अगर यह यूक्रेन होता तो दुनिया भर की सुर्खियां चीख-चीख कर बतातीं. मगर यह फिलिस्तीन है – और इसलिए मीडिया चुप है. मुख्यधारा का मीडिया सच्चाई, इंसानी हमदर्दी और प्रेस की आजादी के बुनियादी उसूल को बेच चुका है. गाजा में इजराइल के जनसंहार में अब तक जितने पत्रकार मारे गए हैं, वो पिछले सात बड़े अमरीकी युद्धों में मारे गए पत्रकारों की कुल गिनती से भी ज्यादा है. ये वही मंजर है जिसे इतिहास ने पत्रकारों के लिए ‘सबसे खतरनाक जंग’ कहा जा रहा है.
फासीवाद को सबसे ज्यादा खौफ अपने जुर्म के पर्दाफाश से होता है. वो सिर्फ अंधेरे, खामोशी और झूठी रजामंदी में पलता है. किसी एक पत्रकार का कत्ल दरअसल सिर्फ एक जान का कत्ल नहीं, बल्कि सच्चाई, याददाश्त और जवाबदेही की संभावना का कत्ल है. ये खुद इतिहास पर हमला है – ये पैगाम है कि तबाही की मशीनरी न सिर्फ जिस्मों को मिटाएगी बल्कि उनके गम और जुल्म के रिकॉर्ड को भी मिटा डालेगी. नेतन्याहू की फासीवादी राजनीति इन्हीं जुर्मों पर टिकी है.
ये इत्तेफाक नहींए बल्कि उनके फासिस्ट शासन की बुनियाद हैं. घरों पर बमबारी करना, कैमरों को खामोश करना, बच्चों को आंकड़ों में बदल देना – यही उस राजनीतिक हुकूमत के हथियार हैं जो अपनी जीत को जनसंहार और जातीय सफाये की नीति में मापती है. ये वही स्क्रिप्ट है जो हमने पिनोशे के चिली, मुसोलिनी के इटली और नाजी जर्मनी में देखी थी – जहां हुक्मरानों ने न सिर्फ असहमति जताने वालों को मिटाया बल्कि उन गवाहों को भी खत्म किया जो उनके जुल्म की गवाही दे सकते थे.
गाजा में औरतों और बच्चों का जनसंहार कोई ‘जंग की दुखद गलती’ या ‘हमास की वजह से सेल्फ डिफेंस की कार्रवाई’ नहीं है. ये ताकत और जनसंहार की खुली ऐलानिया नुमाइश है. इस मशीनरी का असली निशाना सिर्फ फिलिस्तीनी जिस्म नहीं, बल्कि सच्चाई खुद है. मकसद सिर्फ जमीन छीनना नहीं, बल्कि एक कौम की याददाश्त, उसकी इज्जत और इंसाफ की मांग को भी मिटाना है. ये दरअसल इतिहास की संभावना के खिलाफ जंग है – वो जंग जिसे वही लोग लड़ते हैं जो समझते हैं कि उन्हें कभी जवाबदेह नहीं ठहराया जाएगा. यही फासीवाद का असल चेहरा है; कुछ जिंदगियां बेकार हैं, कुछ आवाजें बर्दाश्त से बाहर हैं, और कुछ जुर्म हमेशा दंड से बचेंगे.
जब फासीवाद पत्रकारों को मारता है, तो वो दरअसल पत्रकारिता की रूह को खत्म करना चाहता है. क्योंकि असली पत्रकारिता याद को जिंदा रखने का अमल है, भुलाने से इंकार है, और वो हिम्मत है जो सत्ता छुपाना चाहती है. सब कुछ दांव पर लगाकर सच्चाई कहना ही फासीवाद को उसकी जड़ों में चोट पहुंचाना है. यही वजह है कि फिलिस्तीन में पत्रकारों का सिलसिलेवार कत्ल हो रहा है.
25 अगस्त 2025 को गाजा पट्टी के नासिर अस्पताल पर इस्राइली हमले में 22 लोग मारे गए, जिनमें पांच पत्रकार भी शामिल थे. दुनिया भर में इसकी निंदा होने के बाद इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दफ्तर से बयान जारी किया गया कि इस्राइल “पत्रकारों के काम की कदर करता है.” लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी बताते हैं.
करीब दो साल से जारी इस जंग में अब तक 7 अक्टूबर, 2023 से – गाजा पर – इजराइल के युद्ध में कम से कम 278 पत्रकार और मीडियाकर्मी मारे गए हैं, जिनमें से अधिकांश फिलिस्तीनी हैं. इन आँकड़ों को इकट्ठा करने वाली संस्था कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स ने इस्राइल पर आरोप लगाया है कि उसने पत्रकारों को चुप कराने और खत्म करने की सबसे घातक और सुनियोजित मुहिम छेड़ी है, जैसी इस कभी इतिहास ने नहीं देखी. संस्था के अनुसार, “फिलस्तीनी पत्रकारों को इस्राइली फौज सीधा निशाना बना रही है, उन्हें मार रही है, गिरफ्तार कर रही है और उनकी रिपोर्टिंग का बदला लेने के लिए यातनाएं दे रही है.”
आधुनिक फलस्तीनी इतिहास का शोध करने वाले विद्वानों का कहना है कि गाजा में रिपोर्टरों, फोटोग्राफरों और मीडिया कर्मियों की यह हत्या कोई नई बात नहीं है, बल्कि 1967 से जारी उस लंबे इतिहास की कड़ी है, जब छह दिन की जंग के बाद इस्राइल ने पश्चिमी तट, पूर्वी यरुशलम और गाजा पर कब्जा किया था और फलस्तीनी पत्रकारों को दबाने की कोशिशें शुरू की थीं.
आज हालात और गंभीर इसलिए हैं क्योंकि इस्राइल ने विदेशी मीडिया को गाजा में दाखिल होने पर पाबंदी लगा रखी है. ऐसे में वहां के स्थानीय फलस्तीनी पत्रकार ही जनसंहार और तबाही के गवाह बन रहे हैं और उसे पूरी दुनिया तक पहुंचा रहे हैं. यही वजह है कि अक्टूबर 2023 से अब तक मारे गए लगभग 278 पत्रकारों में ज्यादातर फलस्तीनी हैं. अक्सर वे लोग वहां पहुंचते हैं जहां बम गिर रहे होते हैं, जबकि बाकी सब लोग वहां से भाग रहे होते हैं. इस वजह से कई बार वे “डबल टैप” हमलों का शिकार बन जाते हैं, यानी पहले बमबारी होती है, और जब डॉक्टर, रेस्क्यू टीम और पत्रकार पहुंचते हैं तो दोबारा हमला किया जाता है.
गाजा से रिपोर्टिंग जारी रखने वालों पर इसका बेहद निजी और दर्दनाक असर भी पड़ा है. 25 अक्तूबर 2023 को अल-जजीरा के गाजा ब्यूरो प्रमुख वाएल अल-दहदूह लाइव रिपोर्टिंग कर रहे थे, तभी उन्हें खबर मिली कि इस्राइली हवाई हमले में उनकी पत्नी, दो बच्चे और पोता मारे गए हैं. अगले ही दिन उन्होंने फिर कैमरे के सामने आकर रिपोर्टिंग जारी रखी.
लेकिन यह सिलसिला रुका नहीं. 10 अगस्त 2025 को गाजा सिटी में इस्राइली फौज ने अल-जजीरा के वरिष्ठ संवाददाता अनस अल-शरीफ को मार डाला, जो महीनों से बमबारी के बीच सड़कों पर डटे रहे थे. उसी हमले में उनके पांच साथी पत्रकार भी मारे गए.
25 अगस्त को नासिर अस्पताल पर हुआ हमला इसी खूनी पैटर्न का हिस्सा था. इस हमले में मारे गए पांच पत्रकारों में फ्रीलांसर भी थे, जो रॉयटर्स और एसोसिएटेड प्रेस जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के लिए काम करते थे. यही वे संस्थान हैं, जो लगातार इस्राइल से गाजा में स्वतंत्र मीडिया को प्रवेश की अनुमति देने की मांग कर रहे हैं. हाल ही में 27 देशों का एक समूह भी इस मांग को लेकर आगे आया है.
लेकिन इस्राइल अब भी इन मांगों को ठुकरा रहा है. नतीजा यह है कि गाजा में इस्राइल के लगातार होते हमलों के मुख्य गवाह और रिपोर्टर वही फलस्तीनी पत्रकार हैं – और रिपोर्टिंग करते हुए उनकी जिंदगियां और ज्यादा खतरे में हैं. सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय बिरादरी कभी इस्राइल को इसके लिए जवाबदेह ठहराएगी?
इन हत्याओं के खिलाफ रायटर की पत्रकार वैलेरी जिंक ने पश्चिमी मीडिया को अपमानजनक इजराइली दुष्प्रचार का माध्यम बननेए युद्ध अपराधें को छुपाने और पीड़ितों के साथ अमानवीय व्यवहार करने, और फिलिस्तीनी पत्रकारों और नरसंहार में मारे गए अनगिनत लोगों के लिए मौत के वारंट पर हस्ताक्षर करने के लिए धन्यवाद कहते हुए दुनिया की प्रमुख समाचार एजेंसी रायटर से अपना इस्तीफा देते हुए कहा है : पिछले आठ साल से मैं रायटर्स न्यूज एजेंसी के लिए फ्रीलांस काम कर रही थी. मेरी तस्वीरें कनाडा के प्रेयरी प्रांतों से लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स, अलजजीरा और दुनिया भर के दूसरे मीडिया आउटलेट्स में छपती रही हैं. मगर अब रायटर्स के साथ मेरा रिश्ता बनाए रखना नामुमकिन हो गया है, क्योंकि उसने गाजा में 245 पत्रकारों की योजनाबद्ध तरीके से की जा रहे जनसंहार को जायज ठहराने और आसान बनाने में सीधा रोल अदा किया है. मैं अपने फिलिस्तीनी साथियों की शहादत के आगे कम से कम इतना तो कर सकती हूं – और बहुत कुछ बाकी है.
10 अगस्त को जब इस्राइल ने अनस अल-शरीफ और गाजा सिटी में पूरी अलजजीरा टीम को मार गिराया, तब रायटर्स ने इस्राइल का बेहूदा और तथ्यहीन झूठ छापा कि अल-शरीफ हमास का ऑपरेटिव था. ये वही झूठ है जिसे बार-बार मीडिया आउटलेट्स, जिनमें रायटर्स भी शामिल है, दोहराते और वैधता देते रहे हैं. इस्राइल की प्रोपेगैंडा मशीनरी को आगे बढ़ाने की रायटर्स की ये तैयारियाँ उनके अपने रिपोर्टरों को भी इस जनसंहार से नहीं बचा सकीं – आज सुबह नासिर हॉस्पिटल पर हुए हमले में 20 लोगों के साथ पाँच और पत्रकार मारे गए, जिनमें रायटर्स का कैमरामैन हुस्साम अल-मस्री भी शामिल था. ये हमला “डबल टैप” स्ट्राइक कहलाता हैख्रइस्राइल पहले किसी स्कूल या हॉस्पिटल जैसे सिविलियन टार्गेट को बम से उड़ाता है, फिर जब डॉक्टर्स, रेस्क्यू टीम और पत्रकार वहाँ पहुँचते हैं, तो दोबारा हमला करता है.
पश्चिमी मीडिया सीधा जिम्मेदार है उन हालात को पैदा करने में जिनमें ये सब हो रहा है. जैसा कि ड्रॉप साइट न्यूज के जेरमी स्काहिल ने कहा – “हर बड़ा मीडिया आउटलेट – न्यूयॉर्क टाइम्स से लेकर वॉशिंगटन पोस्ट तक, एसोसिएटेड प्रेस से लेकर रायटर्स तक – इस्राइली प्रोपेगैंडा के मुख्यपत्र की तरह काम कर रहा है. युद्ध अपराधों को धो-पोंछकर पेश करना, पीढ़ियों की इंसानियत मिटाना, और अपने ही साथी पत्रकारों व सचाई की रिपोर्टिंग के फर्ज को छोड़ देना. यही उनका काम बन चुका है.”
इस्राइल के झूठे और जनसंहारक दावों को बिना किसी पड़ताल के दोहराते हुए – यानी पत्रकारिता की सबसे बुनियादी जिम्मेदारी को ठुकराते हुए . पश्चिमी मीडिया आउटलेट्स ने ये मुमकिन किया है कि सिर्फ दो साल में गाजा की इस छोटी सी पट्टी पर इतने पत्रकार मारे गए जितने पहली-दूसरी विश्वयुद्ध, कोरिया, वियतनाम, अफगानिस्तान, यूगोस्लाविया और यूक्रेन की जंगों में मिलाकर भी नहीं मारे गए थे, और इसके साथ ही पूरी आबादी को भूख से मारना, बच्चों को तबाह करना और लोगों को जिंदा जला देना जारी है.
ये हकीकत कि अनस अल-शरीफ का काम रायटर्स के लिए पुलित्जर अवॉर्ड जीत चुका था, उन्हें उसके बचाव में खड़ा होने पर मजबूर नहीं कर सकी. जब इस्राइली फौज ने उसे ‘हिट लिस्ट’ में डाल दिया और उसे हमास व इस्लामिक जिहाद का मिलिटेंट करार दिया, तब भी रायटर्स चुप रहा. जब उसने अंतरराष्ट्रीय मीडिया से गुहार लगाई कि उसे बचाया जाए, क्योंकि इस्राइली फौजी प्रवक्ता ने एक वीडियो डालकर साफ कर दिया था कि वे उसके जनाजे की तैयारी कर रहे हैं – तब भी रायटर्स खामोश रहा. और जब हफ्तों बाद उसे शिकार बनाकर मार दिया गया, तब भी रायटर्स ने उसकी मौत की सच्चाई ईमानदारी से रिपोर्ट नहीं की.
पिछले आठ साल में रायटर्स के लिए किया अपना काम मुझे हमेशा कीमती लगा. मगर अब इस प्रेस कार्ड को पहनना मेरे लिए सिर्फ शर्म और गम का सबब है. मुझे नहीं मालूम कि गाजा के पत्रकारों – जो सबसे बहादुर और बेहतरीन हैंख्रकी हिम्मत और कुर्बानी का असली सम्मान कैसे किया जाए. लेकिन अब से मैं अपनी हर कोशिश और योगदान उसी तरफ मोड़ूंगी.