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ट्रांसजेंडर लोगों को औपनिवेशिक दौर के जैसे ही अपराधी मनोवृत्ति का बताने की कोशिश को खारिज करें

ट्रांसजेंडर लोगों को औपनिवेशिक दौर के जैसे ही अपराधी मनोवृत्ति का बताने की कोशिश को खारिज करें

मार्च 2026 में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में संशोधन विधेयक को अचानक पेश किए जाने से पूरे देश में हजारों ट्रांसजेंडर (उभयलिंगी) लोगों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं. यह विधेयक वस्तुतः उन अधिकारों को वापस ले लेता है जिन्हें बड़ी मुश्किल से हासिल किया गया था, और इसे बिना किसी पूर्व परामर्श, सूचना या प्रभावित लोगों के साथ किसी सार्थक बातचीत के बिना ही पेश कर दिया गया. इसके बाद इसे संसद में गैर-मुनासिब जल्दबाजी के साथ पारित करवा दिया गया, और विपक्ष के साथ-साथ ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रतिनिधियों द्वारा उठाई गई गंभीर आपत्तियों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया. इन प्रतिनिधियों ने न केवल इस प्रक्रिया पर, बल्कि प्रस्तावित संशोधनों के मूल तर्क और आवश्यकता पर भी सवाल उठाए थे.

ट्रांसजेंडर लोग सदियों से दक्षिण एशियाई सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा रहे हैं, जिनके संदर्भ प्राचीन पौराणिक कथाओं और लोककथाओं में मिलते हैं. यह सिलसिला मुगल काल तक जारी रहा, जिस दौरान उन्होंने शासन और राजसत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और वे सलाहकार तथा सैन्य नेताओं जैसे प्रभावशाली पदों पर आसीन रहे. ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन अपने साथ प्रणालीगत भेदभाव लाया और ट्रांसजेंडरों को अपराधी मनोवृत्ति का व्यक्ति बताया. इसका चरम रूप ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871’ में देखने को मिला, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को एक ‘आपराधिक जनजाति’ घोषित कर दिया गया. इसके चलते उन्हें पुलिस की निगरानी, आवाजाही व आजीविका कमाने पर प्रतिबंधों, तथा सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा. इसके चलते वे हाशिए पर धकेल दिए गए. ट्रांसजेंडर लोगों को महिलाओं जैसे कपड़े और गहने पहनने, या यहां तक कि सार्वजनिक रूप से गाने-बजाने के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया, और साथ ही साथ उन्हें पुलिस की गंभीर धमकियों और जोर-जबरदस्ती का भी शिकार होना पड़ा. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, 1952 में ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ को आखिरकार निरस्त कर दिया गया. फिर भी, इस अधिनियम ने जिस सांस्कृतिक कलंक, संस्थागत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार को गढ़ा और बढ़ावा दिया था, वह बेरोक-टोक जारी रहा. ट्रांसजेंडर समुदाय ने पूरे देश में अपने जुझारू संघर्षों के माध्यम से इस स्थिति का पूरी हिम्मत के साथ मुकाबला किया.

इन संघर्षों के जरिये सबसे बड़ी सफलता सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के रूप में आई जिसे आम तौर पर ‘नालसा’  फैसला कहा जाता है. इस फैसले में ट्रांसजेंडर लोगों को ‘तीसरा लिंग’ घोषित किया गया, और समाज में उनके लिए समान पहुंच और अवसरों को मान्यता दी गई. ‘नालसा’  फैसले ने ट्रांसजेंडर लोगों के लिए अपने लिंग की पहचान खुद करने के अधिकार को मान्यता दी और ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को कानूनी मान्यता देने की प्रक्रिया शुरू की. इसमें कोई शक नहीं कि ‘नालसा’ फैसले से प्रेरित होकर बाद के समयों में किए गए लगातार संघर्षों और वकालत ने इस समुदाय की सामूहिक मांगों को और मजबूत किया. इसके परिणामस्वरूप, केंद्र सरकार को ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019’ लागू करने के लिए मजबूर होना पड़ा. यह सफर 1852 में औपनिवेशिक ताकतों द्वारा ट्रांसजेंडर लोगों को अपराधी घोषित किए जाने से लेकर कानूनी आदेश के जरिए उनके अधिकारों को मान्यता दिए जाने तक का एक ऐतिहासिक सफर था!

2019 का यह अधिनियम ट्रांसजेंडर समुदाय को मान्यता दिलाने और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ी सफलता थी. इसमें अपने लिंग की पहचान खुद करने का अधिकार, अपनी पहचान से जुड़े दस्तावेज प्राप्त करने का अधिकार, ट्रांसजेंडर लोगों की शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा व स्वास्थ्य से जुड़े अधिकार और उनके साथ होने वाले भेदभाव से सुरक्षा का अधिकार आदि शामिल थे. हालांकि, इस कानून की इस बात के लिए आलोचना भी हुई कि यह ट्रांसजेंडर लोगों की सुरक्षा के लिए कोई संपूर्ण और व्यापक ढांचा उपलब्ध कराने में विफल रहा; फिर भी, यह कानून ट्रांसजेंडर लोगों को मान्यता दिलाने और उन्हें अधिकार प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरूआती कदम साबित हुआ.

लेकिन, यह जीत ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सकी. मोदी सरकार ने 2019 के अधिनियम में 2026 के विवादास्पद संशोधन पेश कर दिए, जिससे यह कानून एक बार फिर औपनिवेशिक काल के संस्थागत भेदभाव के बेहद करीब पहुंच गया. इसके विरोध में पूरे देश में व्यापक प्रदर्शन हुए और ‘राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद’ से कई सदस्यों ने इस्तीफे दे दिए. इन तमाम विरोधें के बावजूद इस संशोधन को संसद में पारित कर दिया गया है और अब यह केवल राष्ट्रपति की औपचारिक मंजूरी का इंतजार कर रहा है.

सबसे पहले, यह संशोधन एक बुनियादी बदलाव लाता है, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति की एक सीमित परिभाषा पेश की गई है. इसमें सिर्फ किन्नर, जोगती, हिजड़ा, अरावनी जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले लोग, इंटरसेक्स विविधताएं, नपुंसक, और वे लोग शामिल हैं जिन्हें शरीर को नुकसान पहुंचाने या किसी प्रक्रिया के जरिए जबरदस्ती ट्रांसजेंडर पहचान दी गई है. यह साफ तौर पर ट्रांस-पुरुषों, ट्रांस-महिलाओं, जेंडरक्वीर (ऐसे लोग जो अपना लिंग समय-समय पर बदल लेते हैं, यानि कि लैंगिक तरलता वाले लोग – अनु.) और गैर-द्विआधारी लोगों को बाहर रखता है, जिन्हें अब तक इसी कानून का संरक्षण मिला हुआ था.

दूसरे, इस संशोधन का खास मकसद खुद से निर्धारित पहचानों को अमान्य कर देना है, जो 2019 के कानून के विधायी इतिहास और विधायी मकसद को पूरी तरह से नकारता है. संशोधन बिल के ‘उद्देश्यों और कारणों’ के विवरण में कहा गया है कि इस कानून का उद्देश्य सिर्फ उन लोगों को सुरक्षा देना है जो ‘जैविक कारणों से, बिना किसी अपनी गलती या बिना अपनी मर्जी के, गंभीर सामाजिक बहिष्कार का सामना करते हैं’, न कि ‘अलग-अलग लिंग पहचान, खुद से पहचानी गई लिंग/जेंडर पहचान, या जेंडर तरलता वाले हर तरह के लोगों को सुरक्षा देना’. यह ‘नालसा’ के बाध्यकारी फैसले के खिलाफ जाता है, जिसने ट्रांसजेंडर लोगों के अपनी लिंग पहचान खुद तय करने के अधिकार को गरिमापूर्ण जीवन जीने का एक जरूरी हिस्सा माना था. यह गलत आधार पर बना और पश्चगामी संशोधन ट्रांसजेंडर लोगों की एक बड़ी श्रेणी के साथ भेदभाव करता है, क्योंकि यह उन्हें उनकी लिंग पहचान के आधार पर कानूनी मान्यता पाने के अधिकार से वंचित कर देता है.

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को परिभाषा संबंधी पाबंदियों के जरिए दोहरी तरह से बाहर करके उन्हें मान्यता न देने का यह तरीका मोदी युग में कानून बनाने की एक खास पहचान बन गया है. नए श्रम कानूनों के जरिए करोड़ों मजदूरों को, जिन्हें अब तक श्रम कानूनों के तहत सुरक्षा मिली हुई थी, अब परिभाषा संबंधी पाबंदियों के कारण कानून के दायरे से बाहर धकेल दिया गया है. और इसी तरह, हम ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ के जरिए लोगों की नागरिकता और वोट देने के अधिकारों को खत्म होते हुए भी देख रहे हैं.

तीसरी बात यह कि यह संशोधन एक ऐसी मेडिकल जांच को जरूरी बनाता है जो लोगों की निजता और अपने शरीर पर उनके अधिकार का हनन करती है. 2019 के कानून के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के तौर पर मान्यता पाने की जो प्रक्रिया पहले काफी सीधी-सादी थी, उसकी जगह अब एक ऐसी अवरोधी प्रक्रिया बन गई है, जिसमें डिप्टी कमिश्नर द्वारा पहचान पत्र के लिए किसी भी आवेदन की जांच करने से पहले एक मेडिकल बोर्ड की सिफारिश लेना अनिवार्य है. यह ‘नालसा’ के उस फैसले का दूसरा बड़ा उल्लंघन है, जिसमें मेडिकल जांच की जरूरत को साफ तौर पर खारिज कर दिया गया था और खुद को अपनी मर्जी से पहचानने के मूल अधिकार को मान्यता दी गई थी.

चौथी बात यह कि यह अवरोधी प्रक्रिया, अपने खाके के हिसाब से ही लोगों को बाहर रखने वाली है और इसका मकसद जान-बूझकर इतनी ज्यादा सरकारी कागजी कार्रवाई जरूरी बना देना है, जिससे कि उन लोगों को सुरक्षा ही न मिल पाए जिन्हें यह कानून कथित तौर पर सुरक्षा देना चाहता है. यह बात सभी जानते हैं कि ट्रांसजेंडर लोग, जिन्हें गंभीर सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है और जिन्हें यह सीमित परिभाषा सुरक्षा देना चाहती है, आम तौर पर आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से हाशिए पर पड़े समुदायों से आते हैं. एक ऐसे कानूनी ढांचे की जगह, जो लोगों को अपनी मर्जी से लैंगिक पहचान की आजादी देता था, एक ऐसा जटिल ढांचा, जो बहुत ज्यादा प्रशासनिक और मेडिकल जांच-पड़ताल से भरा हुआ है, इस बात की पूरी गारंटी कर देता है कि इस कानून के तहत मिलने वाली सुरक्षा इन लोगों की पहुंच से बाहर हो जाए. यह मोदी शासन का एक दूसरा लाक्षणिक पहलू है, जो एक ओर कॉरपोरेट लूट और प्राकृतिक संसाधनों के निजीकरण को बढ़ावा देने वाले अर्थव्यवस्था के विनियमन, और दूसरी तरफ कमजोर समुदायों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों पर सख्त पुलिसिया निगरानी को सामने लाता है.

अंत में, धारा 18 में किया गया संशोधन कुछ नए अपराधों को जोड़ता है. इसके तहत, किसी भी व्यक्ति को “ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने, स्वीकार करने या बाहरी तौर पर प्रदर्शित करने के लिए” मजबूर करना या दबाव डालना एक अपराध माना जाएगा. यह संशोधन ट्रांसजेंडर पहचान को व्यक्तिगत स्वायत्तता का प्रतीक मानने के बजाय उसे किसी दबाव या जबरदस्ती का नतीजा बताकर कलंकित करता है और उसे एक बीमारी के तौर पर पेश करता है. इसके अलावा, यह संशोधन हिजड़ा जमात, किन्नर अखाड़ा जैसे समुदायों और उन्हें सहयोग देने वाले समूहों को भी कानूनी कार्रवाई के दायरे में ला सकता है. ऐसे में, समुदाय द्वारा दिए गए सहयोग और एकजुटता को गलत तरीके से दिया गया प्रलोभन या उकसावा समझा जा सकता है. यह स्थिति उस सामाजिक सहयोग को कमजोर करती है, जो ऐतिहासिक रूप से ट्रांसजेंडर लोगों के अस्तित्व और उनके कल्याण के लिए बेहद जरूरी रहा है. ये प्रावधान हमें औपनिवेशिक काल के ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871’ की याद दिलाते हैं – उस कानून के तहत भी, ट्रांसजेंडर लोगों को महिलाओं की तरह कपड़े पहनने या श्रृंगार करने के लिए अपराधी ठहराया जाता था. ट्रांसजेंडर व्यक्ति के अपने जन्म के परिवार से बाहर मौजूद सहयोग तंत्र के खिलाफ इन प्रावधानों का गलत इस्तेमाल किया जा सकता हैं, जिससे ट्रांसजेंडर व्यक्ति के लिए खतरा और भी बढ़ जाएगा.

संघ परिवार के व्यापक विविधता-विरोधी और अधिकार-विरोधी एजेंडे की दिशा में ही ट्रांसजेंडर अधिनियम, 2019 में किए गए इस संशोधन के साथ-साथ, जिस तरह से इस संशोधन को जबरदस्ती पारित कराया गया, वह कानून बनाने और संसदीय प्रक्रिया को मजाक बना देने के भाजपा के सुनियोजित प्रयास के अनुरूप है. संशोधन विधेयक पेश किए जाने के तुरंत बाद, ‘ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय परिषद’ (एनसीटीपी) के दो सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया, क्योंकि संशोधन विधेयक को आगे बढ़ाने का निर्णय एनसीटीपी के साथ बिना किसी औपचारिक परामर्श के लिया गया था – यह उस मूल उद्देश्य को ही कमजोर करता है जिसके लिए इस परिषद की स्थापना की गई थी. भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त सलाहकार समिति की अध्यक्ष, न्यायमूर्ति आशा मेनन (सेवानिवृत्त), जिन्हें ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019’ के तहत मौजूदा प्रणालियों को मजबूत करने के उपायों पर नजर रखने और कानून में किसी भी कमी का आकलन करने का कार्य सौंपा गया था, ने सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया है कि सलाहकार समिति से कोई परामर्श नहीं किया गया था, और इसलिए यह संशोधन एक बड़ा झटका के रूप में आया है और इस समुदाय को मुख्यधारा में लाने के प्रयासों के लिए जबरदस्त धक्का साबित होंगा.

केंद्र सरकार द्वारा ट्रांसजेंडर समुदाय पर किये गए इस हमले और ट्रांसजेंडर लोगों को कलंकित करने व उन्हें अपराधी ठहराने के उपनिवेशकालीन प्रयासों को फिर से थोपे जाने की कड़ी निंदा और विरोध किया जाना चाहिए. यह विरोध भाजपा और उसकी मूल संस्था आरएसएस के खिलाफ तथा लोकतंत्र और संविधान को कमजोर करने की उनकी परियोजना के खिलाफ लोगों के एक दृढ़ आंदोलन का हिस्सा होना चाहिए.


04 April, 2026