वर्ष 34 / अंक-35 / 28 दिसंबर 2025 : पर्यावरण बचाओ, भारत बचाओ दिवस मना...

28 दिसंबर 2025 : पर्यावरण बचाओ, भारत बचाओ दिवस मनाएं

28 दिसंबर 2025 : पर्यावरण बचाओ, भारत बचाओ दिवस मनाएं

अरावली बचाओ! हिमालय बचाओ! ग्रेट निकोबार बचाओ! हसदेव अरण्य बचाओ!

प्रकृति और हमारी जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए कोई प्लान-बी नहीं है. हमारे पास एक ही दुनिया है. दिल्ली की दमघोंटू हवा से लेकर छत्तीसगढ़ और ग्रेट निकोबार के उजड़ते जंगलों तक, और हिमालय में लगातार सामने आती आपदाओं तक – हम अपने भविष्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के खिलाफ मोदी सरकार की विनाशकारी नीतियों के गवाह हैं.

एक तरफ मोदी सरकार झूठ पर झूठ बोल रही है, और दूसरी तरफ उसके कारपोरेट मित्र – सरकार की तथाकथित ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ नीति के पूरे संरक्षण में – हमारी सांसों की हवा, पीने का पानी, जंगल, पहाड़ और प्रकृति को बेरहमी से तबाह कर रहे हैं. जब पूरी दुनिया जलवायु संकट और उसके गरीब-कमजोर लोगों पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंतित है, तब यह सरकार बेशर्मी से पर्यावरण विनाश के रास्ते पर आगे बढ़ रही है.

अरावली

मोदी सरकार ने दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला, अरावली, की परिभाषा को मनमाने और छलपूर्ण तरीके से बदल दिया है ताकि इन्हें खनन के लिए खोल दिया जा सके. अब वे इस विनाश को ‘टिकाऊ खनन’ के नाम पर जनता को बेचने की कोशिश कर रहे हैं. इस नई परिभाषा के बाद अरावली का नब्बे फीसदी से ज्यादा हिस्सा खनन माफिया के खतरे में आ गया है.

लगभग 670 किलोमीटर में फैली अरावली, दिल्ली से शुरू होकर दक्षिणी हरियाणा और राजस्थान से गुजरती हुई अहमदाबाद तक जाती है. ये पहाड़ियां पूरे इलाके के लिए ‘फेफड़े’ के समान हैं. अरावली के बिना दिल्ली और आसपास के इलाके भीषण मरुस्थलीकरण का सामना कर सकते हैं. सदियों से ये पहाड़ियां थार रेगिस्तान की धूल और लू के सामने प्राकृतिक ढाल रही हैं. इनकी चट्टानी धारियां और ढलान रेगिस्तानी हवाओं की रफ्तार को धीमा करती हैं, मिट्टी को थामे रखती हैं, धूल को रोकती हैं, नमी को संतुलित करती हैं और बारिश के पानी को जमीन के भीतर जलस्रोतों तक पहुंचने देती हैं. ये प्रकृति के अपने जल और जलवायु नियामक हैं, लेकिन आज इन्हें हमेशा के लिए खोने का खतरा है.

यह खतरा सिर्फ अरावली तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर में फैल रही लूट, दोहन और पर्यावरणीय विनाश की बड़े साजिश का हिस्सा है.

हिमालय

उत्तराखंड में मोदी सरकार ने 900 किलोमीटर की चारधाम सड़क परियोजना को जानबूझकर 100 किलोमीटर से कम के 53 हिस्सों में बांट दिया, ताकि बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरी समग्र पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) से बचा जा सके. इसके साथ ही नाजुक हिमालयी क्षेत्रा में अवैज्ञानिक और लापरवाह निर्माण को खुली छूट दी गई.

आज इसके जानलेवा नतीजे सामने हैं – भूस्खलन, बाढ़ और जोशीमठ में जमीन धंसने की त्रासदी. ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, नदियां उफान पर हैं, और स्थानीय समुदाय हर साल जान-माल और रोजी-रोटी खो रहे हैं.

ग्रेट निकोबार

ग्रेट निकोबार स्वैप यानी कम्पेन्सेटरी अफॉरेस्टेशन के नाम पर, सरकार ने मेगा विकास परियोजना के लिए ग्रेट निकोबार द्वीप के 130 वर्ग किलोमीटर के प्राकृतिक उष्णकटिबंधीय जंगल को नष्ट कर दिया. इसके तथाकथित मुआवजे के तौर पर हरियाणा की अरावली में पौधारोपण दिखाया गया – जो निकोबार से करीब 2,400 किलोमीटर दूर है और पूरी तरह अलग पारिस्थितिकी और जलवायु में स्थित है. इस खुले पर्यावरणीय धोखाधड़ी को अब ‘अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट’ के नाम से पेश किया जा रहा है.

हसदेव अरण्य

छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य, भारत के सबसे घने जंगलों में से एक, मोदी सरकार के कारपोरेट मित्र अडानी के हितों के लिए निशाने पर है. लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं, हजारों एकड़ जंगल मिटाए जा रहे हैं, और यह सब पेसा कानून, वन संरक्षण अधिनियम और भूमि अधिग्रहण कानून 2013 का उल्लंघन करते हुए हो रहा है. बड़ी संख्या में आदिवासी कारपोरेट बुलडोजरों के सामने जबरन बेदखली और विस्थापन का सामना कर रहे हैं.

हर तरफ विनाश

स्वच्छ यमुना और स्वच्छ गंगा जैसी योजनायें पहले ही इस सरकार की भ्रष्टाचार और संवेदनाहीनता को उजागर कर चुके हैं. हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद हमारी नदियां पहले से अधिक प्रदूषित हैं.

आज हमारे प्राकृतिक संसाधनों को उन्हीं मुनाफाखोर कारपोरेट्स के हवाले किया जा रहा है, जो दान के नाम पर सत्ताधारी पार्टी को फंड देते हैं. सरकार तथ्यों को छुपाती है, पर्यावरण कानूनों में छेड़छाड़ करती है, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल जैसे संस्थानों को कमजोर करती है, और आदिवासियों व मछुआरों की आजीविका पर हमला करती है. इसी कारपोरेट लूट के तहत झारखंड के सारंडा, हजारीबाग और संथाल परगना के जंगलों का और धनबाद के आसपास कोयला खनन इलाकों का पर्यावरणीय विनाश जारी है.

सरकार हमारी शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, भोजन, काम और सूचना के अधिकार छीन रही है, और लोकतंत्र, संविधान और मतदान के अधिकार पर हमला कर रही है.

अब हमारी हवा, पानी, जंगल, समुद्र और आसमान भी सरकार के निशाने पर हैं. हमें एकजुट होकर इस विनाश की लहर का विरोध करना होगा.

हम सभी देशभक्त नागरिकों और संगठनों से अपील करते हैं कि आप अपनी आवाज उठाएं और अरावली, हिमालय, ग्रेट निकोबार और हसदेव अरण्य की रक्षा करें.

आइए, 28 दिसंबर 2025 को पर्यावरण आंदोलन के समर्थन में अपनी आवाज उठाएं – हिमालय से लेकर ग्रेट निकोबार, अरावली से हसदेव अरण्य तक, भारत का पर्यावरण बिक्री के लिए नहीं है!



27 December, 2025