-- कुमार दिव्यम
बिहार में अब यह लगभग एक स्थापित सच बन चुका है कि नौजवानों के सड़क पर उतरे बिना कोई भी बहाली प्रक्रिया पूरी नहीं होती. बहाली की मांग से शुरू होने वाला संघर्ष विज्ञापन जारी करवाने तक चलता है, फिर परीक्षा की तारीख के लिए आंदोलन, और परीक्षा हो जाने के बाद पेपर लीक व अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन. जैसे बहाली की प्रक्रियाएं चरणों में चलती हैं, वैसे ही आंदोलनों के भी अपने चरण बन चुके हैं.
भाजपा की नई सरकार बनने के बाद एक बार फिर बिहार के छात्र और नौजवान सड़कों पर हैं. पटना से लेकर जिलों तक प्रदर्शन हो रहे हैं. कहीं TRE&4 की बहाली की मांग है, कहीं AEDO परीक्षा के पेपर लीक के खिलाफ गुस्सा है, तो कहीं NEET पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन. जगह-जगह केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठ रही है.
भरपूर चुनावी वादे और अधूरी बहालियां
बिहार में शिक्षक भर्ती परीक्षा, जिसे संक्षेप में TRE कहा जाता है, लंबे समय से लाखों युवाओं की उम्मीद का केंद्र रही हैं. छात्र लगातार TRE-4 का विज्ञापन जारी करने की मांग कर रहे हैं. विधानसभा चुनाव के दौरान एनडीए ने युवाओं के आक्रोश को शांत करने के लिए चुनाव बाद बहाली निकालने का वादा किया था. लेकिन यह वादा भी बाकी चुनावी वादों की तरह “जुमला” साबित हुआ और आज तक बहाली लंबित है.
TRE-4 के लिए पहले 1.2 लाख पदों पर बहाली की बात कही गई; उसके बाद 46 हजार पदों की घोषणा की गई! अब कहा जा रहा है कि केवल 20 हजार पदों पर बहाली की जाएगी! ये युवाओं के साथ छल नहीं तो क्या है?
इसी मांग को लेकर पटना में बड़ी संख्या में छात्र-नौजवान जुटे. उन्होंने मार्च निकाला, नारे लगाए और सरकार से जवाब मांगा. लेकिन जवाब के बदले उन्हें लाठियां मिलीं.
पटना की सड़कों पर लाठीचार्ज
प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस ने बेरहमी से लाठियां बरसाईं. कई छात्रों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. पांच हजार से अधिक अज्ञात प्रदर्शनकारियों पर मुकदमा दर्ज किया गया.
सबसे ज्यादा आक्रोश उस दृश्य को लेकर था जिसमें महिला अभ्यर्थियों पर भी निर्ममता से लाठीचार्ज किया गया. जमीन पर गिरी महिला प्रदर्शनकारियों को पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा लात से मारे जाने के आरोप लगे. छात्रों और सामाजिक संगठनों ने इसे राज्य का दमनकारी चेहरा बताया.
छात्रों का कहना है कि सरकार युवाओं से संवाद करने के बजाय आंदोलनों को कुचलने की नीति पर चल रही है.
AEDO परीक्षा और फिर वही पेपर लीक
इधर AEDO परीक्षा आयोजित हुई. लेकिन परीक्षा केंद्रों से बाहर निकलते ही अभ्यर्थियों के बीच निराशा फैल गई. आरोप लगा कि पेपर फिर लीक हो गया.
बिहार में पेपर लीक अब एक अपवाद नहीं, बल्कि एक स्थायी संकट बन चुका है. छात्रा संगठनों का आरोप है कि परीक्षा आयोजित करवाने वाली निजी कंपनियों और अधिकारियों की मिलीभगत से यह पूरा खेल चलता है. बावजूद इसके सरकार के पास न कोई ठोस नीति दिखाई देती है और न ही कोई निर्णायक कार्रवाई.
AEDO परीक्षा आयोजित करने की जिम्मेदारी ‘मेसर्स साईं एडू केयर प्राइवेट लिमिटेड’ नामक कंपनी को दी गई थी, जिसका संचालन जयपुर से होता है. छात्रों और विपक्षी संगठनों ने आरोप लगाया कि यह कंपनी पहले से विवादों और गड़बड़ियों के आरोपों में घिरी रही है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर बिहार लोक सेवा आयोग ने उसे परीक्षा आयोजित करने का ठेका क्यों दिया.
इस मामले में उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज हो गई है.
तेज होता विरोध और बढ़ता दमन
पेपर लीक और TRE-4 बहाली के समर्थन में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) और इन्कलाबी नौजवान सभा (आरवाईए) ने 14 मई 2026 और 24 मई 2026 को राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन आयोजित किया.
इन प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में छात्रा शामिल हुए. मांग साफ थी – पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, पेपर लीक पर रोक, दोषियों पर कार्रवाई और लंबित बहालियों को जल्द पूरा करना. लेकिन सरकार ने संवाद की जगह मुकदमों और दमन का रास्ता चुना.
## “कॉकरोच” और युवाओं का गुस्सा
इसी बीच एक बयान ने देशभर के युवाओं के गुस्से को और भड़का दिया. भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के एक बयान को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया शुरू हो गई. दावा किया गया कि उन्होंने बेरोजगार युवाओं और अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्टों की तुलना “कॉकरोच” से की.
इसके बाद सोशल मीडिया पर “कॉकरोच कैंपेन” चल पड़ा. बेरोजगारी, महंगाई और पेपर लीक से परेशान युवाओं ने व्यंग्य के तौर पर “कॉकरोच पार्टी ऑफ इंडिया” नाम से ऑनलाइन अभियान शुरू कर दिया. देखते ही देखते लाखों युवा उससे जुड़ गए और उसके फाॅलोअर्स करोड़ों की चर्चा में आने लगे.
सरकार ने इस डिजिटल विरोध पर भी दमन चक्र चलाया गया. आरोप लगे कि सोशल मीडिया हैंडल ब्लाॅक किए गए और वेबसाइट हटाई गई.
सड़कों और स्क्रीन पर संघर्ष
बिहार और देश का युवा आज दो मोर्चों पर लड़ता दिखाई देता है – सड़कों पर और सोशल मीडिया पर. एक तरफ नौकरी की मांग, पारदर्शी परीक्षाओं और सम्मानजनक व्यवहार की लड़ाई है; दूसरी तरफ दमन, मुकदमे और बर्बरतापूर्ण लाठीचार्ज.
बहाली की हर अधूरी प्रक्रिया अब सिर्फ प्रशासनिक मामला नहीं रह गई है. वह राजनीतिक सवाल बन चुकी है. बिहार के युवाओं के लिए रोजगार अब केवल नौकरी पाने का मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व, अधिकार और सम्मान की संघर्ष बन गया है.