वर्ष 35 / अंक - 05 / पश्चिम बंगाल में SIR : वोटर सत्यापन के नाम पर आतंक...

पश्चिम बंगाल में SIR : वोटर सत्यापन के नाम पर आतंकराज!

पश्चिम बंगाल में SIR : वोटर सत्यापन के नाम पर आतंकराज!

चुनाव आयोग जिसे ‘मतदाता सूची सुधार’ (SIR) का मामूली काम बता रहा था, उसकी असलियत अब बंगाल की जनता के सामने आ गई है. जब लोगों के पास ‘सुनवाई’ के नोटिस पहुंचने शुरू हुए, तब जाकर सबको समझ आया कि यह कोई साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मतदाताओं  को डराने-धमकाने और प्रताड़ित कर राजनीतिक हस्तक्षेप करने की एक गहरी साजिश है.

बूथ लेवल ऑफिसर इसे पहले ही भांप चुके थे. उन पर सबसे ज्यादा दबाव था और वे सबसे पहले विरोध करने वाले थे. उनका विरोध जल्दी ही आम जनता में फैल गया. जनवरी के तीसरे हफ्ते तक जनता का गुस्सा उबलने लगा था. अब रोष सिपर्फ चुनाव आयोग पर नहीं था; यह तेजी से भाजपा नेतृत्व पर भी फूटने लगा.

उत्पीड़न का चुनाव आयोग

कई सालों से भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री बार-बार धमकी देते रहे हैं कि पश्चिम बंगाल के ‘घुसपैठिए’, ‘रोहिंग्या’ और ‘नकली मतदाताओं’ की पहचान कर उन्हें बांग्लादेश में भेज दिया जाएगा. एसआईआर की घोषणा के साथ ही इसका  आतंक आम लोगों में फैल गया. बहुत से लोगों, खासकर गरीब और हाशिए पर रहने वालों, के पास जरूरी दस्तावेज नहीं हैं.

भाजपा की ‘देश से निकालने’ की बयानबाजी ने इस आतंक को और गहरा कर दिया है. ये डर बेबुनियाद नहीं थे. बंगाली प्रवासी मजदूरों को पहले ही दूसरे राज्यों में हिरासत में लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सीमा पार भेजा जा चुका है.

इसलिए चिंता वजूद बचाने की थीः क्या मतदाता सूची से नाम हटने का मतलब नागरिकता ही खो जाना होगा? बंगाल के गांवों और शहरों में, लोग इस अनिश्चितता के तहत मानसिक रूप से टूटने लगे. बुजुर्गों के दिल के दौरे से मरने और डर व अपमान से आत्महत्या करने की खबरें सामने आईं. संदेह और गुस्सा लगातार बढ़ता गया.

शुरुआती चरण में, चुनाव आयोग ने साफ तौर से कहा था कि जिनके नाम 2002 की मतदाता सूची में हैं, या जो उससे अपना संबंध साबित कर सकते हैं, उन्हें जरूरी दस्तावेज जमा करने की जरूरत नहीं होगी. इस आश्वासन से अस्थायी राहत मिली. मसौदा सूची प्रकाशित होने तक स्थिति अपेक्षाकृत शांत रही. फिर भी आयोग के कई विरोधाभासी फैसलों ने धीरे-धीरे जनता का भरोसा खो दिया.

मनमाने और क्रूर उत्पीड़न का जीवंत अनुभव सामने आने लगा. काम के सिलसिले में घर से दूर रहने वाले कई लोग सिर्फ फॉर्म भरने के लिए वापस दौड़े. कई लोग बीएलओ के पास कई बार गए. सभी ने जरूरी जानकारी जमा कर दी. फिर भी, ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ (तार्किक विसंगति) के नाम पर एक अस्पष्ट और हथियार बना दी गई श्रेणी के आधार पर, नागरिकों को मामूली विसंगतियों के लिए सुनवाई में घसीटा गया. सुनवाई समाधान के बजाय अपमान करने का तरीका हो गया.

यहां तक कि आयोग ने प्रक्रिया के बीच में ही मान्य दस्तावेजों की लिस्ट बदल दी. बंगाल की बड़ी आबादी के लिए अब चुनाव आयोग उत्पीड़न का जरिया बन गया है. मुसलमानों के मामले में यह साफ दिखता है, जहां नागरिकता और मतदान देने का उनका जन्मसिद्ध अधिकार, एक ऐसा ‘विशेषाधिकार’ बना दिया गया है जिसे उन्हें बार-बार साबित करना होगा. वहीं, नमशूद्र समुदाय को भी अब समझ आ रहा है कि नागरिकता के वादों के नाम पर उनके साथ लंबे समय से धोखा होता रहा है. सीएए के तहत दिए गए आश्वासनों का खोखलापन एसआइआर के रोजमर्रा के उत्पीड़न ने उजागर कर दिया है. मतुआ बहुल इलाकों में विरोध की आग सुलग रहे हैं.

चुनाव आयोग का झूठ सामने है. अलोकतांत्रिक एसआईआर प्रक्रिया अब केवल डर,अपमान और असुरक्षा का एक सामूहिक सामाजिक जख्म बन चुकी है.

बीएलओ  का व्यवस्थित उत्पीड़न

बूथ लेवल अधिकारियों ने इस धांधली को सबसे करीब से देखा और झेला है. शुरू में उन्हें सिर्फ फॉर्म बांटने वाला ‘डाकिया’ बताया गया, लेकिन जल्द ही उन पर भारी दबाव डाल दिया गया. उन्हें बताया गया कि यह  एक ‘खास मिशन’ है. बिना किसी अतिरिक्त वेतन या सुरक्षा के, उनसे बेहद कम समय में भारी-भरकम डेटा जमा करने और ऐप पर अपलोड करने को कहा गया. स्कूल शिक्षकों और स्वास्थ्य कर्मियों पर काम का दोहरा बोझ लाद दिया गया.

आयोग ने पहले कहा था कि 2002 के रिकॉर्ड वाले लोगों को दस्तावेज नहीं देने होंगे, जिसके आधार पर बीएलओ ने सत्यापन किया. लेकिन बाद में आयोग पलट गया. जो केस पहले सही पाए गए थे, उन्हें अचानक ‘संदिग्ध’ घोषित कर दिया गया. इससे जनता का सारा गुस्सा सीधे इन अधिकारियों पर फूट पड़ा.

रही-सही कसर खराब एआइ सिस्टम ने पूरी कर दी, जो नाम की स्पेलिंग, उम्र या गांव के नाम में मामूली अंतर को भी नहीं समझ पाया. अपनी तकनीकी गलती मानने के बजाय आयोग ने सारा दोष बीएलओ पर मढ़ दिया. अब सुनवाई के दौरान उनकी कोई आवाज नहीं है; सारी ताकत ऊपर बैठे अधिकारियों के हाथ में है. बाहर से आए ‘ऑब्जर्वर्स’ की तैनाती ने यह संदेश दिया कि स्थानीय अधिकारी भरोसे के लायक नहीं हैं. वाट्सएप और मौखिक आदेशों की अराजकता ने इस अपमान को और बढ़ा दिया है.

संघीय ढांचे पर हमला

एसआइआर अब बंगाल की प्रशासनिक आजादी पर सीधा हमला बन चुका है. बीडीओ और जिला मजिस्ट्रेट जैसे अधिकारियों पर भारी दबाव है, जो राज्य के कर्मचारी होने के बावजूद चुनाव के वक्त आयोग के नीचे काम करते हैं. हालात इतने बिगड़ गए कि खुद मुख्यमंत्री को अधिकारियों से कहना पड़ा कि वे इस दबाव के आगे न झुकें.

यह पूरी कवायद राज्य की चुनावी मशीनरी पर कब्जा करने की साजिश है. दावा किया गया कि अंतिम फैसला स्थानीय निर्वाचन अधिकारी का होगा, लेकिन असल में वे सिर्फ नाम के अधिकारी रह गए. असली ताकत दिल्ली से भेजे गए उन ‘ऑब्जर्वर्स’ के पास है, जो केंद्रीय नेटवर्क से जुड़े हैं. बंगाल को एक प्रयोगशाला बना दिया गया है, जहां केंद्र यह दिखा रहा है कि कैसे चुनाव आयोग के जरिए किसी राज्य की चुनावी प्रक्रिया को हड़पा जा सकता है. यहां वोट देने का अधिकार अब संवैधानिक गारंटी नहीं, बल्कि केंद्र की मर्जी पर निर्भर हो गया है.

बंगाल की पहचान पर हमला

इस पूरी प्रक्रिया में बंगाल पर गहरा राजनीतिक और सांस्कृतिक हमला छिपा है. भाजपा की भाषा में अब “बंगाली” होना शक, घुसपैठ और गैर-कानूनी होने से जोड़ दिया गया है. भाषा के फर्क, नामों की वर्तनी, उच्चारण और लिखने के तरीकों को एआइ सिस्टम के जरिये अपराध बना दिया गया है. बंगाली भाषा और पहचान खुद सजा का आधार बनती जा रही है.

इस मानसिक हिंसा की हद तब दिखी जब अमर्त्य सेन जैसी शख्सियतों को भी नोटिस जारी किए गए. ऐसे व्यक्ति को, जिसने कभी भारतीय नागरिकता नहीं छोड़ी. दूसरे कई प्रतिष्ठित लोगों को भी नोटिस मिलने की बातें सामने आई हैं. आयोग इसे अपनी “तटस्थता” का सबूत बताता है कि “कोई भी इससे बाहर नहीं है”. लेकिन इसका असली संदेश बिल्कुल साफ है. कोई भी सुरक्षित नहीं है. अगर अमर्त्य सेन की नागरिकता और वोट देने के हक पर सवाल उठाया जा सकता है, तो आम नागरिक की क्या बिसात है.

यहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) कोई तटस्थ तकनीक नहीं रह गई है. इसे डर फैलाने और दबाव बनाने के औजार में बदल दिया गया है. कागजों में मामूली अंतर को पहचान, नागरिकता और वोट के अधिकार पर सवाल उठाने का जरिया बना दिया गया है. हाथ में कागज होने के बावजूद लोग अपनी पहचान साबित नहीं कर पा रहे हैं. इस तकनीकी हिंसा ने नागरिक और राज्य के रिश्ते को पूरी तरह अमानवीय बना दिया है.

इसके मूल में हिंदुत्व की राजनीति है, जो ब्राह्मणवादी पदानुक्रम पर टिकी है और डर, निगरानी और नियंत्रण के सहारे चलती है. नागरिकों को शक के दायरे में खड़े प्रोफाइल में बदल दिया गया है. राज्य रक्षक नहीं रह जाता, बल्कि सजा देने वाला बन जाता है. तकनीक तरक्की का साधन नहीं रह जाती, बल्कि दबदबे और वर्चस्व का हथियार बन जाती है. ये सब एक सत्तावादी, फासीवादी परियोजना की साफ पहचान हैं, जिसे अब चुनावी मशीनरी के जरिये पश्चिम बंगाल में आजमाया जा रहा है.

31 January, 2026