21 अक्टूबर 2026 को पटना जिले में भाकपा(माले) के वरिष्ठ नेता का. शिवपूजन यादव निधन हो गया. अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उनको सैनिक अस्पता, दानापुर ले जाया गया जहां अपराहन ढाई बजे उनकी मौत हो गई. वर्ष 2016 में उनकी हार्ट सर्जरी हुई थी और अब भी नियमित चेकअप और इलाज चल रहा था.
एक जनवरी 1954 को पटना जिलांतर्गत नरही गांव (दुल्हिनबाजार प्रखंड) में जन्मे का. शिवपूजन यादव अपने पिता राजनाथ यादव की तीन संतानों में सबसे बड़े थे. उलार-भरतपुरा अवस्थित बंसीधारी हाई स्कूल से हायर सेकेंडरी की पढ़ाई के दौरान ही वे शोषित समाज दल से प्रभावित हुए और जनता के सवालों पर आंदोलन चलाने लगे. आपातकाल के दौरान 23 मार्च 1975 को दुल्हिन बाजार में शहीद-ए-आजम भगत सिंह का शहादत दिवस आयोजित करने के आरोप में विक्रम थाना पुलिस ने उनको गिरफ्तार किया और जेल भेज दिया. 6 महीने के कारावास के दौरान ही उनका भाकपा(माले) नेताओं से संपर्क हुआ. जेल से बाहर आने के बाद वे अपने गांव में सामाजिक उत्पीड़न व अत्याचार के खिलाफ भाकपा(माले) के नेतृत्व में चल रहे आंदोलनों में अगुआ भूमिका निभाने लगे. 1981 में बिहार प्रदेश किसान सभा में नेतृत्वकारी भूमिका निभाते हुए उन्होंने विक्रम थाना घेराव की अगुआई की जिसमें आक्रोशित जनता ने थाना कार्यालय पर कब्जा कर लिया. इस घटना से खार खाई पुलिस ने सीमावर्ती प्रखंड के गांवों मेें जनता के ऊपर बर्बर दमन शुरू किया. पुलिसिया दमन के प्रतिरोध के दौरान 30 अक्टूबर 1981 को चंद्रावती कुमारी, सुरेंद्र सिंह और रामअवध सिंह पुलिस की गोली लगने से शहीद हो गए, दर्जनों घायल हुए और कई जेल भी गए.
आगे चलकर वे बिहार प्रदेश किसान सभा और भाकपा(माले) जिला नेतृत्वकारी टीम में शामिल किए गए. उन्होंने 1995 में विक्रम विधानसभा क्षेत्र और 2000 में मसौढी विधानसभा क्षेत्र से भाकपा(माले) प्रत्याशी के बतौर चुनाव भी लड़ा और सम्मानजनक मत हासिल किए. भूमिगत दौर से लेकर खुली पार्टी के दौर तक तथा भूमि सेना और किसान संघ जैसी निजी सेनाओं तथा पार्टी यूनिटी सरीखे अराजकता वादी संगठनों के साथ संघर्ष तक – तमाम कठिन परिस्थितियों व चुनौतियों उन्होंने बहुत मजबूती के साथ का सामना किया. जब राजनीतिक गतिविधियां संचालित करना आसान नहीं था तब भी वे लगातार जोखिम उठाते हुए संगठन व आंदोलन को विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे और ग्रामीण गरीबों व किसानों के सवालों पर संघर्ष की अगुआई करते रहे.
उनका पार्थिक शरीर को 22 अक्टूबर को उनके गांव लाया गया. उनके अंतिम दर्शन के लिए महिलाओं-पुरुषों, पार्टी कार्यकर्ताओं और सामाजिक और राजनीतिक धाराओं के लोग जुटे और उन्हें भावभीनी अंतिम विदाई दी.