सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी घरेलू कामगारों और मज़दूर वर्ग के अधिकारों पर कुठाराघात

खेद की बात है कि देश के मुख्य न्यायाधीश ने मजदूर विरोधी स्वार्थी समूहों और पूर्वाग्रहों को स्वर देने का काम किया है.

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी घरेलू कामगारों और मज़दूर वर्ग के अधिकारों पर कुठाराघात

29 जनवरी 2026 को पेन थोज़िलार्गल संगम और अन्य यूनियनों द्वारा दायर घरेलू कामगारों के अधिकारों की जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी बहुत दुखदायी है, जो एक संकीर्णतावादी सोच है। घरेलू कामगारों के लिए कल्याणकारी उपायों की मांग करने वाली जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट द्धारा की गई टिप्पणी परेशान करने वाली हैं. सर्वोच्च अदालत ने ट्रेड यूनियनों पर औद्योगिक विकास में बाधा डालने का आरोप ही लगा दिया है और कहा कि न्यूनतम मजदूरी तय करने से हायरिंग में रुकावट आएगी और मुश्किलें बढ़ेंगी।

अब न्याय की उम्मीद किससे की जाय? यह तो हर कोई जानता है कि अधिकांश औद्योगित बंदियों के पीछे मैनेजमेण्ट का नाकारापन और औद्योगित संस्थानों की पूंजी को जानबूझ कर डायवर्ट करना होता है, और ट्रेड यूनियनों तथा मजदूर आन्दोलन का इससे कोई लेना देना नहीं है. उल्टे मजदूर तो हमेशा फैक्ट्रियों को चलते रहना चाहते हैं जोकि उनके लिए जरूरी है. खेद की बात है कि देश के मुख्य न्यायाधीश ने मजदूर विरोधी स्वार्थी समूहों और पूर्वाग्रहों को स्वर देने का काम किया है.

ऐसे विचार मज़दूर वर्ग के ऐतिहासिक संघर्षों और बलिदानों को स्वीकार करने से डरते हैंए उन्हें मिटा देना चाहते हैं। आठ घंटे का कार्यदिवस, न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी श्रम सुरक्षा केवल मज़दूरों और ट्रेड यूनियनों के लगातार संघर्षों से ही हासिल हुई हैं। इन संघर्षों के बिना, गुलामी और बंधुआ मज़दूरी की व्यवस्था सामाजिक व्यवस्था के रूप में जारी रहती।

ट्रेड यूनियनों को आर्थिक विकास में बाधा बताना, इस मूलभूत सच्चाई को नज़रअंदाज़ करना है कि श्रम सुरक्षा और श्रम कानून बाधाएं नहीं हैं, बल्कि वह बुनियाद हैं जिस पर एक न्यायपूर्ण और समान समाज का निर्माण होता है।

- केंद्रीय कमेटी, भाकपा-माले लिबरेशन

31 January, 2026