लखनऊ के बख्शी का तालाब क्षेत्र के अस्ती गांव में मस्जिद ध्वस्तीकरण
10 अप्रैल की सुबह सोशल मीडिया से लोगों को पता चला कि लखनऊ में बख्शी का तालाब (बीकेटी) तहसील क्षेत्र के अस्ति गांव में दशकों पुरानी मस्जिद के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करने के बाद, पुलिस और प्रशासन ने भगवा ब्रिगेड के इशारे पर पीड़ित पक्ष के 18 निर्दाष युवकों को ‘शांति भंग’ के फर्जी आरोपों में फंसा दिया है, जिसमें से दो मंद बुद्धि भी हैं. अब इन लोगों को 2-2 लाख रूपये का मुचलका भरना होगा और 2-2 जमानतदार लाकर अपनी जमानत करानी होगी.
भाकपा(माले) ने अविलंब प्रशासन की दमनकारी नीति की कड़ी आलोचना करते हुए शांति भंग के नाम पर प्रशासन की पूरी कार्रवाई को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की मांग की. भाकपा(माले) की राज्य इकाई ने कहा कि योगी सरकार में मुस्लिमों और उनकी धार्मिक-शैक्षणिक संस्थानों को निशाना बनाया जा रहा है. यह बेहद शर्मनाक है कि प्रशासन ने पीड़ित पक्ष के सामूहिक रूप से 18 युवाओं पर मुकदमा दर्ज किया, जिसमें दो ऐसे युवक भी शामिल हैं जो मानसिक रूप से अक्षम हैं. 2-2 लाख रुपये के भारी मुचलके और दो-दो जमानतदारों की शर्त केवल इन गरीब परिवारों को आर्थिक रूप से तबाह करने और डराने के उद्देश्य से लगाई गई है. यह कार्रवाई कानून का दुरुपयोग और मुस्लिमों के खिलाफ बदले की भावना से प्रेरित है.
जानकारी के अनुसार, अस्ति गांव की न्यायिक आदेश से ध्वस्त की गई मस्जिद दबंगों व भगवा ताकतों के निशाने पर पहले से थी. बाप-दादे के जमाने से मौजूद धार्मिक स्थल पीड़ितों द्वारा कागज-पत्तर न दिखा पाने के कारण ध्वस्तीकरण का शिकार हुआ. ऊपर से चुप कराने के लिए पीड़ित पक्ष के खिलाफ पुलिस कार्रवाई भी कर दी गई. यह बुलडोजर राज का ‘न्याय’ है.
अगले ही दिन भाकपा(माले) का एक प्रतिनिधिमंडल अस्ती गांव पहुंचा और मस्जिद ध्वस्तीकरण के बाद वहां के मुस्लिम समुदाय के लोगों से मुलाकात की. प्रतिनिधिमंडल में लखनऊ जिला प्रभारी कामरेड रामेश सिंह सेंगर, राज्य कमेटी सदस्य कामरेड कमला गौतम और राजीव गुप्ता, तथा जिला नेतृत्वकारी टीम के सदस्य शांतम निधि शामिल थे. प्रतिनिधिमंडल ने मौके पर स्थिति का जायजा लिया और स्थानीय निवासियों तथा प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए.
अस्ती गांव की घटना के संदर्भ में अत्यंत चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि प्रशासन द्वारा 18 गरीब मुस्लिम व्यक्तियों के खिलाफ “कानून-व्यवस्था भंग करने की आशंका” के आधार पर कार्यवाही शुरू की गई है, जिसमें प्रत्येक पर 2 लाख रूपये की जमानत की शर्त लगाई गई है. यह कार्यवाही ऐसे समय में की जा रही है जब समुदाय पहले ही अपने इकलौते इबादत स्थल के ध्वस्तीकरण से आहत और असुरक्षित स्थिति में है. इस प्रकार की कठोर जमानती शर्तें न्यायसंगत प्रक्रिया का हिस्सा कम और भय का माहौल बनाने का उपकरण अधिक प्रतीत होती हैं. यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि प्रशासनिक शक्ति का उपयोग केवल भूमि विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसे समुदाय के भीतर असुरक्षा और चुप्पी स्थापित करने के लिए भी विस्तारित किया जा रहा है.
इस दौरे से जो तथ्य सामने आए हैं, वे अत्यंत चिंताजनक हैं और उन्हें एक सामान्य “अवैध कब्जा हटाने” की प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं किया जा सकता.
स्थानीय लोगों ने प्रतिनिधिमंडल को बताया कि मस्जिद ध्वस्तीकरण से पहले बजरंग दल के सदस्य गांव में आए, उन्होंने तथाकथित अवैध कब्जे का मुद्दा उठाया और आक्रामक सांप्रदायिक नारेबाजी की. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि वह सीधे मुस्लिम समुदाय और मस्जिद पर हमले में बदल सकती थी, और केवल पुलिस की मौजूदगी ने तत्काल हिंसा को रोका. घटनाक्रम की यह श्रृंखला इस बात को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करती है कि किस प्रकार जमीनी स्तर पर हुई सांप्रदायिक लामबंदी ने बाद की प्रशासनिक कार्रवाई को प्रभावित और निर्देशित किया.
इस उकसावे के तुरंत बाद तहसील प्रशासन ने नोटिस किसी औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त प्रबंधन समिति को नहीं, बल्कि उन स्थानीय व्यक्तियों को जारी किए जो केवल स्थायी इमाम की अनुपस्थिति में मस्जिद की अस्थायी देखभाल कर रहे थे. इन व्यक्तियों का न तो निर्माण से कोई संबंध था, न स्वामित्व से और न ही किसी संस्थागत प्राधिकरण से. उच्च न्यायालय के अभिलेख स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि याचिकाकर्ताओं को मस्जिद के निर्माण या स्वामित्व से नहीं जोड़ा जा सका, और इसी आधार पर उन पर लगाया गया जुर्माना भी निरस्त कर दिया गया. इसके बावजूद, किसी स्पष्ट कानूनी इकाई की अनुपस्थिति का उपयोग करते हुए प्रशासन ने बिखरे हुए व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही चलाई, जिससे किसी सार्थक संस्थागत बचाव की संभावना ही समाप्त हो गई.
पूरे मामले को राज्य ने संकीर्ण रूप से “ग्राम सभा भूमि पर अनधिकृत कब्जा” के रूप में प्रस्तुत किया और इसे उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत चलने वाली संक्षिप्त (summary) कार्यवाही के अंतर्गत निपटाया गया. इस प्रक्रिया में निर्णय मुख्यतः हलफनामों और प्रशासनिक रिपोर्टों के आधार पर लिए जाते हैं, जहां विस्तृत साक्ष्य या अनिवार्य जिरह की आवश्यकता नहीं होती. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तहसील के आदेश को बरकरार रखते हुए मुख्य रूप से इस आधार पर निर्णय दिया कि याचिकाकर्ता भूमि पर अपना कोई वैध अधिकार या शीर्षक सिद्ध नहीं कर सके और वह भूमि राजस्व अभिलेखों में “खलिहान” के रूप में दर्ज ग्राम सभा की भूमि है. इस प्रकार, पचास से अधिक वर्षों से अस्तित्व में रही एक धार्मिक संरचना को मात्रा राजस्व अभिलेखों के एक तकनीकी प्रश्न तक सीमित कर दिया गया, जबकि व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर कोई विचार नहीं किया गया. और इससे भी अधिक चिंताजनक है वह जो इस प्रक्रिया में पूरी तरह अनुपस्थित रहा.
पचास वर्ष पहले अस्ती गांव में यह मस्जिद हिंदू और मुस्लिम समुदायों ने मिलकर बनाई थी, जो उस समय की साझा सामाजिकता, आपसी भरोसे और सहअस्तित्व की ठोस अभिव्यक्ति थी. आज वही स्थान, जो कभी मिलकर निर्माण का प्रतीक था, विभाजन और अविश्वास की राजनीति का शिकार बन गया है. जिस संरचना को दोनों समुदायों ने साथ मिलकर खड़ा किया था, उसे अब संकीर्ण कानूनी तकनीक और चयनात्मक प्रशासनिक कार्रवाई के जरिए मिटा दिया गया है. यह बदलाव केवल एक मस्जिद के ध्वस्तीकरण का नहीं, बल्कि उस सामाजिक ताने-बाने के क्षरण का संकेत है, जिसमें कभी साझी विरासत और पारस्परिक सम्मान की जगह थी.
यह तथ्य कि यह एक सक्रिय मस्जिद थी जहां समुदाय अपने धर्म का पालन करता था, यह तथ्य कि पूरे गांव में यह एकमात्र मस्जिद थी, और यह तथ्य कि इसी प्रकार की स्थिति में कई अन्य धार्मिक संरचनाएं, विशेषकर मंदिर, ग्राम सभा भूमि पर बिना किसी लीज के मौजूद हैं, इन सभी को कानूनी रूप से अदृश्य बना दिया गया. जब समान कानूनी स्थिति में स्थित संरचनाओं के साथ बिना किसी युक्तिसंगत वर्गीकरण के भिन्न व्यवहार किया जाता है, तो राज्य की कार्रवाई कानूनसम्मत नहीं रह जाती, बल्कि संवैधानिक अर्थों में मनमानी बन जाती है. इस स्पष्ट विरोधाभास की किसी भी स्तर पर जांच न होना चयनात्मक प्रवर्तन की गहरी समस्या को उजागर करता है.
प्रत्यक्षदर्शियों ने यह भी बताया कि मस्जिद का ध्वस्तीकरण भारी पुलिस बल की मौजूदगी में किया गया और लोगों को तितर-बितर करने के लिए बिना किसी उकसावे के हवाई फायरिंग की गई, जिससे भय का माहौल उत्पन्न किया गया. इस प्रकार की शक्ति का प्रयोग न केवल अनुपातहीनता बल्कि प्रशासनिक मंशा पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है.
आज स्थिति यह है कि अस्ती गांव का मुस्लिम समुदाय अपने इकलौते इबादत स्थल से वंचित हो गया है. एक ऐसा स्थान जो दशकों से सामूहिक धार्मिक जीवन का केंद्र था, उसे ऐसे प्रशासनिक ढांचे के माध्यम से समाप्त कर दिया गया जो अधिकारों, समानता और ऐतिहासिक वास्तविकताओं के साथ किसी सार्थक संवाद में नहीं उतरता, बल्कि केवल त्वरित बेदखली सुनिश्चित करने के लिए निर्मित है.
भाकपा(माले) जांच दल की मांगें
- 18 गरीब मुस्लिम व्यक्तियों के खिलाफ “कानून-व्यवस्था” के नाम पर की गई कार्यवाही और 2 लाख की जमानती शर्तों को तत्काल वापस लिया जाए तथा इस प्रकार की दमनात्मक कार्रवाइयों पर रोक लगाई जाए.
- अस्ती गांव के मुस्लिम समुदाय के लिए तत्काल भूमि उपलब्ध कराई जाए और मस्जिद के पुनर्निर्माण को सुनिश्चित किया जाए.
- ग्राम सभा भूमि पर स्थित सभी संरचनाओं का एक व्यापक और पारदर्शी सर्वे कराया जाए और सभी समुदायों पर समान मानक लागू किए जाएं.
- ध्वस्तीकरण से पहले हुई सांप्रदायिक लामबंदी और उसमें शामिल संगठनों की भूमिका की स्वतंत्रा जांच कराई जाए.
- ध्वस्तीकरण के दौरान पुलिस द्वारा किए गए बल प्रयोग, विशेषकर हवाई फायरिंग, की जांच कराई जाए.
पार्टी दोहराती है कि कानून का शासन तकनीकी प्रावधानों के चयनात्मक प्रवर्तन तक सीमित नहीं किया जा सकता. एक ऐसा कानून जो केवल कागजों में दर्ज स्वामित्व को देखता है और लोगों के अस्तित्व को नहीं, जो केवल मालिकाना हक को पहचानता है और जीवन की वास्तविकता को नहीं, वह न्याय नहीं करता, वह बेदखली का निर्माण करता है.