27 दिसंबर 2025 को मीनाबाग, दिल्ली स्थित भाकपा(माले) के संसदीय कार्यालय में का. राजा बहुगुणा की स्मृति सभा आयोजित हुई.
पार्टी केन्द्रीय कमेटी सदस्य राजेन्द्र प्रर्थाेली ने उस दौर को याद करते हुए कहा कि अपने छात्र जीवन से अंतिम समय तक राजा भाई लगातार उत्पीड़ित समाज के लिए संघर्षरत रहे. उत्तराखंड में चिपको आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो, बिंदुखत्ता का भूमि संघर्ष, पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के मजदूर आंदोलन के दमन के खिलाफ, तराई में महिलाओं के उत्पीड़न के खिलाफ महतोष मोड़ आंदोलन, उत्तराखंड राज्य आंदोलन और वर्तमान में फासीवादी सरकार के बुलडोजर राज के खिलाफ बिना थके वह लगातार संघर्षरत रहे. इसी क्रम में आरंभिक दौर में ही वह भारत के क्रांतिकारी वाम आंदोलन के प्रति आकर्षित हो गए. 1980 के दौर में वह पार्टी के संपर्क में आए. इसके बाद उत्तराखंड में पार्टी और राजा बहुगुणा एक दूसरे के पूरक थे.
कामरेड पुरूषोत्तम शर्मा ने का. राजा बहुगुणा को याद करते हुए कहा कि उनकी सबसे बड़ी विशेषता विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी विचार और हस्तक्षेप को मजबूती से आगे ले जाना था. उत्तराखंड राज्य आंदोलन को याद करते हुए पुरूषोत्तम शर्मा ने कहा कि जब पूरे आंदोलन को विचार विहीन और डंडा-झंडा छोड़कर सिर्फ उत्तराखंड राज्य प्राप्ति तक सीमित करने की बात हो रही थी. उस समय राजा भाई ने पूरे उत्तराखंड में पार्टी के झंडे के साथ ‘उत्तराखंड राज्य कैसा होना चाहिए’ और आंदोलन के दोस्त और दुश्मन ताकतों की शिनाख्त करनी चाहिए. इस सवाल पर पार्टी के नेतृत्वकारी साथियों के साथ पूरे उत्तराखंड का दौरा किया और आंदोलन में वाम-लोकतांत्रिक ताकतों की भूमिका मजबूत की.
राजा भाई की सबसे बड़ी ताकत हर मौके पर पार्टी पहलकदमी को खोलना था. वह हर परिस्थिति में हस्तक्षेप किया करते थे. कहा जा सकता है कि वह इसके लिए प्रोग्राम्ड थे. अपने लंबे राजनैतिक जीवन की यात्रा कांग्रेस से शुरू करने के बाद वह हमेशा परिवर्तन की राजनीति की तलाश में रहे. इसी कारण आपातकाल में कांग्रेस का विरोध करते हुए जनता पार्टी के नजदीक पहुंचे और आपातकाल के खिलाफ विरोध में उतर पड़े. जनता पार्टी की सरकार की जनविरोधी नीतियों के कारण वह अधिक समय तक जनता पार्टी के साथ भी नहीं रहे. इस बीच तत्कालीन उत्तर प्रदेश के इस पर्वतीय क्षेत्र में युवा और ग्रामीण अपने वनों को बचाने के संघर्ष को आगे बढ़ा रहे थे. छात्रा राजा बहुगुणा भी इस ओर आकर्षित हुए. वनों को बचाने (चिपको आंदोलन) के इस संघर्ष को राजा भाई के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया. पहले पर्वतीय युवा मोर्चा और उसके बाद उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के नेतृत्व में चले वनों को बचाने के संघर्ष में राजा बहुगुणा उत्तराखंड के मुख्य नेतृत्वकारी साथियों में एक थे.
विभिन्न वक्ताओं ने याद किया कि अपने संपूर्ण जीवन में एक जीवट आंदोलनकारी के साथ-साथ वह पार्टी के ऐसे नेतृत्वकारी साथी थे जिनसे कोई भी सामान्य छात्र, महिला, बुजुर्ग या पार्टी से इतर प्रगतिशील-लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले लोग भी समान रूप से बात-बहस से लेकर अपने निजी जीवन की समस्याओं को लेकर भी बात कर सकते थे.
वर्तमान में भाजपा-आरएसएस के लिए फासीवाद की प्रयोग स्थली के रूप में उत्तराखंड सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है. ऐसे समय में राजा भाई की अनुपस्थिति हमारी पार्टी के लिए ही नहीं वरन् समूचे वाम-लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए भारी क्षति है.
लेखक-पत्रकार चंद्र भूषण, प्रोफेसर प्रकाश चौधरी, जीवन जोशी, गिरिजा पाठक, श्रीकांत आदि ने भी राजा बहुगुणा और उनके साथ अपने संस्मरण साझा किए.
स्मृति सभा का संचालन भाकपा(माले) के दिल्ली राज्य सचिव रवि राय ने किया. सभा में भाकपा(माले) पोलित ब्यूरो सदस्य संजय शर्मा, केन्द्रीय कंट्रोल कमीशन की सदस्य उमा राग, केंद्रीय कमेटी की सदस्य श्वेता राज, प्रेम सिंह गहलावत, लेखक-पत्रकार चारू तिवारी, ग्रीन पार्टी के सुरेश नौटियाल, सहित दिल्ली और उत्तराखंड के विभिन्न साथी, जिन्होंने राजा भाई के साथ किसी ना किसी दौर में काम किया, उपस्थित थे.