक कार्रवाई की भर्त्सना नहीं कर सका.
कूटनीतिक रिश्तों से परे, भारत और ईरान के बीच करीबी सांस्कृतिक रिश्तों और वार्ताओं का एक लंबा इतिहास रहा है. आज के अंतरराष्ट्रीय रिश्तों के संदर्भ में भी ईरान भारत का एक भरोसेमंद दोस्त रहा है. ईरान के सबसे बुरे संकट के समय में भारत का अमेरिका-इजराइल धुरी का साथ देना विदेश नीति की ऐसी नाकामी है जिसके बचाव में कुछ नहीं कहा जा सकता, और साथ ही यह एक दोस्त और ‘ब्रिक्स’ सदस्य देश के प्रति भारत की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने जैसा भी है. फिलिस्तीनी इलाके पर इजराइल के कब्जे और फिलिस्तीनी लोगों के नरसंहार के सवाल पर मोदी सरकार की शर्मनाक भूमिका के साथ, ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका-इजराइल धुरी का समर्थन भारत की विदेश नीति पर एक धब्बा है और भारत के अपने राष्ट्रीय हितों के साथ गद्दारी भी. हम भारत के लोगों को ईरान की जनता की संप्रभुता और सम्मान के समर्थन में उनके साथ खड़ा होना चाहिए, ईरान के खिलाफ सभी हिंसा को तुरंत खत्म करने पर जोर देना चाहिए और मोदी सरकार को उसकी गैर-जिम्मेदाराना और नाकाबिल भूमिका के लिए जवाबदेह ठहराना चाहिए.