नवादा जिला के सीतामढ़ी थाना के जमुई पकड़िया निवासी मुसहर जाति के संतोष मांझी, जो एक निजी क्लीनिक में कम्पाउंडर का काम करते थे, की 2 अगस्त की रात को अमानवीय तरीके से हत्या कर दी गई.
परिजनों के अनुसार, पहले उनकी दोनों आंखें लोहे की रॉड से फोड़ी गईं और लाठी-डंडों से बेरहमी से पीटा गया. जब पत्नी प्रतिमा देवी ने क्लीनिक संचालक निर्भय कुमार पांडेय से बात की तो उसने बताया कि ‘संतोष का एक्सीडेंट हो गया है, तुम अकेले आओ.’ जब प्रतिमा देवी अपने ससुर के साथ हिसुआ पहुंचीं तो उन्होंने देखा कि संतोष मांझी बुरी तरह घायल अवस्था में थे – दोनों आंखें फूटी हुईं थीं और मुंह से खून बह रहा था.
उस समय तक संतोष जीवित थे और उन्होंने पत्नी से कुछ बात भी की. क्लीनिक संचालक ने पत्नी को धमकाया कि किसी को कुछ नहीं बताना है. संतोष को एक इंजेक्शन लगाया गया जिसके बाद वे बेहोश हो गए. इसके बाद उन्हें नवादा के एक निजी क्लीनिक में भर्ती कराया गया, जहां उनकी मृत्यु हो गई. परिजनों को जान से मारने की धमकी देकर शव को जबरन गांव लाकर जला दिया गया. जब परिजन हिसुआ थाना में लिखित शिकायत दर्ज कराने पहुंचे तो थानेदार ने गाली-गलौज कर मुकदमा लेने से मना कर दिया. बाद में एसपी के हस्तक्षेप पर घटना के एक महीने 10 दिन बाद एफआईआर दर्ज की गई.
इस बर्बर हत्या की जांच करने के लिए भाकपा(माले) का जिला स्तर पर एक जांच दल पीड़ित परिवार से मिला और पूरी जानकारी ली. जांच दल ने पाया कि पूरा इलाका स्वर्ण सामंती दबदबे वाला है और परिवार आज भी गहरे दहशत में है. जांच दल में जिला सचिव का. भोला राम, का. अजीत कुमार मेहता, मेवालाल राजवंशी और श्यामदेव विश्वकर्मा प्रमुख रूप से शामिल थे.
18 सितंबर को भाकपा(माले) विधायक गोपाल रविदास की अगुआई में एक उच्चस्तरीय जांच दल ने संतोष मांझी के परिजनों से मुलाकात की. वहां से लौटकर पटना में एक संवाददाता सम्मेलन कासे संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इस घटना ने बिहार में गुंडा राज का चेहरा उजागर कर दिया है. सवाल उठता है कि दलितों के हक की बात करने वाले नेता, जीतन राम मांझी और चिराग पासवान आज चुप क्यों हैं? क्या उनकी राजनीति सिर्फ वोट तक सीमित है? भाकपा(माले) ने इस मामले में दोषी डॉक्टर की तत्काल गिरफ्तारी और पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा देने की मांग की है.